पत्नी को काला बेटा पैदा हो गया/पति बोला ये मेरा बच्चा नहीं है ये तो मेरे नौकर का है/नौकर भी काला है/

कानपुर का विश्वासघात: एक दरोगा की व्यथा
उत्तर प्रदेश का कानपुर जिला अपनी औद्योगिक पहचान के साथ-साथ अपनी अनूठी कहानियों के लिए भी जाना जाता है। इसी कानपुर जिले में एक छोटा सा गांव है ‘चौबीपुर’। यह गांव शांत था, लेकिन यहाँ के एक घर में जो कुछ चल रहा था, उसने पूरे प्रदेश को हिला कर रख दिया।
इस कहानी के मुख्य पात्र हैं महेंद्र सिंह। महेंद्र सिंह यूपी पुलिस में एक दरोगा के पद पर तैनात थे। उनकी छवि एक बहुत ही ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारी की थी। गांव के लोग उन्हें ‘ईमानदार दरोगा जी’ कहकर बुलाते थे क्योंकि उन्होंने आज तक किसी से एक रुपया भी रिश्वत नहीं ली थी। गरीबों की मदद के लिए वे हमेशा तैयार रहते थे। उनके घर के दरवाजे हर जरूरतमंद के लिए चौबीसों घंटे खुले रहते थे।
महेंद्र सिंह के परिवार में उनकी धर्मपत्नी प्राची देवी थीं। प्राची दिखने में बेहद सुंदर थीं, लेकिन उनका स्वभाव थोड़ा अलग था। महेंद्र के घर में उनकी एक बहन रूपा भी रहती थी। रूपा का जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा था। महेंद्र ने उसकी दो बार शादी करवाई थी, लेकिन रूपा के /चाल-चलन/ और उसके /चरित्र/ की संदिग्धता के कारण दोनों पतियों ने उसे /तलाक/ दे दिया था। अब रूपा अपने भाई के ही घर पर रह रही थी।
प्राची और रूपा की आपस में बहुत बनती थी। महेंद्र ड्यूटी पर चले जाते थे और पीछे से ये दोनों महिलाएं अक्सर सज-धज कर शहर की पार्टियों में या घूमने निकल जाती थीं। घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी। महेंद्र की अपनी पुश्तैनी जमीन भी थी और दरोगा की तनख्वाह भी अच्छी थी। प्राची काफी ‘कामचोर’ स्वभाव की थी और अक्सर घर के कामों से बचने के लिए महेंद्र पर दबाव बनाती थी कि कोई नौकर रख लिया जाए।
एक सुबह करीब 8:00 बजे, महेंद्र अपनी ड्यूटी पर जाने के लिए तैयार हो रहे थे। उन्होंने प्राची से नाश्ता माँगा, लेकिन प्राची ने बीमारी का बहाना बनाकर मना कर दिया। उन्होंने अपनी बहन रूपा से कहा, तो उसने भी वही बहाना बना दिया। महेंद्र को बहुत गुस्सा आया, पर वे बिना कुछ खाए पुलिस स्टेशन चले गए। मन ही मन उन्होंने ठान लिया कि अब घर के लिए कोई नौकर रखना ही पड़ेगा।
महेंद्र के जाते ही प्राची ने अपना /श्रृंगार/ किया और रूपा से कहा कि वह शहर जा रही है। घर पर रूपा अकेली रह गई। रूपा के मन में कुछ और ही चल रहा था। उसका पड़ोस में रहने वाले एक लड़के सुल्तान सिंह के साथ /प्रेम-प्रसंग/ चल रहा था। सुल्तान सिंह एक /विपरीत स्वभाव/ का लड़का था जो महिलाओं का बेहद शौकीन था। रूपा ने सुल्तान को फोन किया, “आज घर पर कोई नहीं है, तुम आ सकते हो।”
सुल्तान पहले तो हिचकिचाया और बस अड्डे पर मिलने को कहा, लेकिन रूपा ने उसे घर के अंदर ही /मंगल काम/ करने का आमंत्रण दिया। सुल्तान चुपके से घर में दाखिल हुआ। रूपा ने मुख्य दरवाजा बंद किया और उसे अपने कमरे में ले गई। वहां उन दोनों के बीच /गलत संबंध/ कायम हुए। उन्होंने इस /गलत काम/ को तब तक अंजाम दिया जब तक दोनों संतुष्ट नहीं हो गए। शाम को सुल्तान के जाने के बाद रूपा ने अपने भाई को धोखा देने की पहली सीढ़ी चढ़ ली थी।
उसी शाम, महेंद्र घर लौटते वक्त एक चाय की दुकान पर रुके। वहां उन्हें ‘कालू’ नाम का एक लड़का मिला। कालू का रंग गहरा काला था, लेकिन वह कद-काठी से काफी मजबूत और नौजवान था। महेंद्र ने उसे ₹8000 प्रति माह और घर में रहने के लिए एक कमरे का प्रस्ताव दिया। कालू तुरंत मान गया।
जब महेंद्र कालू को लेकर घर पहुँचे, तो प्राची की नजर जैसे ही उस हट्टे-कट्टे नौकर पर पड़ी, उसके मन में /वासना/ के विचार आने लगे। उसे लगा कि नौकर भले ही काला है, लेकिन नौजवान और शक्तिशाली है। महेंद्र को कालू पर पूरा भरोसा था क्योंकि वह बहुत मेहनती था और उसका रंग काला होने के कारण महेंद्र ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उनकी पत्नी उसकी तरफ आकर्षित होगी।
24 मई 2025 का दिन आया। महेंद्र ड्यूटी पर थे और रूपा अपने प्रेमी सुल्तान के साथ होटल जाने के बहाने बाहर निकल गई। घर में प्राची और कालू अकेले थे। प्राची रसोई में गई और कालू को उकसाने लगी। उसने कहा, “आज कोई नहीं है, चलो इस मौके का फायदा उठाते हैं।” कालू, जो पहले ही अपनी मालकिन की खूबसूरती का कायल था, खुद को रोक नहीं पाया। प्राची ने दरवाजा बंद किया और कालू को अपने कमरे में ले गई। वहां उन दोनों के बीच /नाजायज संबंध/ बने। प्राची ने कालू को लालच दिया कि अगर वह उसकी /शारीरिक जरूरतों/ को पूरा करता रहेगा, तो वह उसे अतिरिक्त पैसे भी देगी।
अगले तीन महीनों तक यह सिलसिला बदस्तूर चलता रहा। कालू और प्राची के बीच /अनैतिक संबंध/ अनगिनत बार बने। किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। इसी बीच 16 अगस्त 2025 को प्राची की तबीयत खराब हुई। डॉक्टर ने जांच के बाद बताया कि वह ‘गर्भवती’ है। महेंद्र की खुशी का ठिकाना नहीं था। शादी के सात साल बाद उन्हें पिता बनने का सुख मिलने वाला था। उन्होंने प्राची को बहुत भाग्यशाली माना।
लेकिन कालू परेशान हो गया। प्राची के गर्भवती होने के बाद उसका /शारीरिक सुख/ कम हो गया था। अब उसकी नजरें महेंद्र की बहन रूपा पर टिक गईं। 28 अगस्त को जब महेंद्र प्राची को लेकर अस्पताल गए, तो घर में रूपा और कालू अकेले थे। रूपा, जो खुद /चरित्रहीन/ थी, उसने भी कालू को पैसों का लालच देकर उसे अपनी ओर खींच लिया। उस दिन कालू और रूपा के बीच भी /शारीरिक संबंध/ बने। अब कालू घर की दोनों महिलाओं के साथ /गलत काम/ में लिप्त था।
समय बीता और 2 मार्च 2026 को प्राची ने एक बेटे को जन्म दिया। जैसे ही बच्चे को महेंद्र के हाथों में सौंपा गया, वे दंग रह गए। बच्चे का रंग बिल्कुल काला था। महेंद्र और प्राची दोनों गोरे थे, और उनकी पिछली सात पीढ़ियों में भी कोई काला नहीं था। हालांकि, उस वक्त उन्होंने इसे कुदरत का करिश्मा मानकर दिल छोटा नहीं किया।
सच्चाई का खुलासा 16 मार्च 2026 को हुआ। महेंद्र ड्यूटी पर निकलने ही वाले थे कि उन्हें बगल के कमरे से कुछ /अजीब आवाजें/ सुनाई दीं। उन्होंने धीरे से दरवाजा खोला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। उनका नौकर कालू और उनकी पत्नी प्राची /आपत्तिजनक स्थिति/ में थे।
गुस्से से पागल महेंद्र ने कालू को पकड़ लिया और उसकी बेरहमी से पिटाई शुरू कर दी। अपनी जान बचाने के लिए कालू ने सारा सच उगल दिया। उसने चिल्लाकर कहा, “इसमें मेरी गलती नहीं है! आपकी पत्नी और आपकी बहन रूपा, दोनों मुझे इस /गलत काम/ के लिए पैसे देती थीं!”
यह सुनकर महेंद्र का विवेक मर गया। जिस बहन और पत्नी पर उन्होंने इतना भरोसा किया, उन्होंने उनके सम्मान को धूल में मिला दिया था। महेंद्र अंदर गए और अपनी सरकारी रिवॉल्वर निकाल लाए। उन्होंने सबसे पहले कालू के सीने में गोली उतार दी। प्राची चीखने लगी, तो महेंद्र ने उसे भी /मौत के घाट/ उतार दिया। शोर सुनकर जब रूपा कमरे में आई, तो महेंद्र ने बिना सोचे-समझे उसे भी गोलियों से भून दिया।
घर में तीन लाशें बिछ चुकी थीं। पड़ोसी इकट्ठा हो गए। पुलिस आई और अपने ही साथी दरोगा महेंद्र सिंह को गिरफ्तार कर लिया। थाने में महेंद्र ने अपना जुर्म कबूल करते हुए कहा, “वह बच्चा मेरा नहीं, उस नौकर का /नाजायज अंश/ था। इन्होंने मेरा घर और मेरा ईमान दोनों लूट लिया।”
आज महेंद्र सिंह जेल की सलाखों के पीछे हैं। यह घटना समाज के लिए एक बड़ा सवाल छोड़ गई है कि क्या धोखे का अंत हमेशा इतना ही खौफनाक होना चाहिए? क्या महेंद्र सिंह का कानून को अपने हाथ में लेना सही था?
समाप्त
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