एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया।।

.
.
.

एक अकेला फौजी पुलिस वालों पर भारी पड़ गया

सड़क पर रात उतर चुकी थी।
हाईवे के दोनों तरफ अंधेरा पसरा था और बीच-बीच में खड़े पीले स्ट्रीटलाइट किसी थके हुए पहरेदार की तरह झपकियाँ ले रहे थे। हवा में हल्की ठंडक थी, लेकिन पुलिस की जीप के अंदर बैठे दरोगा जालिम सिंह के चेहरे पर अलग ही गर्मी थी—अहंकार की गर्मी।

“अरे कालिया,” जालिम सिंह ने तिरछी मुस्कान के साथ कहा,
“देख रहा है आज अपना टशन? लगता है आज कोई बड़ा मुर्गा फँसेगा।”

कांस्टेबल कालिया हँसा।
“सही पकड़ा साहब। आज तो अपनी चांदी है।”

हेड कांस्टेबल रेशम सिंह ने दूर सड़क की तरफ देखा।
“साहब, देखो आगे कौन जा रहा है।”

जालिम सिंह ने आँखें सिकोड़ लीं।
“लगता है कोई फौजी है… अरे वाह! आज तो मज़ा आएगा। चलो गाड़ी बढ़ाओ। देखते हैं कितनी हिम्मत है इसकी।”


एक सिपाही, एक माँ और अधूरी छुट्टी

उसी सड़क पर, मोटरसाइकिल पर सवार विक्रम तेज़ी से आगे बढ़ रहा था।
कंधे पर टंगी राइफल, चेहरे पर थकान और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी। यूनिट से इमरजेंसी कॉल आया था। उसे तुरंत लौटना था।

कुछ घंटे पहले ही वह गाँव पहुँचा था।

“राम-राम काका,” उसने बुज़ुर्ग पड़ोसी से कहा था।
“अरे विक्रम बाबा!” काका खुशी से चहक उठे। “कब आए? बताया भी नहीं।”

घर में घुसते ही माँ की वही पुरानी खुशबू—अगरबत्ती, सादा खाना, सुकून।
माँ ने उसे देखा तो आँखें भर आईं।

“बेटा, बाहर क्यों खड़ा है? अंदर आ।”

विक्रम मुस्कुराया।
“माँ, तेरे हाथ का खाना खाने के लिए ही भूख बचा कर रखी थी।”

रसोई में बैठा विक्रम, पहली कौर मुँह में रखते ही बोला—
“दुनिया में चाहे कहीं भी चले जाओ, माँ के हाथ के खाने जैसा स्वाद कहीं नहीं मिलता।”

माँ उसके दुबले चेहरे को देखती रही।
“वहाँ ठीक से खाना नहीं मिलता क्या?”

“माँ,” विक्रम हँसा,
“फौज का खाना बढ़िया होता है, बस तेरे प्यार का तड़का नहीं होता।”

फोन बजा।

“यस कमांडिंग ऑफिसर, विक्रम हियर।”

दूसरी तरफ आवाज़ सख्त थी।
“विक्रम, इमरजेंसी है। यूनिट को तुरंत मूव करने का ऑर्डर मिला है। क्या तुम निकल सकते हो?”

विक्रम ने बिना रुके कहा—
“यस सर। आई एम मूविंग।”

माँ का चेहरा उतर गया।
“बेटा, अभी तो आया था…”

विक्रम ने माँ का हाथ थामा।
“अगर मैं नहीं गया, तो मेरे साथी खतरे में पड़ सकते हैं। भारत माँ भी बुला रही है।”

माँ ने आँसू पोंछे।
“जा बेटा… विजय हो।”


रोक-टोक और अहंकार

अब वही विक्रम हाईवे पर था।

पीछे से पुलिस की जीप तेज़ी से पास आई।
“ओए फौजी!”
“ओ हीरो! कहाँ भागा जा रहा है बे?”

विक्रम ने बाइक धीमी की।
“जय हिंद साहब। यूनिट से इमरजेंसी कॉल आया है। जल्दी जाना है।”

जालिम सिंह हँसा।
“इमरजेंसी तेरे घर में होगी। ये सड़क तेरे बाप की है क्या? हेलमेट कहाँ है तेरा?”

“साहब,” विक्रम ने संयम से कहा,
“जल्दबाज़ी में रह गया। चालान काटना है तो काट लीजिए, लेकिन जाने दीजिए। मामला देश की सुरक्षा का है।”

“अरे देश की सुरक्षा!” जालिम सिंह ने मज़ाक उड़ाया।
“आज इसकी वर्दी उतार कर ही दम लूँगा।”


तनाव बढ़ता है

जीप ने बाइक को आगे से घेर लिया।
“नीचे क्यों उतर गया?” जालिम सिंह चिल्लाया।
“दम नहीं है क्या?”

विक्रम ने गहरी साँस ली।
“साहब, क्या चाहते हो? अब खेत में उतार दूँ गाड़ी?”

यह बात जालिम सिंह को चुभ गई।
“जुबान लड़ाता है! आगे चेक पोस्ट आने वाला है, वहीं रोकेंगे।”

विक्रम समझ चुका था—मामला अब कानून का नहीं, अहंकार का है।


भीड़ और वीडियो

चेक पोस्ट पर कुछ लोग जमा हो गए।
किसी ने मोबाइल निकाल लिया।

“ये पुलिस वाले एक फौजी को घेर रहे हैं!”
“ये तो गुंडागर्दी है!”

विक्रम ने सख्त आवाज़ में कहा—
“हाथ मत लगाना। वर्दी की इज्जत करना सीखो।”

जालिम सिंह भड़क गया।
“अबे, तू हमें सिखाएगा कानून?”

उसने झूठा आरोप लगाया—
“देखो सब! इस बदमाश ने पुलिस पर बंदूक तानी है।”

भीड़ में हलचल मच गई।
लेकिन कैमरे सब कुछ रिकॉर्ड कर रहे थे।


काफिले की गड़गड़ाहट

अचानक दूर से सायरन की तेज़ आवाज़ आई।
एक नहीं, कई गाड़ियाँ।

कालिया घबरा गया।
“साहब… ये तो पूरा काफिला लग रहा है।”

कुछ ही मिनटों में पुलिस की कई गाड़ियाँ रुकीं।
सबसे आगे उतरे एसपी सूर्यकांत राठौर

“जय हिंद,” उन्होंने सबसे पहले विक्रम से कहा।

फिर जालिम सिंह की तरफ मुड़े।
“मेरे फोन क्यों नहीं उठाए?”

जालिम सिंह हकलाया।
“सर… नेटवर्क…”

एसपी ने मोबाइल उठाया।
“मैंने वीडियो देख लिया है।”


इंसाफ

एसपी की आवाज़ गूँज उठी।
“ये वो जवान है, जिसकी वजह से हम रात को चैन से सोते हैं। और तुमने इसकी वर्दी का अपमान किया?”

उन्होंने आदेश दिया—
“सब-इंस्पेक्टर जालिम सिंह, हेड कांस्टेबल रेशम सिंह, कांस्टेबल कालिया—इन सबकी बेल्ट और हथियार तुरंत जब्त करो।”

जालिम सिंह गिरगिड़ाने लगा।
“सर, गलती हो गई। मेरे बच्चों का ख्याल कीजिए…”

“बहुत देर हो चुकी,” एसपी ने कहा।
“तुम सस्पेंड हो। विभागीय जाँच और क्रिमिनल केस चलेगा।”

चाबी विक्रम की तरफ बढ़ाते हुए बोले—
“जवान, ये तुम्हारी। और अगर आगे कोई रोके, मेरा कार्ड दिखा देना।”

विक्रम ने सैल्यूट किया।
“जय हिंद सर।”


अंत, लेकिन सबक

विक्रम फिर बाइक पर बैठा।
“दोस्तों,” उसने भीड़ से कहा,
“मेरी यूनिट इंतज़ार कर रही है। मैं जा रहा हूँ।”

रात के अंधेरे में उसकी बाइक दूर निकल गई।
पीछे रह गईं कुछ शर्मिंदा वर्दियाँ, और एक सबक—

वर्दी ताकत के लिए नहीं, सेवा के लिए होती है।
और असली फौजी को रोका जा सकता है, झुकाया नहीं।

जय हिंद 🇮🇳