घमंड में डूबी मालकिन ने जिस लड़के को नौकर समझा वही निकला कंपनी का मालिक सच सामने आते ही सब दंग रह गए

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आईना

दिल्ली की उस बहुमंज़िला इमारत की चमक दूर से ही आँखें चकाचौंध कर देती थी।
शीशे की दीवारें, अंदर जाती महंगी गाड़ियाँ, रिसेप्शन पर खड़े सूट-बूट वाले गार्ड —
सब कुछ यह जताने के लिए काफी था कि यह कोई साधारण जगह नहीं है।

यह था सिंघानिया ग्रुप का मुख्य कार्यालय।

इसी इमारत में उस सुबह एक साधारण-सा युवक दाख़िल हुआ।

सफेद कमीज़, हल्का पुराना बैग, आँखों में शांत आत्मविश्वास।
ना कोई ब्रांडेड घड़ी, ना चमकदार जूते।

रिसेप्शन से आगे बढ़ते ही वह अचानक रुक गया।

एक तेज़ आवाज़ गूँजी।

“यू इडियट! तुम्हें दिखाई नहीं देता क्या?”

युवक के हाथ से पानी का गिलास फिसल गया था।
पानी सामने खड़ी युवती की महंगी ड्रेस पर गिर चुका था।

वह युवती थी — काव्या सिंघानिया

कंपनी की डायरेक्टर।
घमंड उसकी चाल में था, उसकी आवाज़ में था, उसकी आँखों में था।

“तुम्हें अंदाज़ा भी है ये ड्रेस कितनी महंगी है?”
उसने नफ़रत से युवक को देखा।
“तुम जैसे लोगों की साल भर की कमाई से ज़्यादा!”

युवक ने सिर झुका लिया।

“माफ़ कीजिए… गलती हो गई।”

उसने जेब से रुमाल निकाला।

“मैं साफ़ कर देता हूँ।”

“खबरदार!”
काव्या पीछे हट गई जैसे किसी ने उसे छू लेने की कोशिश की हो।

“अपना दो टके का रुमाल मुझ पर लगाने की हिम्मत कैसे हुई?”

उसने गार्ड्स को इशारा किया।

“इसे अभी बाहर फेंको।”

गार्ड युवक के पास आए।

“मैडम का ऑर्डर है। बाहर निकलो।”

युवक ने एक पल के लिए आँख उठाई।
उसकी नज़र काव्या की आँखों से टकराई।

और वह धीरे से बोला—

“कपड़े गंदे हों तो धोए जा सकते हैं…
लेकिन सोच गंदी हो जाए, तो कोई साबुन साफ़ नहीं कर सकता।”

काव्या ठिठक गई।

लेकिन अगले ही पल उसका अहंकार फिर हावी हो गया।

“बकवास बंद करो। अपनी औकात में रहो।”

युवक मुस्कराया।
कोई कड़वाहट नहीं।
कोई गुस्सा नहीं।

बस एक शांत मुस्कान।

“अब असली खेल शुरू हुआ है,”
वह मन ही मन बोला।


दो चेहरे

ऊपर बोर्डरूम में हलचल थी।

काव्या के पिता — राजवीर सिंघानिया,
कंपनी के चेयरमैन — बेचैन थे।

“काव्या, आज की मीटिंग बहुत अहम है,”
उन्होंने कहा।

“हम जिस व्यक्ति से मिलने वाले हैं, वही हमारी कंपनी का भविष्य तय करेगा।”

काव्या ने लापरवाही से जवाब दिया।

“कोई पुराना अमीर इन्वेस्टर होगा। साइन ही तो करने हैं, डैड।”

राजवीर की आवाज़ कांप गई।

“अगर उसने फंडिंग रोक दी, तो ये कंपनी नहीं बचेगी।”

काव्या ने कंधे उचकाए।

“ठीक है। आज मैं अच्छा व्यवहार कर लूंगी।”

उसी समय बोर्डरूम का दरवाज़ा खुला।

सेक्रेटरी बोली—

“सर… अद्वैत वर्मा आ गए हैं।”

काव्या ने पलटकर देखा।

और उसका चेहरा सफ़ेद पड़ गया।

वही युवक।

वही साधारण कमीज़।

वही शांत आँखें।

“यह… यह यहाँ कैसे?”
उसने बुदबुदाया।

राजवीर खड़े हो गए।

“स्वागत है, अद्वैत सर।”

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया।

राजवीर ने घोषणा की—

“लेडीज़ एंड जेंटलमैन,
आज हमारे बीच हमारे फाउंडर और मेन इन्वेस्टर मौजूद हैं —
मिस्टर अद्वैत वर्मा।”

काव्या की साँस रुक गई।


आईना टूटता है

अद्वैत ने चारों ओर देखा।

“तारीफों का वक्त नहीं है,”
उसने शांत स्वर में कहा।

“मैं यहाँ बिज़नेस से ज़्यादा… संस्कारों की बात करने आया हूँ।”

उसने स्क्रीन पर एक रिपोर्ट डलवाई।

मजदूरों के साथ बदसलूकी।
पेमेंट में देरी।
स्टाफ़ से अपमानजनक व्यवहार।

“यही है आपकी कंपनी की सच्चाई।”

राजवीर घबरा गए।

“सर… ये छोटी समस्याएँ हैं…”

अद्वैत ने बीच में ही कहा—

“इंसान को बोझ समझना छोटी समस्या नहीं होती।”

उसकी नज़र सीधे काव्या पर थी।

“कंपनी का कल्चर ऊपर बैठे लोगों से तय होता है।”

फिर वह रुका।

“मैं अपनी इन्वेस्टमेंट वापस ले रहा हूँ।”

कमरे में हड़कंप मच गया।

राजवीर लगभग गिर पड़े।

“सर, ऐसा मत कीजिए… हजारों लोग बेरोज़गार हो जाएंगे।”

अद्वैत ने एक शर्त रखी।

“काव्या सिंघानिया अगले छह महीने डायरेक्टर नहीं रहेंगी।”

“वे इंटर्न बनकर सबसे नीचे से काम करेंगी।”

काव्या फट पड़ी।

“मैं किसी वेयरहाउस में काम नहीं करूंगी!”

राजवीर ने आँखें बंद कर लीं।

“मैं आपकी शर्त मानता हूँ।”


छह महीने

पहला दिन।

गोदाम।

गर्मी।
धूल।
भारी बॉक्स।

काव्या के हाथ काँप रहे थे।

“जल्दी करो,”
एक सुपरवाइज़र बोला।

वह बैठ गई।

“मेरे हाथ…”

तभी एक बूढ़ा कर्मचारी पास आया।

“बिटिया, थोड़ा खा लो।”

घर का बना खाना।

काव्या की आँखें भर आईं।

“मेहनत की रोटी सच में मीठी होती है,”
वह फुसफुसाई।

दिन बीतते गए।

काव्या बदली।

अब वह “मैडम” नहीं थी।
बस “काव्या” थी।


नया सूरज

छह महीने बाद।

बोर्डरूम।

राजवीर बोले—

“अब कंपनी को नई सोच चाहिए।”

घोषणा हुई—

“सिंघानिया ग्रुप का नया CEO —
अद्वैत वर्मा।”

काव्या की आँखों से आँसू गिर पड़े।

मीटिंग के बाद वह अद्वैत के पास गई।

“मुझे माफ़ कर दीजिए।”

अद्वैत मुस्कराया।

“CEO मैं हूँ…
लेकिन कंपनी आपकी भी है।”

“असली लीडर वही होता है
जो सम्मान कमाता है।”

काव्या ने सिर झुका लिया।

“अब कभी किसी का अपमान नहीं करूंगी।”


अंत नहीं — शुरुआत

उस दिन सिंघानिया ग्रुप बदला।

और काव्या भी।

क्योंकि
विरासत में संपत्ति मिल सकती है…
लेकिन काबिलियत कमानी पड़ती है।