जब पुलिसवालों ने महिला पुलिसवाले को बनाया बंदी || Crime patrol || New episode ||
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जब पुलिसवालों ने महिला पुलिसवाले को बनाया बंदी — जबलपुर स्टेशन की वह रात
जबलपुर स्टेशन की वह शाम आम शामों जैसी ही थी।
कुलियों की पुकार, इंजन की सीटी, प्लेटफॉर्म पर दौड़ते मुसाफ़िर और चाय की दुकानों से उठती भाप—सब कुछ रोज़ जैसा ही लग रहा था। लेकिन प्लेटफॉर्म नंबर तीन पर खड़ी पिंकी के लिए यह शाम ज़िंदगी की सबसे ख़तरनाक रात बनने वाली थी।
पिंकी उम्र में महज़ सोलह साल की थी। चेहरे पर मासूमियत थी, आँखों में सपने और हाथ में एक छोटा सा बैग। उसी बैग में उसने अपने पिता के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा रखा था—एक ऊनी शॉल।
“दीदी, पापा के लिए शॉल… उनका बर्थडे गिफ्ट। उन्हें खुशी होगी ना?”
उसने अपनी बड़ी बहन कविता से हँसते हुए कहा था।
“देखना खुशी के मारे पागल ही ना हो जाएँ,”
कविता ने मज़ाक में जवाब दिया था।
पिंकी पढ़ाई में तेज़ थी। परिवार चाहता था कि वह आगे चलकर अफ़सर बने—IAS। लेकिन उसी सपने की राह में उसे रोज़ अकेले सफ़र करना पड़ता था।

घर लौटने की जिद
उस दिन पिंकी ने हॉस्टल से अचानक घर जाने का फ़ैसला किया था। वजह थी—पिता का जन्मदिन। वह उन्हें सरप्राइज़ देना चाहती थी।
शाम लगभग सात बजे वह हॉस्टल से निकली। उसने किसी को ठीक से बताया भी नहीं। बस यही कहा था—
“घर जा रही हूँ।”
करौदी मोड़ तक वह ऑटो से पहुँची। वहाँ से उसे बस या किसी परिचित का इंतज़ार करना था।
लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था।
उसका मोबाइल कुछ देर बाद बंद हो गया—बैटरी खत्म।
पहली चूक
पिंकी के माता–पिता ने जब देर रात तक उसका इंतज़ार किया और फ़ोन नहीं लगा, तो वे घबरा गए।
सुबह सबसे पहले वे थाने पहुँचे।
लेकिन ड्यूटी पर मौजूद पुलिसवाले ने मामला हल्के में लिया।
“लड़की है… कहीं बॉयफ्रेंड के साथ चली गई होगी,”
उसने लापरवाही से कह दिया।
मिसिंग रिपोर्ट दर्ज नहीं हुई।
यही वह पहली चूक थी—जो आगे चलकर एक बड़ी त्रासदी में बदल गई।
भयानक सच
करीब 24 घंटे बाद, करौदी मोड़ से चार किलोमीटर दूर एक सुनसान सड़क किनारे पिंकी बेहोशी की हालत में मिली।
उसका शरीर बुरी तरह ज़ख्मी था।
कपड़े फटे हुए।
शरीर पर हिंसा के निशान।
और साँसें मुश्किल से चल रही थीं।
उसे तुरंत अस्पताल ले जाया गया।
लेकिन वहाँ भी एक और बेरुख़ी सामने आई।
“यह पुलिस केस है… जब तक पुलिस नहीं आती, हम इलाज नहीं कर सकते,”
डॉक्टर ने कह दिया।
हर मिनट की देरी उसके जीवन के लिए ख़तरा बनती जा रही थी।
एंट्री: इंस्पेक्टर स्वाति
इसी बीच, जब मामला मीडिया में उछला, तब केस पहुँचा इंस्पेक्टर स्वाति मिश्रा के पास।
स्वाति—एक महिला पुलिस अधिकारी।
सख़्त अनुशासन, तेज़ दिमाग और ज़ीरो टॉलरेंस।
जैसे ही उसने केस फ़ाइल देखी, उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखा।
“मिसिंग की रिपोर्ट कब दी गई थी?”
“सुबह…”
“और आपने केस क्यों बंद किया?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
जांच की शुरुआत
स्वाति ने बिना वक्त गंवाए पूरी टीम एक्टिव कर दी।
करौदी मोड़ के ऑटो और रिक्शा चालकों से पूछताछ
स्टेट हाईवे की नाकाबंदी
शराब की दुकानों से पूछताछ
आसपास के ढाबे, बंद मकान, खाली प्लॉट
एक छोटी सी कड़ी सामने आई—
एक शराब की बोतल, जिस पर एक दुकान का टैग था।
साजिश का जाल
जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ी, कहानी का सबसे घिनौना चेहरा सामने आने लगा।
यह कोई अचानक हुआ अपराध नहीं था।
यह सोची–समझी साजिश थी।
पिंकी जिस नेटवर्किंग बिज़नेस से जुड़ी थी, वहाँ पैसों का दबाव था।
कुछ लोग उसे रास्ते से हटाना चाहते थे।
एक खाली घर।
एक स्टेट एजेंट।
कुछ बेरोज़गार युवक।
और शराब।
सब कुछ प्लान किया गया था।
दरिंदगी की हद
पूछताछ में जो सच सामने आया, वह इंसानियत को शर्मसार करने वाला था।
पिंकी को ज़िंदा छोड़ दिया गया—
लेकिन जब अपराधियों को लगा कि वह पुलिस के सामने बयान दे सकती है,
तो उसे मारने की कोशिश की गई।
उसके शरीर में ज़हर फैल चुका था।
डॉक्टरों ने साफ़ कह दिया—
“अगर इलाज नहीं हुआ, तो जान बचाना नामुमकिन है।”
इंसानियत बनाम सिस्टम
इंस्पेक्टर स्वाति ने अस्पताल प्रशासन को कड़ी फटकार लगाई।
“किसी भी पेशेंट को एडमिट ना करना कानूनन अपराध है।
हर मिनट की देरी—ज़िंदगी और मौत का फर्क बन सकती है।”
इलाज शुरू हुआ।
अंततः न्याय
48 घंटे के भीतर—
सभी आरोपी गिरफ्तार
मास्टरमाइंड पकड़ा गया
स्टेट एजेंट और नेटवर्किंग लिंक बेनकाब
पुलिस ने केस सॉल्व कर लिया।
लेकिन अफ़सोस एक बात का रहा—
पिंकी होश में नहीं आ सकी।
वह ज़िंदगी और मौत के बीच झूलती रही।
अंतिम सच्चाई
यह केस सिर्फ़ एक अपराध की कहानी नहीं था।
यह कहानी थी—
पुलिस की पहली चूक की
समाज की सोच की
और उस मानसिकता की जो लड़कियों को “ज़िम्मेदारी” मानती है, इंसान नहीं
इंस्पेक्टर स्वाति ने केस फ़ाइल बंद करते हुए कहा—
“जब तक हम लड़कियों को अकेले जाने से नहीं,
बल्कि लड़कों को इज्ज़त करना नहीं सिखाएंगे—
तब तक ऐसे अपराध रुकेंगे नहीं।”
समाप्त
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