जंगल में अकेली लड़की हमीला की दिल दहला देने वाली कहानी 😢 अल्लाह का करिश्मा देखिए

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भाग 1: मेहनत, फिक्र और रिश्तों का बोझ

दिन का वक्त था। एक छोटे से मिट्टी के घर के सहन में मरियम सिलाई मशीन पर बैठी कपड़े सी रही थी। आज उसे गांव की कुछ औरतों के कपड़े मुकम्मल करके देने थे। हर धागे और हर सिलाई के साथ मरियम की आंखों में मेहनत और फिक्र की झलक थी।

कपड़े सिलाई करने के बाद मरियम ने दूध का फीडर बनाया और अपनी एक साल की बच्ची निमरा के मुंह से लगा दिया। मासूम बच्ची ने दूध पिया और खुशी से हंसने लगी। मरियम की आंखों में थोड़ी सी चमक लौट आई।

वो निमरा को झूले में लिटाकर सुलाती है और फिर किचन की तरफ चली जाती है ताकि खाना बना सके। खाना बनाते हुए उसके चेहरे पर गहरी उदासी और परेशानी थी। वो दिमाग में हिसाब लगा रही थी कि इस महीने सिलाई के कितने पैसे बनेंगे, घर के लिए कौन सा राशन खरीदना है।

तभी दरवाजे की आवाज ने उसके ख्यालात तोड़ दिए। असलम अंदर आया, झुंझुलाहट के साथ। वो सीधा चारपाई पर बैठ गया। मरियम ने जल्दी से खाना निकाला और असलम के आगे रख दिया। लेकिन असलम के चेहरे पर गुस्सा साफ नजर आ रहा था।

मरियम ने एक ठंडी सांस भरी और उसके करीब जाकर बैठ गई। कुंडे पर हाथ रखते हुए बोली, “असलम, परेशान क्यों हो? जल्द नौकरी मिल जाएगी तुम्हें। देखो, मैं घर में सिलाई भी कर रही हूं। खर्चा निकल ही आता है। अभी भी गांव के कुछ औरतों के कपड़े सीने हैं। उनसे थोड़ा राशन ले लेंगे।”

लेकिन असलम फौरन भड़क उठा। उसकी आवाज में गुस्से की गरज थी, “तुम अपने पैसों का एहसान जता रही हो मुझ पर? ये कहना चाहती हो कि मैं कुछ नहीं कर सकता?”
फिर उसने गुस्से में आकर खाने की प्लेट को हाथ से मारते हुए कमरे में फेंक दिया।

मरियम की आंखों में दुख और सदमे का तूफान उभर आया। वो सहन में ही चारपाई पर बैठ गई। आंखों में आंसू आ गए थे और दिल दुख से भर गया था। वो उस वक्त चौथे महीने में हामिला थी। लेकिन जिंदगी ने उससे जैसे हर सुकून छीन लिया था।

असलम की मामूली सी नौकरी चंद महीने पहले ही छूट गई थी। अब मरियम सिलाई मशीन का काम संभाल रही थी। उससे इतने पैसे आ जाते थे कि घर का खर्च चल सकता था। लेकिन असलम दिनभर झुंझलाता रहता, कोई खास कोशिश भी नहीं करता था।

मरियम असलम से बेपनाह मोहब्बत करती थी। असलम वो पहला और वाहिद शख्स था जो उसके दिल में बसा था और अब वह उसका शौहर भी था। मगर जिंदगी ने इस बेचारी के लिए सिर्फ मुश्किलात ही रखी थी। दिनभर मेहनत के बावजूद असलम के चेहरे पर ना खुशी होती, ना तारीफ का लफ्ज आता।

भाग 2: बेवफाई और टूटता रिश्ता

गांव की कुछ औरतें सिलाई के कपड़े लेने आई थीं। कपड़े देखने के बाद एक औरत बोली, “कपड़े तो बड़े अच्छे सीए हैं तुमने, मरियम।”
फिर उस औरत ने चंद नोट निकालकर मरियम की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “यह तुम्हारे सिलाई के पैसे हैं।”

मरियम ने नोट देखे तो चेहरे पर मायूसी छा गई। हिचकिचाते हुए बोली, “बाजी, थोड़ी सी सिलाई बढ़ा दें। आप तो जानती हैं कितनी मेहनत लगती है।”

वो औरत फौरन बोली, “अरे, नखरे क्यों कर रही हो? गनीमत जानो कि हम तुमसे सिलवा रहे हैं। अगर किसी और से सिलवा लूं तो क्या करोगी?”

मरियम खामोश हो गई। दिल में एक ठंडी आह भर गई कि किस तरह लोग दूसरों की मजबूरी का फायदा उठाते हैं। उसके दिल में मायूसी और तनहाई की लहर दौड़ गई। लेकिन वह जानती थी कि यह उसकी मेहनत और सब्र का वक्त है।

मरियम सहन में बैठी अपनी एक साल की मासूम बेटी को खाना खिला रही थी। दोनों हंसती मुस्कुराती थीं। असलम सहन में बैठा मोबाइल फोन हाथ में लिए किसी से लगातार टाइपिंग कर रहा था। मरियम ने महसूस किया कि वह इन दिनों कुछ बदल गया था। घर में कम ही नजर आता, चेहरे पर अजीब सी मुस्कुराहट छाई रहती थी। अक्सर किसी ख्यालों में गुम रहता।

मरियम पास गई तो असलम ने मोबाइल फोन जेब में डाल दिया। मरियम ने चंद नोट निकालकर असलम की तरफ बढ़ाते हुए कहा, “असलम, ये सिलाई के कुछ पैसे हैं। रख लो, तुम्हें काम आएंगे।”

असलम ने नोट देखे और लापरवाही से जेब में डालकर घर से बाहर चला गया। मरियम ने ठंडी सांस भरी और घर के कामों में मशगूल हो गई।

आठवां महीना चल रहा था और इतनी मेहनत उसके लिए बहुत मुश्किल थी। लेकिन वो नहीं जानती थी कि जिंदगी ने उसके लिए बड़े ही दुख पहले ही लिख रखे हैं।

"Ek Majboor Hamilah Ladki Jo Jungle Mein Tanha Barish Mein Bheeg Rahi Thi  😢 Rula Dene Wali Kahani"

भाग 3: धोखा और घर से बेदखली

एक दिन मरियम सहन में बैठी अपनी बेटी को खिलाने में मशगूल थी कि दरवाजा खुलकर असलम अंदर दाखिल हुआ। लेकिन उसके साथ एक लड़की भी थी। मरियम की आंखें हैरत से खुल गईं। वो फौरन खड़ी हुई।

लड़की दुल्हन के लिबास में असलम का हाथ थामे घर के अंदर आई थी। मरियम पर जैसे हैरत के पहाड़ टूट पड़े। वो कांपते लहजे में बोली, “असलम, ये लड़की कौन है? किसे घर ले आए हो?”

असलम ने सख्त लहजे में जवाब दिया, “ये मारिया है। मैंने इससे शादी कर ली है। मैं इसे पसंद करता था।”

मरियम को लगा कि एक लम्हे में उसकी दुनिया ही उजड़ गई है। आंखों से आंसू बहने लगे। वो बेयकीनी के आलम में अपने सामने खड़े शौहर को देख रही थी और उस लड़की को, जिसके चेहरे पर मुस्कुराहट थी।

रोते हुए बोली, “असलम, ये तुमने मेरे साथ क्या किया? मेरी वफा, मेरी मुखलिसी का मुझे ये सिला दिया है? तुम ऐसा कैसे कर सकते हो? तुम्हारे घर में औलाद है, सब कुछ था, फिर भी तुमने ये किया?”

असलम चीख कर बोला, “हम दोनों एक-दूसरे से मोहब्बत करने लगे थे। तुम कौन होती हो मुझसे ऐसे सवालात करने वाली?”

मरियम हक्का-बक्का रह गई। वो औरत और असलम दोनों एक-दूसरे का हाथ पकड़े कमरे के अंदर चले गए। मरियम सहन में जमीन पर बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी एक साल की बेटी भी रोने लगी।

मरियम अपनी बेटी को गोद में लिए कमरे में गई और फूट-फूट कर रोने लगी। उसकी वफा, उसकी मुखलिसी सब कुछ उसके मुंह पर मार दिया गया था। वो सोच रही थी कि क्या असलम को कभी एहसास नहीं हुआ कि उसने उसके लिए क्या कुछ किया। सब्र और शुक्र के साथ कभी शिकायत जुबान पर नहीं आई और उसकी ये वफाएं उसे यही सिला दे गई थीं।

भाग 4: बरसात, बेघर और जंगल की तन्हाई

बाहर गांव में बारिश जोर से बरस रही थी। जैसे वो भी मरियम के गम में शरीक हो। तभी जोर से दरवाजा खुला और असलम कमरे में दाखिल हुआ। चेहरे पर शदीद गुस्सा था। वो चीख कर बोला, “मरियम, जब से तुम मेरी जिंदगी में आई हो सब कुछ तबाह हो गया है। तुम्हारी वजह से मारिया मुझसे नाराज हो गई है। कहती है जब तक तुम इस घर से दफा नहीं होगी वो मेरे साथ यहां नहीं रहेगी। बताओ अब मैं क्या करूं? मैं उससे मोहब्बत करता हूं।”

मरियम रोते हुए बोली, “कुछ तो शर्म करो असलम। क्या बकवास कर रहे हो? कहां जाऊंगी मैं इस बरसती बारिश में अपनी बच्ची को लेकर? कुछ सोचा है तुमने? मैं हामिला हूं। तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हूं। मेरा नहीं तो अपनी बेटी का ही ख्याल कर लो।”

लेकिन असलम की आंखों पर अंधी मोहब्बत की पट्टी बंधी हुई थी। उसने मरियम को बाजू से पकड़ा। मरियम की गोद में एक साल की बच्ची भी थी। असलम को उस पर जरा भी रहम नहीं आया। बाजू से पकड़ कर वो उसे घसीटते हुए घर से बाहर ले आया और दरवाजे से बाहर पटक दिया।

जमीन पर गिरी हुई मरियम रोते हुए उस बेहिस इंसान को देखती रही, जो दरवाजा बंद करके चला गया। मरियम को लगा कि सब कुछ खत्म हो गया है। वो फूट-फूट कर रोने लगी। अपने गर्द दुपट्टे को मजबूती से संभाले, गोद में बच्ची को लेकर गांव से बाहर जाने लगी। आंखों से आंसू बह रहे थे और दिल जख्मों से चूर था।

पूरा गांव उस वक्त सन्नाटे में डूबा हुआ था। बारिश बरस रही थी और लोग अपने घरों में दबके हुए थे। मरियम अपनी बेटी को सीने में भी तेज कदमों से आगे बढ़ रही थी। तभी गांव के दो आवारा लड़के उस रास्ते से गुजरे। मरियम को देखकर हंसते हुए बोले, “अरे, कहो तो हम मदद कर देते हैं। तुम्हारी कहां जा रही हो इस बरसती बारिश में?”

मरियम की आंखों में खून उतर आया। वो चीख कर बोली, “मुझे कमजोर बिल्कुल मत समझना। अभी यहां सबको इकट्ठा कर दूंगी।”
लड़के हंसते हुए आगे बढ़ गए। शायद उन्हें मरियम की हालत पर तरस आ गया था।

मरियम भागती हुई वहां से दूर हो गई, जैसे अपनी इज्जत और जान दोनों के लिए खौफजदा थी। चलते-चलते मरियम एक घने जंगल में निकल आई। बारिश जोरों से बरस रही थी। बिजली कड़क रही थी और हर लम्हा ठंडक और खौफ बढ़ा रही थी। मरियम की आंखों से मुसलसल आंसू बह रहे थे और उसकी गोद में बैठी एक साल की बेटी निमरा जोर-जोर से रो रही थी।

अचानक मरियम के पेट में शदीद दर्द की लहर दौड़ी। वो फौरन एक घने दरख्त के नीचे बैठ गई। एक तरफ उसने निमरा को बिठाया, जो बारिश, सर्दी और खौफ की शिद्दत से रोती जा रही थी। मरियम के पेट में दर्द बढ़ता जा रहा था। उसने दोनों हाथ पेट पर रखे और चीख-चीख कर रोना शुरू कर दिया। उस तन्हा जंगल में अल्लाह के सिवा कोई मददगार नहीं था।

भाग 5: अल्लाह का करिश्मा और दर्द का अंजाम

मरियम के पास बस अपने जज्बात और दर्द के आंसू थे। हर लम्हा उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या करें। वो दर्द से तड़प रही थी। आंखें आंसुओं से भीगी हुई थीं और हर सांस के साथ खौफ और बेबसी बढ़ रही थी।

चंद लम्हों बाद मरियम ने एक खूबसूरत बच्चे को जन्म दिया। लेकिन जब उसने बच्चे को गोद में लिया, वो बिल्कुल खामोश था। मरियम फौरन उसका चेहरा थपथपाने लगी। आंखों से आंसू बहने लगे। निढ़ाल सी वो दरख्त के साथ टेक लगाकर अपने बच्चे को झंझोड़ रही थी। उसका बच्चा जो अभी-अभी जिंदगी की शुरुआत कर रहा था, अब ठंडा और मुर्दा था।

मरियम ने उसे सीने से लगाया और फूट-फूट कर रोना शुरू कर दिया। दिल और रूह से वो आसमान की तरफ देखकर फरियाद कर रही थी, “या अल्लाह, मैंने उस शख्स की वजह से अपने मासूम बच्चे को खो दिया।”

उसी लम्हे उसके दिल और रूह में असलम की सारी मोहब्बत घायल हो गई। वो जानती थी कि उस बेहिस इंसान की वजह से उसकी दुनिया ही उजड़ गई थी। वो रोते हुए अपने बच्चे की लाश को सीने से लगाए जंगल की तन्हाई में दर्द और सदमे की शिद्दत में अल्लाह से इंसाफ की दरख्वास्त कर रही थी।

मरियम जानती थी कि असलम शायद कभी उस लम्हे की हकीकत को नहीं समझेगा, लेकिन एक दिन उसे जरूर तलाश करना पड़ेगा। दर-दर की ठोकरें खानी होंगी और शायद उसी लम्हे इंसाफ जरूर मिलेगा। और शायद उसी लम्हे मरियम की आहें अर्श तक चली गई थीं।

भाग 6: असलम की सजा और पछतावा

दूसरी तरफ असलम अपनी बीवी मारिया के साथ खुश था। चंद दिन सुकून से गुजरे, लेकिन जल्द ही मारिया की बेसब्री और मुतालिबात शुरू हो गईं। एक दिन मारिया ने कहा, “असलम कोई मेहनत मजदूरी करो। कब तक तुम घर में बैठोगे?”

असलम ने मजबूर होकर घर से बाहर नौकरी की तलाश में निकलना शुरू किया। दिन भर वो खेतों में मेहनत करता, पसीना बहाता और जो कुछ भी कमाता, वो घर ले आता। लेकिन मारिया कभी भी उससे खुश नहीं होती थी। एक रोज मारिया ने फिर अपनी नाराजगी जाहिर की, “असलम, तुम कोई अच्छी नौकरी क्यों नहीं देखते? इतने कम पैसों में हमारा कैसे गुजारा हो सकता है?”

असलम फौरन बोल पड़ा, “अरे, मरियम तो अपने पैसों से सारा घर का खर्च चला लिया करती थी। मेरी तो कितना अरसा नौकरी नहीं थी। मैं तुम्हें इतने पैसे देता हूं, वो कहां जाते हैं?”

यह सुनना था कि मारिया ने हंगामा खड़ा कर दिया। वो चीख पड़ी, रोने लगी और बोली, “अब वो तो थी ही मनहूस। अब तुम उसके ताने दोगे?”

यह सब सुनकर असलम थोड़ा दब सा गया। लेकिन मारिया की नाराजगी और बेजगह मुतालिबात के आगे वह कुछ ना कर सका। यूं उस घर में मरियम का जिक्र करना भी एक तरह से गुनाह बन गया था।

वक्त का पहिया घूमता रहा। और असलम और मारिया की शादी को पांच साल हो गए। मारिया अभी भी बेऔलाद थी। वो हर वक्त चीखती, चिल्लाती रहती और असलम मुश्किल से उसे बर्दाश्त करता।

घर में हर लम्हा उसके शिकवे, शिकायतें और मुतालिबात की गूंज रहती। वो दोनों दवाइयां आजमा चुके थे, मगर कोई अफाका नहीं हुआ था। असलम दिन-रात परेशान रहने लगा। उसकी सेहत दिन-बदिन कमजोर हो रही थी। वो गधों की तरह मेहनत मजदूरी करता, सिर्फ मारिया की ख्वाहिशें पूरी करने के लिए और यह अब आसान नहीं रहा था।

दिन-रात की मेहनत के बावजूद मारिया के शिकवे और बेऔलादी का दुख उसके दिल पर बार-बार गिरा, उसे टुकड़े-टुकड़े कर रहा था।

भाग 7: पुरानी यादें और पछतावे का बोझ

एक दिन असलम अपने कुछ जरूरी कागजात ढूंढ रहा था। उसके एक दोस्त ने कहा था कि वह उसे बाहर का वीजा लगवा कर देगा। लेकिन कमरे में आकर उसे अपने पुराने कागजात नहीं मिल रहे थे। तभी उसने एक पुराना बक्सा खोला। वो धूल और मिट्टी से अटा हुआ था और अंदर का सामान पुराने जमाने की यादें बिखेर रहा था।

जब उसने बक्सा खोला तो अचानक एक तस्वीर उसके सामने गिर गई। असलम ने तस्वीर उठाई और देखते ही दुनिया जैसे ठहर सी गई। तस्वीर में वो मरियम और उसकी एक साल की बेटी मुस्कुराते हुए खड़े थे। वो लम्हे जब उसकी बेटी सिर्फ एक साल की थी और मरियम अभी भी उसके साथ थी। सब याद आ गए।

असलम तस्वीर को थामे खड़ा रहा। आंखों से आंसू बहने लगे। दिल पर एक भारी बोझ छा गया। वो तस्वीर उसे मरियम की याद दिला रही थी, उसकी वफा, कुर्बानी और वो सब कुछ जो उसने खो दिया था।

तभी मारिया कमरे में आई। उसने देखा कि असलम जमीन पर हाथ पर हाथ रखे तड़प रहा है। आंखों से आंसू बहा रहा है। फौरन उसकी तरफ बढ़ी। मगर तस्वीर को देखकर उसकी आंखों में सख्ती और गुस्सा छा गया।

“तुमने मुझे धोखा दिया। यह उसी औरत की नूसत है कि हमारे यहां औलाद नहीं।”

मारिया को असलम की हालत का जरा भी ख्याल नहीं था। वो चीखती-चिल्लाती वहां से चली गई। असलम ने लम्हों में होश खो दिया। जब उसे होश आया वो कमरे में चारपाई पर पड़ा था और गांव का हकीम बैठा हुआ था।

हकीम ने संजीदगी से जवाब दिया, “मालूम नहीं, गांव के कुछ लोगों ने मुझे खबर दी कि तुम घर में बेहोश पड़े हो। तुम्हें दिल का दौरा पड़ा है। अपना ख्याल रखो। तुम्हारी सेहत बेहद खराब है।”

सुनने में आया है कि तुम्हारी बीवी घर से बाहर चीखती-चिल्लाती जा रही थी और कह रही थी कि मेरे शौहर बड़ा धोखेबाज है। जब गांव वाले यहां आए, तुम बेहोश पड़े थे और मैंने तुम्हारी बीवी को नहीं देखा।

यह सुनकर असलम के हैरत के पहाड़ टूट पड़े। वो फौरन उठकर बैठ गया और लड़खड़ाते कदमों से घर के सहन में आया। लेकिन पूरा घर सन्नाटे में डूबा हुआ था। वो चारपाई पर जाकर सर पकड़ कर बैठ गया।

तभी गांव की एक बूढ़ी औरत आई। संजीदगी से बोली, “असलम बेटा, तुम्हारी बीवी मारिया कह गई थी कि जब तुम्हारा होश आए, तो तुम्हें बता दूं कि मैं हमेशा के लिए यह घर छोड़कर जा रही हूं। मैं मजीद ऐसे गरीब इंसान के साथ नहीं रह सकती जिसने सारी जिंदगी मुझे कुछ भी नहीं दिया।”

बूढ़ी औरत यह पैगाम देकर चली गई। असलम दिल पर हाथ रखे, चारपाई पर ढेर सा हो गया। वो फूट-फूट कर रोने लगा। वक्त ने जैसे उसके मुंह पर तमाचा मार दिया था।

उसके ज़हन में मरियम की वफादारी, कुर्बानियां और वह सब यादें दौड़ने लगीं कि कितने मुश्किल हालात में उसने उसके साथ जिंदगी गुजारी। घर के सारे खर्चे उठाए और कभी शिकायत जुबान पर नहीं लाई। और मारिया जैसी नाशुक्र औरत जिसके लिए उसने मरियम और अपनी मासूम बेटी को घर से निकाला। जिसके लिए वह दिन-रात गधों की तरह काम करता रहा। आज कह गई थी कि असलम ने उसे कुछ भी नहीं दिया।

असलम वक्त के हाथ से निकल जाने का एहसास कर रहा था। अब उसके नसीब में सिर्फ पछतावे ही बचे थे। वो फूट-फूट कर रोता रहा, मरियम के हर लम्हे की तल्खी और अपनी बेबसी के साथ।

भाग 8: अल्लाह का इंसाफ

असलम दिनभर चारपाई पर पड़ा रहता। दिन-बदिन गिरती हुई तबीयत और पछतावों ने उसे बिल्कुल निढाल कर दिया था। लेकिन एक दिन कुछ सोचकर उसने हिम्मत की और घर से बाहर निकल आया। आंखों में आंसू और दिल में एक उम्मीद की चमक थी।

“मरियम कहां गई होगी? मेरी बेटी अब कैसी हो गई होगी? मां बनने वाली थी। ना जाने कहां चली गई होगी।”

वो लाठी का सहारा लेकर मुश्किल से चल रहा था। जैसे उसी के गुनाहों ने उसकी कमर तोड़ रखी हो। चलते-चलते वो एक घने जंगल में पहुंच गया। एक दरख्त के साथ टेक लगाकर बैठ गया और गहरे सांस लेने लगा। आंखों से मुसलसल आंसू बह रहे थे।

अचानक उसके कानों में किसी औरत के रोने की आवाज पड़ी। हैरान होकर वह आवाज के ताखुब में आगे बढ़ा। थोड़ा आगे चलने पर एक मंजर ने उसके कदम जमीन से जकड़ दिए। एक कब्र थी और उसके पास एक औरत बैठी रो रही थी। कब्र शायद किसी मासूम बच्चे की थी।

औरत का चेहरा अभी असलम को नजर नहीं आया था। लेकिन जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ा और उस औरत के चेहरे पर नजर पड़ी, उसकी दुनिया जैसे थम गई। वह औरत कोई और नहीं बल्कि मरियम थी।

जब मरियम ने नजरें उठाकर सामने खड़े असलम को देखा तो उसकी आंखों में नफरत की चमक आ गई। वो फौरन उठ खड़ी हुई। असलम अगले ही लम्हे मरियम के कदमों में गिर गया और रोने लगा।

“खुदा के लिए मरियम, माफ कर दो। मुझे तुम्हारी माफी की तलब है। मुझे माफ कर दो। मैंने बहुत गुनाह किए हैं।”

मरियम गुस्से में उसे देख रही थी। और उसके दिल में उन सालों का दर्द और धोखा अभी भी ताजा था। मरियम चीख कर बोली, “तुम जैसे इंसान को कभी माफी नहीं मिलेगी। तुम कातिल हो अपनी ही मासूम बच्चे के।”

असलम हैरान और परेशान मरियम को देखने लगा। मरियम रोते हुए बोली, “जानते हो ये कब्र किसकी है?” असलम हैरत से सर हिलाने लगा। मरियम ने कहा, “ये मेरे मासूम बच्चे की कब्र है। जिस दिन तुमने मुझे घर से निकाला, ये मासूम दुनिया में आया। लेकिन मैंने उसे अपने हाथों से यहां दफन किया है। बताओ किस चीज की माफी दूं मैं तुम्हें? इस बात की कि तुमने मुझे घर से निकाल दिया? इस बात की कि मैं अपनी मासूम बच्ची के साथ दर-दर की ठोकरें खाती रही या फिर इस बात की कि तुम्हारी वजह से मैंने अपने मासूम बच्चे को खो दिया। बताओ किस बात की माफी दूं?”

असलम का चेहरा शर्मिंदगीगी से झुक गया। दिल जैसे गम से फटने लगा। मरियम चीखते हुए बोली, “मैं और मेरी बेटी अपनी जिंदगी में आगे बढ़ चुके हैं। दोबारा मुझे अपनी शक्ल मत दिखाना। मैंने कहा था कि अल्लाह इंसाफ जरूर करेगा और इसी मुकाम पर अल्लाह तुम्हें जरूर लेकर आएगा। यही तुम्हारी जिंदगी है। अब तुम यही जिल्लत की जिंदगी गुजारोगे और इसी जंगल में खाक छानते फिरोगे। तुम्हारे लिए मेरे पास कोई माफी नहीं है।”

मरियम रोते हुए वहां से पलट गई। असलम वहीं कब्र के पास बैठा रह गया। आंखें पथरा गई थीं। दिल जैसे गम से फटने लगा। वो चीख-चीख कर रोने लगा। कब्र के ऊपर हाथ फेरता और कहता, “मेरे मासूम बच्चे, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारा गुनहगार हूं। मैं कातिल हूं।”

वो रो रहा था, मगर उसके नसीब में कोई माफी नहीं थी। असलम वहीं पड़ा रहता। कभी कब्र से बातें करता तो कभी माफी मांगता। धीरे-धीरे लोग मशहूर करने लगे कि जंगल में एक पागल रहता है। एक कब्र के पास बैठा रहता है और बस यही कहता है, “मुझे माफ कर दो। मैं कातिल हूं।”

एक रोज लोगों को असलम के दरख्त के पास एक लाश भी मिली। बदबू में डूबी हुई, लोगों ने मुश्किल से एक गड्ढा खोदा और उसे दफन कर दिया।

भाग 9: सबक और अल्लाह का करिश्मा

शायद यही अंजाम होता है उन लोगों का, जो अपने मखलिस रिश्तों की कदर नहीं करते। जो गरूर और ताकत के नशे में जुल्म की इंतहा कर देते हैं। मगर भूल जाते हैं कि अल्लाह की लाठी बे आवाज है। और जब अल्लाह की पकड़ आती है तो बड़े-बड़े अकलमंद भी ठिकाने आ जाते हैं।

मरियम ने अपनी बेटी के साथ नई जिंदगी शुरू की। उसने सब्र, मेहनत और अल्लाह पर भरोसा रखा। उसकी दुआओं ने उसे मुश्किलों से निकाल दिया। वक्त ने उसे नई राहें दीं, और उसकी बेटी निमरा एक दिन उसकी मेहनत और सब्र की मिसाल बन गई।

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