करोडपति ने हाथी को 30 सालो तक चैन से बाँध कर रखा गया… गरीब लड़के ने कर दिया रिहा, फिर | Story

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जंजीरें इंसानियत को मारती हैं

भाग 1: जर्जर चिड़ियाघर और बंधा हुआ हाथी

शहर के बाहर एक बहुत पुराना चिड़ियाघर था। कभी यह जगह बच्चों की खुशियों से गूंजती थी, लेकिन अब वहां सन्नाटा था। दीवारें जर्जर हो चुकी थीं, पिंजरे जंग खा चुके थे, और जानवरों की आंखों में वह चमक नहीं बची थी जो आज़ादी में होती है। हर तरफ उदासी थी, पेंट उखड़ गया था, दीवारों पर दरारें थीं, और पिंजरों की सलाखों पर जंग। जानवर अपने-अपने पिंजरों में बेजान पड़े रहते थे, जैसे उन्होंने जिंदगी से हार मान ली हो।

इसी चिड़ियाघर के सबसे कोने में एक विशाल हाथी रहता था। उसका पिंजरा सबसे दूर था, जहां धूप भी कम पहुंचती थी, हवा भी ठीक से नहीं आती थी। वह बड़ा था, भारी-भरकम, लेकिन अब उसकी खाल ढीली पड़ चुकी थी, कान लटके हुए थे, आंखें धुंधली। उसके पैरों में मोटी लोहे की जंजीर बंधी रहती थी, जो बहुत पुरानी थी, जंग लगी थी, लेकिन अभी भी मजबूत थी। हाथी के पैरों पर जंजीर के निशान थे, कई जगह छाले थे, कभी-कभी खून भी निकलता था। लेकिन किसी को परवाह नहीं थी।

कहा जाता था कि 30 साल पहले यह हाथी बहुत उग्र था। जब उसे पहली बार चिड़ियाघर में लाया गया, उसने भारी तबाही मचाई थी। दरवाजे तोड़ दिए, दीवारें गिरा दी, कई लोग घायल हुए। उसी डर की वजह से उसे हमेशा के लिए बांध दिया गया। मालिक ने फैसला किया, “इसे कभी नहीं छोड़ना है, यह खतरनाक है।” और वह डिसीजन 30 साल तक चलता रहा। किसी ने सवाल नहीं किया, किसी ने सोचा नहीं कि क्या यह सही है।

वक्त बीतता गया। साल पर साल निकलते गए, दिन बदलते रहे, महीने गुजरते रहे, मौसम आते-जाते रहे। गर्मी, बरसात, सर्दी — हर मौसम में हाथी वहीं रहा, उसी जगह, उसी जंजीर में। उसकी जिंदगी एक रूटीन बन गई थी — सुबह उठना, थोड़ा चारा मिलना, पूरा दिन खड़े रहना, शाम को फिर थोड़ा खाना, रात में लेट जाना। बस इतनी ही उसकी दुनिया रह गई थी।

धीरे-धीरे उसकी आंखों से गुस्सा गायब हो गया, उम्मीद भी। पहले उसकी आंखों में एक चिंगारी थी, बेचैनी थी, छटपटाहट थी। लेकिन साल दर साल वह चिंगारी बुझती गई। अब उसकी आंखों में सिर्फ खालीपन था, एक गहरा अंतहीन खालीपन। उसकी चाल भारी हो गई, सूंड ढीली, कदम भारी। वह अब वही हाथी नहीं रहा था जिसे कभी खतरनाक कहा जाता था। अब वह बस थका हुआ था, जिंदगी ने उसे तोड़ दिया था। 30 साल की कैद ने उसे पूरी तरह खत्म कर दिया था। अब वह सिर्फ एक छाया था, अपने पुराने स्वरूप की एक धुंधली तस्वीर।

भाग 2: गरीब सफाईकर्मी और उसका बेटा

इसी चिड़ियाघर में एक गरीब आदमी को सफाई की नौकरी मिली थी। फटे पुराने कपड़े पहनता था, लेकिन मेहनती और ईमानदार था। उसे इस नौकरी की बहुत जरूरत थी — घर में खाने के लिए पैसे नहीं थे। उसका छोटा बेटा अक्सर उसके साथ आता, क्योंकि वह उसे घर पर अकेला नहीं छोड़ सकता था। बच्चा करीब 10-11 साल का था, दुबला-पतला, लेकिन उसकी आंखों में एक अलग ही संवेदनशीलता थी।

बच्चा चिड़ियाघर के हर जानवर को देखता, लेकिन सबसे ज्यादा देर उसकी नजर उसी हाथी पर टिक जाती। वह सिंह को देखता, बाघ को देखता, बंदरों को देखता, लेकिन हमेशा उसके कदम हाथी के पिंजरे की तरफ चले जाते। वह वहां खड़ा होकर हाथी को घंटों देखता रहता। जब भी हाथी को देखता, उसका दिल भारी हो जाता। उसे समझ नहीं आता था कि यह भारीपन क्यों है, लेकिन हर बार जब वह उस बूढ़े हाथी को देखता, उसके अंदर एक अजीब सा दर्द उठता, जैसे किसी ने उसके दिल को निचोड़ दिया हो।

एक दिन बच्चे ने अपने पिता से पूछा, “बाबा, इस हाथी को हमेशा बांधकर क्यों रखा है? क्या यह बीमार है?” वह genuinely curious था। उसे लगता था कि शायद हाथी को कोई बीमारी है, इसलिए उसे अलग रखा गया है। पिता ने काम करते-करते कहा, “नहीं बेटा, यह बहुत खतरनाक था। इसे छोड़ दिया जाए तो तबाही मचा देगा।” पिता ने बिना ज्यादा सोचे जवाब दे दिया, वही कहा जो उसने दूसरे कर्मचारियों से सुना था।

बच्चा कुछ देर चुप रहा, फिर बोला, “पर अब तो यह कुछ करता ही नहीं। यह तो बहुत उदास लगता है।” बच्चे की आवाज में दर्द था। वह देख सकता था कि हाथी खुश नहीं है, उसकी आंखों में कोई जान नहीं है। पिता ने लंबी सांस ली, “30 साल से बंधा है, अब इसमें जान ही कहां बची है? इसे छोड़ भी दें तो क्या फायदा, ज्यादा दिन जिएगा भी नहीं।” पिता को भी दुख था, लेकिन वह क्या कर सकता था? वह एक छोटा सा कर्मचारी था, उसकी कौन सुनने वाला था?

भाग 3: बारिश और खतरा

कुछ दिन बाद तेज बारिश हुई। आसमान फट पड़ा, घंटों बारिश होती रही। चारों तरफ पानी ही पानी हो गया। चिड़ियाघर के पास लगा पानी का पाइप फट गया। बारिश के प्रेशर से पुराना पाइप टूट गया, पानी जोर से बहने लगा और हाथी के पिंजरे के अंदर भरने लगा। पानी का बहाव तेज था और हाथी का पिंजरा नीची जगह पर था। पानी सीधा उसी की तरफ जा रहा था। पानी हाथी के पैरों तक आ गया, कीचड़ बन गया। कुछ ही मिनटों में पिंजरे में काफी पानी भर गया, जमीन कीचड़ बन गई। हाथी के पैर कीचड़ में धंसने लगे।

हाथी परेशान होकर हिलने लगा, लेकिन जंजीर ने उसे वहीं रोक लिया। हाथी ने हिलने की कोशिश की, वह ऊंची जगह पर जाना चाहता था, लेकिन जंजीर ने उसे खींच लिया। वह वहीं फंस गया। बच्चा दौड़कर अपने पिता के पास गया, “बाबा, हाथी डूब जाएगा! उसे कहीं और ले चलते हैं।” बच्चे की आवाज में पैनिक था। उसे लग रहा था कि हाथी की जान जा सकती है। पिता घबरा गए, “नहीं बेटा, ऐसा मत बोल। अगर कुछ हो गया तो मेरी नौकरी चली जाएगी।” पिता को अपनी नौकरी का डर था, उसे पता था कि अगर उसने बिना परमिशन के हाथी को छुआ तो उसे निकाल दिया जाएगा।