जब जवान पत्नी और सौतेला बेटा मिलकर धोखा देते हैं, तब कबाड़ बीनने वाली बच्ची अरबपति की रक्षक बनती है

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“कचरे के ढेर से अरबपति की रक्षक बनी अनाथ बच्ची”

अंधेरी रात और एक खौफनाक मंजर

मुंबई के बाहरी इलाके में एक मूसलाधार बारिश वाली रात थी। कचरे के मैदान के पास की गली, जो पहले ही वीरान और डरावनी लगती थी, उस रात और भी सन्नाटे में डूबी हुई थी। सड़क पर पीली रोशनी पानी के गड्ढों पर पड़ रही थी, और कुछ आवारा कुत्ते खाने के टुकड़ों के लिए लड़ रहे थे।

उस वीरान माहौल में, एक आठ साल की बच्ची, आद्या, कचरे के ढेर में झुकी हुई थी। फटे पुराने कपड़े पहने, नंगे पैर, और कमर पर एक पुरानी बोरी लटकाए हुए, वह प्लास्टिक की बोतलें और खाली डिब्बे बीन रही थी। उसका चेहरा गंदगी से सना हुआ था, लेकिन उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में भूख और मजबूरी की झलक साफ दिख रही थी।

तभी, उसने एक अजीब सी आवाज सुनी। वह आवाज कचरे के ढेर के पास खड़ी एक पुरानी ट्रक जैसी गाड़ी से आ रही थी। यह आवाज किसी के दर्द भरे कराहने की थी। आद्या ठिठक गई। उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।

“यह आवाज कैसी है? कहीं कोई कुत्ता तो नहीं फंसा?” यह सोचते हुए वह धीरे-धीरे गाड़ी की ओर बढ़ी। उसके पैर कांप रहे थे। उसने डरते-डरते गाड़ी की डिक्की की कुंडी को खोला।

डिक्की खुलते ही आद्या सन्न रह गई। उसके सामने एक आदमी पड़ा था। उसकी कलाई और पैर मोटी रस्सियों से बंधे हुए थे। मुंह पर ग्रे रंग का टेप चिपका हुआ था। उसकी आंखों में बेबसी और मदद की भीख थी।

आद्या के लिए यह मंजर किसी डरावने सपने जैसा था। उसने ऐसा कुछ पहले कभी नहीं देखा था। आदमी के महंगे लेकिन फटे हुए कपड़े, उसकी कलाई पर चमचमाती सोने की घड़ी, सब ये बता रहे थे कि वह कोई अमीर आदमी है।

डर और साहस के बीच जंग

आद्या के मन में सवालों की बाढ़ आ गई। “कौन है यह आदमी? इसे इस हालत में यहां क्यों फेंका गया है?”

उसका मन डर और जिज्ञासा के बीच झूल रहा था। क्या उसे भाग जाना चाहिए या इस अजनबी की मदद करनी चाहिए?

“अंकल, आपको मदद चाहिए?” आद्या ने डरते हुए पूछा। आदमी ने अपनी आंखों से इशारा किया। आद्या ने कांपते हुए अपने छोटे हाथों से उसके मुंह पर चिपका टेप हटाया।

“बेटी… मुझे बचा लो,” आदमी ने मुश्किल से कहा। उसकी आवाज कमजोर और टूटी हुई थी।

आद्या ने अपनी जेब से एक पुराना जंग लगा चाकू निकाला और रस्सियों को काटने लगी। तभी दूर से ट्रक की आवाज सुनाई दी।

“वे वापस आ गए हैं। भाग जाओ, बेटी।” आदमी ने फुसफुसाते हुए कहा।

लेकिन आद्या ने दृढ़ता से जवाब दिया, “नहीं, मैं आपको बचाऊंगी।”

गुंडों का आगमन

ट्रक कचरे के ढेर के पास आकर रुक गया। उसमें से कुछ गुंडे उतरे। उनकी हंसी और बातें रात के सन्नाटे में गूंज रही थीं।

“उसे यहीं डिक्की में पड़े रहने दो। कुछ दिनों में प्यास से मर जाएगा। इस कचरे के ढेर में उसे कौन ढूंढेगा?” एक गुंडे ने कहा।

आद्या और वह आदमी जमीन पर लेटे हुए अपनी सांसें रोककर छिपे रहे। गुंडे थोड़ी देर बाद वहां से चले गए।

आद्या ने राहत की सांस ली। उसने फिर से चाकू उठाया और बची हुई रस्सियां काट दीं। आदमी आजाद हो गया।

अरबपति की कहानी

आद्या ने सहारा देकर उस आदमी को उठाया और पास की एक गली में ले गई। वहां एक पुरानी झोपड़ी में उसने उसे बैठाया।

“अंकल, आप कौन हैं? और यहां क्यों हैं?” आद्या ने पूछा।

आदमी ने धीरे से कहा, “मेरा नाम विक्रम मल्होत्रा है। मैं एक समय में बहुत बड़ा आदमी था। लेकिन मेरी पत्नी और सौतेले बेटे ने मुझे धोखा दिया। उन्होंने मेरी दौलत और जिंदगी छीनने की साजिश रची।”

आद्या हैरान रह गई। विक्रम मल्होत्रा का नाम उसने कई बार सुना था। वह मुंबई के सबसे बड़े रियल एस्टेट टाइकून थे।

“आपकी पत्नी ने ऐसा क्यों किया?” आद्या ने मासूमियत से पूछा।

“पैसे के लिए, लालच के लिए। मैंने उन पर भरोसा किया, लेकिन उन्होंने मेरी पीठ में छुरा घोंप दिया।” विक्रम ने भारी आवाज में कहा।

एक नई उम्मीद

विक्रम को एहसास हुआ कि उसकी जिंदगी अब इस बच्ची के भरोसे है। उसने आद्या से कहा, “बेटी, मुझे तुम्हारी मदद चाहिए। मुझे सबूत इकट्ठा करने होंगे ताकि मैं अपनी सच्चाई दुनिया के सामने ला सकूं।”

आद्या ने सिर हिलाया। “मैं आपकी मदद करूंगी, अंकल। आप मुझ पर भरोसा कर सकते हैं।”

विक्रम की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने महसूस किया कि इस बच्ची में एक अजीब सा साहस और सच्चाई है।

सच्चाई की तलाश

अगले कुछ दिनों तक आद्या और विक्रम ने मिलकर सबूत इकट्ठा करने की कोशिश की। आद्या ने अपनी मासूमियत और छोटी उम्र का फायदा उठाकर रिया और उसके गुंडों की बातें सुनीं। उसने विक्रम को बताया कि रिया और आर्यन ने वसीयत को नष्ट करने की साजिश रची थी।

“अंकल, मैंने सुना कि असली वसीयत सेंट एंस चैपल में छिपी है,” आद्या ने कहा।

विक्रम ने सिर हिलाया। “हां, वो वसीयत मैंने खुद वहां छिपाई थी। हमें उसे ढूंढना होगा।”

सेंट एंस चैपल की ओर सफर

अगली सुबह, विक्रम और आद्या सेंट एंस चैपल की ओर रवाना हुए। यह एक पुराना चर्च था, जो अब वीरान पड़ा था।

चर्च के अंदर विक्रम ने वर्जिन मैरी की मूर्ति के पीछे से एक लकड़ी का डिब्बा निकाला। डिब्बे में असली वसीयत थी।

“यह रही वह वसीयत। यही हमारी जीत की चाबी है,” विक्रम ने कहा।

लेकिन तभी चर्च का दरवाजा जोर से खुला। जख्म वाला गुंडा और उसके साथी अंदर आ गए।

सच्चाई की जीत

गुंडों ने विक्रम और आद्या पर हमला कर दिया। लेकिन मिस्टर शर्मा, जो अब सच्चाई का साथ देने का फैसला कर चुके थे, उनके बचाव में आ गए।

“यह वसीयत असली है। तुम लोग इसे नहीं ले जा सकते,” शर्मा ने कहा।

गुंडों और विक्रम-शर्मा के बीच जमकर हाथापाई हुई। इस बीच आद्या ने वसीयत को सुरक्षित रखा।

आखिरकार, गुंडे हार मानकर भाग गए। विक्रम, आद्या और शर्मा ने राहत की सांस ली।

कोर्ट में इंसाफ

अगले दिन कोर्ट में सुनवाई शुरू हुई। विक्रम ने असली वसीयत पेश की। आद्या ने गवाही दी और बताया कि कैसे रिया और आर्यन ने विक्रम की हत्या की साजिश रची थी।

जज ने रिया और आर्यन को दोषी ठहराया और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

एक नई शुरुआत

कोर्ट के बाहर विक्रम ने आद्या को गले से लगा लिया। “आज से तुम मेरी बेटी हो। मैं तुम्हें वह हर खुशी दूंगा जिसकी तुम हकदार हो।”

आद्या की आंखों में आंसू थे। उसने धीरे से कहा, “पापा।”

विक्रम की आंखों में भी आंसू थे। उन्होंने महसूस किया कि इस बच्ची ने उनकी जिंदगी बदल दी है।

नया सवेरा

आज वह विला, जो कभी साजिशों का घर था, अब आद्या की हंसी से गूंज रहा था।

विक्रम ने आसमान की ओर देखा और मुस्कुराकर कहा, “शुक्रिया। आपने मुझे दूसरा मौका दिया।”

इस तरह कचरे के ढेर से शुरू हुई यह कहानी एक नई उम्मीद और प्यार के साथ पूरी हुई।

“सच्चाई और इंसानियत कभी हार नहीं मानती।”

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