इंडियन आर्मी बनाम पुलिस: एक गरीब आदमी के श्राप से इंस्पेक्टर की मौत हो गई और आर्मी ऑफिसर ने उसे पीट दिया

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रमज़ान का चाँद दिखने में बस एक दिन बाकी था। शहर की पुरानी बस्ती में हल्की-हल्की रौनक शुरू हो चुकी थी। कहीं सेवइयों की खुशबू थी, कहीं मस्जिदों की सफाई चल रही थी। लेकिन उसी बस्ती पर एक साया मंडरा रहा था—इंस्पेक्टर राणा का साया।

राणा इस इलाके का थाना प्रभारी था। वर्दी उसके तन पर थी, मगर कानून उसके दिल में नहीं। लोग उसका नाम सुनकर सहम जाते थे। उसकी जीप जैसे ही गली में घुसती, दुकानों के शटर गिरने लगते, ठेलेवाले अपनी रेड़ियाँ समेटकर भागने लगते। वह इस डर से आनंद लेता था। उसे लगता था कि यही असली ताकत है—लोगों को काँपते देखना।

उस दिन भी वह अपनी जीप में बैठा जोर-जोर से हँसता हुआ बाजार में दाखिल हुआ।
“आज फिर देखता हूँ, कौन बैठा है यहाँ!” उसने सिपाहियों से कहा।

जीप रुकी और सिपाही रेड़ियाँ उलटने लगे। सब्जियाँ सड़क पर बिखर गईं, फल नाली में गिर पड़े। गरीबों की दिनभर की कमाई मिट्टी में मिल गई।

बाजार के बीचोंबीच एक बूढ़ा आदमी बैठा था—रहमत अली। सफेद दाढ़ी, झुकी कमर और सामने छोटा-सा ठेला। वह बरसों से वहीं बैठकर बच्चों के लिए गुब्बारे और सस्ते खिलौने बेचता था। रमज़ान से पहले की कमाई उसके लिए बहुत मायने रखती थी।

राणा उसके पास पहुँचा और ठेले को लात मार दी।
“कितनी बार कहा है यहाँ मत बैठा कर! ये तेरे बाप की जमीन है?”

रहमत अली काँपती आवाज़ में बोला, “बेटा, कल से रोज़ा है। बच्चों के लिए दो पैसे कमा लेने दे। तेरी मिन्नत करता हूँ।”

राणा ने उसे धक्का दिया। “ज़्यादा जुबान मत चला बूढ़े! अभी हड्डियाँ तुड़वा दूँगा।”

बस्ती के लोग दूर खड़े सब देख रहे थे, मगर किसी में हिम्मत नहीं थी बोलने की। तभी भीड़ को चीरता हुआ एक लंबा-सा नौजवान आगे आया। उसके कपड़ों से साफ था कि वह फौजी है। सीधी कमर, आँखों में तेज़—वह था कैप्टन आर्यन।

आर्यन छुट्टी पर अपने घर आया था। उसने बूढ़े को जमीन पर गिरते देखा तो उसका खून खौल उठा।
“इंस्पेक्टर!” उसने ऊँची आवाज़ में कहा, “क्या यही कानून है? निहत्थे बूढ़े पर हाथ उठाते हुए शर्म नहीं आती?”

राणा ने घूरकर देखा। “और तू कौन होता है मुझे सिखाने वाला? डो कौड़ी का फौजी!”

भीड़ में सन्नाटा छा गया। आर्यन आगे बढ़ा। “माफी मांग लो इनसे। यही ठीक होगा।”

राणा हँसा। “तू मुझे धमकी देगा? अपनी फौज बुला ले!”

आर्यन ने सख्ती से कहा, “जब तक मैं यहाँ हूँ, किसी गरीब पर जुल्म नहीं होगा।”

बात बढ़ी और हाथापाई तक पहुँच गई। आर्यन ने राणा को पकड़कर पीछे धकेल दिया। सिपाही आगे बढ़े, मगर भीड़ अब आर्यन के साथ थी। पहली बार राणा को अपमान का स्वाद चखना पड़ा। वह गुस्से से तिलमिलाता हुआ जीप में बैठा और चला गया।

रहमत अली ने काँपते हाथों से आर्यन का हाथ पकड़ा। “बेटा, उससे दुश्मनी मत ले। वो बहुत जालिम है।”

आर्यन मुस्कुराया। “चाचा, जब तक ये जवान जिंदा है, आपको कोई हाथ नहीं लगा सकता।”

लेकिन राणा अपमान भूलने वालों में से नहीं था। उसी रात उसने अपने गुर्गों को बुलाया।
“आज उस बूढ़े की झोपड़ी जला दो। सब खत्म हो जाना चाहिए।”

आधी रात को बस्ती में आग की लपटें उठीं। लोग चीखते हुए बाहर भागे। रहमत अली की झोपड़ी आग में घिर चुकी थी। अंदर से उसकी कमजोर आवाज़ आ रही थी।

आर्यन को खबर मिली तो वह दौड़ा। आग भड़क रही थी, मगर उसने बिना सोचे अंदर छलांग लगा दी। धुएँ से आँखें जल रही थीं, मगर उसने रहमत अली को कंधे पर उठाया और बाहर ले आया। उसके हाथ और कंधे झुलस गए थे।

रहमत अली बेहोश था। आर्यन ने आसमान की ओर देखा और कहा, “राणा, इसका अंजाम तू सोचेगा भी नहीं।”

सुबह तक बस्ती में चर्चा फैल गई कि यह राणा का काम है। मगर कोई गवाही देने को तैयार नहीं था।

उधर राणा अपने घर में ऐश कर रहा था। उसका इकलौता बेटा, आरव, कॉलेज में पढ़ता था। राणा उसे बेहद चाहता था।
“जाओ बेटा, दोस्तों के साथ घूम आओ,” उसने कार की चाबी देते हुए कहा।

आरव कार लेकर निकला, मगर कुछ ही देर बाद भयानक हादसा हो गया। कार ट्रक से टकरा गई। उसे गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया।

राणा अस्पताल पहुँचा तो उसका घमंड टूट चुका था। डॉक्टर ने कहा, “खून की सख्त जरूरत है। अभी इंतज़ाम कीजिए, वरना देर हो जाएगी।”

राणा ने फोन पर फोन मिलाए, मगर किसी ने मदद नहीं की। जिन गरीबों को उसने सालों सताया था, उनमें से कोई भी आगे नहीं आया।

वह रो पड़ा। “मैं इतना जालिम था… आज मेरे बेटे को खून देने वाला कोई नहीं।”

तभी अस्पताल के दरवाजे पर आर्यन आया। उसके हाथ अब भी पट्टी में बँधे थे।
“डॉक्टर साहब, मेरा खून ले लीजिए,” उसने कहा।

राणा ने हैरानी से देखा। “तू? मैं तो तुझे मारना चाहता था…”

आर्यन ने शांत स्वर में कहा, “गुनाह बाप ने किया है। बच्चे का क्या कसूर?”

खून चढ़ाया गया। कुछ घंटों बाद डॉक्टर बाहर आए। “मुबारक हो, आपके बेटे की जान बच गई।”

राणा की आँखों से आँसू बह निकले। वह आर्यन के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। “मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारे साथ बहुत बुरा किया।”

आर्यन ने कहा, “माफी मुझसे नहीं, रहमत चाचा से मांगो।”

अगले दिन राणा बस्ती पहुँचा। लोग हैरान थे। उसने रहमत अली के सामने सिर झुका दिया।
“चाचा, मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे माफ कर दीजिए।”

रहमत अली ने उसे देखा। “बेटा, अगर तुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है, तो अल्लाह भी माफ कर देगा।”

राणा ने अपनी जेब से नक्शा निकाला। “यहाँ आपकी नई दुकान बनेगी। पक्की दुकान। अब कोई आपको नहीं हटाएगा।”

कुछ ही हफ्तों में वहाँ नई दुकान बनकर तैयार हो गई। उद्घाटन के दिन पूरी बस्ती जमा थी। राणा ने फीता काटा और कहा, “आज से यहाँ कानून डराने के लिए नहीं, बचाने के लिए होगा।”

रमज़ान की पहली इफ्तार उसी दुकान के सामने हुई। लोग साथ बैठे, खजूर बाँटी गई। राणा का बेटा आरव भी आया। उसने रहमत अली का हाथ पकड़ा और कहा, “फौजी अंकल की वजह से आज मैं जिंदा हूँ।”

राणा ने आसमान की ओर देखा। उसे लगा जैसे वह पहली बार सुकून से साँस ले रहा है। उसे समझ आ गया था कि असली ताकत डराने में नहीं, बचाने में है।

कैप्टन आर्यन कुछ दिन बाद वापस ड्यूटी पर लौट गया। मगर उसके जाने के बाद भी बस्ती में उसका नाम इज़्ज़त से लिया जाता था।

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रहमत अली की दुकान अब सिर्फ खिलौनों की नहीं, उम्मीद की दुकान बन चुकी थी। वहाँ से गुजरने वाला हर शख्स जानता था कि अगर एक जालिम बदल सकता है, तो दुनिया भी बदल सकती है।

और इस तरह, एक गरीब बूढ़े की आह, एक फौजी की इंसानियत और एक बाप के दर्द ने मिलकर एक जालिम इंस्पेक्टर को इंसान बना दिया।