गरीब लड़की मां के इलाज के लिए PGI लखनऊ जा रही थी, ट्रेन में टीटी लड़के ने जो किया, इंसानियत हिल गई

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गरीब लड़की मां के इलाज के लिए PGI लखनऊ जा रही थी, ट्रेन में टीटी लड़के ने जो किया, इंसानियत हिल गई

कहानी की शुरुआत

दोस्तों, इस दिल छू लेने वाली कहानी की शुरुआत कोलकाता से होती है, जहां एक छोटे से घर में एक लड़की और उसकी मां अपने जीवन की कठिनाइयों का सामना कर रही थीं। यह कहानी उस लड़की की है, जिसका नाम प्रिया था, और उसकी मां का नाम था सावित्री देवी। यह कहानी उस लड़की की है, जो अपनी मां की जान बचाने के लिए पीजीआई लखनऊ जाने का हर संभव प्रयास कर रही थी, और ट्रेन में जो हुआ, वह इंसानियत की मिसाल बन गया।

रात के करीब 9:00 बजे थे, और कोलकाता के हावड़ा स्टेशन पर हमेशा की तरह शोर था। कुली सामान उठाए भाग रहे थे, चाय वाला आवाज लगा रहा था, और कुछ लोग दौड़ते हुए अपनी ट्रेन पकड़ने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन इस सब शोर-गुल के बीच एक लड़की ऐसी थी, जो बिल्कुल चुप थी। वह किसी और ही दुनिया में खोई हुई थी। उसकी आंखों में आंसू सूखे हुए थे, जैसे वह रोते-रोते थक गई हो। वह लड़की थी प्रिया, जो 22 साल की थी। उसकी कंधे पर एक पुराना कपड़े का झोला था, और हाथ में एक टिकट था। उसके साथ उसकी मां सावित्री देवी भी थीं, जो बमुश्किल खड़ी हो पा रही थीं।

मां की बीमारी और गरीबी की सच्चाई

सावित्री देवी को पिछले 6 महीनों से पेट में दर्द था। पहले सोचा कि गैस है, लेकिन जब दर्द बढ़ता गया तो कोलकाता के सरकारी अस्पताल में दिखाया। डॉक्टर ने जो कहा, वह सुनकर प्रिया के पैरों तले जमीन खिसक गई। डॉक्टर ने कहा, “यह मामला बहुत गंभीर है। आपको लखनऊ में पीजीआई ले जाना होगा।” प्रिया के लिए यह कोई आसान फैसला नहीं था। उसने कभी कोलकाता से बाहर कदम नहीं रखा था। लखनऊ उसके लिए किसी दूसरी दुनिया जैसा था, लेकिन मां की जान का सवाल था, तो उसे यह कदम उठाना ही था।

प्रिया ने ठान लिया कि चाहे जो हो, वह अपनी मां को लखनऊ ले जाएगी और उनका इलाज करवाएगी। वह जानती थी कि घर की हालत बहुत खराब थी। उसके पिता रमेश चंद्र 3 साल पहले गुजर चुके थे। घर में सिर्फ मां और प्रिया ही रह गई थीं। प्रिया सिलाई का काम करती थी और कभी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती थी। यही काम कर वह दो वक्त की रोटी जुटाती थी।

मां का इलाज और ट्रेन यात्रा

प्रिया का सपना था कि वह एक दिन टीचर बनेगी, लेकिन घर की जिम्मेदारी के चलते उसे अपने सपने को छोड़ना पड़ा। लेकिन अब उसने मां के इलाज के लिए कुछ भी करने का फैसला किया। उसने पास-पड़ोस से मदद ली, कुछ रिश्तेदारों से भी थोड़ा पैसा लिया, और जैसे-तैसे एक टिकट खरीदी। खुद के लिए कोई टिकट नहीं था, क्योंकि पैसे नहीं थे। प्रिया ने बिना एक पल सोचे मां का टिकट लिया और खुद के लिए टिकट नहीं लिया। उसने सोचा, “भगवान देखेंगे, सब ठीक हो जाएगा।”

टीटी लड़के ने प्रिया को उस रात बहुत ही मुश्किल में डाला। हावड़ा से लखनऊ के लिए पुरुषोत्तम एक्सप्रेस ट्रेन थी, जो प्लेटफार्म नंबर 7 पर आई। प्रिया ने अपनी मां का हाथ थामा और उन्हें धीरे-धीरे डिब्बे में चढ़ाया। मां को बर्थ पर लिटाया, उनके सिर के नीचे दुपट्टा रखा, और उनके पैरों पर चादर ओढ़ाई। मां ने कमजोर स्वर में कहा, “तू है तो सब ठीक हो जाएगा बेटा।” प्रिया ने मुंह फेर लिया ताकि मां उसकी आंखें न देख सकें, जिनमें आंसू थे।

टीटी लड़के से मुलाकात

प्रिया की आंखों में अब बस एक ही डर था – टीटी लड़का आएगा तो क्या होगा? मां का टिकट था, उसका नहीं। अगर पकड़ा गया तो जुर्माना भरना होगा और पैसे नहीं थे। रात के करीब 11:00 बजे ट्रेन में टीटी लड़का आया। वह नौजवान था, और उसकी आंखों में गंभीरता थी। उसने एक-एक बर्थ पर जाकर टिकट चेक करना शुरू किया। जैसे-जैसे वह प्रिया की बर्थ के पास पहुंचा, प्रिया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“टिकट,” उसने कहा, और प्रिया के हाथों से कांपते हुए मां का टिकट निकाला। टीटी ने टिकट देखा, फिर प्रिया से पूछा, “और आपका?” प्रिया ने कांपते हुए कहा, “मेरे पास नहीं है।”

टीटी लड़के की इंसानियत

आकाश, जो कि टीटी था, ने कुछ पल चुप्पी साधी। फिर उसने गहरी सांस ली और अपनी वर्दी की जेब से 500 रुपये का नोट निकाला और प्रिया की तरफ बढ़ा दिया। “यह रखो, लखनऊ पहुंचकर काम आएगा। टिकट की चिंता मत करो।” प्रिया ने पहले तो पैसे लेने से मना किया, लेकिन आकाश ने मुस्कुराते हुए कहा, “यह कर्ज नहीं है, यह इंसानियत है। और मां की बीमारी में कोई अनजान नहीं होता।”

यह सुनकर डिब्बे में बैठे बाकी लोग भी आकाश की तरफ देखा, और कई यात्री प्रिया की मदद करने के लिए आगे बढ़े। कुछ ने पैसे दिए, कुछ ने खाना और पानी दिया। प्रिया की आंखों में आंसू थे, लेकिन वह हंसी भी थी। आकाश ने उसे दिल से मदद की, और उसका यह कार्य पूरी तरह से अनकहा था।

लखनऊ में मदद

जब ट्रेन लखनऊ स्टेशन पहुंची, तो आकाश ने प्रिया को डॉक्टर के पास भेजने में मदद की। उसने डॉक्टर राजेश से संपर्क किया, और उन्हें बताया कि प्रिया की मां को तुरंत इलाज की जरूरत है। प्रिया को उम्मीद की चमक मिली, और उसने आकाश के साथ इस दुखभरी यात्रा को पूरा किया।

समाप्ति

इस कहानी का संदेश यही है कि इंसानियत कभी मरती नहीं। किसी अनजान आदमी ने एक गरीब लड़की की मदद की, और उसकी मां को बचाने के लिए रास्ता दिखाया। यह कहानी हमें यह सिखाती है कि कभी भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए, और हर किसी की मदद करना हमारी जिम्मेदारी होनी चाहिए, चाहे हम जानते हों या नहीं।