‘गाड़ी रोक दो सर ,आपकी पत्नी ने ब्रेक काट दी हैं… करोड़पति नहीं रुका, गरीब लड़का चीखा | Story

.
.
.

गाड़ी रोक दो साहब, आपकी पत्नी ने ब्रेक काट दिए हैं… करोड़पति नहीं रुका, गरीब लड़का चीखा | एक इंसानियत की कहानी

I. हादसे से पहले

एक बड़े शहर में करोड़पति रमेश अग्रवाल का नाम हर कोई जानता था। आलीशान बंगलों, महंगी गाड़ियों और बड़ी-बड़ी कंपनियों का मालिक रमेश अपनी मेहनत और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। उसके घर में कई नौकर-चाकर थे, लेकिन सबसे पुरानी और भरोसेमंद नौकरानी थी—शांति देवी। पंद्रह साल से वह इस घर में काम कर रही थी। हर कोने को साफ किया, हर मुश्किल वक्त में साथ दिया। उसकी वफादारी पर पूरे घर को भरोसा था।

लेकिन घर की मालकिन, यानी रमेश की पत्नी, कभी शांति देवी को पसंद नहीं कर सकी। शादी के पहले दिन से ही उसे लगता था कि यह बूढ़ी औरत घर में ज्यादा दखल देती है। वह बात-बात पर शांति को ताने मारती, चिल्लाती, और पूरे घर के सामने बेइज्जत करती। शांति चुपचाप सब सुन लेती, क्योंकि उसके पास कोई और विकल्प नहीं था।

II. मासूम पोता

शांति देवी का एक पोता था—रवि। करीब बारह साल का, गरीब घर का, लेकिन पढ़ाई में अच्छा। महीने में एक-दो बार वह अपनी दादी से मिलने आता था। उसके कपड़े पुराने थे, लेकिन साफ-सुथरे। उसकी आँखों में मासूमियत थी। वह कभी किसी से कुछ नहीं मांगता था, चुपचाप पढ़ाई करता या बगीचे में खेलता।

एक दिन गलती से रवि के हाथ से पानी का गिलास टूट गया। बस यहीं से तूफान शुरू हुआ। घर की मालकिन ने रवि पर जोर-जोर से चिल्लाना शुरू किया। “तुम जैसे लोगों को यहाँ रखना ही नहीं चाहिए। बाहर निकल जाओ यहाँ से!” रवि सिर झुकाए खड़ा था, उसकी आँखों में आँसू थे। उसे घर से बाहर निकाल दिया गया।

रवि चुपचाप बगीचे में जाकर एक पेड़ के नीचे बैठ गया। अंधेरे में, झाड़ियों के पीछे, अपने घुटनों में मुँह छुपाए वह रोता रहा। किसी को याद नहीं रहा कि बच्चा अब भी बाहर है। घर में सब अपने-अपने कामों में लग गए।

III. पत्नी का षड्यंत्र

असल में रमेश की पत्नी सिर्फ पैसों की भूखी थी। उसकी शादी भी पैसों के लिए ही हुई थी। वह सोचती थी कि अगर पति मर जाए तो सारी प्रॉपर्टी उसकी हो जाएगी। महीनों से उसके दिमाग में यह ख्याल चल रहा था। धीरे-धीरे यह ख्याल प्लान में बदल गया। उसने रिसर्च की, सोचा कि कैसे एक्सीडेंट दिखे, कैसे किसी को शक ना हो।

एक शाम उसने फैसला कर लिया। वह चुपके से बाहर गई, गाड़ी के पास जाकर ब्रेक की तार काट दी। उसे पता था कि ब्रेक लाइंस कहाँ होती हैं। ठंडे दिमाग से, बिना किसी हिचकिचाहट के, उसने तार काट दी। फिर धीरे से अंदर चली गई। उसे नहीं पता था कि झाड़ियों के पीछे बैठा रवि सब देख रहा है। रवि ने सबकुछ देख लिया था। पहले तो उसे समझ नहीं आया, लेकिन फिर उसे एहसास हुआ कि यह बहुत खतरनाक है।

IV. मौत की ओर बढ़ती गाड़ी

उसी रात रमेश को एक जरूरी बिजनेस मीटिंग के लिए निकलना था। वह तैयार हुआ, गाड़ी में बैठा, और निकल गया। सड़क पर स्पीड बढ़ाने लगा। तभी रवि को समझ आ गया कि गाड़ी मौत बन चुकी है। वह दौड़ पड़ा, पूरी ताकत से चिल्लाने लगा—”गाड़ी रोक दो साहब! ब्रेक फेल है!” लेकिन गाड़ी के अंदर उसकी आवाज नहीं पहुँच रही थी। शीशे बंद थे, एसी चल रहा था, म्यूजिक बज रहा था।

पीछे से एक बाइक वाला युवक आया। उसने देखा कि एक बच्चा गाड़ी के पीछे दौड़ रहा है और चिल्ला रहा है। उसने अपनी बाइक रोकी। रवि रोते हुए सब बता दिया—”भैया, गाड़ी के ब्रेक फेल हैं, वह आदमी मर जाएगा!”

बाइक वाला तुरंत रिएक्ट किया। उसने अपनी बाइक रमेश की गाड़ी के साथ दौड़ाई। वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था, हाथ हिला रहा था, गाड़ी के शीशे पर दस्तक दे रहा था। अब जाकर रमेश का ध्यान गया। उसने शीशा थोड़ा नीचे किया, ब्रेक दबाया—लेकिन गाड़ी स्लो नहीं हुई। ब्रेक काम नहीं कर रहा था।

V. हादसा और बचाव

रमेश का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा। उसने एक्सलरेटर से पैर हटाया, गाड़ी की स्पीड कम होने लगी, लेकिन अभी भी काफी स्पीड थी। सड़क पर ट्रैफिक था, आगे सिग्नल था। जैसे ही गाड़ी थोड़ी धीमी हुई, उसने गाड़ी को डिवाइडर की तरफ मोड़ दिया। जोरदार टक्कर हुई—गाड़ी का सामने का हिस्सा डिवाइडर से टकराया, शीशे टूट गए, एयर बैग्स खुल गए। गाड़ी पलट गई, लेकिन रमेश बच गया। चोटें आईं, खून निकला, लेकिन एयर बैग्स ने जान बचा ली।

युवक ने दौड़कर रमेश को गाड़ी से बाहर निकाला। किसी ने एंबुलेंस बुलाई। अस्पताल में रवि ने पूरी सच्चाई पुलिस को बता दी। फॉरेंसिक टीम आई, उन्होंने देखा कि ब्रेक लाइंस जानबूझकर काटी गई थीं। यह एक्सीडेंट नहीं था, यह हत्या की कोशिश थी।

VI. सच का उजागर होना

पुलिस ने पत्नी को गिरफ्तार किया। पूछताछ में पहले उसने इंकार किया, लेकिन रवि की गवाही और फॉरेंसिक एविडेंस के सामने वह टूट गई। उसने सब कबूल कर लिया। कोर्ट में केस चला, सारे सबूत उसके खिलाफ थे। उसे सजा हुई, वह जेल में बंद हो गई। उसके लालच ने उसे बर्बाद कर दिया।

रमेश ने उसे तलाक दिया, घर से निकाल दिया, कानूनी अधिकार छीन लिए। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस औरत के साथ उसने इतने साल बिताए, वह उसे मार सकती थी।

VII. मासूमियत की जीत

रमेश ने रवि को बुलाया। ठीक होने के बाद उसने शांति देवी और उसके पोते को घर बुलाया। रवि डरते-डरते आया, लेकिन इस बार कोई गुस्सा नहीं था, सिर्फ कृतज्ञता थी। रमेश रो रहा था—”अगर तू नहीं होता, तो आज मैं जिंदा नहीं होता।”

उसने रवि को गले लगाया, धन्यवाद कहा, उसका हाथ पकड़ा। “तेरा भविष्य अब मेरी जिम्मेदारी है।” उसने प्रॉमिस किया कि बच्चे की पढ़ाई का सारा खर्च वह उठाएगा, उसकी हर जरूरत पूरी करेगा। उसे अच्छे स्कूल में भर्ती कराया, उसके फ्यूचर की पूरी प्लानिंग की। रवि की आँखों में खुशी के आँसू थे।

कभी-कभी भगवान इंसान की जान एक मासूम बच्चे के जरिए बचाते हैं। जिस बच्चे को घर से निकाला गया था, वही उस घर के मालिक की जान बचाने वाला बना।

VIII. कर्मों का फल

जो लालच में अंधे हो जाते हैं, वही अपने कर्मों से बर्बाद होते हैं। पैसों की भूख ने पत्नी को बर्बाद कर दिया। जो लग्जरी लाइफ वह जीना चाहती थी, वह कभी नहीं जी पाई। जेल की सलाखों के पीछे उसकी जिंदगी खत्म हो गई। कर्मों का फल सबको मिलता है।

रमेश ने शांति देवी और रवि को परिवार का हिस्सा बना लिया। रवि की पढ़ाई, उसके सपने, उसकी खुशियाँ अब सुरक्षित थीं। शांति देवी के चेहरे पर पहली बार सुकून था। घर में फिर से इंसानियत लौट आई थी।

IX. संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि ईमानदारी, मासूमियत और इंसानियत आज भी जिंदा है। अगर आपके दिल को यह कहानी छू गई हो, तो याद रखिए—भगवान बड़े-बड़े काम छोटे-छोटे हाथों से करवा देते हैं। इंसानियत सबसे बड़ी दौलत है।

ईमानदारी आज भी जिंदा है।