समय का मरहम और अधूरी मोहब्बत: जब 10 साल बाद डॉक्टर पत्नी बीमार पति की झोपड़ी पहुँची

प्रस्तावना: नियति का क्रूर मजाक जिंदगी कभी-कभी ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहाँ हम खुद को लाचार महसूस करने लगते हैं। यह कहानी है डॉ. अंजलि और राहुल की। 10 साल पहले गरीबी और एक गलतफहमी ने इनका घर उजाड़ दिया था। आज अंजलि शहर की सबसे बड़ी डॉक्टर है, और राहुल उसी गाँव की एक टूटी झोपड़ी में अपनी आखिरी सांसें गिन रहा है। लेकिन नियti को कुछ और ही मंजूर था।

अध्याय 1: गरीबी, आंसू और वह दर्दनाक विदाई

10 साल पहले, राहुल और अंजलि एक खुशहाल जोड़ा थे। राहुल मजदूरी करता था और अंजलि का सपना डॉक्टर बनने का था। राहुल ने अपनी खुशियाँ बेचकर अंजलि की पढ़ाई का खर्च उठाया। लेकिन राहुल के बीमार पड़ने और काम छूट जाने के बाद, अंजलि के परिवार वालों ने राहुल को “नाकाम” करार दिया।

अंजलि के पिता ने राहुल पर दबाव डाला कि वह अंजलि की जिंदगी से दूर चला जाए ताकि वह अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे सके। राहुल ने अंजलि के भविष्य के लिए एक बहुत बड़ा झूठ बोला। उसने अंजलि से कहा कि वह किसी और से प्यार करता है और उसे अब अंजलि की जरूरत नहीं है। अंजलि का दिल टूट गया। नफरत और जिद में उसने घर छोड़ दिया और डॉक्टर बनने के अपने मिशन में लग गई। तलाक के कागजों पर साइन करते वक्त अंजलि ने कसम खाई थी कि वह कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेगी।

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अध्याय 2: शहर की चमक और गाँव का अंधेरा

10 साल बीत गए। अंजलि अब “डॉ. अंजलि” बन चुकी थी। उसके पास दौलत, शोहरत और नाम सब कुछ था। लेकिन उसके दिल के एक कोने में राहुल के लिए नफरत की आग आज भी जल रही थी। उसे लगता था कि राहुल ने उसे धोखा दिया।

दूसरी तरफ, राहुल की हालत बद से बदतर होती गई। अंजलि की पढ़ाई का कर्ज चुकाने और अपनी बीमारी का इलाज न कराने की वजह से उसका शरीर जर्जर हो चुका था। वह गाँव के किनारे एक पुरानी झोपड़ी में रहने लगा। गाँव वाले उसे “पागल प्रेमी” कहते थे, जो दिन भर काम करता और रात को अंजलि की पुरानी तस्वीरों को देखकर रोता था।

अध्याय 3: एक मेडिकल कैंप और पुरानी गलियाँ

एक दिन अंजलि को उसी गाँव में एक मेडिकल कैंप लगाने के लिए भेजा गया जहाँ उसने अपना बचपन बिताया था। वह नहीं चाहती थी, लेकिन ड्यूटी के कारण उसे जाना पड़ा। कैंप में सैकड़ों मरीज आए, लेकिन तभी एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ आया और अंजलि का हाथ पकड़कर रोने लगा— “डॉक्टर दीदी, बचा लो! झोपड़ी वाले काका मर रहे हैं।”

अंजलि का दिल अचानक जोर से धड़का। वह अपनी टीम के साथ उस झोपड़ी की तरफ भागी। जैसे ही वह झोपड़ी के अंदर दाखिल हुई, वहाँ की गरीबी और बदबू देखकर उसका दम घुटने लगा। लेकिन जब उसकी नजर जमीन पर पड़ी फटी चटाई पर लेटे उस शख्स पर पड़ी, तो उसके हाथ से स्टेथोस्कोप गिर गया।

अध्याय 4: 10 साल बाद की वह मुलाकात

वह राहुल था। चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था—धंसी हुई आँखें, सफेद बाल और हड्डियों का ढांचा बना शरीर। वह खून की उल्टियाँ कर रहा था। अंजलि चीख पड़ी— “राहुल!”

राहुल ने अपनी धुंधली आँखें खोलीं। उसने अंजलि को देखा और उसके चेहरे पर एक अलौकिक मुस्कान आ गई। उसने कांपते हुए कहा— “डॉक्टर साहिबा… आप आ गईं? अब मैं शांति से मर सकता हूँ।”

अंजलि ने तुरंत उसका इलाज शुरू किया। उसने देखा कि राहुल को फेफड़ों की गंभीर बीमारी थी, जिसका इलाज समय पर न होने के कारण वह अंतिम अवस्था में पहुँच चुका था। झोपड़ी की दीवारों पर अंजलि के नाम की डिग्रियाँ और उसकी तस्वीरों के अखबार में छपे कतरन लगे थे। अंजलि को एहसास हुआ कि राहुल ने उसे कभी भुलाया ही नहीं था।

अध्याय 5: वह खौफनाक सच और पश्चाताप

तभी राहुल के पुराने दोस्त ने अंजलि को वह सच बताया जिसे सुनकर पूरी दुनिया हिल गई। उसने बताया कि 10 साल पहले राहुल ने कभी किसी और से प्यार नहीं किया था। वह तो खुद बीमार था और नहीं चाहता था कि उसकी बीमारी अंजलि के करियर में बाधा बने। उसने अंजलि के पिता से वादा किया था कि वह अंजलि की नजरों में खुद को “गिरा” लेगा ताकि अंजलि आगे बढ़ सके।

दोस्त ने एक छोटी सी संदूक खोली, जिसमें राहुल की पिछले 10 साल की कमाई के कुछ सिक्के और अंजलि के लिए लिखी गई हजारों चिट्ठियां थीं, जो उसने कभी पोस्ट नहीं की थीं। अंजलि वहीं जमीन पर बैठकर दहाड़ें मार-मार कर रोने लगी। पूरा गाँव झोपड़ी के बाहर इकट्ठा हो गया था, और सबकी आँखें नम थीं।

अध्याय 6: चमत्कार और गाँव का साथ

अंजलि ने हार नहीं मानी। उसने राहुल को तुरंत अपने बड़े अस्पताल में शिफ्ट किया। गाँव वालों ने राहुल को एम्बुलेंस तक ले जाने के लिए कंधा दिया। अंजलि ने अपनी पूरी जमा पूंजी और अपनी सारी डॉक्टर वाली ताकत राहुल को बचाने में लगा दी। वह रात-रात भर उसके बेड के पास बैठी रहती और उससे माफी मांगती।

वह डॉक्टर नहीं, बल्कि वही पुरानी अंजलि बन गई थी। राहुल की हालत नाजुक थी, लेकिन अंजलि की दुआओं और मेडिकल साइंस ने चमत्कार कर दिखाया। राहुल की आँखों में जीने की इच्छा वापस आ गई थी।

निष्कर्ष: एक नई सुबह

महीनों के इलाज के बाद, राहुल ठीक होकर जब वापस गाँव आया, तो अंजलि उसके साथ थी। उसने अपना आलीशान बंगला बेच दिया और गाँव में ही एक अस्पताल खोला ताकि किसी और “राहुल” को इलाज के अभाव में झोपड़ी में न मरना पड़े।

पूरे गाँव ने उनका स्वागत किया। आज राहुल और अंजलि एक साथ हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि:

प्यार सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि त्याग का नाम है।

गलतफहमियां रिश्तों को तोड़ सकती हैं, लेकिन अगर प्यार सच्चा हो तो नियति दोबारा मिला ही देती है।

सफलता तभी सार्थक है जब वह अपनों के काम आए।

जब अंजलि और राहुल गाँव के उसी मंदिर में माथा टेकने गए, तो पूरा गाँव खुशी के आंसू रो रहा था। इंसानियत की जीत हुई थी।