जब सुप्रीम कोर्ट से जुड़ी सरकारी वकील ने सड़क पर अपने तलाकशुदा पति को कचरा बीनते देखा फिर जो हुआ…

.
.
.

सड़क के किनारे: आराध्या और निखिल की कहानी

अध्याय 1: दिल्ली की सुबह

दिल्ली की सुबह हल्की ठंडक के साथ शुरू हुई थी। लेकिन यह ठंडक ज्यादा देर टिकती नहीं, क्योंकि यहां हर सुबह भागदौड़ के साथ खुलती है। कारों के हॉर्न, बसों की आवाज, मेट्रो स्टेशनों की सीढ़ियों पर चढ़ते-उतरते कदम और फुटपाथ पर बिखरी जिन्दगियां… सब कुछ एक साथ चलता है, बिना रुके, बिना किसी का इंतजार किए।

इन्हीं सड़कों पर एक सफेद रंग की सरकारी गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। गाड़ी के अंदर बैठी महिला की निगाहें बाहर थीं, लेकिन मन कहीं और अटका हुआ था। उसका नाम था आराध्या मल्होत्रा—देश की जानीमानी सरकारी वकील, जो सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की तरफ से बड़े-बड़े संवेदनशील मामलों की पैरवी करती थी। संविधान, कानून और न्याय उसके लिए सिर्फ पेशा नहीं थे, उसकी पहचान थे।

लेकिन आज उसका मन कानून की धाराओं में नहीं था। आज उसे झुग्गी पुनर्वास से जुड़े एक ऐसे केस पर अंतिम राय देनी थी, जिसमें हजारों लोगों का भविष्य जुड़ा था।

अध्याय 2: फुटपाथ पर एक चेहरा

ड्राइवर ने अचानक हल्का ब्रेक लगाया, “मैडम, आगे कचरा गाड़ी है, जाम है।”
आराध्या ने बाहर देखा और उसी पल उसकी सांसें रुक गईं। फुटपाथ के किनारे, कचरे के ढेर के पास एक आदमी झुकी कमर के साथ प्लास्टिक और लोहे के टुकड़े छान रहा था। फटे कपड़े, धूप से जला चेहरा, बिखरे बाल और ऐसी थकान जो सिर्फ शरीर की नहीं, आत्मा की होती है।

पहली नजर में वह आदमी शहर के हजारों अनदेखे चेहरों में से एक था। लेकिन जब उसने पल भर के लिए सिर उठाया तो आराध्या का दिल जैसे छाती से गिर पड़ा। वह चेहरा… उसने कभी बहुत करीब से देखा था। वह आदमी कोई और नहीं, बल्कि निखिल सक्सेना था—उसका तलाकशुदा पति। वही निखिल जो कभी दिल्ली यूनिवर्सिटी का गोल्ड मेडलिस्ट था, वही जो रात-रात भर उसके साथ बैठकर प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें पढ़ता था, वही जो कहा करता था कि “हम दोनों एक दिन सिस्टम के दो मजबूत स्तंभ बनेंगे।” और आज वही आदमी सड़क पर कचरा बीन रहा था।

आराध्या की उंगलियां सीट के किनारे कस गईं। गाड़ी आगे बढ़ गई, लेकिन उसका मन वहीं रुक गया। सात साल पुराना अतीत एक झटके में उसके सामने खुल गया—छोटा सा कमरा, किताबों का ढेर, सपनों से भरे दो लोग, पहली नाकामी पर निखिल की मुस्कान, दूसरी पर उसकी खामोशी, और तीसरी बार रिजल्ट आने पर उसकी आंखों में स्थायी टूटन।

अध्याय 3: अतीत की परतें

उस वक्त आराध्या लॉ की पढ़ाई पूरी कर रही थी—नई दुनिया, नई पहचान। और निखिल हर कॉल पर खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करता, ताकि वह कभी यह न सोचे कि उसने गलत आदमी चुना है। लेकिन हर नाकामी के साथ उसका आत्मसम्मान टूटता गया।

एक दिन उसने कहा, “तुम्हारे लिए सब आसान है, आराध्या। तुम्हें सिस्टम ने अपनाया है और मुझे ठुकराया है।”
तलाक बिना शोर के हुआ—सिर्फ दस्तखत और सात साल का रिश्ता खत्म। आराध्या काम में डूब गई—सुप्रीम कोर्ट की बहसें, बड़े केस, और निखिल पीछे छूटता चला गया।

अध्याय 4: सड़क की सच्चाई

वर्तमान में, मीटिंग के दौरान फाइलों के पन्ने पलटते रहे, लेकिन आराध्या के सामने वही चेहरा घूमता रहा। मीटिंग खत्म होते ही उसने बाकी शेड्यूल रद्द कर दिया। शाम को वही सड़क, वही जगह। इस बार गाड़ी रुकी और इस बार आराध्या रुकी नहीं—उसके पैर सड़क पर पड़े और उसे पहली बार एहसास हुआ कि जमीन कितनी सख्त होती है।

निखिल पास बैठा था, कचरे की बोरी एक तरफ रखी थी। वो हाथ धोने की कोशिश कर रहा था, जैसे गंदगी सिर्फ हाथों पर हो। आराध्या को देखकर उसने नजरें फेर ली, शायद उम्मीद कर रहा था कि यह मुलाकात भी बिना बात के गुजर जाए।

लेकिन आराध्या रुक गई।
“निखिल…”
सिर्फ नाम लिया गया, ना कोई सवाल, ना कोई आरोप। निखिल ने सिर नहीं उठाया, कुछ पल बाद बोला, “मैडम, आप यहां क्यों खड़ी हैं? किसी ने देख लिया तो सवाल उठेंगे।”
आराध्या चौंक गई—आज भी वह उसकी इज्जत की चिंता कर रहा था।

उसने कहा, “लोग क्या सोचेंगे, मुझे फर्क नहीं पड़ता।”
निखिल की आंखों में सख्ती आ गई, “मुझे पड़ता है। आज भी मैं वही आदमी हूं जिसने आपको सपने दिखाए थे। मैं नहीं चाहता लोग कहें कि सुप्रीम कोर्ट की वकील का पति कचरा बीनता है।”

वह वाक्य आराध्या को भीतर तक हिला गया। वह जमीन पर बैठ गई। लोग रुकने लगे, मोबाइल उठने लगे। लेकिन उसे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था।

“यहां तक कैसे पहुंचे?”
निखिल हंसा, एक ऐसी हंसी जिसमें खुद पर तंज था। “जब आदमी बार-बार हारता है, तो हार उसकी आदत बन जाती है।”

“अगर मैं तुम्हें यहां से घर ले जाऊं?”
निखिल खड़ा हो गया, “दया नहीं चाहिए। मैं तुम्हारा केस नहीं हूं। तुम तब नहीं रुकी थी जब मैं टूट रहा था।”

यह सच था, और यही सबसे ज्यादा चुभता है।

आराध्या उठी, गाड़ी की तरफ मुड़ी। तभी पीछे से उसकी आवाज आई, “अगर इंसान को लगे कि वह पूरी तरह बेकार हो चुका है, तो क्या उसे दूसरा मौका मिलना चाहिए?”

आराध्या रुकी, बिना पीछे देखे बोली, “मौका नहीं मिलता, निखिल। मौका लिया जाता है।”

अध्याय 5: रात का सन्नाटा

उस रात निखिल देर तक सड़क के किनारे पड़ी टूटी हुई बेंच पर बैठा रहा। दिल्ली की सड़कों पर रात का मतलब सुकून नहीं होता, बस शोर थोड़ा धीमा हो जाता है। ऊपर आसमान था, लेकिन उसे तारे नहीं दिख रहे थे—बस अपनी अधूरी कोशिशें दिख रही थीं।

हर तारा जैसे एक सपना था, जिसे उसने कभी छुआ था लेकिन पकड़ नहीं पाया था। उसने अपने हाथों को देखा—वही हाथ जो कभी किताबों के पन्ने पलटते थे, नोट्स बनाते थे और आज कचरे से बोतलें चुनते थे।

उसे याद आया कि पहली बार फेल होने पर उसने खुद को समझाया था कि यह सिर्फ एक झटका है। दूसरी बार उसने खुद से झूठ बोलना शुरू कर दिया। और तीसरी बार जब रिजल्ट आया तो उसके भीतर कुछ ऐसा टूट गया जो फिर कभी जुड़ नहीं पाया।

उस वक्त आराध्या सुप्रीम कोर्ट में अपनी ट्रेनिंग और प्रैक्टिस के शुरुआती दौर में थी। नई दुनिया, नए लोग और नई पहचान के बीच निखिल हर फोन कॉल पर खुद को मजबूत दिखाने की कोशिश करता, ताकि आराध्या को कभी यह एहसास ना हो कि उसने गलत आदमी को चुना है। लेकिन सच्चाई यह थी कि हर दिन वह खुद को थोड़ा-थोड़ा खोता जा रहा था।

अध्याय 6: सिस्टम की सच्चाई

पढ़ा लिखा होना भी इस सिस्टम में एक बोझ बन गया था। छोटी नौकरियों में उसे कहा गया कि “तुम ज्यादा पढ़े हो।” बड़े इंटरव्यू में कहा गया कि “तुम्हें स्थिरता नहीं है।” दोस्तों ने पहले सलाह दी, फिर दूरी बना ली। रिश्तेदारों ने पहले सवाल किए, फिर नाम लेना छोड़ दिया। और आराध्या की खामोशी उसे हर दिन यह एहसास दिलाती रही कि वो अब बराबरी का नहीं रहा।

तलाक के बाद उसने सोचा था कि अब कम से कम उम्मीद का बोझ नहीं रहेगा। लेकिन उसी आजादी में उसने भूख, अकेलापन और बेइज्जती को बहुत करीब से देखा। एक-एक करके उसने अपनी किताबें बेची, मोबाइल गिरवी रखा, कमरा छोड़ा और एक रात ऐसी आई जब भूख ने आत्मसम्मान को पछाड़ दिया। उसी रात उसने पहली बार फुटपाथ पर सोया और वहीं से सड़क उसकी मजबूरी नहीं बल्कि पहचान बनती चली गई।

अध्याय 7: आराध्या का द्वंद्व

दूसरी तरफ उसी रात आराध्या अपने सरकारी बंगले में अकेली बैठी थी। पहली बार उसे लगा कि कानून की किताबों में लिखी धाराएं जमीन पर कितनी अलग जिंदगी बनाती हैं। उसे निखिल का चेहरा बार-बार याद आ रहा था। लेकिन उसने अपने पद का इस्तेमाल करके उसके बारे में जानकारी मंगवाने से खुद को रोका, क्योंकि वह नहीं चाहती थी कि यह रिश्ता अधिकार का रूप ले।

अगले दिन उसने बिना किसी काफिले और बिना मीडिया के उसी इलाके का निरीक्षण तय किया जहां निखिल रहता था। उसने वहां बच्चों को कचरे से खिलौने बनाते देखा, पढ़े लिखे युवाओं को दिहाड़ी के लिए लाइन में खड़ा पाया और बूढ़े लोगों को ऐसे बैठे देखा जैसे सिस्टम ने उन्हें रिटायर कर दिया हो।

उसी शाम एक एनजीओ के वालंटियर ने निखिल से कहा कि कोई बड़ी वकील रोज झुग्गी इलाके में आ रही है, लोगों से बात कर रही है। निखिल समझ गया कि यह आराध्या है और उसके भीतर गुस्सा भर आया। उसे लगा कि वह उसकी दुनिया को सुधारने आई है, जैसे वह कोई अधूरा केस हो।

लेकिन जब उसने दूर से देखा कि आराध्या एक बूढ़ी औरत के घाव साफ कर रही है और एक बच्चे को अपने हाथ से खाना खिला रही है, बिना कुर्सी, बिना रुतबे के—तब उसके भीतर पहली बार यह सवाल उठा कि क्या इंसान सच में बदल सकता है या बस हालात के हिसाब से रंग बदलता है।

अध्याय 8: वायरल वीडियो और सिस्टम की चाल

उसी रात आराध्या ने अपनी डायरी में लिखा, “सिस्टम लोगों को गिराता नहीं है, बस उन्हें उठने का रास्ता दिखाना भूल जाता है।”

और उसी रात निखिल कई महीनों बाद पहली बार ठीक से सो पाया, क्योंकि उसे लगा कि शायद कहानी यही खत्म नहीं हुई है, बल्कि असली संघर्ष अब शुरू होने वाला है।

अगली सुबह शहर वही था, लेकिन माहौल बदला हुआ था। झुग्गी इलाके में अचानक हलचल थी—कैमरे, रिपोर्टर, भीड़। किसी ने सोशल मीडिया पर वीडियो डाल दिया था, जिसमें एक सरकारी वकील फुटपाथ पर बैठकर लोगों से बात कर रही थी और उसी फ्रेम के कोने में एक कचरा बीनता हुआ आदमी भी दिख गया था। कैप्शन छोटा था, लेकिन जहरीला—”सुप्रीम कोर्ट की वकील और उनका तलाकशुदा पति।”

मीडिया को बस इतना ही चाहिए था।

अध्याय 9: सार्वजनिक दर्द

निखिल ने जब वह वीडियो देखा तो उसकी छाती में पुराना डर लौट आया। उसे लगा कि अब उसकी जिंदगी उसकी नहीं रही, वह फिर से किसी और के मसाले में बदल चुका है। और वहीं से उसने फैसला लेने लगा कि अगर इस कहानी में रहना है तो भागकर नहीं बल्कि सामने खड़े होकर रहना होगा, क्योंकि चुप रहकर उसने पहले ही खुद को मिटा दिया था।

अब यह कहानी एक निजी दर्द से निकलकर सिस्टम के खिलाफ खड़ी होने वाली थी।

वीडियो वायरल होने के बाद दिल्ली का माहौल अचानक बदल गया था। जो कहानी कल तक फुटपाथ तक सीमित थी, वह अब न्यूज़ स्टूडियो से लेकर मंत्रालयों के गलियारों तक पहुंच चुकी थी। चैनलों पर पैनल बैठे थे—कोई आराध्या मल्होत्रा को संवेदनशील सरकारी वकील बता रहा था, तो कोई उस पर निजी रिश्तों के कारण पेशेवर सीमाएं लांघने का आरोप लगा रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के बाहर खड़े रिपोर्टर कैमरे के सामने सवाल उछाल रहे थे—क्या एक सरकारी वकील का निजी अतीत उसके मौजूदा फैसलों को प्रभावित कर सकता है? क्या यह हितों का टकराव है?

अध्याय 10: कटघरे में आराध्या

आराध्या जब कोर्ट पहुंची तो पहली बार उसे महसूस हुआ कि काले कोर्ट का वजन आज ज्यादा भारी है। कॉरिडोर में साथी वकीलों की निगाहें बदली हुई थी—कोई सहानुभूति में देख रहा था, तो कोई दूरी बनाकर जैसे वह किसी अदृश्य रेखा को पार कर चुकी हो।

उसी दिन दोपहर बाद उसे अटॉर्नी जनरल ऑफिस से बुलावा आया। सवाल सीधे नहीं थे, लेकिन लहजा साफ था—मीडिया से दूरी रखिए और फिलहाल उस इलाके से हट जाइए।

आराध्या ने पहली बार कुर्सी पर बैठकर नहीं बल्कि खड़े होकर जवाब दिया, “अगर एक सरकारी वकील का जमीन पर लोगों से मिलना अपराध है तो शायद कानून को खुद से सवाल पूछने चाहिए।”

मीटिंग खत्म हुई, लेकिन उसे साफ संकेत दे दिया गया कि ऊपर से नजर रखी जा रही है।