करोड़पति माँ रोज़ जिस बच्चे को भीख देती थी… वो उसी का छोड़ा हुआ बेटा था, जब सच आया सामने..

एक अमीर घर की महिला संजना हर सुबह अपने पति मनीष के साथ कार में बैठकर शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों से होकर ऑफिस जाती थी। बाकी लोगों की तरह ट्रैफिक उनके लिए बस एक रुकावट था। मगर रेड सिग्नल पर रुकते ही कुछ ऐसा होता था जो उनके दिल को छू जाता था। हर रोज छोटे-छोटे बच्चे उनकी गाड़ी के पास आकर कुछ बेचते, कुछ भीख मांगते और उन्हीं में से एक था कुणाल। ना उम्र ज्यादा, ना कद लंबा। बस 10 से 11 साल का एक नन्हा सा बच्चा था। कभी वह गुब्बारे लेकर भागता हुआ कार के पास पहुंचता। कभी हाथ में पुरानी किताबें, तो कभी रंग-बिरंगे फूल। उसकी बातें इतनी मीठी थीं कि सुनकर लगता था जैसे कोई फरिश्ता सड़क पर उतर आया हो।

पहली मुलाकात

एक दिन वह खिड़की के पास आकर बोला, “आंटी, गुब्बारा ले लीजिए। आपके बच्चे बहुत खुश हो जाएंगे।” संजना मुस्कुराई। “मैं गुब्बारे का क्या करूं? अपने बच्चे को दे दीजिएगा,” संजना हंसते हुए बोली। “अरे, मेरे बच्चे नहीं हैं,” कुणाल ने मासूमियत से सिर हिलाया। “आंटी, ले लो ना, सुबह से एक भी नहीं बिका।” उसकी यह बात संजना के दिल में नमी उतार गई। उन्होंने दो गुब्बारे खरीदे और कार आगे बढ़ गई।

नई दोस्ती

कुछ दिनों बाद वही जगह, वही सिग्नल। लेकिन इस बार कुणाल के हाथ में किताबें थीं। संजना ने मुस्कुरा कर पूछा, “क्या बात है? आज गुब्बारे गायब?” कुणाल भोलेपन से बोला, “आंटी, गुब्बारे फट जाते हैं। नुकसान हो जाता है। आज किताब ले लीजिए। बस ₹20 की है।” जरूरत ना होने के बावजूद संजना ने किताब खरीद ली। धीरे-धीरे दोनों के बीच एक अजीब सी लगाव की डोर बनती चली गई। हर बार गुजरते हुए संजना उससे कुछ खरीदती और चुपचाप नोट उसकी हथेली में सरका देती। कुणाल की मासूम मुस्कान किसी मरहम की तरह उनके भीतर उतरती जाती थी।

खोने का डर

फिर एक दिन वही सिग्नल, वही हलचल, लेकिन कुणाल नहीं। संजना बेचैन होकर शीशे से बाहर झांकती रही। दिल जैसे कह रहा था, “आज वो नहीं दिखेगा। कुछ गलत हुआ है।” तभी दो-चार बच्चे भागते हुए आए। “मैडम, आप कुणाल को ढूंढ रही हैं?” संजना की सांस अटक गई। “हां, कहां है वो?” उन बच्चों की आवाज पिघलती हुई सी लगी। “दीदी, उसका एक्सीडेंट हो गया है।” दुनिया जैसे पल भर में थम गई। “क्या? कैसे? कब? उसकी हालत कैसी है?”

दुखद समाचार

“दीदी, एक कार ने टक्कर मारी और भाग गई। उसका सिर फट गया था। लोग उसे अस्पताल ले गए। पर उन्होंने कहा था, बचने की उम्मीद बहुत कम है।” संजना के हाथ कांपने लगे। आंखों से आंसू खुद-ब-खुद गिरते चले गए। दिल में एक अजीब सी टीस उठी कुणाल के लिए भी और किसी अनकही कड़वी याद के लिए भी। उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि यह हादसा सिर्फ एक बच्चे का दर्द नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई लेकर आने वाला है।

खोया हुआ बेटा

वह सच्चाई जिससे उनका अतीत, वर्तमान और भविष्य सब हिलने वाला था। एक ऐसा खुलासा जिसे सुनकर उनकी दुनिया बिखर जाएगी। और यह मासूम बच्चा कुणाल वह कोई और नहीं बल्कि उन्हीं का खोया हुआ बेटा था, जिसे पैदा होते ही एक मजबूरी ने उनसे छीन लिया था। संजना ने जैसे ही सुना, उसकी सांसे अटक सी गईं। घबराई आवाज में वह बोली, “क्या तुम लोग मुझे उसके घर ले जा सकते हो?”

संजना की खोज

वे लड़के तुरंत बोले, “हां आंटी, वह तो हमारे घर के बिल्कुल पास ही रहता है।” संजना ने मनीष की ओर देखा। उसकी आंखों में बेचैनी साफ झलक रही थी। “मनीष, मुझे यहीं उतार दो। मेरा दिल कुछ अच्छा नहीं लग रहा। मुझे उसे देखने जाना ही होगा।” मनीष ने गहरी सांस ली और बोला, “ठीक है, तुम चले जाओ। मुझे दुकान खोलनी है। पर जो भी हो, तुरंत मुझे फोन करना।” मनीष ने उसे वहीं उतारा।

दादी से मुलाकात

संजना एक छोटे बच्चे को साथ लेकर ओनाटो में बैठी और घबराए दिल के साथ उस गली की तरफ निकल पड़ी जहां कुणाल रहता था। ओनाटो रुका और जैसे ही संजना उतरी, उसकी नजर एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी। उसे देखते ही संजना स्तब्ध रह गई। उधर बुजुर्ग महिला भी उसे देखते ही ठिठक गई और अगले ही पल फूट-फूट कर रोने लगी। वह कांपती आवाज में बोली, “मैं, मैं तेरे बेटे को बचा नहीं पाई।” संजना के पैरों तले जमीन खिसक गई।

भयावह सच्चाई

“क्या वो, क्या मेरा बेटा कुणाल था?” बुजुर्ग महिला ने आंसू पोंछते हुए सिर हिलाया। “हां, वही तुम्हारा कुणाल था।” बस इतना सुनना था कि संजना ने छाती पीटना शुरू कर दिया। “मेरे भाग्य ही फूट गए। 10 साल बाद मेरा बच्चा सामने खड़ा था और मैं उसे पहचान भी ना सकी।” संजना रोते-रोते बोली, “वह कहां है? कैसी हालत है? मुझे उसे देखना है।”

गांव का माहौल

अभी गली की औरतें इकट्ठी होने लगीं। एक ने पूछा, “यह कौन है? इतनी बेचैन क्यों है?” कुणाल की दादी ने आंसू पोंछते हुए कहा, “अरे, यही तो उसकी असली मां है।” चारों तरफ सन्नाटा छा गया। किसी को यकीन नहीं हो रहा था क्योंकि इतनी आमिर औरत का बच्चा इस हालत में कैसे जी रहा है। संजना का रो-रो कर पुकारना पूरे मोहल्ले में गूंज रहा था। “कुणाल, मेरे बच्चे कुणाल।”

अतीत की परछाई

इस दर्दनाक सच्चाई को समझने के लिए हमें समय में थोड़ा पीछे लौटना होगा। साल 2020 में संजना कोलकाता की रहने वाली तब सिर्फ 19 साल की थी जब उसे अजय से प्यार हो गया। दोनों शादी करना चाहते थे। पर संजना का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था। लाख समझाने पर भी संजना नहीं मानी और एक दिन वह अजय के साथ भागकर शादी कर ली। वे दोनों शहर में एक छोटे से किराए के घर में रहने लगे। लेकिन इस कदम से उसके परिवार ने अपनी इज्जत दांव पर समझी और उन्होंने संजना से हर रिश्ता तोड़ लिया।

बच्चे का जन्म

एक साल बाद संजना ने एक प्यारे बेटे को जन्म दिया। कुणाल। पर इसी बीच उसे पता चला कि अजय का सच क्या है? अजय एक खतरनाक गैंग से जुड़ा था, पैसों के लिए हत्या करने वाला। संजना ने उसे बहुत समझाया, “अजय, यह रास्ता ठीक नहीं। एक दिन यही लोग तुम्हें मार देंगे। हमारी जिंदगी तबाह हो जाएगी।” पर अजय नहीं बदला। और एक दिन वही हुआ जिससे संजना हमेशा डरती थी। अजय की दुश्मनों ने हत्या कर दी।

टूटते रिश्ते

संजना टूट गई। उसके पास ना घर था, ना सहारा। वह मायके भी नहीं जा सकती थी। पर उसके पास उसका बेटा था। उसे बस उसी के सहारे जीना था। इतने में जब उसके माता-पिता को अजय की मौत की खबर मिली, वे फिर आए और बोले, “बेटी, जो हुआ सो हुआ। तू अभी जवान है। हम तेरी दूसरी शादी करा देंगे। पर एक शर्त रखी। तुझे इस बच्चे को भूलना होगा।”

कठिन निर्णय

संजना सन्न रह गई। “मैं अपने बच्चे को कैसे छोड़ दूं?” लेकिन वे बोले, “अगर यह बच्चा रहेगा तो कौन तुझसे शादी करेगा?” उधर अजय के माता-पिता भी पहुंचे और बोले, “तू अपनी जिंदगी बना ले। हम कुणाल को पाल लेंगे। वह हमारा खून है।” बहुत सोचने समझने के बाद, आंसुओं के समंदर में डूबते हुए संजना ने अपना छोटा सा कुणाल उसकी दादी-दादा को सौंप दिया और अपने माता-पिता के साथ चली गई।

नई जिंदगी

संजना के माता-पिता ने अपनी बेटी का अतीत मिटा देने की कोशिश में उसके लिए एक अच्छे और सुसंस्कृत लड़के मनीष का रिश्ता तय कर दिया। मनीष से मुलाकात हुई, बातें हुई और कुछ मुलाकातों के बाद परिवार वालों ने शादी पक्की कर दी। लेकिन इस रिश्ते की नींव एक सच्चाई छुपा कर रखी गई। संजना का पूरा अतीत मनीष से छिपाया गया। उसे बताया गया था कि संजना अविवाहित है, सीधी साधी लड़की है।

शादी के बाद

कुछ दिनों बाद धूमधाम से शादी हो गई। शादी के बाद संजना मुंबई आ गई। मनीष मुंबई में रहता था, पढ़े-लिखे सुसंस्कृत परिवार से। संजना की सुंदरता और उसकी गहराई भरी शालीनता से वह इतना प्रभावित था कि शादी के बाद हर किसी से यही कहता था, “मैंने दुनिया की सबसे अच्छी लड़की से शादी की है।”

नए रिश्ते का आरंभ

मनीष की सहारा मार्केट में मोबाइल की दुकान थी। कुछ कर्मचारी भी थे और काम इतना अच्छा चलता था कि घर में कभी पैसों की कमी महसूस नहीं होती थी। धीरे-धीरे संजना भी दुकान पर हाथ बटाने लगी। दोनों साथ बैठकर काम करते, चाय पीते, हंसते। जिंदगी जैसे स्वर गई। लेकिन जिंदगी की अजीब स्थिति देखिए। जब संजना की दुनिया संभल रही थी, उसी वक्त उसके छोड़े हुए बच्चे कुणाल की जिंदगी में तूफान आने वाला था।

कुणाल का संघर्ष

कुणाल के दादा का अचानक देहांत हो गया। उनके जाते ही घर में माहौल बदल गया। रोज बातें शुरू हो जातीं, “इस बच्चे को उसकी मां छोड़कर भाग गई। अब हम क्यों पालें इसे? अनाथ आश्रम दे दो। बोझ कम होगा।” लेकिन कुणाल की दादी किसी पत्थर की तरह अडिग थी। वह कहती, “यह मेरा अजय है। मेरे बेटे की आखिरी निशानी। मैं इसे कहीं नहीं भेजूंगी।”

दादी की जिद

इस जिद पर रोज घर में झगड़े होते। एक दिन कुणाल की बड़ी बुआ वहां आईं। उन्होंने देखा कि परिवार में हर तरफ तनाव ही तनाव है। बुआ ने दादी से कहा, “मां, अगर इतना झगड़ा हो रहा है तो बच्चे को मुझे दे दो। मेरे दो बेटे हैं। मैं इसे मुंबई ले जाऊंगी।” दादी ने तुरंत सिर हिलाया। “नहीं, मैं किसी पर भरोसा नहीं करती। यह मेरे साथ रहेगा।”

मुंबई की यात्रा

बुआ ने समझाया, “ठीक है, तो आप मेरे साथ चलिए। मैं जहां रहूंगी, वहीं आप भी रहेंगी।” और इसी तरह कुणाल अपनी दादी के साथ मुंबई आ गया। समय बीतता गया। कुणाल अब 10 साल का हो चुका था, जिज्ञासुओं से भरा, शरारती और दुनिया को अपने ढंग से समझने की कोशिश करता हुआ।

भीख मांगने की शुरुआत

एक दिन उसने देखा कि उसकी उम्र के बच्चे रोज जेब में पैसे लेकर घर लौटते हैं। उसने पूछा, “तुम पैसे कहां से लाते हो?” बच्चों ने हंसते हुए कहा, “मुंबई की सड़कों से रेड सिग्नल पर गाड़ियों के पास जाते हैं और मांग लेते हैं।” कुणाल के मन में भी पैसे कमाने की चाह जागी। वह बोला, “मैं भी तुम्हारे साथ चलूंगा।” लेकिन दादी ने सख्त मना कर दिया। “भीख मांगना बहुत बुरी बात है बेटा।”

कुणाल का निर्णय

कुणाल ने नटखट मुस्कान के साथ कहा, “दादी, मैं भीख थोड़ी मांगूंगा। मैं तो सामान बेचूंगा। गुब्बारे।” दादी ने अनच्छा से सही। पर उसे रोक ना सकी। और यूं कुणाल ने कुछ गुब्बारे खरीदे और रेड सिग्नल पर बेचने जाने लगा। कभी गुब्बारे, कभी फूल, कभी किताबें जो हाथ लगता बेच देता।

संजना की यादें

इसी दौरान उसकी जिंदगी में बिना किसी पहचान के उसकी असली मां वापस आ चुकी थी। संजना। लेकिन दोनों एक-दूसरे को पहचान नहीं पाए। संजना अंदर ही अंदर अपने बेटे को हर रोज याद करती। लेकिन उसके माता-पिता ने सख्त हिदायत दी थी, “कभी कुणाल का नाम मत लेना। कोई जान गया तो जिंदगी खराब हो जाएगी।” इसलिए वह चुप रही। अपने आंसू तक किसी से बांट ना सकी।

कुणाल की दादी का संघर्ष

कभी-कभी मायके जाती तो बस इतना ही पता चलता, “कुणाल अपनी बुआ के साथ मुंबई चला गया है।” कितनी विडंबना थी। मां और बेटा एक ही शहर में थे। एक ही सड़क पर खड़े थे। एक ही हवा में सांस ले रहे थे। पर पहचान की डोर टूट चुकी थी। संजना ने कई बार उससे नाम पूछा। घर पूछा। कुणाल ने कहा था, “मैं अपनी दादी के साथ रहता हूं।” लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि वह दादी वही थी जिन्होंने उसके बेटे को गोद में पालकर बड़ा किया था।

अस्पताल की घटना

और फिर जिस दिन वह कुणाल को तलाशते हुए उसके घर पहुंची और दादी को सामने देखा, दिल में एक बिजली सी कौधी। “क्या यह मेरा ही बेटा है?” दादी ने कांपती आवाज में कहा, “हां बेटी, यही तेरा कुणाल है। उसका एक्सीडेंट हो गया है।” वह चीख पड़ी, “कहां है वो? मुझे अभी उसके पास ले चलो।” उसकी दादी ने थरथराती आवाज में बताया कि उसे अस्पताल ले जाया गया है।

दर्दनाक इंतज़ार

यहां तक कि उसकी बुआ भी उसकी हालत के बारे में कुछ नहीं जानती थी। बस इतना कि चोटें बहुत गंभीर थीं। पास खड़ी कुछ औरतों ने उसका हाथ पकड़ा और बोली, “चल बहन, हम तुझे लेकर चलते हैं।” संजना किसी रोबोट की तरह उनके साथ चल दी। मानो आत्मा शरीर से निकल चुकी हो। अस्पताल पहुंचते ही कुणाल की बुआ उसे देखते ही फूट-फूट कर रोने लगीं।

डॉक्टर की रिपोर्ट

उन्होंने बताया, “डॉक्टर कह रहे हैं, उम्मीद बहुत कम है।” “उम्मीद!” यह वही शब्द था जो उस वक्त संजना की दुनिया को तोड़ रहा था। वह कांपती आवाज में बोली, “ऐसा मत कहिए। दुआ कीजिए कि वह मुझे छोड़कर ना जाए।” 6 घंटे बीत गए। हर मिनट किसी पहाड़ की तरह भारी। आईसीयू का दरवाजा बंद। अंदर कुणाल जिंदगी से लड़ता हुआ। बाहर संजना खुद से।

मोबाइल की चिंता

इसी बीच मनीष के फोन लगातार बज रहे थे। आखिरकार उसने एक बार फोन उठाया और टूटती आवाज में कहा, “मनीष, उस लड़के के बचने की शायद कोई उम्मीद नहीं है। मैं आज नहीं आ पाऊंगी। माफ करना।” मनीष हैरान था। “क्या तुम अस्पताल पहुंच गई हो? यह कैसी बात कर रही हो? उसके मां-बाप हैं। वे संभाल लेंगे।”

सच्चाई का सामना

लेकिन संजना उसे कैसे बताती कि जिस लड़के को वह कोई और समझ रहा है, वही उसका अपना बेटा है जिसे उसने दुनिया से छुपाए रखा था। उसने बस इतना कहा, “मैं अभी बात नहीं कर सकती,” और फोन बंद कर दिया। कुछ देर बाद एक डॉक्टर बाहर आया। चेहरे पर थकान और अनिश्चितता दोनों। “अगर मरीज को होश आ गया तो वह धीरे-धीरे ठीक हो सकता है। वरना कुछ कहना मुश्किल है।”

तीसरे दिन की खुशी

3 दिन मानो 3 साल। फिर तीसरे दिन शाम को डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए खबर दी, “लड़का होश में आ गया है। अब आप लोग मिल सकते हैं।” उस पल रोने वालों की भीड़ में एक ही आवाज थी। “सुकून की।” सब एक-दूसरे को गले लगाकर रो पड़े। संजना दौड़ती हुई अंदर गई। कुणाल की आंखें आधी खुली थीं। उसने धीमी आवाज में पूछा, “आंटी, आप आ गईं?”

मां का प्यार

संजना टूट गई। वह उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, “बेटा, मैं आंटी नहीं हूं। मैं तुम्हारी मां हूं।” उसने उसे सीने से लगा लिया और बरसों का दर्द, अपराध बोध और प्यार सब आंसुओं में बह गया। डॉक्टर ने फिर भी समझाया कि ज्यादा बात ना करें। बच्चे को आराम चाहिए।

मनीष का सामना

तीन दिनों से संजना ने मनीष को फोन नहीं किया था। उसका मोबाइल बंद ही था। मनीष चिंता में पागल हुआ जा रहा था। आखिर वह कुणाल के घर पहुंचा और पूरी सच्चाई जान गया। अस्पताल में उसने गुस्से से कांपती आवाज में कहा, “तुम लोगों ने मुझसे धोखा किया है। हमारा रिश्ता यहीं खत्म।” संजना सिर्फ सिर झुकाकर सब सुनती रही। जवाब क्या देती? उसके पास बची ही क्या थी? बस उसका बेटा। वह एक चीज जो वह किसी भी कीमत पर नहीं खो सकती थी।

नए सिरे से शुरुआत

एक हफ्ते बाद कुणाल घर आ गया। संजना उसकी देखभाल में पूरी तरह लग गई। जब उसने मनीष को फोन किया तो फोन ही नहीं उठा रहा था। 10 दिन बाद अचानक मनीष अपने घर वालों के साथ कुणाल के घर आया। संजना उन्हें देखकर फूट पड़ी। उसकी सास ने उसे गले लगाया और बोली, “बेटी, मत रो। चलो, घर चलते हैं।”

एकता का बंधन

संजना घबरा गई। “मैं अपने बेटे को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी।” सास मुस्कुराई। “किसने कहा उसे छोड़कर चलने को? तुम्हारा बेटा, उसकी दादी, सब साथ चलेंगे।” मनीष बहुत देर बाद बोला, “चलो संजना, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।” और यूं वह टूट चुका परिवार फिर से एक हो गया।

नए जीवन का आरंभ

यह घटना 2020 की है। उस समय संजना 2 महीने की गर्भवती थी। 7 महीने बाद उसने एक प्यारे बेटे को जन्म दिया। कुछ साल बाद एक बेटी हुई। आज कुणाल, संजना, उसका छोटा भाई-बहन सब एक साथ एक खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।

सीख

तो दोस्तों, बात समझना चाहिए कि प्यार मोहब्बत के चक्कर में घर छोड़कर, बेचकर, मां-बाप की इज्जत उछालकर नहीं जाना चाहिए। अगर कहानी पसंद आई हो, तो लाइक करें। दोस्तों के साथ शेयर करें, और नई कहानियों के लिए चैनल को सब्सक्राइब जरूर करें। धन्यवाद।

निष्कर्ष

यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। सिर्फ मनोरंजन और सीख के उद्देश्य से बनाई गई है। किसी भी असली घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं।

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