औकात वक्त बताता है

मुंबई के सबसे आलीशान फाइव-स्टार होटल रॉयल ऑर्किड की चमचमाती लॉबी लोगों से भरी थी। महंगे सूट, परफ्यूम की खुशबू, झूमरों की रोशनी और स्टेटस का शोर।

इसी शोर में एक छोटी सी घटना हुई।

सत्यम के हाथ से गलती से पानी का गिलास छलक गया। कुछ बूंदें पास खड़ी लड़की के डिजाइनर गाउन पर गिर गईं।

लड़की थी — रिया सिंघानिया
शहर के बड़े उद्योगपति विक्रम सिंघानिया की इकलौती बेटी।

रिया ने जैसे ही गाउन पर पानी देखा, उसका चेहरा गुस्से से भर गया।

“तुम्हें पता भी है ये ड्रेस कितने की है? तुम्हारी साल भर की कमाई से ज्यादा!”

उसकी आवाज इतनी ऊँची थी कि आसपास खड़े लोग रुककर देखने लगे।

एक रुमाल और एक अपमान

सत्यम ने तुरंत जेब से अपना साफ रुमाल निकाला।

“आई एम सॉरी मैम… मैं साफ कर देता हूँ।”

रिया पीछे हट गई जैसे उसने कोई गंदगी छू ली हो।

“खबरदार जो छुआ भी! तुम्हारा दो टके का रुमाल मेरी ड्रेस को छुएगा?”

उसने रुमाल छीनकर जमीन पर फेंक दिया।

“ये रॉयल होटल है, धर्मशाला नहीं। तुम जैसे लोग यहाँ इंटरव्यू के बहाने एसी की हवा खाने आते हो।”

भीड़ खड़ी तमाशा देख रही थी। कोई आगे नहीं आया। सबको सिंघानिया परिवार का रुतबा पता था।

सत्यम ने रुमाल उठाया। उसकी आँखों में गुस्सा नहीं था, बस ठहराव।

धीरे से बोला:

“कपड़े गंदे हों तो धुल जाते हैं मैम…
लेकिन सोच गंदी हो जाए तो कोई साबुन साफ नहीं कर सकता।”

रिया भड़क गई।

“औकात देखी है अपनी?”

सत्यम मुस्कुराया।

“औकात इंसान नहीं… वक्त बताता है।”

और वह बिना कुछ कहे बाहर चला गया।

एक अनदेखा खेल शुरू

बाहर निकलते ही उसका फोन वाइब्रेट हुआ।

नाम चमक रहा था — विक्रम सिंघानिया

रिया के पिता।

सत्यम ने कॉल उठाई।

“सत्यम जी आप कहाँ हैं? बोर्ड मीटिंग शुरू होने वाली है। आज हमारी कंपनी का भविष्य तय होना है!”

“बस आ रहा हूँ सर,” सत्यम ने शांत स्वर में कहा।

बोर्डरूम का सन्नाटा

40वीं मंजिल पर सिंघानिया ग्रुप का भव्य बोर्डरूम तैयार था।

रिया अपने पिता से शिकायत कर रही थी।

“डैड सिक्योरिटी इतनी खराब है कि कोई भी अंदर आ जाता है। एक लड़के ने मेरी ड्रेस खराब कर दी।”

विक्रम ने ध्यान नहीं दिया।

“रिया आज बड़ी डील है। एसपी वेंचर्स के मालिक खुद आने वाले हैं। वही साइलेंट इन्वेस्टर जिसने कंपनी को डूबने से बचाया है।”

रिया ने हँसकर कहा, “कोई बूढ़ा अमीर होगा।”

तभी दरवाज़ा खुला।

पीए ने कहा —
“सर, मिस्टर सत्यम आ गए।”

रिया ने मुस्कान ओढ़ी… और जैसे ही उसने मुड़कर देखा — उसका चेहरा जम गया।

दरवाज़े में वही लड़का खड़ा था।

वही शर्ट।
वही जूते।
वही फाइल।

सत्यम।

सच्चाई का झटका

रिया उछल पड़ी।

“ये यहाँ कैसे आया?”

लेकिन उसके बोलने से पहले ही कुछ हुआ जिसने उसका दिल दहला दिया।

विक्रम सिंघानिया खड़े हो गए।
साथ में सारे डायरेक्टर भी।

रिया का दिमाग सुन्न।

विक्रम आगे बढ़े।

“स्वागत है सत्यम सर।”

रिया का गला सूख गया।

असल पहचान

विक्रम बोले:

“लेडीज़ एंड जेंटलमैन, ये हैं हमारे मुख्य निवेशक —
मिस्टर सत्यम प्रकाश।

रिया की सांस अटक गई।

ये वही नाम था जो बिजनेस मैगज़ीन में छपता था।
यंग बिलियनेयर।
साइलेंट इन्वेस्टर।
जीनियस माइंड।

और वो… वही लड़का था जिसे उसने अपमानित किया।

एक आईना

सत्यम ने बैलेंस शीट टेबल पर रखी।

“आपकी कंपनी की सबसे बड़ी समस्या घाटा नहीं…
संस्कारों की कमी है।”

उसने रिया की ओर देखा।

“जब मालिक इंसानियत भूल जाए तो कंपनी की जड़ें सड़ जाती हैं।”

फिर शांत स्वर में बोला:

“मैं अपनी इन्वेस्टमेंट वापस ले रहा हूँ।”

कमरे में सन्नाटा।

विक्रम घबरा गए।

“सर प्लीज! कंपनी बर्बाद हो जाएगी।”

एक शर्त

सत्यम बोला:

“मेरी एक शर्त है।”

सब चुप।

“रिया अगले 6 महीने डायरेक्टर नहीं…
वेयरहाउस में इंटर्न बनकर काम करेंगी।”

रिया चिल्लाई — “व्हाट!”

विक्रम ने फैसला सुनाया।

“कल से वेयरहाउस रिपोर्ट करो।”

रिया टूट गई।

6 महीने बाद

गोदाम की टीन की छत के नीचे पसीने में काम करती रिया अब बदल चुकी थी।

एक दिन रामदीन काका ने उसे रोटी दी।

पहली बार उसने गरीब की रोटी खाई।

और रो पड़ी।

अंतिम फैसला

6 महीने बाद बोर्ड मीटिंग।

विक्रम बोले:

“मैं रिटायर हो रहा हूँ। नया सीईओ होगा —
मिस्टर सत्यम प्रकाश।

तालियाँ गूँज उठीं।

रिया की आँखों में आँसू थे —
इस बार अहंकार के नहीं, समझ के।

एक पेन, एक सीख

सत्यम उसके पास आया।

“सीईओ मैं हूँ, लेकिन कंपनी आपकी भी है।
आपने मेहनत करना सीख लिया है।”

उसने उसे एक साधारण पेन दिया।

“जिस दिन दूसरों के सम्मान को दौलत से ऊपर रखोगी…
कुर्सी तुम्हारा इंतज़ार करेगी।”

रिया ने हाथ जोड़ दिए।

“मुझे माफ कर दीजिए।”

सत्यम मुस्कुराया।

सीख

उस दिन रिया ने दौलत नहीं खोई,
खुद को पाया।

क्योंकि —

घमंड की उम्र छोटी होती है,
लेकिन संस्कारों की जड़ें बहुत गहरी।