Dekho Ek Sas Ne Apni Bahu Ke Sath Kya Kiya 😭 | Jab Allah Ka Insaaf Hua

मुस्कान की असली जीत
भाग 1: बचपन की तन्हाई
सुनहरी किरणों के साथ सुबह का उजाला फैल रहा था, लेकिन मुस्कान के घर में अंधेरा ही अंधेरा था। आठ साल की मासूम मुस्कान अपनी सौतेली मां नरगस बीवी के डर से कांप रही थी। नरगस बीवी का चेहरा हमेशा गुस्से से भरा रहता, खासकर जब उसकी नजर मुस्कान पर पड़ती।
मुस्कान की असली मां का इंतकाल उसकी पैदाइश के वक्त ही हो गया था। उसके अब्बा नजीर अहमद ने दोबारा शादी कर ली थी। नरगस बीवी का एक छोटा बेटा अहमद था, जो मुस्कान से तीन साल छोटा था। घर में हमेशा मुस्कान के साथ नाइंसाफी होती। अहमद को अच्छा खाना, नए कपड़े और प्यार मिलता, जबकि मुस्कान को बचे-कुचे टुकड़े और तिरस्कार।
“सुन मुस्कान, आज से तू ही पूरे घर का काम करेगी। मैं अहमद के लिए नए कपड़े सिलने में मशरूफ हूं।”
मुस्कान की आंखों में आंसू आ गए, मगर वह खामोश रही। उसे मालूम था कि अगर कुछ बोली, तो मजीद सजा मिलेगी।
दिन भर मुस्कान घर की सफाई करती, बर्तन धोती, खाना बनाती। उसके नन्हे हाथों में छाले पड़ गए, मगर किसी को रहम न आता। शाम को जब अब्बा काम से लौटते, नरगस बीवी झूठी शिकायतें लगाती—”देखिए नजीर साहब, आपकी बेटी कितनी सुस्त है। पूरा दिन खेलती रहती है, काम में दिल नहीं लगाती।”
नजीर साहब अपनी दूसरी बीवी के सामने बेबस थे। वो मुस्कान से मोहब्बत तो करते थे, मगर घर की खातिर नरगस बीवी की बात मान लेते।
“मुस्कान, तू अपनी अम्मी जान की बात मान। वो तेरी भलाई चाहती है।”
मुस्कान का दिल टुकड़े-टुकड़े हो जाता। वह जानती थी कि नरगस उसकी मां नहीं है, मगर सबके सामने उसे अम्मी कहना पड़ता।
भाग 2: जवानी की मुश्किलें
वक्त गुजरता गया। मुस्कान बड़ी हो रही थी, मगर मुश्किलात भी बढ़ती जा रही थीं। पंद्रह साल की उम्र में वह एक हसीन लड़की बन गई—घने लंबे बाल, खूबसूरत गहरी आंखें, मगर चेहरे पर हमेशा उदासी की परछाई।
एक दिन नजीर अहमद से नरगस बीवी ने कहा, “मुस्कान अब बड़ी हो गई है। इसकी शादी का इंतजाम करना चाहिए। मैंने एक रिश्ता देखा है—करीम नाम का लड़का है, अच्छी खासी जमीन है उसके पास।”
नजीर अहमद को लगा, शायद शादी के बाद मुस्कान की जिंदगी संवर जाए। मगर नरगस का चुना हुआ रिश्ता मुस्कान के लिए किसी सजा से कम न था। करीम एक बेमिसाल जालिम इंसान था। उसकी पहली बीवी भी उसके जुल्म से तंग आकर मायके चली गई थी।
शादी की तैयारियां शुरू हुईं। मुस्कान की कोई सहेली न थी, जो उसके हाथों पर मेहंदी लगाती या शादी के गीत गाती। नरगस ने बस रस्मी तौर पर कुछ इंतजाम कर दिया था।
शादी के दिन मुस्कान की आंखों में खौफ था, खुशी नहीं।
“मुस्कान, अब तू अपने शौहर के घर जा रही है। वहां अच्छे से रहना, किसी की शिकायत न करना।”
नजीर ने बेटी को रुखसत करते वक्त कहा—आंखों में आंसू थे, मगर अपनी कमजोरी छुपा रहे थे।
मुस्कान ने अब्बा से लिपटते हुए धीरे से कहा, “अब्बा, मैं आपको याद करूंगी।”
भाग 3: ससुराल के जुल्म
करीम का घर एक बड़े गांव में था। मुस्कान को पहुंचते ही लगा कि यहां का माहौल बिल्कुल अलग है। करीम की मां बेगम जान बड़ी सख्त मिजाज औरत थी। उसने मुस्कान को ऊपर से नीचे तक देखा और नाक चढ़ाकर बोली, “इतनी दुबली पतली लड़की बेच दी। यह काम कैसे करेगी?”
पहली ही रात मुस्कान को अपनी तकदीर का एहसास हो गया। करीम निहायत गुस्सेला था।
“मुस्कान, यहां आराम की जिंदगी नहीं मिलेगी। सुबह से शाम तक काम करना होगा।”
अगली सुबह से मुस्कान की नई जिंदगी शुरू हुई। सूरज निकलने से पहले उठकर गाय धोना, नाश्ता बनाना, सफाई करना, दिन में खेतों में मजदूरों के लिए खाना पहुंचाना, और शाम को फिर खाना पकाना।
करीम की काफी जमीनें थीं और वहां कई मजदूर काम करते थे। सबके लिए खाना बनाना मुस्कान की जिम्मेदारी थी। बड़े-बड़े बर्तनों में दाल, सब्जी और रोटियां बनानी पड़ती। उसके हाथ छालों से भर गए। कमर में हमेशा दर्द रहता। बेगम जान हर वक्त ताने देती—”ओ मुस्कान, आज फिर दाल में नमक कम है। तो कुछ सीखेगी भी या नहीं?”
महीने गुजरते गए। मुस्कान को लगा, शायद हालात बदल जाएंगे। मगर करीम का बर्ताव तो पहले से भी ज्यादा जालिमाना हो गया। एक दिन मुस्कान सख्त बीमार पड़ गई। तेज बुखार और कमजोरी के कारण बिस्तर से उठ नहीं सकती थी। मगर करीम को कोई रहम न आया।
“बीमारी का बहाना बनाकर काम से जी चुराना चाहती है? उठ और चल जाकर किचन में काम कर।”
मुस्कान लड़खड़ाती हुई किचन में पहुंची। आंखों के आगे अंधेरा छा गया। मगर फिर भी उसने खाना पकाना शुरू किया। अचानक उसके हाथ से बड़ा बर्तन गिर गया और वह खुद भी जमीन पर गिर पड़ी।
करीम गुस्से से चीखा—”यह क्या हाल बना रखा है? अब यह सारी सफाई कौन करेगा?”
मुस्कान रोते हुए सफाई करने लगी। उसे लगा जैसे उसकी जिंदगी किसी कैद से कम नहीं।
भाग 4: मां बनने की उम्मीद और टूटन
दो साल बाद मुस्कान को मालूम हुआ कि वह मां बनने वाली है। इस खबर ने उसके दिल में एक छोटी सी उम्मीद जगाई—शायद अब करीम बदल जाएगा। मगर करीम और भी बिगड़ गया।
“अभी से तेरे बहाने हैं। हमल है तो क्या हुआ? काम तो करना ही पड़ेगा।”
हमल के दौरान भी मुस्कान को वही सब मुश्किल काम करने पड़ते थे। भारी बर्तन उठाना, गाय-भैंसों को चारा देना, खेतों में मजदूरों को खाना पहुंचाना। जब वह थक कर चूर हो जाती, बेगम जान तंस के तीर चलाती—”हमारे जमाने की औरतें बच्चा पेट में लिए सारा घर और खेत संभालती थी। आजकल की लड़कियां तो बहुत नाजुक होती हैं।”
मुस्कान की हालत बिगड़ती जा रही थी। चेहरा पीला पड़ गया, आंखों के नीचे गहरे हल्के मगर किसी को कुछ परवाह न थी। छठा महीना चल रहा था, पेट का बढ़ना भी उसके लिए एक नया बोझ बन चुका था। फिर भी सारे काम उसी के जिम्मे थे।
एक दिन बेगम जान फिर चीखी—”मुस्कान, आज दाल जल गई है। तेरा ध्यान कहां रहता है? हमल के बहाने बनाना बंद कर। हमारे वक्त में तो औरतें 10-10 बच्चे पैदा करके भी घर संभालती थी।”
मुस्कान की आंखों से आंसू बह निकले। पेट में बच्चा जोर से लातें मार रहा था। दर्द से कमर टूट रही थी। मगर वह खामोश रही, क्योंकि यहां किसी को उसकी तकलीफ सुनाई न देती थी।
भाग 5: बेटी का जन्म और नफरत
हमल के आठवें महीने में मुस्कान की कमर में शदीद दर्द शुरू हुआ। रात में वह दर्द से कराह रही थी। करीम उठकर बोला—”अब क्या ड्रामा कर रही हो? तुम्हारी वजह से सो नहीं पा रहा।”
“बहुत दर्द हो रहा है। शायद बच्चा आने वाला है।”
“अभी तो महीना बाकी है। यूं ही बहाने बना रही हो।”
करीम लिहाफ ओढ़कर सो गया। पूरी रात मुस्कान तड़पती रही। सुबह दर्द और बढ़ गया। बेगम जान ने गांव की दाई को बुलाया। दाई ने मुस्कान को देखकर कहा, “अरे, हालत तो बहुत खराब है। इतनी कमजोर हो गई है। इसे क्या खिला पिला रहे हो?”
बेगम जान बोली, “अरे दाई जी, सब अच्छा मिलता है। यह खुद ही कम खाती है।”
दाई ने कहा, “बेटी, हिम्मत रखो। अल्लाह सब बेहतर करेगा।”
दो दिन की तकलीफ के बाद मुस्कान ने एक बेटी को जन्म दिया। बच्ची बहुत कमजोर थी, आहिस्ता-आहिस्ता रो रही थी।
दाई ने फिकरमंदी से कहा—”बच्ची को दूध कम मिल रहा है। मां का भी ख्याल रखना होगा।”
मगर करीम का चेहरा गुस्से से लाल हो गया—”मुझे बेटा चाहिए था। यह क्या दे दिया?”
मुस्कान की आंखों से आंसू बहने लगे। उसने अपनी नन्ही बच्ची को सीने से लगाकर कहा, “करीम, यह भी अल्लाह की नेमत है।”
करीम ने गुस्से में कहा, “अल्लाह की नेमत बेटियां बोझ होती हैं। उनकी शादी करनी पड़ती है, दहेज देना पड़ता है।”
बेगम जान भी बोली, “पहला बच्चा है, अगली बार बेटा होना चाहिए।”
मुस्कान की रूह जख्मी हो गई, मगर वह फिर भी कुछ न बोली।
उसने बेटी का नाम ‘आसिया’ रखा।
भाग 6: नई चुनौतियां और बेदखली
आसिया की पैदाइश के बाद मुस्कान को लगा, शायद अब कुछ दिन आराम मिल जाएगा। मगर पैदाइश के सिर्फ 10वें दिन ही करीम ने सख्त लहजे में कहा—”बस बहुत हो गया आराम। अब उठ और काम कर।”
मुस्कान अभी भी बहुत कमजोर थी। बच्चे को दूध पिलाने के बाद ही उसकी जान निकल जाती। फिर भी पूरे घर का काम करना पड़ता। वह आसिया को कमर से बांधकर चूल्हा जलाती, खाना बनाती, कपड़े धोती। आसिया अक्सर भूख से रोती रहती थी। मुस्कान को सेहतमंद खाना नहीं मिलता था, इसीलिए दूध भी कम आता था।
बेगम जान रोज चीखती रहती—”यह बच्ची क्यों इतना रोती है? कान फाड़ देगी सबके।”
रात भर बच्चे को संभालती, दिन में काम।
यूँ मुस्कान की हालत बिगड़ती चली गई।
चार साल गुजर गए। आसिया एक खूबसूरत मगर सहमी-सहमी सी बच्ची बन गई। करीम ना उसे कभी प्यार से देखता, ना बात करता। बेगम जान भी हमेशा डांटती रहती।
“अम्मी मुझे भूख लगी है,” आसिया रोते हुए कहती।
मुस्कान का दिल चीर कर रह जाता। घर में खाना तो बनता था, मगर पहले करीम और बेगम जान खाते। जो बच जाता, वो मुस्कान और आसिया को मिलता। अक्सर सिर्फ रोटी और नमक से गुजारा करना पड़ता।
एक दिन आसिया तेज बुखार और दस्त में मुब्तला हो गई। मुस्कान ने परेशान होकर कहा, “करीम, बच्ची की हालत ठीक नहीं। डॉक्टर के पास चलिए। कम से कम दवाई तो ले आइए।”
करीम ने सर्द लहजे में कहा, “बेटियों पर पैसे जाया नहीं करता मैं। खुद ही ठीक हो जाएगी।”
मुस्कान का दिल टूट गया। तीन दिन तक आसिया तड़पती रही। मुस्कान ने घरेलू टोटके किए, दुआएं पढ़ीं, मगर कोई फायदा नहीं हुआ। आखिरकार गांव के एक भले आदमी ने कुछ पैसे दिए और कहा, “बच्ची को डॉक्टर के पास ले जाओ।”
डॉक्टर ने दवा दी तो आसिया आहिस्ता-आहिस्ता ठीक हो गई। मगर मुस्कान के दिल पर एक गहरा जख्म रह गया।
भाग 7: घर से बेदखली और नई शुरुआत
करीम का रवैया दिन-ब-दिन और खराब होता जा रहा था। जरा सी बात पर मुस्कान पर हाथ उठा देता था। आसिया यह सब देखकर डर जाती। एक दिन मासूम सी आवाज में पूछ बैठी—”अम्मी, अब्बू मुझसे प्यार क्यों नहीं करते?”
मुस्कान की आंखें नम हो गई। वह सिर्फ इतना कह सकी—”बेटी, अल्लाह तुमसे बहुत प्यार करता है। बस यही काफी है।”
एक शाम करीम खेत से गुस्से में आया। फसल में नुकसान हुआ था।
“मुस्कान, खाना कहां है? मैं थका-हारा आया हूं और तू इधर बैठकर बातें कर रही है।”
मुस्कान जल्दी-जल्दी खाना लगाने लगी, मगर करीम का गुस्सा कम नहीं हुआ।
“तू किसी काम की नहीं। ना घर संभाल सकती है, ना खेत। और यह तेरी बेटी बिल्कुल तेरे जैसी निकम्मी।”
करीम अपने दोस्तों से कहता—”इसने मुझे बेटा नहीं दिया। सिर्फ बेटी।”
दोस्त ने मशवरा दिया—”यार, दूसरी शादी कर लो। शायद दूसरी बीवी बेटा दे दे।”
यह बात करीम के दिल में बैठ गई। वह घर आकर अपनी मां से बोला—”अम्मी, मैं दूसरी शादी करना चाहता हूं। मुस्कान ने मुझे सिर्फ बेटी दी है। मुझे बेटा चाहिए जो मेरा नाम आगे बढ़ाए।”
बेगम जान फौरन मान गई। “हां बेटा, ठीक कह रहे हो। मैंने तो एक लड़की भी देख ली है। सुमेरा जवान है, अच्छी फैमिली की है।”
मुस्कान को यह बातें मालूम हो गईं। रात को उसने हिम्मत करके कहा—”करीम, अगर मुझसे कोई गलती हुई है तो बताओ। मैं उसे सुधारने की कोशिश करूंगी।”
करीम ने गुरूर से जवाब दिया—”तेरी सबसे बड़ी गलती यही है कि तू मुझे बेटा नहीं दे सकी। अब मैं दूसरी शादी करूंगा।”
मुस्कान की आंखों से आंसू बहने लगे—”तो मैं और आसिया… हमारा क्या होगा?”
करीम ने बेरहमी से कहा—”तुम दोनों इस घर से निकल जाओ। दूसरी बीवी आएगी तो यहां तुम्हारी जगह नहीं।”
मुस्कान के कदम लड़खड़ा गए। वह रोकर बोली—”करीम, आसिया तुम्हारी बेटी है। उसे कैसे निकालोगे?”
“बेटी है तो क्या हुआ? बेटियां पराया धन होती हैं। उन्हें तो वैसे भी पराए घर जाना होता है।”
मुस्कान दहाड़े मारकर रोने लगी—”हमें मत निकालो। मैं और मेहनत करूंगी।”
मगर करीम का दिल पत्थर बन चुका था।
“मेरा फैसला आखिरी है। अगले महीने मेरी शादी है। इससे पहले तुम दोनों यहां से चली जाना।”
अगले ही दिन से घर का माहौल और बदतर हो गया। बेगम जान तंजिया आवाज में बोली—”जल्दी से अपना सामान बांध। अब यहां तेरी कोई जरूरत नहीं।”
मुस्कान ने सोचा कि वह अपने अब्बा के पास चली जाएगी। मगर जब फोन किया तो पता चला, उसके अब्बा का इंतकाल हो चुका है और रुखसाना अपने बेटे के साथ दूसरे शहर चली गई है। पुराना घर भी बिक चुका है। मुस्कान के कदमों तले से जमीन निकल गई। उसके पास कहीं जाने की जगह नहीं रही थी।
भाग 8: संघर्ष, मेहनत और कामयाबी
करीम की शादी का दिन आ गया। उसी दिन उसने मुस्कान और आसिया को घर से निकाल दिया।
“आज तक का हिसाब खत्म। अब दोबारा इस घर की तरफ मत देखना।”
मुस्कान ने अपना थोड़ा सा सामान एक दुपट्टे में बांधा, आसिया का हाथ थामा और घर से निकल गई। पीछे मुड़कर देखा तो वही घर नजर आया जहां उसने चार साल जुल्मो सितम सहे थे।
“अम्मी, हम कहां जाएंगे?”
“पहले गांव चलते हैं बेटी। शायद वहां कोई रास्ता मिल जाए।”
रास्ते में मुस्कान को अपने अब्बा का पुराना घर याद आया। मगर गांव पहुंचकर पता चला कि वह घर अब किसी और का हो चुका है। मगर करीब ही एक छोटा सा मकान खाली था, जिसका मालिक शहर में रहता था।
गांव के सरदार ने मुस्कान की हालत देखकर कहा—”बेटी, तुम इस खाली मकान में रह सकती हो। मैं मालिक से बात कर लूंगा।”
मुस्कान को लगा जैसे अल्लाह ने उसकी दुआ सुन ली हो।
अम्मी, क्या अब हम यहीं रहेंगे?”
“हां बेटी, अब हम अपना घर बसाएंगे। सिर्फ हम दोनों का।”
मुस्कान ने अपनी बेटी को प्यार से गले लगा लिया।
छोटे से मकान में मुस्कान और आसिया की नई जिंदगी शुरू हुई। पहली रात जब वह सोई तो मुस्कान को एक अजीब सा सुकून महसूस हुआ। ना कोई उस पर चीखने वाला था, ना जबरदस्ती काम करवाने वाला।
“अम्मी, यहां बहुत अच्छा लग रहा है।”
“हां बेटी, यहां हम आजाद हैं। अब कोई हमें डांटने वाला नहीं।”
मुस्कान ने राहत की सांस ली। मगर असल आजमाइश अब शुरू हुई।
मुस्कान के पास कमाने का कोई जरिया नहीं था। घर में सिर्फ थोड़े से चावल और दाल बाकी थी, जो वह अपने ससुराल से लाई थी। तीन दिन बाद खाना खत्म हो गया। आसिया भूख से रो रही थी और मुस्कान के पास उसे देने के लिए कुछ नहीं था।
“ए अल्लाह, मैं क्या करूं? मेरी बच्ची भूखी है और मेरे पास उसे खिलाने के लिए कुछ नहीं।”
मुस्कान ने दुआ मांगी। उसी वक्त उसे याद आया कि उसकी मां अचार और पापड़ बनाना जानती थी। बचपन में वो अक्सर मां को यह सब बनाते देखती थी। उसने सोचा, शायद वह भी यह सब बनाकर बेच सके।
वो गांव के एक बुजुर्ग खातून फातिमा खाला के पास गई—”खाला, मैं अचार और पापड़ बनाना सीखना चाहती हूं। क्या आप मुझे सिखा सकती हैं?”
फातिमा खाला ने मुस्कान की हालत देखी और मोहब्बत से बोली—”बेटी, तुम्हें सब कुछ आता है। बस हिम्मत की जरूरत है। मैं तुम्हें कुछ पैसे देती हूं। उनसे सामान लाकर अचार बनाओ।”
मुस्कान की आंखों में आंसू आ गए—”खाला, अल्लाह आपको खुश रखे। मैं यह पैसे जरूर वापस करूंगी।”
अगले दिन मुस्कान ने बाजार से आम, नींबू, मिर्च और मसाले खरीदे। रात भर जागकर उसने अचार तैयार किया। आसिया भी अपनी मां की मदद करने लगी।
“अम्मी, मैं भी आपकी मदद करूंगी।”
“हां बेटी, तुम मेरी सबसे अच्छी मददगार हो।”
मुस्कान ने प्यार से कहा।
सुबह मुस्कान अपना अचार लेकर गांव के बाजार गई। पहले दिन सिर्फ ₹200 का अचार बिका, मगर जिन लोगों ने चखा, सबने तारीफ की—”मुस्कान, तुम्हारा अचार तो बहुत लजीज है। कल और भी लाना।”
आहिस्ता-आहिस्ता मुस्कान का अचार मशहूर होने लगा। लोग खासतौर पर उसका अचार मंगवाने लगे। एक महीने बाद उसने पापड़ बनाना भी शुरू किया।
“आसिया, देखो हमारा कारोबार कैसे बढ़ रहा है।”
मुस्कान खुशी से बोली।
आसिया भी खुश थी। अब उसे अच्छा खाना मिलता था और उसकी मां के चेहरे पर खुशी देखने को मिलती थी।
अब उसके चीजों की मांग इतनी बढ़ गई कि करीबी शहर से भी लोग आने लगे।
“मुस्कान बहन, आप अपना अचार हमारी दुकान पर भी रख सकती हैं। हम अच्छी कीमत देंगे।”
शहर के एक ताजिर ने पेशकश की।
मुस्कान को लगा जैसे उसकी मेहनत रंग ला रही है।
एक साल में उसने इतना कमा लिया कि आसिया को एक अच्छे स्कूल में दाखिल करवा सके।
“अम्मी, मैं पढ़-लिखकर बड़ी हो जाऊंगी और आपकी मदद करूंगी।”
“हां बेटी, तुम खूब पढ़ना। मैं चाहती हूं तुम एक दिन बड़ी अफसर बनो।”
मुस्कान ने अपनी बेटी के सर पर हाथ रखा।
दो साल का अरसा गुजर गया। अब मुस्कान का कारोबार काफी बड़ा हो चुका था। उसने तीन औरतों को काम पर रख लिया था। गांव की दूसरी औरतें भी उससे अचार बनाना सीखने लगीं।
“मुस्कान बाजी, आप हम सबके लिए एक मिसाल हैं। आपने दिखा दिया कि औरत अकेले भी अपने बच्चों का पेट पाल सकती है।”
मुस्कान को याद आया कि करीम कहता था कि वह निकम्मी है, किसी काम की नहीं। मगर आज वह खुद एक कामयाब औरत थी, अपना कारोबार चला रही थी।
भाग 9: माफी की असली जीत
एक दिन मुस्कान शहर में अपना सामान सप्लाई करने के लिए गई थी। वापसी में रास्ते में उसकी नजर एक भिखारी पर पड़ी। वो आदमी बहुत कमजोर लग रहा था और गंदे कपड़ों में था।
मुस्कान का दिल पिघल गया। उसने जब अपने पर्स से कुछ सिक्के निकालकर उस भिखारी के हाथ पर रखे तो भिखारी ने कांपते हाथों से वह सिक्के पकड़े और नजरें उठाकर देखा तो यह देखकर मुस्कान ठिटक गई। वो कोई अजनबी नहीं, बल्कि करीम था। वही करीम जिसने उसे और उसकी मासूम बच्ची को घर से निकाल दिया था।
करीम की आंखों में शर्मिंदगी और निदामत की गहरी छाप थी।
मुस्कान के लबों से टूटा सा लब्ज निकला।
मुस्कान ने पहचान लिया, मगर उसके चेहरे पर ना नफरत थी, ना इंतकाम। सिर्फ खामोशी।
“करीम, तुम्हारी यह हालत कैसे हुई?”
मुस्कान ने नरमी से पूछा।
करीम की आवाज कांप रही थी—”मुस्कान, मैंने तुम पर बहुत ज्यादा जुल्मो सितम किया। अल्लाह ने मुझे मेरे जुल्मो सितम की सजा दे दी है। दूसरी शादी के बाद मेरी बीवी ने सब कुछ छीन लिया। कारोबार डूब गया, मकान बिक गया और लोग भी मुंह मोड़ गए। अब मैं सड़क पर भीख मांगने पर मजबूर हूं।”
मुस्कान खामोश खड़ी रही। आंखों में एक लम्हे के लिए पुरानी यादें तैर गईं। वो दिन जब उसे जलील किया गया, जब भूखी सोई, जब आसिया को दूध तक ना मिल सका। मगर फिर उसने अपने दिल को संभाला।
“करीम, मैंने तुम्हें माफ कर दिया है। जो कुछ हुआ, वो अल्लाह की मर्जी थी। अल्लाह ने मुझे इज्जत दी, मेरी बच्ची को बेहतर जिंदगी दी। तुम भी हिम्मत करो, तौबा करो। शायद अल्लाह तुम पर भी रहम करें।”
यह कहकर मुस्कान ने अपने बैग से कुछ नोट निकाले और करीम के हाथ में रख दिए।
करीम की आंखों से आंसू बहने लगे—”मुस्कान, तुमने मेरे जुल्म के बावजूद मुझे मदद दी।”
मुस्कान ने मुस्कुराकर कहा—”कभी तुम मेरे नसीब का बोझ थे। अब मैं तुम पर रहम करके अपने नसीब का शुक्र अदा कर रही हूं। अल्लाह ने मेरा दिल बड़ा कर दिया है।”
यह कहकर वह मुड़ गई। आसिया उसके पास खड़ी थी।
“अम्मी, यह कौन था?”
मुस्कान ने आसमान की तरफ देखा और नरम लहजे में बोली—”बेटी, वह शख्स है जिसने हमें गिराया था। मगर अल्लाह ने हमें उठा लिया। हमें किसी से नफरत नहीं करनी चाहिए। क्योंकि जो दूसरों पर जुल्म करता है, आखिरकार अपने अंजाम से नहीं बच पाता।”
आसिया ने अपनी मां का हाथ मजबूती से पकड़ लिया। मुस्कान के चेहरे पर सुकून की एक लहर थी। वह जान चुकी थी कि असल जीत बदले में नहीं, बल्कि माफी में है।
अगर यह कहानी आपको पसंद आई हो तो हमारे चैनल को जरूर सब्सक्राइब करें।
News
वर्दी के घमंड में टूटा रिश्ता चपरासी पति जब IAS बनकर लौटा तो वर्दी उतरते ही सच सामने आ गया…
वर्दी के घमंड में टूटा रिश्ता चपरासी पति जब IAS बनकर लौटा तो वर्दी उतरते ही सच सामने आ गया……
👉 सब्जीवाली बनकर DM मैडम ने रचा प्लान, थप्पड़ मारने वाले दरोगा को जो सबक सिखाया! देखकर हर कोई हैरान
👉 सब्जीवाली बनकर DM मैडम ने रचा प्लान, थप्पड़ मारने वाले दरोगा को जो सबक सिखाया! देखकर हर कोई हैरान…
Police ने रोका Indian Army का Truck 😱 फिर जो हुआ…
Police ने रोका Indian Army का Truck 😱 फिर जो हुआ… वर्दी का असली वजन प्रस्तावना जून की तपती दोपहर…
मौ*त से लड़ रही थी हॉस्पिटल मे पत्नी डॉक्टर निकला उसका तलाकशुदा पति फिर जो हुआ
मौ*त से लड़ रही थी हॉस्पिटल मे पत्नी डॉक्टर निकला उसका तलाकशुदा पति फिर जो हुआ शीर्षक: इंसानियत की जीत…
स्कूल की फीस न भरने पर टीचर ने बच्चे को क्लास से निकाल दिया, अगले दिन कलेक्टर ने आकर जो कहा
स्कूल की फीस न भरने पर टीचर ने बच्चे को क्लास से निकाल दिया, अगले दिन कलेक्टर ने आकर जो…
बेटे-बहू ने विधवा माँ को एक-एक रोटी को तरसाया, मगर भगवान का इंसाफ अभी बाकी था
बेटे-बहू ने विधवा माँ को एक-एक रोटी को तरसाया, मगर भगवान का इंसाफ अभी बाकी था भगवान का इंसाफ –…
End of content
No more pages to load






