“इसने होली के रंग मे जहर मिलाया हैं… गरीब लड़के ने करोड़पति चोर को, अदालत मे नं*गा कर दिया 😱
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होली के रंग में ज़हर: एक गरीब लड़के ने करोड़पति को अदालत में बेनकाब कर दिया
रामपुर एक छोटा सा कस्बा था। यहां लोग एक-दूसरे को नाम से जानते थे। किसी के घर में खुशी होती तो पूरा गांव शामिल होता, और किसी पर दुख आता तो सब उसका सहारा बनते।
तीन दिन पहले ही रामपुर में होली का त्योहार मनाया गया था।
सड़कों पर रंग उड़ रहे थे। ढोल की आवाज गूंज रही थी। बच्चे दौड़ते हुए एक-दूसरे पर रंग फेंक रहे थे। बूढ़े लोग भी उस दिन जवानों की तरह हंस रहे थे।
गांव के सबसे बड़े मिठाई वाले सेठ रामप्रसाद ने इस बार खास मिठाइयों का इंतज़ाम किया था। पूरे गांव में उसके लड्डू और गुजिया बांटी जा रही थीं।
लोग खुश थे।
किसी को क्या पता था कि इन रंगों और मिठाइयों के पीछे एक भयानक सच छिपा है।

अगली सुबह
अगली सुबह रामपुर जिला अस्पताल की इमरजेंसी के बाहर भीड़ लगी हुई थी।
किसी को पेट में भयानक दर्द था। कोई उल्टियां कर रहा था। कई बच्चों को तेज बुखार था।
डॉक्टर मीना ने पहले मरीज को देखा। फिर दूसरे को। फिर तीसरे को।
उनके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
उन्होंने तुरंत स्टाफ से कहा
“यह मास फूड पॉइज़निंग लग रही है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अस्पताल के रिकॉर्ड के अनुसार उस दिन 73 लोग भर्ती हुए, जिनमें 21 बच्चे थे।
सबके घरों में एक चीज कॉमन थी।
उन्होंने होली के दिन सेठ रामप्रसाद की मिठाई खाई थी।
अर्जुन की दुनिया
उसी समय कस्बे के दूसरे कोने में 22 साल का एक लड़का अपनी रोज की तरह काम कर रहा था।
उसका नाम था अर्जुन।
अर्जुन की जिंदगी आसान नहीं थी।
उसके पिता की मौत कई साल पहले हो चुकी थी। घर में सिर्फ उसकी मां और छोटी बहन थी।
वे लोग एक छोटे से कमरे में रहते थे जिसकी छत बरसात में टपकती थी।
छह महीने पहले ही अर्जुन को रामप्रसाद की मिठाई फैक्ट्री में काम मिला था।
वह सफाई का काम करता था।
तनख्वाह सिर्फ 3000 रुपये महीने थी।
कम थी, लेकिन अर्जुन के लिए वही सब कुछ था।
उसकी मां की दवाई, बहन की स्कूल फीस और घर का राशन उसी से चलता था।
वह सुबह जिसने सब बदल दिया
उस दिन सुबह के लगभग छह बजे थे।
अभी पूरी तरह उजाला नहीं हुआ था।
अर्जुन फैक्ट्री के एक कोने में फर्श साफ कर रहा था।
तभी मुख्य दरवाजा खुला।
अंदर सेठ रामप्रसाद आया।
उसके साथ दो आदमी थे।
उनमें से एक के हाथ में एक बोरी थी।
सेठ ने चारों तरफ देखा।
उसे लगा फैक्ट्री खाली है।
फिर उसने धीरे से कहा
“मिलाओ इसमें… आधा-आधा।”
उस आदमी ने बोरी खोली।
अंदर से सफेद पाउडर निकला।
लेकिन वह मिठाई बनाने वाला पाउडर नहीं था।
अर्जुन का हाथ रुक गया।
उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
उसे समझ आ गया कि कुछ गलत हो रहा है।
लेकिन किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया।
सेठ के लिए वह सिर्फ एक सफाई करने वाला लड़का था।
कोई इंसान नहीं… बस एक मजदूर।
अर्जुन ने धीरे से जेब में हाथ डाला।
उसके पास एक पुराना फोन था।
स्क्रीन टूटी हुई थी… लेकिन कैमरा काम करता था।
उसने गहरी सांस ली।
और रिकॉर्ड बटन दबा दिया।
रिश्वत
शाम को अर्जुन को ऑफिस में बुलाया गया।
कमरे में सिर्फ सेठ बैठा था।
मेज पर एक मोटा लिफाफा रखा था।
सेठ ने मुस्कुराते हुए कहा
“अर्जुन… आज जो देखा… वो देखा नहीं।”
अर्जुन चुप रहा।
सेठ ने लिफाफा उसकी तरफ बढ़ाया।
“इसमें दस हजार हैं।”
दस हजार…
अर्जुन की तीन महीने की तनख्वाह।
उसके दिमाग में कई चीजें घूम गईं।
मां की दवाई।
बहन की फीस।
घर की टूटी छत।
उसके हाथ कांप गए।
उसने लिफाफा उठाया।
सेठ मुस्कुराया।
लेकिन अगले ही पल अर्जुन ने लिफाफा वापस मेज पर रख दिया।
“मुझे नहीं चाहिए।”
सेठ की मुस्कान गायब हो गई।
वह धीरे-धीरे उठकर अर्जुन के सामने आकर खड़ा हो गया।
उसकी आवाज ठंडी थी।
“तू जानता है मैं कौन हूं?”
“इस पूरे इलाके में मेरी पहुंच है।”
फिर वह हंसा।
“तू मुझे जेल भेजेगा?”
“तेरी औकात क्या है?”
अर्जुन ने उसकी आंखों में देखा।
एक पल।
फिर बिना कुछ कहे वहां से चला गया।
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असली जीत
सेठ को हथकड़ी लगाकर ले जाया गया।
उसकी आंखों में अब घमंड नहीं था।
अर्जुन की मां दूर खड़ी सब देख रही थीं।
अर्जुन उनके पास गया।
चुपचाप उनके पैर छुए।
मां ने उसके सिर पर हाथ रखा।
और बस इतना कहा
“मुझे तुम पर गर्व है।”
ये तीन शब्द अर्जुन के लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत थे।
कुछ महीने बाद
अर्जुन ने अपनी छोटी सी चाय की दुकान खोल ली।
वही पुराना चूल्हा।
वही छोटी सी दुकान।
लेकिन अब लोग वहां सिर्फ चाय पीने नहीं आते थे।
वे उस लड़के को देखने आते थे जिसने सच के लिए लड़ाई लड़ी।
एक दिन एक एनजीओ का आदमी आया।
उसने अर्जुन को कार्ड दिया।
और कहा
“हमें ऐसे लोगों की जरूरत है जो सच से नहीं डरते।”
अर्जुन ने कार्ड जेब में रखा।
और मुस्कुराकर चाय बनाने लगा।
कहानी का संदेश
रामपुर में अब भी होली आती है।
रंग अब भी उड़ते हैं।
लेकिन एक बात बदल गई है।
अब जब कोई किसी गरीब को उसकी औकात याद दिलाने की कोशिश करता है…
तो लोग कहते हैं
“औकात पैसों से नहीं… हिम्मत से बनती है।”
और फिर वे एक नाम लेते हैं—
अर्जुन।
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