करोड़पति अपने बच्चों का इलाज कराने के लिए भारी रकम चुकाई, लेकिन सच्चाई का खुलासा करने वाली नानी थी।

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प्रस्तावना

दिल्ली के एक आलीशान बंगले में करोड़पति राजेश मल्होत्रा की दुनिया हमेशा नियंत्रण में रहती थी। उनके दो जुड़वा बेटे, आर्यन और अथर्व, दुर्लभ मांसपेशी बीमारी से पीड़ित थे। डॉक्टरों की राय थी कि वे पांच साल की उम्र से पहले व्हीलचेयर तक सीमित हो जाएंगे। राजेश ने दुनिया के सर्वश्रेष्ठ क्लीनिक, महंगी दवाएं, और अनुभवी नर्स सुधा पर लाखों खर्च किए थे। लेकिन इस दुनिया की असली सच्चाई उनके बच्चों की नानी, कामिनी के पीले दस्तानों में छिपी थी।

भाग 1: चुप्पी का घर

राजेश का घर एक अस्पताल जैसा था। हर कोना साफ, हर चीज पर नियंत्रण, और बच्चों के आसपास सिर्फ मेडिकल स्टाफ। नर्स सुधा अनुशासन की मूर्ति थी। बच्चों को हमेशा दवा दी जाती, वे दिन में 18 घंटे सोते रहते। घर में चुप्पी थी, बच्चों की हंसी कहीं खो गई थी।

कामिनी, एक साधारण सफाई कर्मचारी, अदृश्य सी थी। लेकिन बच्चों के लिए वही जीवन की एकमात्र किरण थी। उसके पीले दस्ताने बच्चों के लिए जादू थे—वे कठपुतलियां, किरदार, और सुरक्षा का प्रतीक बन चुके थे। वह बच्चों के साथ खेलती, गाती, और उन्हें हंसाती थी। लेकिन राजेश को यह सब नजर नहीं आता था।

भाग 2: सच्चाई का खुलासा

एक दिन राजेश ने देखा कि उनके बच्चे बिना सहारे चल रहे थे। वह हैरान रह गए। डॉक्टरों की रिपोर्ट के अनुसार तो यह असंभव था। उन्होंने कामिनी को डांटा, उसे नौकरी से निकाल दिया। लेकिन कामिनी ने जाते-जाते एक सवाल छोड़ा—”अगर बच्चे इतने बीमार हैं तो नर्स दवा की शीशियां अपने बैग में क्यों रखती है?”

राजेश ने किचन के कैमरे की रिकॉर्डिंग देखी। उसमें सुधा बच्चों को बिना लेबल वाली बोतल से तरल देती दिखी। बच्चों ने वह रस पिया और कुछ ही मिनटों में वे निष्क्रिय हो गए। राजेश को समझ आ गया कि सुधा उन्हें हर रोज़ नशा देती थी ताकि वे हमेशा सोए रहें और उसका काम आसान हो जाए।

भाग 3: तूफान की रात

राजेश ने कामिनी को ढूंढ़ा, जो बारिश में सबूत (वह शीशी) लेकर जा रही थी। उसी रात सुधा ने गलती से ओवरडोज़ दे दी। बच्चों को ऐंठन होने लगी। एंबुलेंस आई, पुलिस आई। सुधा ने झूठ बोला कि कामिनी ने बच्चों को जहर दिया। लेकिन राजेश ने वीडियो और शीशी की मदद से डॉक्टर को सही जानकारी दी। डॉक्टर ने सही एंटीडोट दिया और बच्चों की जान बच गई।

कामिनी ने बच्चों को संभाला। उसके पीले दस्तानों ने बच्चों के डर को कम किया। राजेश ने पहली बार महसूस किया कि असली इलाज मेडिकल रिपोर्ट में नहीं, बच्चों की हंसी में है।

भाग 4: पुनर्वास की लड़ाई

बच्चों को ठीक करने के लिए मशहूर जर्मन फिजियोथेरेपिस्ट लाया गया। लेकिन उसका तरीका क्रूर था—वह बच्चों को दर्द में जबरन स्ट्रेच करता। कामिनी ने विरोध किया, राजेश ने विशेषज्ञ को निकाल दिया। अब इलाज का जिम्मा कामिनी पर था। उसने खेल-खेल में बच्चों को पुनर्वास कराया, रबर बैंड और पीले दस्तानों के साथ।

धीरे-धीरे बच्चे छोटे-छोटे कदम चलने लगे। राजेश ने पहली बार पिता जैसा महसूस किया। लेकिन सुधा और एक और दुश्मन—राजेश की दिवंगत पत्नी का भाई रमेश—पैसे के लिए बच्चों को अपाहिज बनाने की साजिश कर रहा था।

भाग 5: अंतिम लड़ाई

रमेश ने कोर्ट में बच्चों की अस्थाई कस्टडी के लिए केस किया। समाज सेवा अधिकारी, पुलिस, और रमेश घर पहुंचे। लेकिन कामिनी ने दरवाजे पर खड़े होकर बच्चों की रक्षा की। अचानक आर्यन और अथर्व खुद चलकर दरवाजे पर आए। डॉक्टर और पुलिस ने सबूत पेश किए कि बच्चों को जहर दिया जा रहा था। रमेश को गिरफ्तार कर लिया गया।

राजेश ने कामिनी का धन्यवाद किया। उसने स्वीकारा कि असली इलाज प्यार है, न कि पैसे या मेडिकल रिपोर्ट। कामिनी ने वादा किया कि वह बच्चों के ठीक होने तक साथ रहेगी।

भाग 6: नया जन्मदिन, नया जीवन

छह महीने बाद, बच्चों का जन्मदिन मनाया गया। बगीचे में पार्टी थी, मेहमान थे, प्रेस थी। सब देखने आए थे कि क्या बच्चे सच में ठीक हैं। आर्यन और अथर्व ने दौड़ लगाई, गिर पड़े, फिर उठे। राजेश और कामिनी ने मिलकर उन्हें संभाला। घर में पहली बार हंसी गूंजी।

राजेश ने कामिनी को परिवार का हिस्सा बनने के लिए कहा। उसने एक फ्रेम में पीला दस्ताना गिफ्ट किया—”वह हाथ जिसने हमारी दुनिया को थाम लिया जब वह गिर रही थी।” कामिनी ने स्वीकारा कि वह भी राजेश से प्यार करती है। दोनों ने मिलकर बच्चों और अपने भविष्य का स्वागत किया।

समापन

राजेश ने सीखा कि असली पिता वही है जो बच्चों के साथ जमीन पर बैठता है, उनके आंसू पोंछता है। कामिनी ने साबित किया कि प्यार और विश्वास किसी भी जहर को हराने में सक्षम है। पीले दस्ताने अब चिमनी के ऊपर गर्व से टंगे हैं—एक परिवार के पुनर्जन्म का प्रतीक।

अब हवेली में चुप्पी नहीं, जीवन है। राजेश को पहली बार कल का इंतजार है।