जब कचरा बिनने वाला चिल्लाया- पापा गाड़ी रोको माँ मर जाएगी फिर जो हुआ…Aarzoo Voice
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जब कचरा बिनने वाला चिल्लाया—पापा, गाड़ी रोको, माँ मर जाएगी… फिर जो हुआ…
प्रस्तावना
जयपुर के चांदपोल बाजार की गलियों में, जहां हर सुबह हजारों लोग अपने-अपने काम-धंधे के लिए निकलते हैं, वहीं एक टूटी-फूटी झुग्गी में निकिता अपने 13 साल के बेटे रोहन के साथ रहती थी। दोनों की जिंदगी एक चौराहे पर लगने वाले कचौड़ी के ठेले से चलती थी। सुबह 4 बजे उठकर निकिता आटा गूंथती, मसाला तैयार करती और रोहन उसकी मदद में जुट जाता। 6 बजे तक वे चौराहे पर पहुंच जाते और ठेला लगा लेते। गर्म कचौड़ियां और छोले भटूरे की खुशबू से चौराहा महक उठता।
₹10 की एक कचौड़ी, ₹20 के दो, ₹50 की प्लेट भटूरे की। रोहन ग्राहकों को आवाज लगाता, प्लेटें परोसता, पैसे संभालता। उसके हाथ तेल से चिकने रहते, कपड़े पुराने और फटे लेकिन आंखों में अपनी मां के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा था।
संघर्ष की शुरुआत
निकिता की तबीयत कुछ महीनों से लगातार बिगड़ती जा रही थी। सीने में दर्द, सांस लेने में तकलीफ, कभी-कभी चक्कर आ जाते। डॉक्टर ने जांच के बाद बताया था कि दिल की बीमारी है। ऑपरेशन की जरूरत पड़ेगी और खर्चा ₹1 लाख से ऊपर होगा। निकिता ने रोहन को कुछ नहीं बताया था, लेकिन रोहन समझ गया था। वह देखता था कैसे उसकी मां रात में छुपकर दर्द से कराहती, दवाइयां छुपाती, मुस्कुराने की कोशिश करती।
रोहन ने ठान लिया था कि वह किसी तरह पैसे इकट्ठे करेगा। सुबह ठेले पर काम करता, दोपहर में पास की दुकानों पर सामान ढोने का काम करता, शाम को फिर ठेले पर लौट आता। रात में जब निकिता सो जाती तो रोहन होटलों में बर्तन धोने चला जाता। 3-4 घंटे की नींद में ही उसका काम चल रहा था। निकिता को जब पता चला तो उसने रोहन को बहुत समझाया, लेकिन रोहन नहीं माना। उसने कहा था—”मां, तुम्हारे इलाज के लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं।”
अतीत की परछाई
निकिता की आंखों में आंसू आ गए थे। वह सोचती थी कैसे उसकी जिंदगी यहां तक आ गई। कुछ साल पहले तक वह राहुल मेहता की पत्नी थी, जो शहर के नामी बिजनेसमैन थे। बड़ा घर, गाड़ियां, नौकर-चाकर सब कुछ था। रोहन 3 साल का था जब राहुल और निकिता के बीच बातों-बातों में झगड़ा शुरू हुआ। राहुल का बिजनेस में ध्यान ज्यादा रहता, घर की तरफ कम। निकिता को लगता कि वह और रोहन उपेक्षित हो रहे हैं। छोटी-छोटी बातों पर तकरार होने लगी। एक दिन झगड़ा इतना बढ़ गया कि दोनों ने तलाक लेने का फैसला कर लिया।
मामला कोर्ट में गया। राहुल ने अपने वकीलों की पूरी फौज लगा दी। लेकिन कोर्ट ने फैसला निकिता के हक में दिया। 3 साल का बच्चा मां के साथ रहेगा, यह तय हुआ। राहुल टूट गया। उसने निकिता से गुजारा भत्ता देने की बात की, लेकिन गुस्से में निकिता ने मना कर दिया। उसने कहा, “मुझे तुम्हारे पैसों की जरूरत नहीं। मैं अपने बेटे को खुद पाल लूंगी।” राहुल ने समझाने की कोशिश की, लेकिन निकिता अपनी बात पर अड़ी रही। राहुल दिल्ली चला गया और वहां से अपना बिजनेस संभालने लगा।
फिर संघर्ष की राह
निकिता शुरू में अपने मायके चली गई, लेकिन वहां भी ज्यादा दिन नहीं टिकी। भाई-भाभी के ताने सुनने पड़ते। उसने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और छोटे-मोटे काम करके गुजारा चलाने लगी। रोहन धीरे-धीरे बड़ा होता गया। स्कूल में दाखिला हुआ, लेकिन पैसों की तंगी की वजह से पढ़ाई छूट गई। निकिता ने कोशिश की, लेकिन हालात ने साथ नहीं दिया।
फिर एक दिन निकिता ने ठेला लगाने का फैसला किया। उसे कचौड़ी बनानी अच्छी तरह आती थी। घर में भी बनाती थी। उसने सोचा—क्यों ना यही काम शुरू किया जाए। थोड़े पैसे जोड़कर उसने एक पुराना ठेला खरीदा और चौराहे पर कचौड़ी बेचने लगी। शुरू में बहुत मुश्किल हुई। लोग तरह-तरह की बातें करते—कोई कहता यह पढ़ी-लिखी औरत ठेला क्यों लगा रही है, कोई कहता पति ने छोड़ दिया होगा इसलिए। निकिता सब कुछ सुनती और चुप रहती। उसे बस अपने बेटे की परवाह थी।
धीरे-धीरे उसकी कचौड़ियां मशहूर होने लगीं। लोग स्वाद की तारीफ करते, ग्राहक बढ़ने लगे। रोहन भी बड़ा हो गया था और मां का पूरा साथ देता था। दोनों मिलकर मेहनत करते और किसी तरह दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो जाता।

पुलिस का आतंक
लेकिन मुसीबतें यहीं खत्म नहीं हुईं। चौराहे पर रोज सुबह-शाम पुलिस की गश्त लगती थी। रविकांत, राजमोहन, रजनीश, राजीव, रमन—पांच कांस्टेबल थे जो इस इलाके में तैनात थे। शुरू में वे भी ग्राहक बनकर आते और कचौड़ी खाते, पैसे भी देते थे। लेकिन फिर धीरे-धीरे उनका रवैया बदलने लगा।
एक दिन रविकांत ने कहा, “अरे भाई, हम तो रोज आते हैं तुम्हारे यहां। थोड़ी छूट तो मिलनी चाहिए।”
निकिता ने मुस्कुरा कर कहा, “साहब, जो भाव है वही लगता है सबको।”
रविकांत चिढ़ गया। उसने कहा, “देखो ज्यादा अकड़ मत दिखाओ। हम चाहे तो तुम्हारा ठेला यहां से हटवा सकते हैं।”
निकिता डर गई। लेकिन रोहन ने बीच में कहा, “साहब, हम कोई गलत काम नहीं कर रहे। हमारा लाइसेंस भी है।”
राजमोहन ने रोहन की तरफ देखा और बोला, “छोकरा बड़ों के बीच में बोलता है? चुप रह, वरना थप्पड़ मार दूंगा।”
रोहन चुप हो गया। निकिता ने कहा, “साहब, आप लोग आइए, कचौड़ी खाइए। मैं जितना कम कर सकती हूं, करूंगी।”
उस दिन के बाद पुलिस वाले रोज आने लगे। कभी ₹10 में तीन कचौड़ी मांगते, कभी 50 की प्लेट में सिर्फ ₹20 देते। निकिता मना नहीं कर पाती क्योंकि उसे डर था कि कहीं यह लोग उसका ठेला ना हटवा दें।
फिर धीरे-धीरे पुलिस वाले और बेशर्म होते गए। अब वे बिना पैसे दिए ही चले जाते। निकिता कुछ कहती तो रविकांत कहता, “अरे कल दे देंगे, इतनी जल्दी क्या है?” लेकिन ‘कल’ कभी नहीं आता।
एक हफ्ते में चार-पांच बार वे आते और मुफ्त में खाकर चले जाते। रोहन को बहुत गुस्सा आता। वह कहता, “मां, इनको साफ मना कर दो।”
लेकिन निकिता डरी हुई थी। वह कहती, “बेटा, छोड़ दे, हम गरीब लोग हैं, उनसे लड़ नहीं सकते।”
रोहन समझ नहीं पाता था कि यह कैसा इंसाफ है—पुलिस वाले जो लोगों की मदद करने के लिए होते हैं, वही गरीबों को लूट रहे हैं।
जुल्म की हद
एक दिन की बात है। रविकांत, राजमोहन और रजनीश तीनों जीप से उतरे और ठेले के पास आए।
रविकांत ने कहा, “आज भूख बहुत लगी है। जल्दी से पांच-पांच कचौड़ी लगाओ और हां, चटनी ज्यादा देना।”
निकिता ने झट से प्लेटें तैयार की और सामने रख दी। तीनों ने मजे से खाया और फिर जीप की तरफ बढ़ने लगे।
रोहन ने हिम्मत करके कहा, “साहब, पैसे दीजिए।”
रविकांत रुका, मुड़ा और रोहन की तरफ देखा।
“क्या कहा तूने?”
“साहब, आपने कचौड़ी खाई है, पैसे दे दीजिए।”
रविकांत ने जोर से ठहाका लगाया। राजमोहन और रजनीश भी हंसने लगे।
“अबे छोकरे, हमसे पैसे मांग रहा है?”
“साहब, मेरी मां बीमार है। उनकी दवाई के पैसे चाहिए। आप लोग रोज आते हैं और बिना पैसे दिए चले जाते हैं।”
रविकांत का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। उसने रोहन के गाल पर जोर से थप्पड़ जड़ दिया। रोहन लड़खड़ा कर जमीन पर गिर गया।
निकिता दौड़ी और रोहन को उठाने लगी। वह रोते हुए बोली, “साहब, माफ कर दीजिए। यह बच्चा है, गलती हो गई।”
रविकांत ने कहा, “गलती हो गई? तुम लोगों को शऊर नहीं है कि किससे बात कर रहे हो। हम पुलिस हैं। हम चाहे तो तुम्हें अभी थाने ले जाएं।”
निकिता हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। “साहब, प्लीज हमें माफ कर दीजिए। हम गरीब लोग हैं।”
राजमोहन ने कहा, “चल अब जल्दी से फिर से कचौड़ी लगा और इस बार चटनी का कटोरा भी दे।”
निकिता ने कांपते हाथों से फिर से कचौड़ी तैयार की और चटनी का कटोरा लेकर आई।
रविकांत ने कटोरा लिया और कचौड़ी में चटनी डालने लगा। तभी अचानक निकिता का हाथ कांपा और चटनी का कुछ हिस्सा रविकांत की खाकी वर्दी पर गिर गया।
रविकांत ने जोर से चीख लगाई, “देख क्या किया तूने?”
उसने निकिता के गाल पर जोर से थप्पड़ मारा। निकिता चक्कर खाकर गिर गई।
रोहन चिल्लाया, “मां!” और उनकी तरफ दौड़ा।
रविकांत ने कहा, “यह जानबूझकर किया है इसने। हमने पैसे नहीं दिए, इसलिए यह बदला ले रही है।”
निकिता रोते हुए बोली, “नहीं साहब, मेरे हाथ से गलती से गिर गई। मैं जानबूझकर नहीं की।”
राजमोहन ने कहा, “चुप कर।” उसने ठेले को धक्का दिया। कचौड़ियां और छोले की कढ़ाई जमीन पर गिर गई। रजनीश ने प्लेटें फेंक दीं। सारा सामान बिखर गया।
रोहन चिल्लाया, “मत करो ऐसा। यह हमारी रोजी-रोटी है।”
रविकांत ने रोहन को भी धक्का दिया और बोला, “चुप रह नहीं तो तुझे भी थाने में बंद कर दूंगा।”
चारों तरफ भीड़ जमा हो गई। लोग खड़े होकर देख रहे थे, लेकिन किसी ने कुछ नहीं कहा। सब डरे हुए थे—पुलिस से कौन पंगा ले?
रविकांत, राजमोहन और रजनीश जीप में बैठे और चले गए।
निकिता और रोहन जमीन पर बैठे रो रहे थे। सारा सामान बर्बाद हो गया था। भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी। कुछ लोगों ने सहानुभूति जताई, लेकिन कोई मदद नहीं की।
न्याय की उम्मीद
रोहन ने बिखरा हुआ सामान समेटना शुरू किया।
निकिता ने कहा, “अब हम ठेला नहीं लगाएंगे।”
उस दिन का कमाया हुआ सब कुछ बर्बाद हो गया।
रात में जब दोनों झुग्गी में लौटे तो निकिता ने रोहन का हाथ पकड़ा और कहा, “बेटा, मुझे कुछ हो जाए तो…”
रोहन ने उसके होठों पर उंगली रख दी और बोला, “मां, ऐसा कुछ नहीं होगा। मैं हूं ना।”
निकिता की आंखों में आंसू आ गए।
उधर चौराहे पर संदीप नाम का एक वकील रोज सुबह कचौड़ी खाने आता था। वह हाई कोर्ट का जाना-माना वकील था। उसे निकिता की बनाई कचौड़ी बहुत पसंद थी। पिछले 2 सालों से वह रोज आता था। उसने देखा था कैसे निकिता और रोहन मेहनत से काम करते थे। उसे दोनों से हमदर्दी थी। लेकिन आज जब वह चौराहे पर पहुंचा तो ठेला नहीं था। उसे हैरानी हुई। ऐसा पहली बार हुआ था।
उसने आसपास के लोगों से पूछा, “वह औरत और लड़का कहां है जो यहां कचौड़ी बेचते थे?”
एक दुकानदार ने बताया, “कुछ दिन पहले पुलिस वालों ने उनको बहुत मारा था और उनका सारा सामान फेंक दिया था। तब से वे यहां नहीं आए।”
संदीप का खून खौल गया। उसने पूछा, “पुलिस वालों ने ऐसा क्यों किया?”
दुकानदार ने बताया, “पुलिस वाले रोज आते थे और मुफ्त में खाना खाते थे। एक दिन उस औरत के हाथ से गलती से चटनी एक पुलिस वाले की वर्दी पर गिर गई। बस उसके बाद उन्होंने बहुत मारा।”
संदीप ने पूछा, “क्या किसी ने वीडियो बनाई थी?”
दुकानदार ने कहा, “मुझे नहीं पता।”
संदीप ने और लोगों से पूछा। सब कहते थे कि हां, हमने देखा था लेकिन किसी के पास वीडियो नहीं थी। संदीप निराश हो गया। उसने सोचा—अगर कोई सबूत नहीं है तो केस कैसे लड़ेगा?
वह वापस जाने लगा। तभी एक आदमी उसके पास आया और बोला, “साहब, आप कुछ पूछ रहे थे?”
“हां, मैं उस औरत और लड़के के बारे में जानना चाहता हूं जो यहां कचौड़ी बेचते थे।”
“साहब, मेरे पास उस दिन की वीडियो है।”
संदीप की आंखें चमक उठीं। “सच?”
“हां साहब, मैं यहीं पास में रहता हूं। उस दिन मैं अपनी छत पर खड़ा था और मैंने सब कुछ देखा। मैंने अपने मोबाइल से वीडियो बना ली थी।”
“मुझे वह वीडियो दिखाओ।”
आदमी संदीप को अपने घर ले गया और मोबाइल निकाल कर वीडियो दिखाई।
वीडियो में साफ दिख रहा था कि कैसे पुलिस वाले बिना पैसे दिए कचौड़ी खा रहे थे। कैसे रविकांत ने रोहन को थप्पड़ मारा। कैसे निकिता के हाथ से चटनी गिरी। कैसे पुलिस वालों ने उसे मारा और ठेला फेंक दिया। वीडियो में आवाज भी रिकॉर्ड थी। रविकांत कह रहा था, “नहीं देंगे हम तेरे पैसे। क्या कर लेगी बता?”
संदीप ने आदमी से कहा, “यह वीडियो मुझे भेज दो।”
आदमी ने वीडियो संदीप के नंबर पर भेज दी।
संदीप ने तुरंत फैसला किया कि वह इन पुलिस वालों के खिलाफ केस लड़ेगा। उसने वीडियो को सोशल मीडिया पर डाल दिया और साथ में लिखा—”यह हैं हमारे रक्षक, जो गरीबों को लूटते हैं, मारते हैं और उनकी रोजीरोटी छीन लेते हैं। इन पुलिस वालों के खिलाफ मैं केस दर्ज कर रहा हूं।”
सिस्टम में हलचल
वीडियो रातों-रात वायरल हो गई। लाखों लोगों ने देखा, हर जगह चर्चा होने लगी। मीडिया ने भी उठाया। न्यूज़ चैनलों पर बहस होने लगी। लोग पुलिस की आलोचना करने लगे। पुलिस विभाग में हड़कंप मच गया।
संदीप ने कोर्ट में केस दर्ज करवा दिया। रविकांत, राजमोहन, रजनीश, राजीव, रमन, अनिल, आशीष, नवीन, प्रदीप और मनोज—सभी के खिलाफ केस हुआ। पुलिस विभाग ने सभी को सस्पेंड कर दिया। मीडिया में इतनी चर्चा थी कि कोई भी वकील इन पुलिस वालों का केस लड़ने को तैयार नहीं था। सब डर रहे थे कि अगर उन्होंने इनका केस लिया तो जनता का गुस्सा उन पर भी फूटेगा।
मां की जिंदगी की लड़ाई
एक दिन निकिता की तबीयत और बिगड़ गई। उसे तेज बुखार आ गया और सांस लेने में बहुत तकलीफ होने लगी। रोहन उसे फिर से डॉक्टर के पास ले गया। डॉक्टर ने चेतावनी दी कि अब और देर नहीं की जा सकती। फौरन ऑपरेशन करना होगा, वरना खतरा बढ़ जाएगा।
रोहन ने कहा, “डॉक्टर साहब, बस कुछ दिन और, मैं पैसे का इंतजाम कर रहा हूं।”
डॉक्टर ने सख्ती से कहा, “देखो बेटा, मैं समझता हूं तुम्हारी मजबूरी, लेकिन मरीज की जान ज्यादा जरूरी है। अगर एक हफ्ते में इंतजाम नहीं हुआ तो मैं जिम्मेदार नहीं रहूंगा।”
रोहन के सामने अंधेरा छा गया। एक हफ्ता—सिर्फ एक हफ्ता। वह कहां से इतने पैसे लाएगा?
इतने में निकिता ने उसे अपने पास बुलाया। उसने कमजोर आवाज में कहा, “रोहन, मुझे तुमसे कुछ बात करनी है।”
रोहन बैठ गया। निकिता ने अपने तकिए के नीचे से एक पुरानी फोटो निकाली। उसमें तीन लोग थे—एक छोटा सा बच्चा, एक औरत और एक आदमी।
रोहन ने ध्यान से देखा, बच्चा तो शायद वह खुद था, औरत उसकी मां। लेकिन यह आदमी कौन था?
निकिता ने कहा, “बेटा, यह तुम्हारे पापा हैं।”
रोहन चौंक गया। “क्या?”
निकिता ने सारी कहानी सुनाई—कैसे वह और राहुल मेहता शादीशुदा थे, कैसे रोहन का जन्म हुआ, कैसे झगड़े हुए और कैसे तलाक हो गया। रोहन सब सुनता रहा। उसे विश्वास नहीं हो रहा था।
निकिता ने कहा, “बेटा, तुम्हारे पापा बहुत अमीर हैं। वह अब जयपुर में ही रहते हैं। अखबारों में उनकी फोटो छपती रहती है। वह शहर के सबसे बड़े बिजनेसमैन हैं।”
“तो आपने मुझे पहले क्यों नहीं बताया?”
“मैं नहीं चाहती थी कि तुम उनके पास जाओ। मेरी और उनकी अलग हो गई थी, लेकिन तुम मेरे बेटे हो। मैं तुम्हें खुद पालना चाहती थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। मुझे नहीं पता कि मैं कितने दिन और जिंदा रहूंगी। अगर मुझे कुछ हो जाता है तो तुम उनके पास चले जाना। वह तुम्हारे पिता हैं, तुम्हें संभाल लेंगे।”
रोहन की आंखों में आंसू आ गए। “मां, ऐसा कुछ नहीं होगा। मैं आपको कुछ नहीं होने दूंगा। मैं पैसे का इंतजाम कर लूंगा।”
निकिता ने कहा, “बेटा, मुझसे वादा करो कि अगर मुझे कुछ हो जाता है तो तुम अपने पिता के पास चले जाओगे।”
रोहन ने सिर हिलाया और कहा, “हां मां, मैं वादा करता हूं। लेकिन आपको कुछ नहीं होगा।”
निकिता ने फोटो रोहन के हाथ में रख दी और कहा, “इसे संभाल कर रखना।”
रोहन ने फोटो को अपनी जेब में रख लिया।
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