जिस कैफ़े में पत्नी कॉफ़ी पीने आई… वहीं वेटर का काम करते मिला उसका तलाकशुदा पति… फिर जो हुआ

मुंबई के बांद्रा इलाके में एक बड़ा खूबसूरत कैफे था, जहां शाम का वक्त हमेशा रौनक भरा होता था। हर टेबल पर लोग अपनी-अपनी बातों में खोए थे। कहीं बिजनेस की चर्चा चल रही थी तो कहीं दोस्तों की हंसी गूंज रही थी। लेकिन उसी भीड़ में खिड़की के पास वाली टेबल पर एक औरत अकेली बैठी थी। उसका नाम नैना था। सामने उसका लैपटॉप खुला था, लेकिन उसकी नजरें स्क्रीन पर नहीं थीं। वह बस कॉफी का इंतजार कर रही थी, जैसे रोज करती थी। लेकिन आज का इंतजार कुछ अलग था।

नैना के अंदर एक बेचैनी थी, जिसे वह खुद भी नहीं समझ पा रही थी। वह बार-बार घड़ी की सुइयों को देखती, बालों के लट को कान के पीछे करती और बाहर गिरती हल्की बारिश को निहारती रही। बारिश हमेशा से उसे सुकून देती थी, लेकिन आज उस सुकून में भी एक अधूरापन था। तभी टेबल पर ट्रे रखी गई। एक नरम सी आवाज आई, “मैम, आपकी कॉफी।” नैना ने बिना ऊपर देखे कहा, “थैंक यू।” लेकिन जैसे ही वो आवाज उसके कानों में पड़ी, उसकी उंगलियां रुक गईं। कुछ जाना-पहचाना था उस लहजे में।

भाग 2: अतीत की यादें

धीरे-धीरे नैना ने सिर उठाया और सामने जो खड़ा था, उसे देखकर उसका दिल जैसे धड़कना भूल गया। सामने विक्रांत खड़ा था। वह कई सालों बाद उसे देख रही थी। वही चेहरा, वही आंखें, वही मुस्कान। बस अब उनमें एक सादगी थी, थोड़ी थकान और एक ऐसी शांति जो तब नहीं थी जब वह उसके साथ था। विक्रांत ने उसकी नजरों से बचते हुए बस इतना कहा, “अगर कुछ और चाहिए हो तो बताइएगा, मैम,” और ट्रे उठाकर धीरे से चला गया।

नैना वहीं बैठी रह गई। कॉफी सामने रखी थी, लेकिन उसे पीने का मन नहीं हुआ। कब से उठती भाप ठंडी हो गई। पर उसके अंदर पुरानी यादों की गर्माहट लौट आई। उसकी नजर वहीं अटकी रही जहां से विक्रांत अभी-अभी गया था। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिस इंसान को उसने अपने जीवन से हमेशा के लिए काट दिया था, वह आज उसके सामने खड़ा था, किसी और के लिए कॉफी सर्व करते हुए।

नैना ने आंखें बंद कीं और उसके मन में वह दिन घूमने लगे जब यही विक्रांत उसका सब कुछ था। वह वक्त जब शादी के शुरुआती सालों में दोनों एक कप कॉफी शेयर करते थे। विक्रांत मुस्कुराकर कहता था, “एक दिन मैं कुछ बड़ा बनूंगा नैना। तू देखना लोग मेरे नाम की कॉफी पिएंगे।” नैना की आंखों के कोने भीग गए। वह सोचने लगी, कभी यही मर्द उसका पति हुआ करता था, जिसके साथ उसने जिंदगी के हर सपने देखे थे।

भाग 3: बिछड़ने का दर्द

लेकिन अब वही मर्द किसी और की ट्रे में घूम रहा था। नैना के अंदर कुछ टूट सा गया। वह चाहती थी कि उठकर कुछ कहे, पर जुबान साथ नहीं दे रही थी। बस मन में एक ही बात घूम रही थी, “मैंने उसे छोड़कर क्या पा लिया?” उसने गहरी सांस ली, कुर्सी पर पीछे झुकी और खिड़की से बाहर देखने लगी। बारिश फिर से शुरू हो चुकी थी। बूंदें कांच पर गिरकर धुंधला दृश्य बना रही थीं। जैसे किसी ने उसकी जिंदगी का अतीत धुंधला कर दिया हो।

वह खुद से बुदबुदाई, “शायद जिंदगी ने जानबूझकर आज उसे मेरे सामने भेजा है ताकि मैं समझ सकूं कि अमीरी और शोहरत से बढ़कर कुछ चीजें होती हैं।” कॉफी का कप अब ठंडा हो चुका था। लेकिन उसके अंदर कुछ पिघलने लगा था—पछतावा, यादें और वह एहसास जिसे उसने सालों पहले अपने गुस्से के नीचे दबा दिया था।

भाग 4: घर की ओर लौटना

शहर की हलचल जारी थी। लोग आ जा रहे थे, लेकिन नैना वही जमी रही। उस एक पल में जहां अतीत और वर्तमान आमने-सामने खड़े थे। भारी दिल से उसने कॉफी का अधूरा कप वहीं छोड़ दिया, बैग उठाया और बिना पीछे देखे कैफे से बाहर निकल आई। बारिश थम चुकी थी, लेकिन हवा में नमी और गंध बाकी थी। जैसे आसमान ने भी कुछ देर पहले आंसू बहाए हों।

वह सड़क किनारे कुछ पल खड़ी रही। गहरी सांस ली और खुद से पूछा, “क्या यही जिंदगी है जिसकी चाह में मैंने सब कुछ खो दिया?” उसके कदम खुद-ब-खुद गाड़ी तक पहुंचे। शहर की लाइटें शीशे पर चमक रही थीं, पर उसके भीतर अंधेरा उतरता जा रहा था। वह बिना कुछ बोले घर पहुंची। जूते उतारे, बैग सोफे पर फेंका और बिस्तर पर लेट गई। छत को देखते-देखते उसकी आंखों के सामने वही चेहरा घूमने लगा—विक्रांत का वही मुस्कुराता, सादा, सच्चा चेहरा।

भाग 5: पुरानी यादें और नई सोच

नींद उसकी आंखों से बहुत दूर थी। बस यादें थीं। 7 साल पुरानी, जब जिंदगी आसान, सच्ची और सपनों से भरी थी। वह दिन भी कुछ ऐसा ही था। शादी के शुरुआती साल थे। दिल्ली की सर्दियां अपने पूरे शबाब पर थीं। किचन में सस्ती कॉफी की खुशबू और ठंडी हवा मिलकर हर शाम को किसी फिल्म का सीन बना देती थी। नैना अक्सर उसी कोने की कुर्सी पर बैठती, जहां विक्रांत पहले से मौजूद होता।

विक्रांत मिडिल क्लास परिवार का लड़का था, आंखों में भरोसा और जुबान पर सच्चाई लिए वह सपने देखता था। वह कहता था, “जिंदगी में बड़ा बनने के लिए बड़ा दिल चाहिए, बाकी चीजें वक्त सिखा देती हैं।” नैना को उसकी यही बात पसंद थी। दोनों की शादी प्यार की थी, जहां शुरुआत में औपचारिक बातें हुईं, फिर छोटी-छोटी हंसी, फिर लंबी बातें और फिर वे एक-दूसरे के दिन का सबसे जरूरी हिस्सा बन गए।

भाग 6: तलाक का फैसला

लेकिन वक्त वही करता है जो उसे सही लगता है। नौकरी गई, बिजनेस में नुकसान हुआ और सपनों की दिशा अलग-अलग हो गई। नैना के परिवार का दबाव साफ था। “ऐसे लड़के के साथ जिंदगी बर्बाद मत कर। हमारी बेटी किसी छोटे सपनों वाले मर्द के लिए नहीं बनी।” यह बात नैना के दिल में कांटे की तरह चुभ गई। उस दिन उसने विक्रांत से कहा, “मुझे तलाक चाहिए।”

विक्रांत कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर ठंडी आवाज में बोला, “जिसके पास ना घर है, ना स्थिर नौकरी, मैं सचमुच तेरे लायक नहीं रहा।” नैना की आंखों में आंसू थे, पर होठों पर सिर्फ एक वाक्य था, “मैं थक गई हूं।” विक्रांत ने व्यंग से मुस्कुराकर कहा, “ठीक है। तलाक के कागज भेज देना।”

भाग 7: बिछड़ने के बाद

शाम को विक्रांत सामान पैक कर रहा था। उसके चेहरे पर वही सच्चाई थी, पर आंखों में डर था। कहीं वह उसे हमेशा के लिए खो न दे। “तू रो क्यों रही है?” विक्रांत बोला, “मैं हूं ना, सब ठीक कर दूंगा।” नैना ने सिर हिलाया। “नहीं विक्रांत, अब कुछ ठीक नहीं हो सकता।”

भाग 8: नए सफर की शुरुआत

वक्त बीतता गया। नैना ने खुद को काम में झोंक दिया। पारिवारिक बिजनेस संभाला। नाम और शोहरत दोनों मिली। लोग कहते थे वह मिसाल है सफलता की। पर वह खुद जानती थी कि उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा हिस्सा अधूरा है। कभी-कभी खुद से कहती, “वो बस एक गलती थी।” लेकिन जब भी बारिश होती, कॉफी की खुशबू हवा में घुलती, तो दिल में वही विक्रांत लौट आता।

आज रात बिस्तर पर लेटी नैना वह सारी बातें याद कर रही थी, जिन्हें उसने सालों से अपने अंदर दफन कर रखा था। उसके होठों पर एक हल्की मुस्कान आई—कड़वी लेकिन सच्ची। उसने खुद से कहा, “शायद वक्त अब मुझे उसी कॉफी का बिल चुकाने आया है जिसका स्वाद मैंने अधूरा छोड़ा था।”

भाग 9: नई शुरुआत

सुबह की रोशनी खिड़की से भीतर आई और उसके चेहरे पर पड़ी। जैसे जिंदगी कह रही हो, “अब वक्त है उस कब को फिर से पूरा करने का।” वह बिस्तर से उठी, बाल बांधे और आईने के सामने खुद से कहा, “आज मुझे अपनी अधूरी कहानी का जवाब चाहिए।” कुछ घंटे बाद वह अपनी गाड़ी लेकर उसी रास्ते पर थी, जहां कल रात उसने अपने अतीत को देखा था।

बांद्रा की सड़कों पर ट्रैफिक वही था, पर आज उसका मन शांत था। हर सिग्नल, हर मोड़ उसे उसी जगह की तरफ ले जा रहा था। बींस ब्रस कैफे। कैफे के बाहर कार रोकी, गहरी सांस ली और अंदर चली गई। वही जगह, वही महक, बस फर्क इतना था कि आज उसके दिल में डर नहीं था। एक ठान लिया हुआ सुकून था।

भाग 10: फिर से विक्रांत से मुलाकात

वह इस बार खिड़की के पास नहीं, बीच की टेबल पर बैठी, जहां से पूरे कैफे का दृश्य दिख रहा था। उसने मेन्यू नहीं खोला। बस चुपचाप चारों ओर देखा। कुछ ही देर में वही जानी-पहचानी आवाज आई, “मैम, क्या ऑर्डर लूं?” नैना ने ऊपर देखा। सामने विक्रांत खड़ा था। वह आज भी वैसे ही सादा था, पर शायद कल से थोड़ा और परिपक्व दिख रहा था।

नैना ने मुस्कुराकर कहा, “एक ब्लैक कॉफी और 5 मिनट तुम्हारा वक्त।” विक्रांत थोड़ा चौंका। फिर हल्का सा सिर हिलाकर बोला, “कॉफी अभी लाया।” कुछ मिनट बाद वह लौटा। कप रखा। फिर हिचकते हुए बोला, “क्या बात करनी थी?”

भाग 11: सच्चाई का सामना

नैना ने सीधे उसकी आंखों में देखा। “माफी नहीं मांगूंगी विक्रांत क्योंकि वह बहुत छोटा शब्द है। लेकिन आज बस सच कहना चाहती हूं। तुम्हें देखकर लगा, मैंने जिंदगी में बहुत कुछ पाया। पर जो खोया वो सबसे कीमती था।” विक्रांत ने कुछ नहीं कहा। बस उसकी नजरों में हल्की नमी थी। वह कुर्सी खींचकर बैठ गया।

नैना ने कहा, “जिंदगी वही होती है जो रह जाती है। तुमने जो चुना वह गलत नहीं था। शायद जरूरत थी। बस रास्ते अलग हो गए। लेकिन आज मैं फिर वही रास्ता देख रही हूं।”

भाग 12: नए सपनों की शुरुआत

विक्रांत हल्का मुस्कुराया। “तुझे याद है हम कहा करते थे ना एनवी ब्रूस?” नैना की आंखें चमक उठीं, “हां, और अब वह सिर्फ सपना नहीं रहेगा।” विक्रांत ने कहा, “तू आज भी वैसी ही है जो सोचती है, कर देती है।”

नैना ने कहा, “मैं चाहती हूं हम मिलकर कुछ शुरू करें। तू जिस कॉफी शॉप में आज सर्व कर रहा है, वो अब तेरे सपनों की जगह बने। तेरे नाम से, तेरी मेहनत से। मैं साथ दूंगी। बिजनेस पार्टनर के रूप में नहीं, बल्कि उस बीवी के रूप में जो तुझे कभी समझ नहीं पाई थी।”

विक्रांत ने गहरी सांस ली। उसकी आंखों में कोई चमक थी। “तू यह सब क्यों कर रही है नैना?” वह बोला, “क्योंकि मैंने सब कुछ पा लिया पर खुद को खो दिया। अब मैं खुद को वापस पाना चाहती हूं। तेरे साथ उसी कॉफी की खुशबू में।”

भाग 13: साझेदारी का वादा

विक्रांत ने धीरे से कहा, “ठीक है, लेकिन इस बार किसी की मदद से नहीं। हम दोनों की मेहनत से।” नैना ने हाथ बढ़ाया और पहली बार तलाक के बाद विक्रांत ने उसका हाथ थामा। वह स्पर्श वैसा ही था—नरम, सच्चा और भरोसे से भरा।

भाग 14: नई शुरुआत

कई घंटे बाद जब कैफे बंद हो गया, तो दोनों उसी टेबल पर बैठकर लैपटॉप पर योजनाएं बना रहे थे। लोकेशन, मशीन, नाम, ब्रांडिंग सब पर चर्चा चल रही थी। हर बात में वह पुरानी दोस्ती लौटती जा रही थी। विक्रांत ने कहा, “एक शर्त है क्या? नाम वही रहेगा एनवी ब्रूस। पर इस बार एन और वी सिर्फ नाम नहीं, हमारी दूसरी कहानी का प्रतीक होंगे।”

नैना मुस्कुराई, “और इस बार मैं कॉफी में चीनी डालूंगी क्योंकि अब जिंदगी कड़वी नहीं लगती।” विक्रांत की हंसी गूंज उठी। सालों बाद वह हंसी जो दोनों ने खो दी थी।

भाग 15: उद्घाटन का दिन

और बाहर बारिश फिर शुरू हो चुकी थी। जैसे आसमान भी कह रहा हो, “कभी अधूरी छोड़ी कॉफी का स्वाद। वक्त खुद पूरा करवाता है।” रात देर तक कैफे की लाइट्स चलती रही। दो लोग बैठे रहे, एक नया सपना बुनते हुए, एक पुराना रिश्ता फिर से जीते हुए। नैना के दिल ने धीरे से कहा, “अब जो होगा वो सिर्फ हमारा होगा।”

भाग 16: सफलता की कहानी

अगले कुछ महीनों में मुंबई की भीड़ में एक छोटी सी दुकान आकार लेने लगी। समंदर के पास शांत कोने में और बड़े अक्षरों में बोर्ड पर लिखा गया, “कमिंग सून एनवी ब्रूस कॉफी विद स्टोरी।” नैना अकाउंट्स, इंटीरियर्स और ब्रांडिंग संभाल रही थी, जबकि विक्रांत मशीनें, मेन्यू और कॉफी बींस चुनने में लगा था।

भाग 17: नई पहचान

दोनों सुबह से रात तक काम करते। कभी भावुक होते, कभी हंसते। पर हर शाम जब सूरज ढलता तो दोनों वहीं खड़े होकर दुकान को देखते जैसे दो बच्चे अपनी बनाई रेत की हवेली देख रहे हों। एक दिन शाम को विक्रांत ने थक कर कहा, “यार, जब तू साथ होती है, कॉफी की खुशबू भी ज्यादा मीठी लगती है।” नैना मुस्कुराई, “शायद इसलिए कि अब इसमें तेरे सपनों का स्वाद मिला है।”

भाग 18: उद्घाटन का दिन

ओपनिंग से पहले वाले दिन सब कुछ तैयार था। पर अचानक एक बड़ी दिक्कत आ गई। डिलीवरी में गलती से महंगी कॉफी मशीन की जगह पुराना मॉडल भेज दिया गया था। डीलर ने कहा, “मैम, कम से कम एक हफ्ता लगेगा नई मशीन आने में।” नैना परेशान हो गई। “विक्रांत, अब क्या करेंगे? कल उद्घाटन है। लोग आएंगे। मीडिया भी बुलाया है।”

भाग 19: मेहनत का फल

विक्रांत ने शांत होकर कहा, “तू बस मेरे ऊपर भरोसा रख। कॉफी मशीन पुरानी हो सकती है पर मेहनत नहीं।” वह रात दोनों ने जागकर बिताई। विक्रांत ने हाथों से मशीन ठीक की। नैना ने खुद कॉफी कप्स की पैकिंग की। सूरज उगा तो दुकान तैयार थी। और दोनों के चेहरे पर वही चमक थी, जैसे किसी परीक्षा के पहले आत्मविश्वास।

सुबह 8:00 बजे पहला कप बना। बोर्ड पर लाइट जली, “एनवी ब्रूस नाउ ओपन।” सड़क पर रुकने वाले लोग खुशबू से खींचकर अंदर आने लगे। पहला ग्राहक आया। विक्रांत ने खुद कप बढ़ाया। “वेलकम टू एनवी ब्रूस। सर, फर्स्ट कप ऑन द हाउस।”

भाग 20: कहानी का जादू

वो ग्राहक मुस्कुराया। “आपकी कॉफी में कुछ तो अलग है।” विक्रांत ने कहा, “क्योंकि इसमें एक कहानी मिली हुई है।” नैना ने कोने से यह सब देखा। उसकी आंखें भर आईं। कभी यही मर्द जिसके पास कुछ नहीं था, आज लोगों के चेहरों पर मुस्कान बांट रहा था।

भाग 21: सफलता का जश्न

शाम तक एनवी ब्रूस सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगा। लोग फोटो पोस्ट कर रहे थे, “एनवी ब्रूस—कॉफी विद हिस्ट्री।” हर कप एक कहानी बन गया था। एक दिन नैना के पिता अखबार पढ़ रहे थे। फ्रंट पेज पर एनवी ब्रूस की खबर थी। “पूर्व बिजनेस टकून की बेटी और एक कॉफी सर्वर की साझेदारी ने बनाया नया इतिहास।”

भाग 22: परिवार का समर्थन

पिता ने अखबार मोड़ा, गहरी सांस ली और कहा, “कभी इसी लड़के को मैंने कहा था, ईमानदारी से घर नहीं चलते।” शाम को नैना घर पहुंची। पिता ड्राइंग रूम में बैठे थे। उन्होंने कहा, “बेटा, सुना है तुम्हारी कॉफी बहुत लोगों को भा रही है।” नैना ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “जी पापा, लेकिन स्वाद कॉफी का नहीं, सच्चाई का है।”

भाग 23: एक नई शुरुआत

उसी वक्त विक्रांत अंदर आया। हाथ जोड़कर बोला, “नमस्ते अंकल।” पिता ने कुछ पल तक उसे देखा। फिर धीरे से बोले, “पहली बार महसूस हो रहा है कि मैंने किसी को गलत आका था।” नैना की आंखें भर आईं। पिता ने आगे कहा, “बेटा, जब अगली ब्रांच खुले तो उद्घाटन मेरे हाथों करवाना।” विक्रांत ने हल्की मुस्कान दी। “यह मेरे लिए सम्मान होगा।”

भाग 24: बढ़ते कदम

छह महीने बाद एनवी ब्रूस की तीन ब्रांच खुल चुकी थी। लोग कहते, “यहां कॉफी नहीं, एहसास मिलता है।” हर दीवार पर लिखा था, “हर कप में एक कहानी।” एक दिन एक महिला ग्राहक आई और बोली, “यह जगह अजीब सी सुकून देती है। क्या आप दोनों कपल हैं?” नैना मुस्कुराई। “फिलहाल पार्टनर हैं, पर कॉफी जैसी चीज में वक्त लगाना पड़ता है।” विक्रांत ने मजाक में कहा, “हां, इसे ठीक कब जैसा बनने में टाइम चाहिए।”

भाग 25: सुकून की हंसी

वो हंसी अब दर्द नहीं, सुकून की थी। एक रात दुकान बंद होने के बाद दोनों अंदर बैठे थे। चारों ओर हल्की लाइटें थीं। टेबल पर दो कप रखे थे। एक बिना शक्कर वाली, एक मीठी। नैना ने धीरे से कहा, “याद है विक्रांत, तू कहा करता था, एक दिन लोग मेरे नाम की कॉफी पिएंगे?” विक्रांत मुस्कुराया। “हां, लेकिन अब लोग हमारे नाम की पी रहे हैं।”

भाग 26: एक नया वादा

वह बोला, “मैं तेरा शुक्रिया कैसे अदा करूं?” नैना ने उसकी आंखों में देखा। “शुक्रिया मत कह। बस कॉफी में मिठास बनाए रखना।” फिर विक्रांत ने धीरे से अपनी जेब से एक छोटी सी रिंग निकाली। “एनवी ब्रूस के लोगो वाली साधारण सी सिल्वर रिंग।” वह बोला, “अगर यह कहानी पूरी करनी है तो इसे भी कब की तरह दोनों हाथों से थामना पड़ेगा।”

भाग 27: प्यार की पहचान

नैना की आंखें नम हो गईं। पर होठों पर मुस्कान थी। उसने सिर झुका कर कहा, “इस बार कोई अधूरी कॉफी नहीं छोड़ूंगी।” विक्रांत ने उसका हाथ थामा। और दोनों के बीच बस एक खामोश वादा गूंजा। “अब जो होगा वो साथ होगा।”

भाग 28: नया सफर

कुछ साल बाद एनवी ब्रूस अब पूरे देश में मशहूर था। हर शहर में लोग उस कहानी को जानना चाहते थे, जहां एक करोड़पति औरत ने और एक बरिस्ता ने सिर्फ कॉफी नहीं, जिंदगी की मिठास घोली थी। नैना और विक्रांत की फिर से शादी सादे समारोह में हुई। बिना शोर शराबे के, बस परिवार, दोस्त और वह पुराना कॉफी कप जो अब उनके घर की शेल्फ पर सजाया गया था।

भाग 29: प्यार की मिठास

बोर्ड पर नया टैगलाइन जुड़ा, “एनवी ब्रूस व लव टेस्ट्स लाइक कॉफी।” एक बरसाती शाम थी। कैफे की खिड़की के पास दो कप रखे थे। विक्रांत बाहर बारिश देख रहा था। नैना ने कहा, “बारिश में कॉफी और तेरे साथ। अब जिंदगी में और क्या चाहिए?” विक्रांत मुस्कुराया। “बस इतना कि यह कप कभी खाली ना हो।”

अंत

खिड़की के शीशे पर बारिश की बूंदें गिरती रहीं और बाहर बोर्ड पर लाइट झिलमिलाने लगी। “एनवी ब्रूस—अ स्टोरी सर्व्ड वार्म।” दोस्तों, कभी-कभी जिंदगी उसी मोड़ पर वापस लाती है जहां से हमने कुछ अधूरा छोड़ा था ताकि सिखा सके कि पैसा कभी कहानी नहीं लिखता। इंसानियत और रिश्ते लिखते हैं।

क्या जिंदगी में पैसा सब कुछ दे सकता है? या फिर प्यार और इज्जत ही असली अमीरी है? कभी लगा है कि वक्त ने आपको दोबारा मौका दिया? उसी गलती को सुधारने का, उसी इंसान को पाने का? अगर जिंदगी आपको भी किसी पुराने प्यार के सामने खड़ा कर दे, तो क्या आप उसे दूसरा मौका देंगे? या चुपचाप लोगों की तरह ठुकरा देंगे? अपने जवाब हमें कमेंट में जरूर बताइएगा।

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