चायवाले ने कहा: “साहब, क्रेन में डीजल नहीं पानी है”… टंकी खोलते ही मालिक के होश उड़ गए!

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चायवाले ने कहा: “साहब, क्रेन में डीजल नहीं पानी है”… टंकी खोलते ही मालिक के होश उड़ गए!

चिलचिलाती धूप और सीमेंट की उड़ती धूल के बीच आशियाना हाइट्स का निर्माण कार्य जोरों पर था। दोपहर के 2:00 बज रहे थे, लेकिन मजदूरों के माथे से टपकता पसीना सूखने का नाम नहीं ले रहा था। इस भारीभरकम प्रोजेक्ट के मालिक सेठ जगन्नाथ अपनी सफेद सफारी सूट में साइड पर खड़े थे। लेकिन आज उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था। डेडलाइन नजदीक थी और काम की रफ्तार उम्मीद से कहीं ज्यादा धीमी थी।

सेठ जगन्नाथ एक सख्त मिजाज के आदमी थे। जिन्होंने जमीन से उठकर यह साम्राज्य खड़ा किया था। उनके लिए काम ही पूजा थी और लापरवाही उन्हें बर्दाश्त नहीं थी। साइट पर मौजूद सुपरवाइजर बलदेव घबराहट में अपने हाथ मल रहा था। बलदेव सेठ जी का पुराना वफादार माना जाता था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से साइट पर अजीबोगरीब घटनाएं हो रही थी। कभी सामान चोरी हो जाता तो कभी मशीनें अचानक खराब हो जातीं।

अचानक एक जोर की घरघराहट हुई और फिर सन्नाटा छा गया। साइड की सबसे बड़ी क्रेन जो पिलर उठाने का काम कर रही थी, अचानक बंद हो गई। ड्राइवर ने बार-बार इग्निशन दिया लेकिन इंजन ने खांसकर दम तोड़ दिया। क्या हुआ? काम क्यों रोक दिया? सेठ जगन्नाथ ने गुस्से में चिल्लाते हुए पूछा। उनकी आवाज लोहे की सरिया गिरने जैसी भारी थी। बलदेव दौड़ता हुआ क्रेन के पास गया और ड्राइवर को डांटने लगा। अरे क्या तमाशा है? सेठ जी खड़े हैं और तू मशीन बंद करके बैठ गया। ड्राइवर ने सहमते हुए कहा, साहब पता नहीं क्या हुआ। अभी तो टंकी फुल करवाई थी लेकिन इंजन ऐसे बंद हुआ जैसे जान ही ना बची हो।

तभी भीड़ के पीछे से एक पतली और दबी हुई आवाज आई। बाबूजी चाय… वह 10 साल का रघु था। फटे पुराने कपड़े, पैरों में टूटी हुई हवाई चप्पल और हाथ में केतली लिए वह साइड पर मजदूरों को चाय पिलाता था। रघु अनाथ था और इसी निर्माणाधीन इमारत के एक कोने में सोता था। उसकी आंखें बड़ी-बड़ी और चमकदार थीं, जिनमें एक अजीब सी समझदारी दिखाई देती थी। वह अक्सर मशीनों के पास चुपचाप खड़ा होकर काम देखता रहता था।

बलदेव ने रघु को देखकर झल्लाते हुए कहा, “चल भाग यहां से। यहां मशीन खराब पड़ी है और तुझे चाय की पड़ी है।” रघु ने अपनी जगह से हिले बिना सीधे सेठ जगन्नाथ की आंखों में देखा। उसके चेहरे पर डर नहीं बल्कि एक अजीब सा विश्वास था। उसने अपनी केतली को जमीन पर रखा और क्रेन की ओर इशारा करते हुए बोला, “बड़े साहब, मशीन खराब नहीं है, बस उसे भूख नहीं लगी है।” जगन्नाथ ने अपनी भौहें सिकोड़ी, “क्या मतलब?”

रघु ने एक कदम आगे बढ़ाया और वह वाक्य कहा जिसने वहां मौजूद हर शख्स को चौंका दिया। “साहब, क्रेन की टंकी में पानी है, डीजल नहीं। मशीन पानी से कैसे चलेगी?” वहां सन्नाटा छा गया। बलदेव का चेहरा पसीने से तर-बतर हो गया। उसने चिल्लाकर कहा, “ऐ पागल लड़के, दिमाग खराब है तेरा। अभी सुबह ही मैंने खुद डीजल भरवाया है। सेठ जी, यह लड़का झूठ बोल रहा है। इसे यहां से भगाता हूं।”

लेकिन जगन्नाथ की अनुभवी आंखों ने बलदेव की घबराहट को भांप लिया था। उन्होंने हाथ उठाकर बलदेव को चुप रहने का इशारा किया। वे धीरे-धीरे क्रेन के फ्यूल टैंक के पास गए। “खोल इसे,” जगन्नाथ ने ड्राइवर को आदेश दिया। ड्राइवर ने कांपते हाथों से टंकी का ढक्कन खोला। जगन्नाथ ने अपनी जेब से एक सफेद रुमाल निकाला और उसे टंकी के नोजल में डालकर थोड़ा सा द्रव बाहर निकाला। रुमाल गीला तो हुआ लेकिन उस पर डीजल का गाढ़ा रंग या तीखी गंध नहीं थी। वह साफ पारदर्शी पानी था।

सेठ जगन्नाथ के पैरों तले जमीन खिसक गई। लाखों की मशीन में पानी! इसका मतलब था कि इंजन पूरी तरह से सीज हो सकता था। उन्होंने गुस्से और अविश्वास से भरकर बलदेव की ओर देखा। टंकी में पानी होना सिर्फ लापरवाही नहीं थी, यह एक बहुत बड़ी साजिश का संकेत था। एक चाय बेचने वाला बच्चा वह जानता था जो उनका सबसे भरोसेमंद सुपरवाइजर छिपा रहा था।

सेठ जगन्नाथ ने वह भीगा हुआ रुमाल बलदेव के चेहरे पर दे मारा। उनकी आंखों में खून उतर आया था। जिस आदमी पर उन्होंने आंख मूंदकर भरोसा किया, जिसके हाथ में अपनी साइड की तिजोरी की चाबी तक सौंप दी थी, वहीं उनकी पीठ में छुरा घोंप रहा था।

“साहब, साहब मुझे नहीं पता यह कैसे हुआ,” बलदेव हकलाते हुए बोला, उसके हाथपांव कांप रहे थे। “मैं तो अभी रसीद दिखा सकता हूं। पेट्रोल पंप वालों ने धोखा दिया होगा साहब। आजकल मिलावट का जमाना है। वो लोग ही पानी मिलाकर बेच रहे होंगे। मैं अभी जाकर उनसे बात करता हूं।” बलदेव ने पैतरा बदलते हुए इल्जाम दूसरों पर मड़ने की कोशिश की। वह मुड़कर जाने ही वाला था कि रघु फिर बोला, “पंप वाले चोर नहीं हैं। मुंशी जी, चोरी तो रात के अंधेरे में इसी साइड के पीछे वाले गेट पर होती है।”

बलदेव का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। वह रघु की ओर झपटा और अपना हाथ उठाया, “चुप कर दो टके के छोकरे। बड़ों के बीच में बोलता है तुझे अभी मजा चकाता हूं।” उसका हाथ रघु के गाल तक पहुंचने ही वाला था कि एक मजबूत कलाई ने उसे हवा में ही रोक लिया। वह हाथ सेठ जगन्नाथ का था। उन्होंने बलदेव का हाथ इतनी जोर से मरोड़ा कि उसके मुंह से चीख निकल गई। “हाथ नीचे रख,” जगन्नाथ ने गुर्राते हुए कहा। फिर उन्होंने रघु की ओर देखा जो बिना डरे अपनी जगह पर खड़ा था। “पूरी बात बताओ बेटे। तुम्हें कैसे पता कि यह पंप वालों की गलती नहीं है?”

रघु ने अपनी केतली को कसकर पकड़ा और बोला, “साहब, मैं यहीं सीमेंट की बोरियों के पीछे सोता हूं। मेरा कोई घर नहीं है। पिछले 1 महीने से मैं देख रहा हूं। रोज रात को 2:00 बजे एक काला टेम्पो पीछे वाले गेट पर आता है। मुंशी जी खुद गेट खोलते हैं। फिर यह ड्राइवर और मुंशी जी मिलकर मशीनों से डीजल निकालते हैं और उस टेम्पो में लदे ड्रमों में भर देते हैं और बदले में वो लोग मशीनों में नीले रंग का पानी जैसा कुछ डाल देते हैं। कल रात शायद अंधेरे में इन्होंने ज्यादा पानी मिला दिया। इसीलिए आज आपकी क्रेन ने जवाब दे दिया।”

रघु की एक-एक बात हथौड़े की तरह बलदेव के झूठ को तोड़ रही थी। वहां खड़े बाकी मजदूर भी अब कानफूसी करने लगे थे। सबको याद आ रहा था कि कैसे पिछले कुछ हफ्तों से गाड़ियां जल्दी खराब हो रही थीं और काम बार-बार रुक रहा था। जगन्नाथ ने ड्राइवर की ओर देखा। ड्राइवर पहले से ही पसीने से लथपथ था। “सच बोल वरना पुलिस के हवाले कर दूंगा और वह जो खाल उधेड़ेंगे वो अलग।” जगन्नाथ ने चेतावनी दी।

ड्राइवर तुरंत सेठ के पैरों में गिर पड़ा, “माफ कर दीजिए मालिक। मुझे मुंशी जी ने मजबूर किया था। उन्होंने कहा था कि अगर मैंने मुंह खोला तो मेरी नौकरी खा जाएंगे। हम लोग रोज 50 लीटर डीजल निकाल कर बेचते थे और हिसाब बराबर करने के लिए पानी मिला देते थे। मुझे नहीं पता था कि आज मशीन पूरी तरह बैठ जाएगी।”

बलदेव अब पूरी तरह बेनकाब हो चुका था। वह गिड़गिड़ाने लगा, “सेठ जी गलती हो गई। मुझे माफ कर दीजिए। मेरी बेटी की शादी थी। पैसों की तंगी थी। इसलिए ईमान डगमगा गया।” जगन्नाथ ने घृणा से मुंह फेर लिया, “तंगी थी तो मांग लेता बलदेव। मैंने कभी अपने कर्मचारियों को खाली हाथ नहीं लौटाया। लेकिन तुमने चोरी की और उससे भी बुरा, तुमने मेरा भरोसा तोड़ा। इस मशीन की कीमत लाखों में है और तुमने चंद पैसों के लिए इसे कबाड़ बना दिया।”

उन्होंने तुरंत अपने सुरक्षा गार्डों को इशारा किया, “इन दोनों को पकड़ कर पुलिस के हवाले करो। और हां, ध्यान रहे कि यह भागने ना पाए।” पुलिस के आने तक वहां माहौल तनावपूर्ण बना रहा। जब पुलिस बलदेव और ड्राइवर को ले गई, तब जाकर साइड पर थोड़ी शांति हुई। लेकिन अब जगन्नाथ के सामने एक बड़ी समस्या थी। सुपरवाइजर जेल जा चुका था, क्रेन खराब थी और काम रुका हुआ था। वह हताश होकर एक पत्थर पर बैठ गए।

रघु जो अब तक सब कुछ चुपचाप देख रहा था, धीरे से सेठ के पास आया और बोला, “बाबूजी चाय ठंडी हो गई। मैं दूसरी ले आऊं?” जगन्नाथ ने सिर उठाकर उस छोटे से बच्चे को देखा। मैले कुचैले कपड़े, बिखरे बाल, लेकिन आंखों में गजब की सच्चाई। जहां बड़े-बड़े पढ़े लिखे मैनेजर उन्हें धोखा दे रहे थे, वहां सड़क के एक बच्चे ने उनका लाखों का नुकसान होने से बचा लिया था।

“तेरा नाम क्या है बेटे?” जगन्नाथ ने पहली बार नरमी से पूछा। “रघु साहब,” उसने जवाब दिया। “रघु, तू यहां कब से काम कर रहा है?” “काम तो नहीं करता साहब। बस मजदूरों को चाय पिलाता हूं और जो रूखा-सूखा मिल जाता है खा लेता हूं। मां-बाप बचपन में ही गुजर गए थे। तब से यही आसमान मेरी छत है।”

जगन्नाथ के दिल में एक टीस उठी। उन्होंने जेब से ₹100 का नोट निकाला और रघु की ओर बढ़ाया, “यह ले आज का इनाम।” रघु ने हाथ जोड़ लिए, “नहीं साहब मुझे पैसे नहीं चाहिए। मैंने ये इनाम के लिए नहीं बताया था। वो मशीन मुझे अच्छी लगती है। उसे खराब होते देख मुझे अच्छा नहीं लगा।” सेठ जगन्नाथ उस बच्चे की खुद्दारी देखकर दंग रह गए। आज के जमाने में जब लोग अपने सगे भाई का गला काटने को तैयार रहते हैं, यह अनाथ बच्चा पैसों को मना कर रहा था।

तभी जगन्नाथ के दिमाग में एक विचार आया। उन्होंने नोट वापस जेब में रखा और खड़े हो गए। “पैसे नहीं चाहिए? ठीक है। तो बता तुझे क्या चाहिए? मांग। आज सेठ जगन्नाथ खुश है।” रघु ने अपनी नजरें झुका ली और पैर के अंगूठे से जमीन कुरेदने लगा। कुछ देर की चुप्पी के बाद उसने दबी हुई आवाज में कहा, “साहब, क्या आप मुझे पढ़ना सिखा सकते हैं?”

जगन्नाथ के कानों में रघु के शब्द किसी मंत्र की तरह गूंज रहे थे। “क्या आप मुझे पढ़ना सिखा सकते हैं?” एक अनाथ बच्चा जिसके पास तन ढकने को ढंग के कपड़े नहीं थे, वह नोटों की गड्डी ठुकराकर कलम और किताब मांग रहा था। जगन्नाथ की आंखों में नमी उतर आई। उन्हें अपना बचपन याद आ गया जब वे स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ते थे क्योंकि घर में बिजली नहीं थी। उन्होंने झुककर रघु के कंधे पर हाथ रखा। वह हाथ अब एक मालिक का नहीं बल्कि एक अभिभावक का था।

“सिर्फ पढ़ना ही नहीं बेटे। मैं तुझे इतना काबिल बनाऊंगा कि एक दिन तू खुद ऐसी सैकड़ों मशीनें खरीद सकेगा।” जगन्नाथ ने उसी वक्त ऐलान कर दिया, “आज से रघु चाय नहीं बेचेगा। इसकी जिम्मेदारी अब मेरी है।” वहां खड़े मजदूर हैरान रह गए। जिस लड़के को वे कल तक डांट कर भगा देते थे, आज बड़ा सेठ उसे अपनी चमचमाती कार में बैठा रहा था।

रघु झिझक रहा था। उसके कपड़े गंदे थे और कार की सीटें मखमल की। उसने पीछे हटते हुए कहा, “साहब, गाड़ी गंदी हो जाएगी।” जगन्नाथ ने हंसते हुए कहा, “गाड़ी तो धुल जाएगी रघु। लेकिन अगर तेरा यह हुनर धूल में मिल गया, तो वह पाप कभी नहीं धुलेगा। बैठ जा।” उस दिन रघु की दुनिया बदल गई। निर्माण स्थल की धूल और शोर से दूर वह शहर के एक आलीशान बंगले में पहुंच गया। नौकरों ने उसे नहला धुलाकर नए कपड़े पहनाए। जब वह आईने के सामने खड़ा हुआ तो उसे खुद पर विश्वास नहीं हो रहा था। वह वही चाय वाला लड़का था, लेकिन अब उसकी आंखों में एक नई चमक और आत्मविश्वास था।

अगले ही हफ्ते जगन्नाथ उसे शहर के सबसे प्रतिष्ठित इंग्लिश मीडियम स्कूल में ले गए। प्रिंसिपल ने रघु के पुराने रिकॉर्ड और उसकी उम्र देखकर नाग भौं सिकोड़ी। “मिस्टर जगन्नाथ,” प्रिंसिपल ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, “हम आपकी इज्जत करते हैं लेकिन यह स्कूल शहर के समभ्रांत परिवारों के बच्चों के लिए है। यह लड़का इसका बैकग्राउंड, इसकी भाषा, यह यहां एडजस्ट नहीं कर पाएगा। बाकी बच्चे इसका मजाक उड़ाएंगे और यह डिप्रेशन में चला जाएगा। बेहतर होगा आप इसे किसी सरकारी स्कूल या स्किल सेंटर में डाल दें।”

जगन्नाथ ने रघु की ओर देखा जो डर के मारे अपना सिर झुकाए खड़ा था। जगन्नाथ ने प्रिंसिपल की मेज पर हाथ रखा और दृढ़ता से बोले, “प्रिंसिपल साहब, कोयले की खदान में ही हीरा मिलता है। अगर माहौल ही सब कुछ होता तो मैं आज यहां नहीं, किसी ढाबे पर बर्तन धो रहा होता। इस बच्चे में मैंने वो देखा है जो आपके स्कूल के टॉपर्स में भी नहीं है। भूख, सीखने की भूख। आप इसे दाखिला दीजिए। अगर यह फेल हुआ तो मैं खुद इसे निकाल ले जाऊंगा।”

जगन्नाथ की साख और जिद के आगे प्रिंसिपल को झुकना पड़ा। रघु का दाखिला हो गया। लेकिन असली लड़ाई तो अब शुरू हुई थी। कक्षा में बच्चे उसे चाय वाला कहकर चिढ़ाते थे। उसे अंग्रेजी का एक शब्द नहीं आता था। टीचर जो पढ़ाते वह उसके सिर के ऊपर से निकल जाता। पहले महीने वह हर रात तकिए में मुंह छिपाकर रोता था। उसे लगता था कि उसने सेठ जी का भरोसा तोड़ दिया है। उसे वापस अपनी चाय की केतली के पास लौट जाना चाहिए।

एक रात जगन्नाथ अपने स्टडी रूम में एक बड़े प्रोजेक्ट के नक्शे, ब्लूप्रिंट पर माथापच्ची कर रहे थे। एक पुल का डिजाइन पास नहीं हो रहा था। उसमें कुछ तकनीकी खामी थी जो पकड़ में नहीं आ रही थी। जगन्नाथ थक कर सोफे पर लेट गए। तभी रघु जो पानी का जग लेकर आया था, मेज के पास रुका। वह नक्शे को बड़े गौर से देखने लगा। उसकी नजरें उन लकीरों पर दौड़ रही थीं। उसने मेज पर रखी पेंसिल उठाई और एक पिलर के पास एक छोटा सा निशान लगा दिया।

जगन्नाथ की आंख खुली तो उन्होंने रघु को नक्शे पर झुके देखा। वे डांटने ही वाले थे कि रघु ने डरते हुए कहा, “बाबूजी, यह वाला खंभा गलत जगह है। अगर नदी का पानी बढ़ेगा तो इसका भार यहां नहीं टिकेगा। इसे थोड़ा टेढ़ा होना चाहिए। जैसे हमारी साइड वाली क्रेन का हाथ होता है।” जगन्नाथ चौंक गए। उन्होंने चश्मा पहना और नक्शे को गौर से देखा। जो गलती उनके बड़े-बड़े इंजीनियर नहीं पकड़ पाए थे, उसे इस बच्चे ने सिर्फ अपने व्यावहारिक ज्ञान और अवलोकन से पकड़ लिया था। साइट पर बिताए सालों ने उसे इंजीनियरिंग की वह समझ दी थी जो किताबों में नहीं मिलती।

जगन्नाथ ने रघु को गले लगा लिया, “तुझे अंग्रेजी नहीं आती तो क्या हुआ शेर? तुझे तो वह आता है जो किताबों में नहीं लिखा। तू फिक्र मत कर। आज से मैं तेरा ट्यूटर बनूंगा।” उस रात के बाद सब बदल गया। दिन में स्कूल और रात में जगन्नाथ की पाठशाला। रघु ने जी-तोड़ मेहनत की। 3 साल बीत गए। वह लड़का जो कभी ‘क्रेन’ भी नहीं जानता था, अब अपनी कक्षा में टॉप कर रहा था।

लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन रघु का 10वीं का रिजल्ट आने वाला था, उसी दिन जगन्नाथ के ऑफिस में एक फोन आया जिसने उनके पैरों तले जमीन खिसका दी। फोन हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ा और उसके टुकड़े-टुकड़े हो गए। दूसरी तरफ से आ रही आवाज अभी भी गूंज रही थी, “सेठ जी पुलिस वारंट लेकर आ रही है। सूरजपुर फ्लाई ओवर का एक हिस्सा गिर गया है। इल्जाम हम पर लगा है कि हमने घटिया सामग्री इस्तेमाल की है।”

जगन्नाथ के लिए यह खबर किसी बम धमाके से कम नहीं थी। सूरजपुर फ्लाई ओवर उनका ड्रीम प्रोजेक्ट था। उन्होंने इसमें सबसे बेहतरीन सामग्री लगवाई थी। यह हादसा सिर्फ एक दुर्घटना नहीं बल्कि एक गहरी साजिश थी। सीने में एक तेज दर्द उठा और जगन्नाथ अपनी कुर्सी पर ही लुढ़क गए। उनकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। जिस साम्राज्य को बनाने में उन्होंने पूरी जिंदगी लगा दी थी, वह ताश के पत्तों की तरह बिखर रहा था।

उसी वक्त रघु स्कूल बस से उतरा और बंगले के गेट की तरफ दौड़ा। उसके हाथ में रिजल्ट था और चेहरे पर एक बड़ी मुस्कान। उसने पूरे जिले में टॉप किया था। वह सोच रहा था कि आज बाबूजी कितने खुश होंगे। वह शायद उसे गले लगा लेंगे। शायद उसकी पसंदीदा मिठाई खिलाएंगे। लेकिन गेट पर पहुंचते ही उसके कदम ठिठक गए। वहां पुलिस की गाड़ियां खड़ी थीं। सायरन की लाल नीली बत्तियां माहौल को डरावना बना रही थीं। नौकर चाकर जो कल तक सेठ जी के आगे पीछे घूमते थे, अपना सामान समेट कर पिछले दरवाजे से भाग रहे थे।