करोड़पति महिला ने अपने बच्चों को भीख मांगते हुए देखा – फिर उसने जो किया हैरान कर देगा
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करोड़पति महिला ने अपने बच्चों को भीख मांगते हुए देखा – फिर उसने जो किया हैरान कर देगा
भूमिका
यह कहानी अनामिका मेहता की है, जो मुंबई की एक अमीर, खूबसूरत और अकेली महिला थी। उनका पति विक्रम 3 साल पहले गुजर चुका था और उनकी कोई संतान नहीं थी। अनामिका का जीवन सिर्फ पैसों और काम तक सीमित था। लेकिन एक बरसात की दोपहर उसकी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। जब उसने देखा कि एक बेघर लड़का फुटपाथ पर दो नन्ही बच्चियों को गोद में लेकर भीख मांग रहा था। अनामिका इसीलिए हैरान नहीं हुई कि वह लड़का भीख मांग रहा था। बल्कि वह इसलिए चकित रह गई कि उन दो नन्ही बच्चियों की आंखों में एक ऐसी निशानी थी जो बिल्कुल उसके दिवंगत पति की आंखों जैसी थी। आगे जो हुआ वो किसी ने सोचा नहीं होगा। दोस्तों इस दिल को छू लेने वाली कहानी की पूरी सच्चाई जानने के लिए वीडियो को अंत तक जरूर देखें।
मुंबई की बारिश
मुंबई का एक इलाका जूहू भारी बारिश का दिन था। बादल आसमान पर ऐसे छाए थे मानो सूरज को निगल गए हो। सड़क पर पानी भर चुका था। लोग इधर-उधर भाग रहे थे। कोई छाता लेकर, कोई सिर पर थैली रखकर। कारों के हॉर्न और बारिश की आवाज मिलकर एक बेचैन सी धुन बना रहे थे। एक काली Mercedes धीरे-धीरे जाम में रेंग रही थी। पिछली सीट पर बैठी थी अनामिका मेहता। लंबी गोरी त्वचा, गहरी आंखें और चेहरे पर हमेशा वही कठोर ठंडापन।
अनामिका कभी भी एक ही कपड़े दोबारा नहीं पहनती थी। उसके पास हर मौके के लिए डिजाइनर ड्रेसेस थीं। पति की मौत के बाद और संतान ना होने के कारण उसका घर जूहू बीच के पास बना विशाल बंगला एकदम खाली और बेजान हो चुका था। उसका ड्राइवर किशोर बार-बार पीछे आईने में झांक रहा था।
“मैडम, छोटा रास्ता ले लूं वरना यह ट्रैफिक रात तक नहीं खुलेगा।”
अनामिका ने मोबाइल पर नजर गड़ाए हुए कहा, “नहीं, सीधे चलो।” अचानक उसने खिड़की से बाहर झांका। उसकी आंखें ठिठक गईं। सड़क के बीच डिवाइडर पर एक नन्हा सा लड़का खड़ा था। उम्र ज्यादा से ज्यादा 12-13 साल। बारिश से पूरी तरह भीगा हुआ। उसके हाथों में दो छोटे-छोटे बच्चे थे जिन्हें उसने प्लास्टिक की थैलियों में लपेटा हुआ था। दोनों बच्चियां बहुत कमजोर लग रही थीं और धीरे-धीरे रो रही थीं।
अनामिका का आदेश
किशोर ने गाड़ी रोकी।
“अनामिका ने अचानक आदेश दिया। मैडम, यह सब तो खेल है। सड़क पर बच्चे किराए पर भी ले आते हैं भीख मांगने के लिए।”
अनामिका की नजरें उन बच्चियों की आंखों पर टिक गईं। हल्के सुनहरे भूरे रंग की पुतलियां बिल्कुल वैसी ही थीं जैसी उसके दिवंगत पति विक्रम मेहता की थीं। उसका दिल जोर से धड़क उठा।
“गाड़ी रुकते ही वह छतरी की परवाह किए बिना बारिश में निकल पड़ी। उसके महंगे सैंडल कीचड़ में धंस गए। लेकिन उसे कोई परवाह नहीं थी। तुम कौन हो?” अनामिका ने पास पहुंचते ही पूछा।
“रज्जू,” लड़के ने डरते-डरते जवाब दिया।
“यह बच्चे?” अनामिका की आवाज कांप रही थी। लड़के ने कसकर दोनों बच्चियों को पकड़ लिया।
“यह मेरी बेटी हैं।”
अनामिका स्तब्ध रह गई। “तुम्हारी बेटियां, तुम्हारी उम्र ही कितनी है?”
“मैं 13 साल का हूं और इनकी मां…” उसकी आंखें झुक गईं। “वो मर गई। इन्हें जन्म देते ही।” बच्चियां फिर रोने लगीं। उनकी आवाज बेहद कमजोर थी।
अनामिका का करुणा
अनामिका ने अपना दुपट्टा उतार कर उन्हें ढक दिया। उसका दिल अजीब तरह से कांप रहा था। किशोर ने ड्राइवर को आवाज लगाई।
“इन्हें गाड़ी में बिठाओ।”
रज्जू घबरा गया। “कृपया इन्हें मुझसे मत छीनिए। मैं पुलिस नहीं जाना चाहता।”
अनामिका ने नरमी से कहा, “नहीं बेटा, हम तुम्हें पुलिस नहीं ले जाएंगे। तुम भी चलो हमारे साथ।”
बारिश में भीगा वह लड़का अपनी मासूम बहनों को सीने से लगाए अनामिका के साथ गाड़ी तक आया। गाड़ी के अंदर हीटर चलाया गया। अनामिका ने अपनी शॉल में दोनों बच्चियों को लपेट लिया। बच्चियां धीरे-धीरे शांत हो गईं।
घर में स्वागत
रज्जू किनारे पर चुपचाप बैठा था। आंखों में डर और अनजाना संकोच। अनामिका बस उन बच्चों की आंखें देख रही थी। वही आंखें जिन्हें वह कभी नहीं भूल सकी थी। विक्रम की आंखें। उसकी जिंदगी जो अब तक सिर्फ ठंडी खामोशी थी, उस बरसाती शाम से एक नई दिशा लेने वाली थी।
रात गहराने लगी थी। बाहर बारिश थम चुकी थी। लेकिन हवा में अब भी नमी और ठंडक बाकी थी। अनामिका की Mercedes धीरे-धीरे जूहू के विशाल बंगले के गेट से अंदर दाखिल हुई। गेट पर खड़े सुरक्षा गार्ड ने झुककर सलाम किया।
“मैडम, सब ठीक है।”
“हां,” अनामिका ने धीमे स्वर में कहा। “अंदर किसी को खबर मत देना।”
बंगले के अंदर गर्म रोशनी और नींबू पॉलिश की हल्की खुशबू फैली हुई थी। संगमरमर की फर्श, बड़े झूमर की लाइटें और हर जगह सजा सन्नाटा। रज्जू के लिए यह सब किसी सपने जैसा था। उसने शायद ही कभी इतना बड़ा घर देखा हो।
अनामिका ने कहा, “यहां बैठो। किसी चीज को मत छूना।”
रज्जू डरते हुए सिर हिलाया। उसके कपड़े भीगे हुए थे। बालों से पानी टपक रहा था। दोनों बच्चियां जिन्हें अब वह बार-बार छोटी और गुड़िया कहकर पुकार रहा था, सो चुकी थीं। थोड़ी देर बाद नौकरानी शांति भागती हुई आई।
“मैडम, आपने बुलाया?”
“हां,” अनामिका ने कहा, “गर्म पानी और डॉक्टर को फोन करो अभी।”

डॉक्टर की जांच
शांति ने बस एक नजर रज्जू पर डाली और हैरान रह गई। पर सवाल करने की हिम्मत नहीं की। थोड़ी देर में डॉक्टर मेहोत्रा आ पहुंचे। उन्होंने बच्चियों की जांच की, माथा छुआ, पल्स देखी। फिर बोले, “ठंड से इन्हें बुखार लग सकता है। इन्हें गर्म दूध दीजिए और एक रात आराम करने दीजिए। यह बहुत कमजोर हैं। पर खतरे से बाहर हैं।”
अनामिका ने राहत की सांस ली।
“और यह लड़का?” डॉक्टर ने पूछा।
“यह नाम रज्जू है,” उसने जवाब दिया।
अनामिका का दिल जोर से धड़कने लगा। वह नाम उसे जाना पहचाना लगा। बहुत पुराना।
अतीत का सामना
वह अपने कमरे में गई और एक पुरानी डायरी निकाल लाई। विक्रम की। उसके पन्ने पलटते हुए वह एक जगह ठिठक गई। लिखा था, “अदिति से आज फिर मिला। वह कहती है, ‘मैं बदल गया हूं।’ पर क्या करूं? हर बार उसकी आंखों में वह सच्चाई दिखती है जो इस आलीशान दुनिया में नहीं।”
अनामिका के हाथ कांप गए। वह वहीं बैठ गई। तो यह सच है। उसने धीरे से कहा।
रज्जू का डर
दरवाजे के पास खड़ा रज्जू धीरे से बोला, “मैडम, क्या हम फिर से बाहर जाएंगे?”
अनामिका ने उसकी ओर देखा। आंखों में गुस्सा नहीं, बस थकान और ममता थी।
“नहीं रज्जू, अब तुम कहीं नहीं जाओगे। पर सब कहते हैं हम यहां के नहीं हैं। अब यह घर तुम्हारा है और मैं तुम्हारी मां जैसी हूं।”
रज्जू चौका। कुछ कहना चाहता था पर उसकी आंखों से आंसू बह निकले।
“वो बोला, मैडम, मां कहती थी कि जब कोई सच में अच्छा होता है तो भगवान उसे भेज देता है। शायद आप वहीं हैं।”
अनामिका की आंखें भीग गईं।
“वो झुक कर बोली, शायद तुम्हारी मां सही थी।”
नई शुरुआत
रात में जब सब सो गए अनामिका अपने कमरे में अकेली बैठी थी। उसने विक्रम की तस्वीर उठाई और धीमे स्वर में कहा, “तुम चले गए लेकिन जो अधूरापन छोड़ गए थे वो इन बच्चों ने पूरा कर दिया।”
बाहर हवा चल रही थी। पर अब वह हवा सर्द नहीं थी। वो किसी नई शुरुआत की आहट थी।
अखबार की सुर्खियां
कुछ महीनों बाद अनामिका ने विक्रम की याद में एक संस्था खोली। अदिति फाउंडेशन। रज्जू की मां के नाम पर। इस फाउंडेशन का उद्देश्य था सड़क पर छोड़े गए बच्चों और अकेली मांओं को सहारा देना। फाउंडेशन के उद्घाटन के दिन अनामिका ने मंच से कहा, “यह संस्था सिर्फ मेरे पति की याद में नहीं बल्कि उस औरत के सम्मान में है जिसने कठिनाइयों में भी अपने बच्चों को जन्म दिया और प्यार छोड़ा और उस लड़के के सम्मान में जिसने साबित किया कि खून से नहीं इरादों से परिवार बनता है।”
समापन
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा परिवार खून के रिश्ते से नहीं बल्कि देखभाल, निस्वार्थ प्रेम और मजबूत इरादों से बनता है। अनामिका ने उन बच्चों को अपनी विरासत या अकेलेपन को भरने के लिए नहीं अपनाया बल्कि इसलिए अपनाया क्योंकि वे निर्दोष थे और उन्हें मदद की जरूरत थी। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि समाज में कई बच्चे हैं जो गरीबी और बेघर होने की सजा भुगत रहे हैं। अनामिका ने दिखाया कि करुणा ही न्याय का सबसे बड़ा रूप है।
आपकी राय
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अंतिम शब्द
इस कहानी ने हमें यह सिखाया है कि कभी-कभी हमें अपने दिल की सुननी चाहिए और उन लोगों की मदद करनी चाहिए जिन्हें इसकी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। अनामिका की कहानी हमें प्रेरित करती है कि हम भी समाज के लिए कुछ करें और उन लोगों की मदद करें जो हमारी मदद के बिना नहीं रह सकते।
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