घमंडी अरबपति ने गरीब फूलवाली का अपमान कर मुंह पर पैसे मारे। दिल को छू लेने वाली कहानी।
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घमंडी अरबपति और गरीब फूलवाली की कहानी
भूमिका
कहा जाता है कि अहंकार इंसान की आंखों पर पट्टी बांध देता है। उसे सामने खड़ा इंसान का दर्द नहीं, बल्कि सिर्फ अपनी दौलत दिखाई देती है। लेकिन समय का पहिया जब घूमता है, तो राजा को रंक और रंक को मसीहा बनने में देर नहीं लगती। यह कहानी मुंबई की भीड़-भाड़ वाली सड़क से शुरू होती है, जहां अमीरी और गरीबी एक ही सिग्नल पर खड़ी होती है, लेकिन उनके बीच का फासला मीलों लंबा होता है।
शुरुआत
शाम का वक्त था। आसमान में काले बादल घिरे थे और हवा में बारिश की नमी थी। मुंबई के एक व्यस्त सिग्नल पर एक चमचमाती काली Mercedes आकर रुकी। कार के अंदर बैठे थे दिनेश मल्होत्रा – शहर के सबसे बड़े रियल एस्टेट टाइकून। उनके माथे पर चिंता की लकीरें थीं और स्वभाव में आग जैसी गर्मी। आज ही उनकी एक बहुत बड़ी डील कैंसिल हुई थी। जिससे उनका पारा सातवें आसमान पर था। वह अपने फोन पर किसी को डांट रहे थे।
“मुझे बहाने नहीं चाहिए। अगर काम नहीं हुआ तो सबको नौकरी से निकाल दूंगा!”
तभी कार की खिड़की पर एक नन्ही सी दस्तक हुई। “बाबूजी, गजरा ले लो।”
दिनेश ने गुस्से में कांच नीचे किया। बाहर एक 10 साल की बच्ची खड़ी थी। नाम था झिलमिल। उसके कपड़े फटे पुराने थे। बाल बिखरे हुए और पैरों में चप्पल तक नहीं थी। लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जैसे अंधेरे में कोई दिया जल रहा हो। उसके हाथों में ताजे मोगरे के फूलों की माला थी। जिसकी खुशबू दिनेश की महंगी परफ्यूम से कहीं ज्यादा पवित्र थी।
“बाबूजी, बहुत अच्छी खुशबू है। मेमसाब के लिए ले लो ना। सिर्फ ₹20 का है।” झिलमिल ने उम्मीद भरी नजरों से कहा।
दिनेश का गुस्सा पहले ही भरा हुआ था। इस रुकावट ने आग में घी का काम किया। वह चिल्लाया, “हटो यहां से! मुझे नहीं चाहिए तुम्हारा यह कचरा। दिमाग खराब मत करो मेरा।”
झिलमिल सहम गई। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। उसे अपनी बीमार मां के लिए दवा खरीदनी थी। उसने फिर विनती की, “बाबूजी, सुबह से कुछ नहीं बिका है। बस एक ले लीजिए।”
दिनेश का सब्र टूट गया। उसने अपना वॉलेट निकाला। उसमें से ₹500 का एक कड़क नोट निकाला। उसे मरोड़ा और पूरी ताकत से झिलमिल के मुंह पर दे मारा।
“यह लो भिखारिन कहीं की! फूल नहीं चाहिए मुझे। बस दफा हो जाओ यहां से और अपनी मनहूस शक्ल मत दिखाना।”
नोट सीधा झिलमिल के गाल पर लगा और नीचे कीचड़ भरे पानी में गिर गया। सिग्नल हरा हो गया। दिनेश ने एक्सीलरेटर दबाया और अपनी Mercedes को तेजी से भगा ले गया। बिना यह देखे कि पीछे उस छोटी सी बच्ची के दिल पर क्या गुजरी।
झिलमिल की पीड़ा
बारिश की पहली बूंदें गिरने लगी थीं। लेकिन उसकी आंखों से गिरते आंसू बारिश से ज्यादा खारे थे। उसे पैसे चाहिए थे, बहुत सख्त जरूरत थी। लेकिन क्या अपनी इज्जत बेचकर कीचड़ में सने उस 500 के नोट को उठाना सही था? उसके लिए वह कागज का टुकड़ा नहीं था, बल्कि उसकी गरीबी का मजाक था।
उसके आसपास गाड़ियां गुजर रही थीं। लोग उसे धक्का देकर निकल रहे थे। लेकिन वह बस उस नोट को घूरे जा रही थी। उसका मन चीख-चीख कर कह रहा था, “मत उठा इसे झिलमिल। यह तेरी मेहनत की कमाई नहीं है। यह तो किसी अमीर के अहंकार की खैरात है।”
लेकिन तभी उसे अपनी मां की खांसती हुई आवाज याद आ गई। घर में बुखार से तपती मां, जिनके लिए आज दवा खरीदना बेहद जरूरी था। अगर आज दवा नहीं मिली तो शायद मां कल का सूरज ना देख पाए। भूख और लाचारी स्वाभिमान से कहीं ज्यादा भारी होती है। झिलमिल ने कांपते हाथों से वह नोट उठाया। उसे अपनी ही नजरों में गिरना पड़ा, लेकिन मां की जान बचाने के लिए वह यह जहर पीने को भी तैयार थी। उसने नोट को अपनी फटी हुई फ्रॉक से पोंछा और आसमान की तरफ देखकर बुदबुदाई, “हे भगवान, मुझे माफ करना। मैंने आज भीख नहीं मांगी, लेकिन हालात ने मुझे झुकने पर मजबूर कर दिया।”
उसने वह नोट अपनी मुट्ठी में खींचा और दवा की दुकान की ओर दौड़ लगा दी।
दिनेश का हादसा
दूसरी ओर दिनेश मल्होत्रा का गुस्सा अभी भी ठंडा नहीं हुआ था। वह अपनी कार को आंधी की तरह दौड़ा रहा था। शहर की रोशनी पीछे छूट गई थी और अब वह एक सुनसान हाईवे पर था। बारिश मूसलाधार हो चुकी थी। वाइपर तेजी से चल रहे थे। लेकिन दिनेश के दिमाग में चल रही उथल-पुथल के सामने बाहर का तूफान कुछ भी नहीं था।
“सब के सब निकम्मे हैं। एक 10 साल की छोकरी मेरा रास्ता रोकती है और ऑफिस वाले मेरा समय बर्बाद करते हैं। मैं दिनेश मल्होत्रा हूं। मैं किसी के सामने नहीं रुकता।”
वह स्टीयरिंग व्हील पर मुक्का मारते हुए बड़बड़ाया। तभी किस्मत ने अपना पासा पलटा। सड़क पर अचानक एक आवारा कुत्ता सामने आ गया। उसे बचाने के चक्कर में दिनेश ने तेजी से ब्रेक लगाया। गीली सड़क पर Mercedes के टायर फिसल गए। गाड़ी बेकाबू हो गई। दिनेश ने स्टीयरिंग संभालने की बहुत कोशिश की लेकिन रफ्तार बहुत तेज थी।
एक जोरदार धमाका हुआ। कार सड़क किनारे लगे एक पुराने बरगद के पेड़ से जा टकराई। टक्कर इतनी भयानक थी कि कार का अगला हिस्सा पूरी तरह चकनाचूर हो गया। एयर बैग खुले लेकिन दिनेश का सिर स्टीयरिंग से टकरा चुका था। कांच के टुकड़े उसके शरीर में धंस गए थे। माथे से खून की धार बह रही थी जो उसकी आंखों में भर रही थी। धुंधली होती आंखों से उसने देखा कि उसकी बेशकीमती कार अब लोहे का कबाड़ बन चुकी थी।
दिनेश ने हिलने की कोशिश की। लेकिन उसके पैर डैशबोर्ड के नीचे बुरी तरह फंस चुके थे। एक असहनीय दर्द ने उसके पूरे शरीर को जकड़ लिया। वह चिल्लाना चाहता था, मदद के लिए पुकारना चाहता था, लेकिन गले से सिर्फ कराह निकल रही थी। जिस सड़क पर वह राजा की तरह दौड़ रहा था, आज वही सड़क उसे निगलने को तैयार थी।
मदद की तलाश
अंधेरे में उसे कोई रोशनी दिखाई नहीं दे रही थी। वह जो करोड़ों का मालिक था, अब एक टूटी हुई कार में जिंदगी की भीख मांग रहा था। बिल्कुल वैसे ही जैसे कुछ देर पहले वह बच्ची उससे फूल खरीदने की भीख मांग रही थी। लेकिन यहां इस सुनसान रास्ते पर उस पर नोट फेंकने वाला भी कोई नहीं था।
दिनेश का शरीर दर्द से ऐंठ रहा था। उसकी Mercedes का हॉर्न शॉर्ट सर्किट की वजह से लगातार बज रहा था। जो उस सन्नाटे में किसी मौत के सायरन जैसा लग रहा था। बारिश का ठंडा पानी टूटी हुई विंडशील्ड से अंदर आ रहा था और उसके खून में मिल रहा था।
कुछ पल पहले जो इंसान अपनी दौलत के नशे में चूर था, अब वह जिंदगी की एक-एक सांस के लिए तड़प रहा था। उसने अपना हाथ हिलाने की कोशिश की ताकि जेब से फोन निकाल सके। लेकिन फोन पहले ही झटके से गिरकर चकनाचूर हो चुका था।
“कोई है? मदद करो। प्लीज कोई तो बचाओ…”
दिनेश की आवाज बहुत कमजोर निकल रही थी। उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। उसे अपनी मौत करीब दिखाई दे रही थी। आज उसके बैंक अकाउंट में करोड़ों रुपए थे, लेकिन यहां इस सुनसान सड़क पर उन करोड़ों रुपयों से वह एक घूंट पानी या एक सांस भी नहीं खरीद सकता था।
झिलमिल की वापसी
उसी वक्त सड़क के किनारे बनी कच्ची पगडंडी से झिलमिल वापस आ रही थी। उसने वह 500 का नोट इस्तेमाल करके अपनी मां के लिए दवा और थोड़ा सा दूध खरीद लिया था। वह भीगी हुई थी और ठंड से ठिठुर रही थी। अचानक उसने जोर की आवाज सुनी और एक गाड़ी की हेडलाइट को अजीब तरह से झाड़ियों में चमकते देखा। डरते-डरते वह उस ओर बढ़ी। उसका नन्हा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
जैसे ही वह गाड़ी के पास पहुंची, उसने देखा कि एक शानदार काली कार पेड़ से बुरी तरह लिपटी हुई है। अंदर एक आदमी खून से लथपथ पड़ा था। झिलमिल ने पास जाकर झांका। बिजली कड़की और उस रोशनी में उसने उस चेहरे को देखा। वह ठिठक गई। उसके कदम पीछे हट गए। यह वही चेहरा था। वही क्रूर आंखें जिन्होंने कुछ घंटे पहले उसे हिकारत से देखा था। वही हाथ जिसने उसके मुंह पर पैसे फेंक कर मारे थे। वही इंसान जिसने उसकी गरीबी का मजाक उड़ाया था।
एक पल के लिए झिलमिल के मन में कड़वाहट भर गई। “यह तो वही बुरे बाबूजी हैं।” उसने सोचा, “इन्होंने मुझे धक्का दिया था। भगवान ने शायद इन्हें सजा दी है।”
संस्कारों की जीत
अंदर फंसा दिनेश दर्द से कराह रहा था। उसने खिड़की के पास एक छोटी सी परछाई देखी। उसे नहीं पता था कि वह कौन है। बस उसे एक उम्मीद की किरण दिखाई दी। “ब… पानी… मुझे बाहर निकालो…”
दिनेश गिड़गिड़ाया। उसकी अकड़, उसका अहंकार सब उस बहते खून के साथ बह गया था। अब वहां सिर्फ एक लाचार इंसान था जो जीने की भीख मांग रहा था।
झिलमिल के पास दो रास्ते थे। वह वहां से भाग सकती थी। बदला लेने का इससे अच्छा मौका क्या हो सकता था? वह उन्हें उनके हाल पर छोड़ कर घर जा सकती थी। आखिर इस आदमी ने उसके साथ जानवर जैसा सलूक किया था। लेकिन फिर उसे अपनी मां की सीख याद आई।
“बेटा, अमीर और गरीब में बस यही फर्क होता है कि गरीब के पास देने के लिए धन नहीं होता, लेकिन संस्कार बहुत होते हैं। किसी की मुसीबत पर कभी मुंह नहीं मोड़ना चाहिए, चाहे वह दुश्मन ही क्यों ना हो।”
झिलमिल की आंखों से कड़वाहट गायब हो गई। उसने दवा की थैली को एक सूखे पत्थर पर रखा और अपनी पूरी ताकत बटोर कर उस टूटे हुए दरवाजे की तरफ बढ़ी। वह जानती थी कि वह उस भारी लोहे को नहीं हटा सकती। लेकिन वह कोशिश किए बिना हार मानने वालों में से नहीं थी।
मदद का संघर्ष
उसने अपनी नन्ही हथेलियां उस ठंडे गीले कांच पर रखी और चिल्लाई, “बाबूजी, आप घबराओ मत। मैं हूं ना। मैं किसी को बुलाकर लाती हूं।”
बारिश और तूफान का शोर कानों को फाड़े डाल रहा था। झिलमिल दौड़कर सड़क के बीचोंबीच आ गई। वह अपनी नन्ही बाहें फैलाकर आने जाने वाली गाड़ियों को रोकने की कोशिश कर रही थी। लेकिन विडंबना देखिए, जो गाड़ियां अभी कुछ देर पहले उस अमीर दिनेश मल्होत्रा के लिए पलक झपकते ही रास्ता छोड़ देती थीं, वही गाड़ियां आज उसकी मौत का तमाशा बनकर तेजी से गुजर रही थीं। कोई रुकने को तैयार नहीं था।
एक फटी पुरानी कपड़े वाली बच्ची की पुकार सुनता ही कौन है? कीचड़ उसके चेहरे पर उड़ रहा था। गाड़ियों की हेडलाइट उसकी आंखों को चकाचौंध कर रही थी। एक पल के लिए उसे लगा कि शायद वह हार जाएगी। उसे वही दृश्य याद आया जब दिनेश ने उसे हिकारत से भगा दिया था। आज दुनिया वही व्यवहार उसके साथ कर रही थी।
“रुक जाओ! कोई तो रुको! वहां कोई मर रहा है!”
वह अपनी पूरी ताकत से चिल्लाई। लेकिन उसकी आवाज तूफानी हवाओं में कहीं खो गई।
साहस और दया
तभी उसे दूर से एक ट्रक आता दिखाई दिया। झिलमिल ने फैसला कर लिया था। वह हटी नहीं। वह सड़क के बिल्कुल बीचोंबीच खड़ी हो गई, अपनी जान की परवाह किए बिना। ट्रक के ड्राइवर ने दूर से एक परछाई देखी और पूरी ताकत से ब्रेक दबाया। टायरों की चीख ने सन्नाटे को चीर दिया। ट्रक झिलमिल से महज कुछ इंच की दूरी पर रुका।
ड्राइवर गुस्से में नीचे कूदा, “पागल है क्या छोकरी? मरना है तुझे?”
झिलमिल दौड़ कर उसके पैरों में गिर गई। “काका, मुझे मत मारो, लेकिन प्लीज उस बाबूजी को बचा लो। उनकी गाड़ी पेड़ से टकरा गई है। बहुत खून बह रहा है।”
झिलमिल की आंखों में खौफ और आंसू देखकर ड्राइवर का गुस्सा पिघल गया। वह समझ गया कि मामला गंभीर है। वह लोहे की रॉड लेकर झिलमिल के पीछे भागा। जब वे कार के पास पहुंचे, दिनेश की हालत बहुत खराब थी। उसका सिर स्टीयरिंग पर झुका था और सांसें उखड़ रही थीं। ड्राइवर ने अपनी पूरी ताकत लगाकर लोहे की रॉड से फंसा हुआ दरवाजा खोला। “हिम्मत रखो साहब।” ड्राइवर ने कहा और दिनेश को बाहर खींचने लगा।
झिलमिल ने अपने नन्हे हाथों से दिनेश के पैरों को संभाला। उसका कोमल हाथ दिनेश के ठंडे पड़ते हाथ से छुआ। उन्हें बाहर निकालकर सुरक्षित घास पर लिटाया गया। दिनेश को धुंधला-धुंधला होश आया। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं। उसने अपनी भारी पलकें खोलने की कोशिश की। उसे अपने सामने एक चेहरा दिखाई दिया। वही सांवला रंग, वही बिखरे बाल, वही बद्ध आंखें। झिलमिल अपना पुराना दुपट्टा फाड़कर उसके माथे से बहते खून को रोकने की कोशिश कर रही थी। उसका चेहरा चिंता से भरा था।
दिनेश का दिल एक पल के लिए थम सा गया। यह वही लड़की थी। भिखारिन, कचरा – यही शब्द कहे थे उसने इसे। और आज जब उसके अपने सगे संबंधी, उसके अमीर दोस्त, उसके कर्मचारी कोई यहां नहीं था, तब यही “कचरा” उसकी ढाल बनकर खड़ा था।
अस्पताल में नई शुरुआत
अस्पताल के आईसीयू के बाहर सन्नाटा पसरा था। जिसे केवल वेंटिलेटर की बीप और डॉक्टरों के कदमों की आहट तोड़ रही थी। सफेद दीवारों और फिनाइल की गंध के बीच कॉरिडोर के एक कोने में झिलमिल सिकुड़ी हुई बैठी थी। उसके कपड़े अभी भी गीले थे और कीचड़ से सने थे। आते-जाते लोग उसे घृणा से देख रहे थे, जैसे वह कोई गंदगी हो जो अस्पताल की चमक को खराब कर रही थी। लेकिन झिलमिल को किसी की परवाह नहीं थी। उसकी नन्ही हथेलियां जुड़ी हुई थीं और वह लगातार भगवान से उस बुरे बाबूजी की जान बख्शने की प्रार्थना कर रही थी।
ट्रक ड्राइवर दिनेश को भर्ती करवा कर जा चुका था, लेकिन झिलमिल नहीं गई। उसे डर था कि अगर वह चली गई तो बाबूजी को होश आने पर पानी कौन पिलाएगा?
घंटों बाद दिनेश की आंखों में हरकत हुई। उसने धीरे-धीरे आंखें खोली। सिर में तेज दर्द था और शरीर पट्टियों में जकड़ा हुआ था। उसने देखा कि वह एक आलीशान प्राइवेट वार्ड में था। एसी की ठंडक थी, लेकिन उसके अंदर एक अजीब सी घबराहट थी।
एक नर्स कमरे में आई और उसका चेकअप करने लगी। दिनेश ने लटकती जुबान से पूछा, “मैं… मैं कहां हूं? मुझे यहां कौन लाया?”
नर्स ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप बहुत किस्मत वाले हैं सर। आपका बहुत खून बह चुका था। अगर आपको 10 मिनट की भी देरी होती, तो बचना मुश्किल था। एक ट्रक ड्राइवर और एक छोटी बच्ची आपको लेकर आए थे।”
नर्स ने एक लिफाफा टेबल से उठाया और दिनेश के हाथ में थमा दिया। “सर, जब आपको भर्ती किया जा रहा था तो रिसेप्शन पर उस बच्ची ने यह नोट दिया था। उसने रोते हुए कहा था कि उसके पास बस यही पैसे हैं, लेकिन प्लीज डॉक्टर साहब इनका इलाज शुरू कर दो। हम सब हैरान थे।”
यह वही 500 का नोट था, जिस पर अभी भी कीचड़ के हल्के निशान थे। वही नोट जिसे उसने अपने अहंकार के नशे में उस बच्ची के मुंह पर दे मारा था। वही नोट जिसे उसने भीख कहा था, आज उसी भीख ने उसकी जिंदगी की कीमत चुकाई थी।
पछतावा और परिवर्तन
दिनेश के हाथ कांपने लगे। उसने उस लिफाफे को खोला। अंदर वही 500 का नोट था। उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसे अपनी करोड़ों की दौलत आज मिट्टी के समान लग रही थी। उसने महसूस किया कि वह कितना गरीब है। उसके पास बैंक बैलेंस था, लेकिन उस बच्ची के पास जो दिल था, वह दुनिया की किसी भी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता था।
नर्स ने बताया, “वह बच्ची बाहर कॉरिडोर में जमीन पर बैठी है सर। हमने उसे जाने को कहा, पर वह हटी नहीं।”
दिनेश ने अपने आंसुओं को पोंछा। उसने आदेश नहीं, विनती की, “प्लीज उसे अंदर बुलाइए। मैं उससे मिलना चाहता हूं। मुझे अपने भगवान से मिलना है।”
नर्स बाहर गई और कुछ पलों बाद दरवाजा धीरे से खुला। झिलमिल डरते-डरते अंदर आई। वह दरवाजे के पास ही खड़ी हो गई। जैसे उसे डर हो कि कहीं वह फर्श गंदा ना कर दे। दिनेश ने उसे देखा। वही मासूम चेहरा, वही डर, लेकिन आंखों में वही चिंता। दिनेश ने अपना हाथ बढ़ाया, इस बार मारने के लिए नहीं, बल्कि सहारा मांगने के लिए।
“बेटी, पास आओ।”
दिनेश की आवाज में इतना दर्द और अपनापन था कि झिलमिल भी चौंक गई। झिलमिल धीरे-धीरे सकुचाते हुए बिस्तर के पास आई। उसे अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि यह वही खूंखार बाबूजी हैं। दिनेश की आंखों में अब गुस्सा नहीं, बल्कि पछतावे का सागर था।
उसने कांपते हाथों से झिलमिल का नन्हा मैला हाथ अपने हाथों में थाम लिया। “मुझे माफ कर दो बेटा। मैंने तुम्हें ठुकराया, तुम्हें चोट पहुंचाई और बदले में तुमने मुझे जीवन दिया। क्यों? तुम मुझे वहीं मरने देती तो शायद दुनिया से एक बुरा इंसान कम हो जाता।”
झिलमिल ने मासूमियत से दिनेश की ओर देखा और धीरे से बोली, “मां कहती हैं, बुराई को बुराई से नहीं मिटाया जा सकता। बाबूजी, अंधेरे को सिर्फ रोशनी ही मिटा सकती है। और फिर अगर मैं आपको छोड़ देती तो मुझ में और आप में क्या फर्क रह जाता?”
झिलमिल के इन सरल शब्दों ने दिनेश की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। उसे लगा जैसे किसी ने उसे आईना दिखा दिया हो। वह जीवन भर जिस सफलता, जिस रुतबे के पीछे भागता रहा, वह सब आज इस बच्ची के संस्कारों के आगे बौना साबित हो गया था। उसे समझ आ गया कि असली अमीर वह नहीं जिसके पास बंगला, गाड़ी है, बल्कि असली अमीर वह है जिसका दिल इतना बड़ा है कि वह अपने दुश्मन को भी माफ कर सके।
नई शुरुआत
दिनेश ने अपने आंसुओं को पोंछा और एक दृढ़ निश्चय के साथ झिलमिल की ओर देखा, “तुम्हारी मां… मुझे उनसे मिलना है।”
डॉक्टरों के मना करने के बावजूद दिनेश ने डिस्चार्ज लेने की जिद की। वह व्हीलचेयर पर था, लेकिन उसकी आत्मा अब अपने पैरों पर खड़ी हो चुकी थी। अपनी टूटी हुई Mercedes की जगह उसने एक साधारण टैक्सी मंगवाई। झिलमिल उसे रास्ता बताती गई। शहर की चकाचौंध से दूर उस तंग बदबूदार बस्ती की ओर, जहां सूरज की रोशनी भी बमुश्किल पहुंचती थी।
झिलमिल का घर नहीं, वह घर नहीं था। वह प्लास्टिक की शीट और पुराने बांस से बनी एक छोटी सी झोपड़ी थी। अंदर एक टूटी हुई खाट पर एक महिला लेटी थी, जो खांसते-खांसते बेहाल हो रही थी। बारिश का पानी टपक रहा था और फर्श गीला था। यह दृश्य देखकर दिनेश का कलेजा मुँह को आ गया।
“भगवान, ये लोग यहां कैसे जीते हैं?” उसने मन ही मन सोचा। उसे शर्मिंदगी महसूस हुई कि वह एयर कंडीशंड कमरों में बैठकर दुनिया की समस्याओं पर बड़ी-बड़ी बातें करता था, जबकि असली संघर्ष तो यहां था।
झिलमिल दौड़कर अपनी मां के पास गई और उन्हें दवा दी। “मां, देखो बाबूजी आए हैं।”
उसकी मां ने कमजोर आंखों से दिनेश की ओर देखा और हाथ जोड़ने की कोशिश की, “बाबूजी, मेरी बेटी ने कोई गलती तो नहीं की? माफ कर देना, नादान है।”
दिनेश आगे बढ़ा और झिलमिल की मां के पैर छू लिए, “नहीं मां जी। गलती आपकी बेटी ने नहीं, मैंने की थी। मैं जीवन भर अंधा था। आपकी बेटी ने आज मेरी आंखें खोल दी। आपने इसे जन्म नहीं दिया, आपने एक देवी को पाला है।”
बस्ती के लोग जो अक्सर अमीर लोगों को हिकारत से देखते थे, आज हैरान होकर देख रहे थे कि एक सूट-बूट वाला अमीर आदमी एक गरीब झोपड़ी में जमीन पर बैठकर हाथ जोड़ रहा था।
दिनेश ने झिलमिल के सिर पर हाथ रखा, “झिलमिल, अब से तुम फूल नहीं बेचोगी। और ना ही तुम यहां रहोगी। आज से तुम मेरी बेटी हो। मेरा घर, मेरा परिवार, मेरी दौलत सब तुम्हारा है। मैं तुम्हें वह सब दूंगा जो एक पिता अपनी बेटी को देता है।”
झिलमिल को कुछ समझ नहीं आ रहा था। लेकिन उसकी मां की आंखों में कृतज्ञता के आंसू थे। एक अनजाने रिश्ते की डोर आज उस झोपड़ी में बंध गई थी।
समय का पहिया
12 साल बीत गए। समय के साथ मुंबई शहर बदल गया। इमारतें और ऊंची हो गईं। लेकिन उस पुरानी घटना की नींव पर खड़ी एक इमारत आज सबसे अलग चमक रही थी।
शहर के सबसे प्रतिष्ठित ऑडिटोरियम में हजारों लोग जमा थे। तालियों की गड़गड़ाहट गूंज रही थी। मंच पर माइक के सामने एक 22 वर्षीय युवती खड़ी थी। आत्मविश्वास से भरी, शिक्षित और शालीन। उसने एमबीए में गोल्ड मेडल हासिल किया था। यह वही झिलमिल थी।
सामने की कतार में बैठे दिनेश मल्होत्रा के बाल अब पूरी तरह सफेद हो चुके थे। चेहरे पर झुर्रियां थी। लेकिन उनकी आंखों में जो सुकून और चमक थी, वह 12 साल पहले की उस अहंकारी चमक से बिल्कुल अलग थी। आज वे शहर के क्रूर टाइकून नहीं, बल्कि मसीहा के नाम से जाने जाते थे। उनकी आंखों से गर्व के आंसू छलक रहे थे।
झिलमिल ने माइक संभाला और हॉल में सन्नाटा छा गया। उसने अपनी जेब से एक छोटा सा फ्रेम निकाला, जिसमें एक पुराना मटमैला और थोड़ा सा फटा हुआ 500 का नोट जड़ा हुआ था।
“आप सब मेरी सफलता को देख रहे हैं,” झिलमिल की आवाज में एक ठहराव था, “लेकिन मेरी असली विरासत यह डिग्री नहीं, बल्कि यह नोट है।”
लोगों ने हैरानी से उस फ्रेम को देखा। झिलमिल ने दिनेश की ओर इशारा करते हुए कहा,
“एक तूफानी रात को यह नोट मेरे मुंह पर फेंका गया था। उस वक्त यह मेरी गरीबी का मजाक था। लेकिन आज यह नोट मेरे जीवन का सबसे कीमती खजाना है। क्योंकि इसी नोट ने मुझे एक पिता दिया और मेरे पिता को एक इंसान बनाया।”
दिनेश अपनी जगह से उठे और धीरे-धीरे मंच पर चढ़े। हॉल में मौजूद हर शख्स भावुक था। दिनेश ने झिलमिल के सिर पर हाथ रखा और माइक हाथ में लिया। उनकी आवाज भारी थी।
“मैं उस दिन तक दुनिया का सबसे गरीब आदमी था, जब तक मेरे बैंक में करोड़ों रुपए थे। असली अमीर तो मैं उस दिन बना जब इस बेटी ने, जिसका मैंने अपमान किया था, मुझे मौत के मुंह से खींच निकाला। दोस्तों, याद रखना – कफन में जेब नहीं होती। लेकिन कर्मों का खाता साथ जाता है। ऊपर वाला यह नहीं पूछेगा कि तुमने कितनी Mercedes खरीदी। वह पूछेगा कि तुमने कितने आंसू पोंछे।”
झिलमिल की मां का कुछ साल पहले बीमारी से देहांत हो गया था। लेकिन जाते-जाते उन्होंने अपनी बेटी को एक सुरक्षित भविष्य और दिनेश को एक मकसद दे दिया था। आज दिनेश और झिलमिल मिलकर आशा फाउंडेशन चलाते थे, जो गरीब बच्चों को मुफ्त शिक्षा और बेसहारा बुजुर्गों को आसरा देता था।
अंतिम दृश्य
उस हादसे ने यह साबित कर दिया था कि वक्त का पहिया कब घूम जाए कोई नहीं जानता। जिस हाथ को हम आज हिकारत से झटकते हैं, कल वही हाथ हमें खाई में गिरने से बचा सकता है।
कहानी का अंत एक सुखद तस्वीर के साथ हुआ। बारिश फिर से हो रही थी, लेकिन आज वह बारिश डरावनी नहीं थी। दिनेश और झिलमिल ऑडिटोरियम से बाहर निकले। एक छोटा बच्चा बारिश में भीगता हुआ उनके पास आया और फूल बेचने की कोशिश की। इस बार दिनेश ने उसे दुत्कारा नहीं। उन्होंने झुककर उस बच्चे को गोद में उठाया, उसके सारे फूल खरीदे और झिलमिल की तरफ देखकर मुस्कुराए।
कर्म का चक्र पूरा हो चुका था। अहंकार हार गया था और इंसानियत जीत गई थी। अच्छाई कभी व्यर्थ नहीं जाती। वह लौट कर आती है कई गुना होकर और यही जीवन का सबसे बड़ा सत्य है।
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