जब एक अकेला फौजी भीड़ गया पुलिस वाले से फिर जो फौजी ने किया सब हैरान।
.
.
.
जब एक अकेला फौजी भिड़ गया पुलिस वालों से
और फिर जो हुआ, उसने पूरे सिस्टम को हिला दिया
सालों बाद वह दिन आया था।
मेजर विक्रम प्रताप सिंह की बाइक राष्ट्रीय राजमार्ग पर दौड़ रही थी, लेकिन उनका मन उससे भी तेज़ दौड़ रहा था—घर की ओर।
आज कोई ऑपरेशन नहीं था।
आज कोई गोलियों की आवाज़ नहीं थी।
आज सिर्फ एक फौजी था, जो अपने परिवार के पास लौट रहा था।
“आज तो सालों बाद घर जा रहा हूँ,” उन्होंने खुद से कहा।
“मां… पत्नी… बच्चे… सब कितना खुश होंगे।”
हेलमेट उन्होंने जल्दबाज़ी में घर पर ही छोड़ दिया था।
मन में सिर्फ एक ही बात थी—
मां के हाथ का खाना।
वह दृश्य उनकी आंखों के सामने घूम गया—
मां चौखट पर खड़ी होंगी।
पत्नी की आंखों में इंतज़ार होगा।
बच्चे दौड़ते हुए उनसे लिपट जाएंगे।
और बापू…
बापू उन्हें देखकर शायद कुछ न कहें, लेकिन आंखें भर आएंगी।
उन्हीं आंखों ने तो उन्हें यहां तक पहुंचाया था।

उधर, दूसरी तरफ, सड़क के किनारे एक सरकारी जीप खड़ी थी।
दरोगा शुक्ला सीट पर पसरकर बैठे थे।
चेहरे पर वही पुरानी मुस्कान।
जेबें आज कुछ ज़्यादा ही भारी लग रही थीं।
“आज तो दरोगा जी बहुत खुश लग रहे हैं,” कांस्टेबल पांडे ने हँसते हुए कहा।
“लगता है कोई बड़ा मुर्गा फँसेगा।”
दरोगा ने तिरछी नज़र से देखा।
“हर दिन कोई न कोई फँसता है, पांडे,”
“बस फर्क इतना है कि आज किसकी जेब कटेगी।”
उसी पल उनकी नजर सड़क पर दौड़ती एक बाइक पर पड़ी।
“साहब, देखिए आगे कौन है?”
“फौजी लगता है।”
दरोगा की आंखों में चमक आ गई।
“अच्छा?”
“सुना है ये फौजी खुद को हीरो समझते हैं।”
“चलो… देखते हैं कितनी हिम्मत है।”
“ओए फौजी! कहां भागा जा रहा है?”
“रोक इसको!”
बाइक रोकी गई।
विक्रम ने संयम से कहा—
“साहब, यूनिट से ज़रूरी कॉल आया है। तुरंत ड्यूटी पर पहुँचना है। बॉर्डर पर हालात बिगड़े हुए हैं।”
दरोगा हँसा।
“ड्यूटी तेरे घर में होगी।”
“ये सड़क तेरे बाप की है?”
“और हेलमेट? तेरा बाप पहनेगा?”
“साहब, जल्दबाज़ी में घर भूल गया,” विक्रम ने शांत स्वर में कहा।
“मामला देश की सुरक्षा का है।”
लेकिन सत्ता के नशे में डूबे लोग तर्क नहीं सुनते।
“ज्यादा जुबान लड़ाता है,” दरोगा ने दाँत पीसे।
“अमित, गाड़ी भगा। आगे चेक पोस्ट पर देखते हैं इसको।”
“आज इसकी वर्दी उतार के ही दम लूँगा,” उसने बुदबुदाया।
उधर विक्रम को घर पहुँचने की जल्दी थी।
मां की आवाज़ फोन पर गूँजी थी—
“बेटा, कब आएगा?”
और वह आ चुके थे।
घर की चौखट पर मां खड़ी थीं।
“बेटा तू आ गया?”
“हां मां,”
विक्रम की आवाज़ भर आई।
सब वैसा ही था।
दीवारें।
आंगन।
वही पुरानी यादें।
“खाना खाया?”
“नहीं मां… तेरे हाथ का खाने के लिए भूख बचा रखी थी।”
मां मुस्कुरा दीं।
“कहीं भी चले जाओ बेटा,”
“मां के हाथ का खाना कहीं नहीं मिलता।”
थाली परोसी गई।
खाना सादा था।
लेकिन उसमें जो प्यार था—
वह किसी मेस, किसी होटल में नहीं मिल सकता।
“कैसा बना है?”
“मां… तेरे हाथों का कोई मुकाबला नहीं।”
हंसी गूँजी।
तभी फोन बजा।
“जय हिंद, सर।”
“विक्रम, अभी कहां हो?”
“सर, घर पहुँचा था… नाश्ता कर रहा हूँ।”
“इसी वक्त ड्यूटी पर पहुँचना होगा। क्या निकल सकते हो?”
एक पल की चुप्पी।
“यस सर। जय हिंद।”
फोन कट गया।
मां की आंखों में सवाल थे।
“बेटा, अभी तो आया था…”
विक्रम ने उनका हाथ थामा।
“मां… भारत मां भी बुला रही है।”
मां ने कांपते हाथों से आशीर्वाद दिया।
“जा बेटा… विजय हो।”
विक्रम बाइक स्टार्ट कर चुके थे।
लेकिन किस्मत का खेल अभी बाकी था।
वही पुलिस जीप।
वही दरोगा।
वही अहंकार।
“रुक जा फौजी!”
इस बार स्वर में ज़हर था।
“अब चला बहुत हीरो बन रहा था?”
“चाबी दे।”
“आप ऐसा नहीं कर सकते,” विक्रम बोले।
“मैं देश की सेवा में हूँ।”
“यहां हम राजा हैं!”
“हमारा राज चलता है।”
हाथ उठे।
धक्का दिया गया।
वर्दी को खींचा गया।
भीड़ जमा होने लगी।
“अरे ये पुलिस वाले फौजी को मार रहे हैं!”
किसी ने वीडियो निकाल लिया।
किसी ने चिल्लाया—
“डीएसपी साहब को बुलाओ!”
कुछ ही देर में सायरन गूँजा।
डीएसपी घटनास्थल पर पहुंचे।
“क्या हो रहा है यहां?”
“साहब, ये तेज़ ड्राइविंग कर रहा था,” दरोगा बोला।
“हेलमेट नहीं था।”
“इसने हमारे ऊपर बंदूक तानी।”
डीएसपी ने शांत स्वर में कहा—
“मैंने पूरी वीडियो देखी है।”
भीड़ सन्न रह गई।
“बंदूक तब तानी गई,” डीएसपी बोले,
“जब तुमने बदतमीज़ी की।”
“बस।”
“एक शब्द और नहीं।”
“तुम्हें अभी और इसी वक्त सस्पेंड किया जाता है।”
“हथकड़ी लगाओ।”
दरोगा का चेहरा उतर गया।
वह, जो रोज़ लोगों से वसूली करता था,
आज भीगी बिल्ली बना खड़ा था।
डीएसपी ने विक्रम की ओर देखा।
“देश तुम्हारे जैसे सिपाहियों की वजह से सुरक्षित है।”
“तुम्हें सलाम।”
भीड़ तालियों से गूँज उठी।
बाद में स्पष्ट किया गया—
यह कहानी काल्पनिक है।
मनोरंजन और संदेश के उद्देश्य से बनाई गई है।
लेकिन जो संदेश था—
वह बहुत सच्चा था।
क्योंकि…
वर्दी चाहे किसी की भी हो,
अहंकार से बड़ी नहीं होती।
और जब एक अकेला फौजी सच के साथ खड़ा होता है—
तो पूरा सिस्टम हिल सकता है।
समाप्त
News
2 साल बाद बेटी आर्मी Officer बनकर लौटी तो, बूढ़ी माँ बस स्टैंड पर भीख मांग रही थी — फिर आगे जो हुआ..
2 साल बाद बेटी आर्मी Officer बनकर लौटी तो, बूढ़ी माँ बस स्टैंड पर भीख मांग रही थी — फिर…
गुरुद्वारे से नकली सिख निकाल रहे थे, पोस्टरों पर सिखों का जुलूस निकाला जा रहा था, देखिए गुरुद्वारे से भागा बड़ा चोर, पकड़ा गया
गुरुद्वारे से नकली सिख निकाल रहे थे, पोस्टरों पर सिखों का जुलूस निकाला जा रहा था, देखिए गुरुद्वारे से भागा…
बिन मां के 3 बच्चे और एक आया: फौजी पिता ने CCTV में क्या देखा?
बिन मां के 3 बच्चे और एक आया: फौजी पिता ने CCTV में क्या देखा?. . . . बिन माँ…
MGA SALOT NA NAKA-UNIPORME: PULIS NA NAG-AAMOK SA LIBOG, PINATAUB NG “DIWATANG” SPECIAL FORCES! 6 NA KULAPOL, BULAGTA SA KAHIHIYAN!
MGA SALOT NA NAKA-UNIPORME: PULIS NA NAG-AAMOK SA LIBOG, PINATAUB NG “DIWATANG” SPECIAL FORCES! 6 NA KULAPOL, BULAGTA SA KAHIHIYAN!…
Ininsulto ng Waiter ang Anak ni Manny Pacquiao — Hindi Niya Alam na Siya ang May-ari ng Restawran
Ininsulto ng Waiter ang Anak ni Manny Pacquiao — Hindi Niya Alam na Siya ang May-ari ng Restawran Sa isang…
Pamagat: “Bastos, abusado, at walang takot: Ilegal na checkpoint! Estudyanteng sinampal, galit ng bayan sumiklab—pulis dinakip, buong sistema nilantad!”
Pamagat: “Bastos, abusado, at walang takot: Ilegal na checkpoint! Estudyanteng sinampal, galit ng bayan sumiklab—pulis dinakip, buong sistema nilantad!” Sa…
End of content
No more pages to load






