आखिर एक पागल को आर्मी चीफ ने सैलूट क्यों किया? वजह जान कर हैरान रह जाओगे
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उत्तर भारत के एक पुराने शहर का घंटाघर चौक हमेशा की तरह भीड़ से भरा था। जून की दोपहर थी। धूप ऐसी बरस रही थी मानो आसमान से आग गिर रही हो। सड़क का डामर पिघलकर चिपचिपा हो गया था। दुकानदार सिर पर गीला गमछा रखे बैठे थे। लोग छांव ढूंढते हुए जल्दी-जल्दी अपने काम निपटा रहे थे। हवा में धूल, पसीने और गर्म लोहे की मिली-जुली गंध तैर रही थी।
उसी चौराहे के एक कोने में, कूड़े के ढेर के पास, एक आदमी बैठा रहता था। बिखरे बाल, बढ़ी हुई दाढ़ी, फटी और धूल से सनी कमीज, पैरों में टूटी चप्पलें। चेहरे पर एक अजीब सी खोई हुई मुस्कान और होंठों पर बुदबुदाते शब्द, जिन्हें कोई ठीक से समझ नहीं पाता था। शहर के लोग उसे “पागल” कहकर पुकारते थे। कुछ बच्चे उसे देखकर हंसते, कुछ पत्थर मारकर भाग जाते, और कुछ लोग बस नज़र फेर लेते, जैसे वह इंसान नहीं, कोई बेकार पड़ी चीज हो।
चौराहे पर फल की एक दुकान थी। उसका मालिक राकेश मिश्रा अपने तेज स्वभाव के लिए मशहूर था। उसी की दुकान के पास एक सड़ा हुआ केला गिरा था। भूख से तड़पता वह आदमी धीरे-धीरे उठा और केले की ओर हाथ बढ़ाया। तभी राकेश की तेज आवाज गूंजी, “अरे ओ पागल! हट यहां से। मेरे ग्राहकों को भगा देगा क्या?”
आदमी ने हाथ रोक लिया। वह डरा नहीं। उसने राकेश की ओर देखा और अचानक सीधा खड़ा हो गया। रीढ़ बिल्कुल तनी हुई, एड़ियां आपस में जुड़ी हुईं, छाती चौड़ी। उसने दाहिना हाथ माथे तक ले जाकर एकदम सटीक सैल्यूट मारा और ऊंची आवाज में बोला, “जय हिंद, सर! दुश्मन सामने है, हम पीछे नहीं हटेंगे।”
पास खड़े कुछ लड़के ठहाके मारकर हंस पड़े। “देखो, पागल फौजी आ गया!” किसी ने कहा। एक शरारती लड़के ने सड़क से छोटा पत्थर उठाया और उसकी तरफ फेंक दिया। पत्थर सीधे उसके माथे पर लगा। खून की पतली धार बह निकली। लेकिन हैरानी की बात यह थी कि उसने ना कराह की, ना सैल्यूट तोड़ा। वह उसी मुद्रा में खड़ा रहा, जैसे किसी परेड ग्राउंड में अपने अफसर को सलामी दे रहा हो।
कुछ पल बाद वह चुपचाप हट गया और चौराहे के बीच लगे एक पुराने खंभे के पास जाकर खड़ा हो गया। उस खंभे पर कई महीने पहले 26 जनवरी के दिन किसी ने एक छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा बांधा था। अब वह फट चुका था और धागा टूटने की कगार पर था। अचानक तेज हवा चली और तिरंगा खंभे से अलग होकर नीचे गिरने लगा।

वह आदमी बिजली की तरह दौड़ा। उसने झुककर गिरते हुए तिरंगे को दोनों हाथों में थाम लिया, जैसे कोई मां अपने गिरते बच्चे को पकड़ लेती है। उसकी आंखें भर आईं। उसने अपनी फटी कमीज से तिरंगे को धीरे-धीरे साफ किया, उसे सीने से लगाया और होंठों से छुआ। उस क्षण उसके चेहरे पर जो भाव था, वह पागलपन का नहीं, गहरी श्रद्धा का था।
भीड़ में कुछ लोग चुप हो गए। मगर तभी दूर से सायरन की तेज आवाज सुनाई दी। सड़क पर खड़े ट्रैफिक पुलिस वाले चौकन्ने हो गए। “सब लोग पीछे हटो! रास्ता खाली करो!” आवाज गूंजी। आज शहर के सैन्य कैंप में उच्च अधिकारी का दौरा था। सेना का काफिला इसी रास्ते से गुजरने वाला था।
इंस्पेक्टर राठौड़ अपनी जीप से उतरे। उनकी नजर उस आदमी पर पड़ी जो अब भी तिरंगे को सीधा कर रहा था। “ए पागल! हट यहां से। बड़े साहब आ रहे हैं। सड़क के किनारे जा, समझा?” उन्होंने झुंझलाकर उसे धक्का दिया।
आदमी लड़खड़ाया, पर गिरा नहीं। उसने फिर खुद को संभाला और इंस्पेक्टर को भी सैल्यूट मार दिया। “रिपोर्टिंग फॉर ड्यूटी, सर,” उसने गंभीर आवाज में कहा।
दो सिपाहियों ने उसे पकड़कर भीड़ के पीछे खड़ा कर दिया। उसी समय सेना का काफिला दिखाई दिया। सबसे आगे मिलिट्री पुलिस की बाइक, उसके पीछे जिप्सी और बीच में काली चमचमाती गाड़ी, जिस पर तीन सितारे चमक रहे थे। उस गाड़ी में बैठे थे लेफ्टिनेंट जनरल विनोद शर्मा — अनुशासन और साहस के लिए प्रसिद्ध अधिकारी।
काफिला धीरे-धीरे चौराहे से गुजरने लगा। जनरल शर्मा खिड़की से बाहर देखते हुए भीड़ का निरीक्षण कर रहे थे। तभी उनकी नजर उस आदमी पर पड़ी। फटे कपड़े, माथे से बहता खून, मगर मुद्रा बिल्कुल परफेक्ट। जैसे ही सेना की गाड़ी उसके सामने आई, उसने झटके से खुद को छुड़ाया, सड़क के किनारे सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया और इतनी सटीक सलामी दी कि आसपास खड़े जवान भी चौंक गए।
जनरल शर्मा की भौंहें सिकुड़ गईं। उन्होंने कुछ देखा था — वह खड़ा होने का ढंग, हाथ की स्थिति, आंखों की चमक। उन्होंने तुरंत ड्राइवर से कहा, “गाड़ी रोको।”
अचानक ब्रेक लगे। पीछे की गाड़ियां भी रुक गईं। पुलिस में हलचल मच गई। जनरल शर्मा गाड़ी से उतरे। उनके बूटों की आवाज तपती सड़क पर गूंजी। वे सीधे उस आदमी के सामने जाकर खड़े हो गए। आदमी अब भी सैल्यूट में था।
कुछ क्षणों की खामोशी के बाद जनरल शर्मा की आवाज कांपी, “मेजर विक्रम सिंह…?”
जैसे किसी ने गहरी नींद में सोए व्यक्ति को झकझोर दिया हो। आदमी की आंखें डोल गईं। हाथ धीरे-धीरे नीचे आया। उसके होंठ कांपे, “कोड नेम… तूफान… मिशन पूरा हुआ, सर…”
जनरल शर्मा की आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने आगे बढ़कर उसे गले लगा लिया। भीड़ स्तब्ध रह गई। इंस्पेक्टर राठौड़ के चेहरे का रंग उड़ गया।
जनरल ने मुड़कर भीड़ की ओर देखा और भारी आवाज में कहा, “जानते हो यह कौन हैं? यह भारतीय सेना की पैरा स्पेशल फोर्सेस के मेजर विक्रम सिंह राठौर हैं। दस साल पहले एक गुप्त मिशन पर गए थे। हमें सूचना मिली थी कि वे दुश्मन के कब्जे में आकर शहीद हो गए।”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
जनरल ने आगे कहा, “इन्होंने देश के लिए सब कुछ कुर्बान कर दिया। दुश्मनों की कैद में रहे। अमानवीय यातनाएं सही, लेकिन देश का राज नहीं बताया। शायद उन्हीं यातनाओं ने इनकी याददाश्त छीन ली। किसी तरह सीमा पार छोड़ दिए गए। भटकते-भटकते यहां आ पहुंचे। और हम… हमने इन्हें पागल कहकर पत्थर मारे।”
राकेश मिश्रा की आंखें झुक गईं। पत्थर फेंकने वाला लड़का भीड़ में छिप गया।
मेजर विक्रम ने कांपते हाथों से जेब से वह मुड़ा-तुड़ा तिरंगा निकाला और जनरल को देते हुए कहा, “सर… झंडा गिरने नहीं दिया।”
जनरल ने तिरंगा माथे से लगाया। “तुमने देश का मान रखा, मेजर।”
तुरंत मेडिकल टीम को बुलाया गया। मेजर विक्रम को सम्मान के साथ गाड़ी में बैठाया गया। जाते समय जनरल शर्मा ने सबके सामने उन्हें सलामी दी। पूरा चौराहा “जय हिंद” के नारों से गूंज उठा।
बाद में मिलिट्री हॉस्पिटल में उनका इलाज शुरू हुआ। धीरे-धीरे उनकी यादें लौटने लगीं। दर्दनाक अतीत के टुकड़े सामने आने लगे — दुश्मन की जेल, अंधेरी कोठरी, पूछताछ, यातनाएं, और हर बार एक ही जवाब, “मैं भारतीय सेना का अधिकारी हूं।”
सेना ने उन्हें पूरा सम्मान दिया, उनका बकाया वेतन दिया, और उनके परिवार को खोजकर मिलाया। शहर के लोगों ने घंटाघर चौक पर एक स्मारक बनवाया, जहां लिखा था — “किसी को उसकी हालत से मत आंकिए। हर अनदेखे चेहरे के पीछे एक अनकही कहानी हो सकती है।”
राकेश मिश्रा ने उसी स्थान पर हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को तिरंगा फहराने की जिम्मेदारी ली। पत्थर फेंकने वाला लड़का सेना में भर्ती होने की तैयारी करने लगा।
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और मेजर विक्रम सिंह राठौर की कहानी शहर के बच्चों को सुनाई जाने लगी — इस सीख के साथ कि असली हीरो अक्सर शोर नहीं करते, वे चुपचाप अपना कर्तव्य निभाते हैं।
उस दिन घंटाघर चौक ने सीखा कि किसी इंसान को उसके फटे कपड़ों से नहीं, उसके त्याग से पहचाना जाता है। क्योंकि कभी-कभी जिसे दुनिया “पागल” कहती है, वही देश का सबसे बहादुर सिपाही होता है।
जय हिंद।
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