IPS किशोर कुणाल ने कब्र से निकलवाई लाश || 44 विधायक और 2 मंत्रियों के उड़े होश

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सच की तलाश — एक आईपीएस अधिकारी की कहानी

प्रस्तावना

साल 1992 था। बिहार के एक छोटे जिले ‘राघवपुर’ में अपराध और राजनीति की मिलीभगत से आम जनता त्रस्त थी। नेता, अफसर, और बाहुबली — सभी अपने-अपने स्वार्थ में डूबे थे। पुलिस का नाम सुनते ही लोग डर जाते थे, क्योंकि पुलिस भी नेताओं के इशारे पर चलती थी। ऐसे माहौल में एक ईमानदार आईपीएस अधिकारी, अजय प्रताप सिंह, की पोस्टिंग राघवपुर में हुई।

अजय प्रताप सिंह का आगमन

अजय बचपन से ही आदर्शवादी थे। उनके पिता भी एक शिक्षक थे जिन्होंने उन्हें सिखाया, “बेटा, सच और न्याय के लिए कभी पीछे मत हटना।” अजय ने यह बात अपने जीवन का मंत्र बना लिया था। जब उन्हें राघवपुर का एसपी नियुक्त किया गया, तो जिले में अपराध की दर सबसे ज्यादा थी।

अजय ने पहले ही दिन थानेदारों की मीटिंग बुलाई। उन्होंने सख्त लहजे में कहा, “यहाँ अब कानून की चलेगी, किसी नेता या गुंडे की नहीं। अगर कोई भी पुलिसकर्मी भ्रष्टाचार में लिप्त पाया गया, तो उसकी नौकरी चली जाएगी।” पुलिसकर्मियों के बीच खलबली मच गई।

IPS किशोर कुणाल ने कब्र से निकलवाई लाश || 44 विधायक और 2 मंत्रियों के उड़े  होश | Bobby Murder Case |

पहला बड़ा केस — पूजा मर्डर केस

राघवपुर में एक दिन अचानक खबर आई कि शहर के मशहूर व्यापारी की बेटी पूजा की संदिग्ध हालात में मृत्यु हो गई है। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में आत्महत्या लिखा गया, लेकिन पूजा की माँ रोते हुए अजय के पास पहुँची, “साहब, मेरी बेटी कभी आत्महत्या नहीं कर सकती। उसे मारा गया है।”

अजय ने केस की फाइल उठाई और खुद जाँच शुरू की। उन्होंने पाया कि पूजा के मोबाइल की कॉल डिटेल्स में एक स्थानीय विधायक का नाम बार-बार आ रहा था। विधायक, मनोज यादव, इलाके का सबसे ताकतवर आदमी था। उसके खिलाफ बोलने की किसी की हिम्मत नहीं थी।

राजनीतिक दबाव और धमकी

जैसे ही अजय ने विधायक को पूछताछ के लिए बुलाया, जिले में भूचाल आ गया। विधायक के समर्थकों ने थाने का घेराव किया। फोन पर डीएम और मंत्री भी दबाव डालने लगे। “अजय जी, आप नए हैं, समझदारी से काम लीजिए। विधायक जी का नाम हटवा दीजिए, वरना ट्रांसफर हो जाएगा।”

अजय ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “सर, मैं ट्रांसफर के डर से सच छुपाऊँ, तो वर्दी पहनने का हक नहीं है।” उन्होंने विधायक को थाने बुलाया और सख्ती से पूछताछ की। विधायक ने धमकी दी, “देख लूँगा तुझे, तेरी वर्दी उतरवा दूँगा।”

सबूतों की तलाश

अजय ने पूजा के घर जाकर उसकी डायरी, मोबाइल, और कमरे की तलाशी ली। उन्हें एक पेंडेंट मिला, जिस पर विधायक के बेटे का नाम खुदा था। कॉल रिकॉर्ड्स से पता चला कि घटना की रात विधायक का बेटा पूजा के घर के पास देखा गया था।

अजय ने सीसीटीवी फुटेज निकलवाया, जिसमें विधायक का बेटा अपनी कार से पूजा के घर जाता दिखा। यह सबूत बहुत बड़ा था, लेकिन फॉरेंसिक रिपोर्ट में हेरफेर हो गया था। अजय ने फॉरेंसिक लैब के स्टाफ से अलग से बात की, तो पता चला कि ऊपर से दबाव था कि रिपोर्ट ‘साफ’ लिखी जाए।

सिस्टम से संघर्ष

अजय ने सबूतों के साथ रिपोर्ट तैयार की और एफआईआर दर्ज की। विधायक के बेटे की गिरफ्तारी के आदेश निकाले। लेकिन गिरफ्तारी से ठीक पहले, डीएम ने आदेश जारी कर दिया कि केस की जाँच सीबीआई को सौंप दी जाए। अजय को केस से हटा दिया गया।

अजय निराश नहीं हुए। उन्होंने मीडिया को बुलाया, प्रेस कॉन्फ्रेंस की, और सारे सबूत सार्वजनिक कर दिए। मामला राष्ट्रीय खबर बन गया। जनता में गुस्सा फैल गया। पटना से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मच गया।

जनता की ताकत

पूरे राज्य में प्रदर्शन शुरू हो गए। “पूजा को न्याय दो!” के नारे लगने लगे। सोशल मीडिया पर #JusticeForPooja ट्रेंड करने लगा। मुख्यमंत्री को मजबूरन सीबीआई को निष्पक्ष जाँच का आदेश देना पड़ा।

सीबीआई टीम ने अजय द्वारा जुटाए गए सबूतों की जाँच की। विधायक के बेटे को गिरफ्तार किया गया। कई पुलिसकर्मी, फॉरेंसिक अधिकारी और नेता भी कठघरे में आए।

न्याय की जीत

करीब एक साल चले इस केस में आखिरकार कोर्ट ने विधायक के बेटे को उम्रकैद की सजा सुनाई। फॉरेंसिक लैब के दो अफसरों को नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। कई नेताओं की राजनीतिक करियर खत्म हो गई।

अजय प्रताप सिंह को राज्य सरकार ने ‘गैलेंट्री अवार्ड’ से सम्मानित किया। लेकिन अजय ने कहा, “मुझे कोई अवार्ड नहीं चाहिए। मेरी असली जीत तब होगी, जब हर पुलिसकर्मी सच और न्याय के लिए डटेगा।”

राघवपुर में बदलाव

इस केस के बाद राघवपुर बदल गया। लोग अब पुलिस पर भरोसा करने लगे। नेताओं के डर से बाहर निकलकर सच बोलने लगे। अजय ने थानों में शिकायत पेटी लगवाई, जहाँ लोग गुमनाम शिकायत कर सकते थे।

स्कूलों में ‘कानून और नागरिक अधिकार’ विषय शुरू हुआ। महिलाओं को सेल्फ डिफेंस की ट्रेनिंग दी जाने लगी। गाँव-गाँव में ‘सच की पाठशाला’ नाम से अभियान चला।

अंतिम संदेश

कुछ साल बाद अजय का ट्रांसफर हो गया। जब वे राघवपुर छोड़ रहे थे, तो हज़ारों लोग स्टेशन पर विदाई देने आए। एक बुजुर्ग महिला ने उनके पैर छूते हुए कहा, “बेटा, तूने हमें डर से आज़ादी दी है।”

अजय ने मुस्कुराकर कहा, “मैंने कुछ नहीं किया, बस अपना फर्ज निभाया है। देश तभी बदलेगा, जब हम सब सच के साथ खड़े होंगे।”

मूल संदेश:
पद, ताकत, या डर से बड़ा सिर्फ एक ही चीज़ है — सच और न्याय। अगर एक ईमानदार अफसर ठान ले, तो पूरा सिस्टम बदल सकता है। समाज को बदलने के लिए किसी हीरो का इंतज़ार मत करो, खुद आगे बढ़ो — यही असली क्रांति है।