एक बेटा अपने माता-पिता पर अत्याचार करता है। एक हृदय विदारक और भावनात्मक कहानी।
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हलीमा बेगम की जिंदगी हमेशा संघर्षों से भरी रही थी। पति के गुजर जाने के बाद उन्होंने अपने इकलौते बेटे अल्ताफ को अपनी ममता, मेहनत और प्यार से बड़ा किया। वे चाहती थीं कि उनके बेटे को कभी किसी चीज़ की कमी महसूस न हो। खुद भूखी रह जातीं लेकिन बेटे का पेट कभी खाली नहीं रहता। लेकिन वक्त के साथ सब बदल गया था। अल्ताफ अब बड़ा हो गया था, उसकी शादी रुबीना से हो चुकी थी। हलीमा बेगम को लगा था कि बहू आएगी तो घर में सुख-शांति आएगी, काम में मदद मिलेगी, लेकिन हुआ इसका उल्टा।
रुबीना घर के कामों से बचती थी, हमेशा सज-धज कर कमरे में बैठी रहती। अल्ताफ भी उससे कुछ नहीं कहता, उल्टा हर काम अपनी मां के सिर पर डाल देता। ‘‘अम्मा, खाना तुम ही बनाओगी, मुझे किसी और के खाने की आदत नहीं है।’’ ‘‘अम्मा, कपड़े भी तुम ही धोओ, रुबीना ठीक से नहीं धोती।’’ ‘‘अम्मा, बर्तन भी तुम ही साफ करना, इसमें से साबुन की ब आती है जब रुबीना धोती है।’’ हलीमा बेगम चुपचाप सब करती रहीं। उन्हें लगा कि बेटे की खुशी में ही उनकी खुशी है, लेकिन यह खुशी कब बोझ बन गई, उन्हें पता ही नहीं चला।
एक बार अल्ताफ ने घर पर दोस्तों की दावत रखी और अम्मा से कहा, ‘‘आज खाना अच्छा नहीं बना तो घर से निकाल दूंगा।’’ डर-डर के हलीमा बेगम ने खाना बनाया। जब दोस्तों ने खाना खाया तो बोले, ‘‘नौकरानी को बुलाओ जिसने खाना बनाया है।’’ अम्मा के हाथ-पांव कांपने लगे। अल्ताफ ने प्लेट जोर से जमीन पर पटक दी और मां को गुस्से से देखा, ‘‘फिर से नमक तेज!’’ हलीमा बेगम सहम गईं। कभी ऐसा नहीं हुआ था कि उनके खाने में नमक-मिर्च आगे-पीछे हो जाए, लेकिन अब शायद बुढ़ापा था या कोई और वजह, खाना उनसे ठीक से नहीं बनता था।
रुबीना ने शादी के बाद बस एक बार ही खाना बनाया था, अल्ताफ ने उसे कुछ नहीं कहा लेकिन खाना भी नहीं खाया। ‘‘अम्मा, खाना तुम बनाओगी, मुझे किसी और के खाने की आदत नहीं है।’’ रुबीना ने जैसे राहत की सांस ली। यह मसला सिर्फ खाने का नहीं था, कपड़े, बर्तन, सफाई—सब हलीमा बेगम के जिम्मे आ गया था। रुबीना कभी-कभी कहती, ‘‘अम्मा, दो रोटियां मेरे लिए भी बना देना। आपकी रोटियां बहुत अच्छी होती हैं।’’ हलीमा बेगम चुपचाप खाना बनातीं, कपड़े धोतीं, बर्तन साफ करतीं। उन्हें उम्मीद थी कि किसी दिन बहू उनका हाथ बंटाएगी, लेकिन वह दिन कभी नहीं आया।
एक बार दावत में ससुराल वाले आए। हलीमा बेगम के हाथ का खाना खाकर बहुत तारीफ की। उन्हें लगा कि खाना उनकी बेटी ने बनाया है। जब पता चला कि हलीमा बेगम ने बनाया है, तो रुबीना का मूड खराब हो गया। हर तारीफ की हकदार हलीमा बेगम थी और यह बात रुबीना से बर्दाश्त नहीं हो रही थी।
कुछ दिनों बाद जब हलीमा बेगम नमाज पढ़ रही थीं, रुबीना ने चुपके से पतीले में नमक का चम्मच भर के डाल दिया। रात को जब अल्ताफ खाना खाने बैठा, तेज नमक का निवाला उसके मुंह में गया। प्लेट पटक कर उसने जमीन पर फेंकी और मां को बुरा-भला कहने लगा। ‘‘इतना तेज नमक! खाना कड़वा लग रहा है। खाने के काबिल नहीं रहा।’’ हलीमा बेगम खुद हैरान रह गईं, खाने में नमक बहुत तेज था। उन्होंने जितना रोज डालती थीं, उतना ही डाला था। ‘‘बेटा, मैंने तो नमक इतना ही रखा था जितना रोज रखती हूं।’’ अल्ताफ चिल्लाया, ‘‘क्या कोई जिन-भूत है हमारे घर में जो नमक तेज करके चला गया?’’

अल्ताफ ने मां पर शक किया, ‘‘आप जानती हैं, रुबीना को कोई काम आता ही नहीं है। वह तो किचन में दाखिल तक नहीं होती। शायद आप मेरी बीवी के खिलाफ करना चाहती हैं।’’ हलीमा बेगम ने सारी गलती खुद पर ले ली। बेटे के तेवर देख चुकी थीं। अपने दिल को समझा लिया कि पहले भी तो करती थी, अब भी कर लूंगी।
इस बार उन्होंने खाना बनाया और हर चीज याद से डाली। डालने के बाद वहीं खड़ी रहीं, चूल्हा बंद करके ही नमाज पढ़ने गईं। लेकिन जब बाहर आईं तो देखा कि किचन से धुआं उठ रहा है। खाना जल चुका था। रुबीना भी वहीं से आ रही थी। ‘‘अम्मा, यह क्या जल रहा है? मैं तो सो रही थी। भूख की वजह से मेरी आंख खुल गई। बावर्ची खाने में आई तो देखा खाना जल गया।’’ हलीमा बेगम कहने लगीं, ‘‘बेटा, मैंने तो खुद चूल्हा बंद किया था।’’ रुबीना बोली, ‘‘आप भूल गई होंगी। उम्र भी तो इतनी हो गई है आपकी। इस उम्र में इंसान भूल जाता है।’’
हलीमा बेगम ने दोबारा सब्जी काटी, बनाई। लेकिन रात को मिर्च बहुत तेज थी। फिर से अल्ताफ गुस्से से देख रहा था। ‘‘मुझे समझ आ गई है, आप जानबूझकर यह हरकतें कर रही हैं ताकि आपको खाना न बनाना पड़े।’’ हलीमा बेगम रोते हुए कहने लगीं, ‘‘जब सारी जिंदगी तुम्हें खिलाया है बेटा, तो अब क्यों मैं ऐसा करूंगी? मुझे शायद भूलने की बीमारी हो गई है। मुझे किसी डॉक्टर के पास ले जाओ।’’
अगले दिन अल्ताफ उन्हें डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने कहा, ‘‘ऐसी कोई दवाई नहीं है जिससे मैं आपकी याददाश्त को तेज कर दूं। हां, बादाम वगैरह खाया करें। वैसे तो बजाहिर ऐसी कोई बात नहीं है। ब्लड प्रेशर आपका ठीक है। लेकिन जाहिर सी बात है उम्र का तकाजा है। मेरा मशवरा है कि काम से हाथ हटा लें, बहू के सर पर डाल दें।’’ अल्ताफ के माथे पर बल पड़े थे। घर आकर कहने लगा, ‘‘मुझे तो लगता है कि आप झूठे बहाने करती हैं। डॉक्टर कहता है कि आप बिल्कुल फिट-फाट हैं।’’
हलीमा बेगम ने कहा, ‘‘यह भी तो कहता है कि मेरी उम्र का तकाजा है।’’ ‘‘फिर ऐसा करें जैसे आप पकाती हैं, वैसे रुबीना को सिखा दें।’’ रुबीना ने कहा, ‘‘हां हां, क्यों नहीं अम्मा, आप मुझे सिखा दें।’’ लेकिन खाना फिर से बस जायका ही बना था। कच्चे प्याज और अदरक-लहसुन का कच्चा सा टेस्ट मुंह में आ रहा था। खाना इतना बजायका था कि हलक से निवाला नीचे न उतरे। अल्ताफ ने एक निवाला जो मुंह में डाला था, वह भी थूक दिया। पहली बार उसने रुबीना पर चिल्लाकर बात की थी, ‘‘यह तुमने क्या बनाया है?’’ रुबीना रोते हुए अपने कमरे में चली गई। अल्ताफ हलीमा बेगम को घूरने लगा, ‘‘आप क्यों इसे ठीक से नहीं सिखाती? मुझे तो लगता है कि आप चाहती नहीं हैं कि वह खाना सीखे। जानबूझकर आपने उसको ऐसा गंदा खाना सिखाया।’’
हलीमा बेगम अपने आंसू छुपा रही थीं। कुछ देर बाहर बैठी रहीं, बार-बार अपने आंसू साफ करती रहीं। एक पड़ोसन उनके पास आकर बैठ गई, ‘‘क्या हुआ? आप क्यों रो रही हैं?’’ ‘‘ऐसे ही, सर में दर्द है। घबराहट हो रही थी इसलिए बाहर दरवाजे पर बैठ गई। यहां पर ठंडी हवा चल रही है।’’ पड़ोसन कहने लगी, ‘‘तुम्हारे घर से चिल्लाने की बड़ी आवाजें आती हैं। अल्ताफ को कहा करो कि गुस्सा कम किया करें। बुरी बात होती है। कभी-कभी तो लगता है जैसे तुम पर चीख रहा है।’’ हलीमा बेगम ने आंसू साफ किए, ‘‘नहीं नहीं, अपनी बीवी पर चीखता है। भला मुझ पर क्यों चीखेगा? मेरी तो बहुत इज्जत करता है। कभी आंख उठाकर मेरी तरफ नहीं देखा।’’
पड़ोसन कहने लगी, ‘‘रहने भी दो, सब पता है मुझे किस पर चिल्लाता है। पर्दे मत डालो अपने बेटे पर। कौन नहीं जानता उसकी बदमिजाजी और बदखलाकी को। तुम्हारी चुप ने ही उसे बदतमीज किया है। बचपन से उसे डांट के रखा होता तो इस तरह बदतमीज न बनता।’’ हलीमा बेगम कहने लगी, ‘‘मैंने तो इसलिए प्यार दिया कि कहीं बाप की कमी न महसूस हो। कहीं उसे यह न लगे कि बाप नहीं है तो मां ने ममता भी न्योछावर नहीं की।’’
पड़ोसन बोली, ‘‘अपनी सारी जिंदगी तो तुमने उसके नाम कर दी और क्या चाहता है तुम्हारा बेटा तुमसे? अरे तुम जवान थीं, चाहती तो दूसरी शादी कर लेतीं। सौतेला बाप उसके सर पर आता, उसे 10 जूतियां लगाता तो उसका भी दिमाग दुरुस्त होता। तुम्हारी जिंदगी भी सुख में आ जाती। कितना समझाया हम लोगों ने। कितने लोगों का रिश्ता आता था तुम्हारे लिए। लेकिन तुम्हारी एक जिद थी कि बेटे के साथ जुल्म नहीं कर सकती। बाप चला गया है, सौतेला बाप नहीं ला सकती। क्या मिला तुम्हें? बेटे को देख रही हो? उसके तेवर देखे हैं तुमने।’’
जैसे ही हलीमा बेगम ने पीछे देखा तो अल्ताफ बड़े गुस्से से खड़ा था। वह बुरी तरह से घबरा गईं। फौरन से उठकर घर के अंदर आकर दरवाजा बंद किया। एक जोरदार थप्पड़ था जो हलीमा बेगम के मुंह पर पड़ा और मारने वाला उनका बेटा था। ‘‘तू मेरी बुराइयां करती है पड़ोस में?’’ हलीमा बेगम को तो जैसे यकीन नहीं आया। गाल पर दर्द और जलन नहीं हुई जितनी दर्द की लहर सीने में उठी थी। यह नहीं सोचा था कि बेटा हाथ उठाएगा। ‘‘बेटा, तुमने क्या मेरे मुंह पर सचमुच थप्पड़ ही मारा है या मैं कुछ बोल रही हूं?’’ आंखों से टप-टप आंसू बह रहे थे। लेकिन अल्ताफ को कोई शर्मिंदगी नहीं थी। ‘‘शायद मुझे भूल गया। मेरा बेटा मुझे थप्पड़ तो नहीं मार सकता। उसका हाथ मुझ पर उठ नहीं सकता। शायद मुझे वाकई भूलने की बीमारी हो गई है।’’ यह कहते-कहते रोते-रोते अपने कमरे में चली गईं। सामने लगे श्रृंगार मेज के पास खड़े होकर देखा तो गाल पर उंगलियां छपी हुई थीं। फूट-फूट कर रोने लगीं।
रात भर सुकून से सो नहीं पाईं। सुबह देर से आंख खुली। दरवाजा जोर-जोर से धड़ाया जा रहा था। ‘‘अम्मा, जल्दी बाहर आकर नाश्ता बना के दो। मुझे दुकान से देर हो रही है।’’ हड़बड़ा कर हलीमा बेगम उठ बैठीं। दरवाजा खोला तो सामने अल्ताफ खड़ा था। लेकिन शर्मिंदगी उसके चेहरे पर दूर-दूर तक नहीं थी। वह उठकर नाश्ता बनाने लगीं। रुबीना नाश्ता करते-करते बोली, ‘‘यह अल्ताफ भी ना, गुस्से में अंधा ही हो जाता है। अरे क्या जरूरत पड़ी थी थप्पड़ मारने की? क्या हो गया जो आपने मोहल्ले की चार औरतों से उसकी बुराई कर दी?’’ हलीमा बेगम ने कोई जवाब नहीं दिया। उनकी अंधी मोहब्बत का शायद उन्हें यही सिला मिलना था। अपने बेटे के कपड़े धोती थीं, बड़ी मोहब्बत से। खाना बनाकर देती थीं ताकि पेट भर के खाए। क्या खबर थी कि यह सब चीजें उसके लिए मुसीबत बन जाएंगी।
अब भूख मरने लगी थी। दोपहर को भी कुछ नहीं खाया। सारे घर के काम करके खाना बनाने के बाद रुबीना को अपने पास बुलाया। ‘‘देखो, चूल्हा बंद है?’’ ‘‘हां, चूल्हा बंद है।’’ ‘‘अच्छा, जरा खाने का नमक चेक करो। ठीक है?’’ ‘‘हां, नमक तो ठीक है। मिर्च भी ठीक है।’’ ‘‘अच्छा देखो बेटा, मैं तो भूल जाती हूं। लेकिन तुम याद रखना कि यह खाना बिल्कुल ठीक है। नमक-मिर्च ठीक है और चूल्हा बंद है।’’ रुबीना मरे-मरे पैरों से अपने कमरे में चली गई। गाल पर का निशान तो गायब हो गया था लेकिन दिल पर छाप गहरी पड़ चुकी थी।
अब खाना ठीक रहता था। नमक-मिर्च बिल्कुल ठीक रहता था। खाने में कोई भी गड़बड़ नहीं हो रही थी। अल्ताफ कहने लगा, ‘‘वैसे अम्मा, मुझे पता होता कि मेरा एक थप्पड़ आपके खाने को पहले जैसा बना देगा तो यह मैं पहले ही कर देता।’’ उसने बड़े फेहर से मुस्कुराते हुए कहा, जैसे कि थप्पड़ मां को न मारा हो, किसी और को मारा हो। हलीमा बेगम तो जैसे पत्थर का बुत बन चुकी थीं।
एक बार अल्ताफ ने अपने दोस्तों को दावत पर बुलाया। ‘‘खाना बहुत मजे का बनाइएगा।’’ हलीमा बेगम ने खाना बना दिया। दोस्तों ने खाना खाया तो बहुत तारीफ की। ‘‘किसने बनाया है? अपनी उस मुलाजिमा को बुलाओ।’’ यह सुनकर जैसे हलीमा बेगम तो अंदर से मर चुकी थीं। यह हैसियत थी उनकी—एक मुलाजिमा जैसी। फिर सोचा कि शायद अल्ताफ कहेगा कि नहीं, मेरी मां ने बनाया है। लेकिन उसने आवाज दी, ‘‘हलीमा अम्मा, अंदर आई।’’ बस इससे ज्यादा बर्दाश्त नहीं की। हलीमा बेगम वहीं गिर गईं। सांस रुक गई थी और वह मर चुकी थीं।
हलीमा बेगम के मरने के बाद जैसे सचमुच में अल्ताफ की जिंदगी बदल गई थी। बीवी का खाना पसंद नहीं आता था। न बाजार का खाना ठीक से खाया जाता था। निवाला मुंह में लेता तो अंदर निगला नहीं जाता था। अब वह रोता था कि मां के जाने का अब दुख हुआ था। जिस हाथ से मां को थप्पड़ मारा था, उस हाथ में ऐसे छाले बने कि ठीक होने का नाम नहीं ले रहा था। पहले से कमजोर हो गया था। रुबीना सिर्फ उसे दूध ही देती थी और साथ में सूखा सा ब्रेड रख देती थी कि रोटी नहीं खाई जाती तो यह खा लो। रोता था, बिलखता था। अपनी मां की कब्र पर जाकर माफियां मांगता था। लेकिन वह मारा हुआ थप्पड़ उसके लिए जैसे उम्र भर की सजा बन गया था।
अब अल्ताफ हर वक्त रोता-बिलखता रहता है। उसने अपने हाथ का बहुत इलाज करवाया है, लेकिन उसका हाथ ठीक नहीं होता। एक दिन रुबीना भी तंग आकर उसको छोड़कर चली गई और अब अल्ताफ अपनी जिंदगी की आखिरी सांसें गिन रहा है। अल्लाह ताला से अपनी हर वक्त मौत मांगता रहता है।
अल्लाह पाक हम सबको अपने वालिदैन का फरमाबरदार बनाए। आमीन।
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