जिस लड़के को सबने पागल समझा…उसे आर्मी ऑफिसर ने Salute किया…सच्चाई जानकर रो😭 देंगे |
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रतनपुर की धरती उस दिन सचमुच आग उगल रही थी। मालवा की तपती हवाएँ दोपहर के तीन बजे भी थमने का नाम नहीं ले रही थीं। घड़ी चौक पर डामर पिघलकर जूतों से चिपक रहा था और लोग सिर पर गमछा रखे जल्दी-जल्दी अपने काम निपटा रहे थे। उसी चौक के कोने में नगर निगम का बड़ा सा कूड़ेदान था, जिसके पास बैठा एक दुबला-पतला बालक सबकी नजरों में “पागल” था।
उसकी उम्र दस साल से अधिक नहीं लगती थी, पर चेहरे की कठोर रेखाएँ उसे समय से पहले बड़ा दिखाती थीं। उलझे बाल, धूल से सना शरीर, फटी बनियान और नंगे पैर—मानो जिंदगी ने उसे हर मोर्चे पर परखा हो। मगर उसकी आँखें… वे असाधारण थीं। उनमें एक अजीब अनुशासन, एक चौकन्नापन, जैसे वह किसी अदृश्य सीमा की रक्षा कर रहा हो।
वह कूड़े से निकाले कागज़ों को जमीन पर सलीके से सजाता, फिर अचानक सावधान की मुद्रा में खड़ा हो जाता और बुदबुदाता—
“सेक्टर चार सुरक्षित है, सर… झंडा नीचे नहीं गिरेगा…”
राहगीर हँसते। फलवाला बनवारी उसे डाँटता—“अरे हट यहाँ से! तेरी वजह से ग्राहक भाग जाते हैं।”
स्कूल के कुछ लड़के पत्थर मारकर चिढ़ाते। मगर बालक कभी पलटकर जवाब नहीं देता। बस अपने कागज़ फिर से जमा करता और उसी काल्पनिक ड्यूटी में लग जाता।
उस चौक पर एक पुराना लोहे का खंभा था, जिस पर छोटा सा तिरंगा लगा रहता। धूप और बारिश ने उसे जर्जर कर दिया था। एक दिन तेज हवा चली और कमजोर धागा टूट गया। तिरंगा हवा में लहराता नीचे गिरने लगा।
बालक बिजली की तरह दौड़ा। जलती सड़क की परवाह किए बिना उसने छलाँग लगाई और तिरंगे को जमीन छूने से पहले अपने हाथों में थाम लिया। उसने उसे सीने से लगा लिया, जैसे कोई अमूल्य खजाना हो। उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
भीड़ कुछ पल चुप रही, फिर हँसी और ताने लौट आए। तभी एक लड़के ने पत्थर उठाकर उसके माथे पर दे मारा। खून बह निकला। मगर बालक अडिग खड़ा रहा। उसने एक हाथ से तिरंगा थामा और दूसरे से सैल्यूट किया।
उस दिन के बाद वह और भी चुप हो गया। लोग उसे भूल गए, मगर वह रोज उसी खंभे के पास बैठता, जैसे अपनी पोस्ट न छोड़ने की कसम खाई हो।

कुछ हफ्तों बाद खबर आई कि सेना के उच्च अधिकारी का काफिला रतनपुर से गुजरेगा। पुलिस ने चौक खाली करवाना शुरू किया। “कोई भिखारी, कोई पागल सड़क पर नहीं दिखना चाहिए!” आदेश था।
बालक को घसीटकर गली में फेंक दिया गया। मगर जब काफिला आया, वह अचानक सड़क के बीचोंबीच आ खड़ा हुआ। उसने अपनी बनियान के भीतर से वही फटा तिरंगा निकाला और सावधान मुद्रा में खड़ा हो गया।
खुली जीप में बैठे मेजर जनरल विक्रम सिंह की नजर उस पर पड़ी। उन्होंने तुरंत गाड़ी रुकवाई। पुलिस घबरा गई।
जनरल उतरकर बालक के सामने आए। उन्होंने देखा—खून से सना माथा, मगर सैल्यूट बिल्कुल सही कोण पर।
“तुम्हारा नाम क्या है?”
बालक गरजा—“रिपोर्टिंग फॉर ड्यूटी, सर! झंडा सुरक्षित है!”
जनरल की आँखें भर आईं। यह लहजा, यह अनुशासन—यह यूँ ही नहीं हो सकता। उन्होंने उसे संभाला। बालक बेहोश हो गया।
थाने में उसकी तलाशी ली गई। बनियान की अंदरूनी सिलाई में एक धातु की पट्टी मिली—एक सैन्य पहचान टैग। उस पर नाम खुदा था—“मेजर प्रताप सिंह।”
जनरल स्तब्ध रह गए। दस वर्ष पहले सीमा पर हुए भीषण विस्फोट में मेजर प्रताप सिंह शहीद हुए थे। रिपोर्ट में लिखा था कि उनका पूरा परिवार मारा गया। शायद विस्फोट से पहले उन्होंने अपने बेटे को किसी सुरक्षित जगह धकेल दिया होगा।
“यह उनका बेटा है… अभय,” जनरल की आवाज काँप उठी।
सच सामने आते ही कस्बे की जमीन जैसे फट गई। जिसे सब पागल समझते रहे, वह शहीद का पुत्र था। सदमे ने उसके मन को उसी युद्ध के क्षण में अटका दिया था। वह रोज अपनी ड्यूटी निभाता था—झंडे की रक्षा की ड्यूटी।
अभय को सेना के अस्पताल ले जाया गया। इलाज शुरू हुआ। धीरे-धीरे उसके शरीर की कमजोरी दूर हुई। मनोचिकित्सकों ने समझाया कि उसका दिमाग सदमे से जूझ रहा है।
एक दिन सेना के बैंड की धुन सुनते ही उसकी आँखों में पहचान लौटी।
“पिताजी… उन्होंने कहा था झंडा नीचे नहीं गिरना चाहिए…”
जनरल ने उसका हाथ थाम लिया—“तुमने अपना वचन निभाया, बेटे।”
तीन महीने बाद रतनपुर में समारोह हुआ। वही चौक, जहाँ उसे पत्थर मारे गए थे, अब फूलों से सजा था। कूड़ेदान हटाकर संगमरमर का चबूतरा बना था।
जनरल विक्रम सिंह मंच पर खड़े बोले—
“जिसे तुम पागल कहते थे, वह शहीद का बेटा है। असली पागलपन यह है कि हम बाहरी रूप देखकर इंसान की कीमत तय करते हैं।”
अभय को बाल वीरता सम्मान दिया गया। उसने नया तिरंगा खंभे पर फहराया। पूरे कस्बे ने राष्ट्रगान गाया।
बनवारी और वे लड़के रोते हुए उसके सामने आए। अभय मुस्कुराया—
“पत्थर से दर्द हुआ था, पर उससे मैं मजबूत हुआ। बस अब किसी और पर पत्थर मत उठाना।”
आज अभय सेना की देखरेख में पढ़ रहा है। जब वह अठारह का होगा, उसे अपने पिता की रेजिमेंट में प्रवेश मिलेगा।
रतनपुर के लोग अब उस दिन को अपनी जागृति का दिन कहते हैं। घड़ी चौक पर लगा वह चबूतरा याद दिलाता है—
हर फटे कपड़े के पीछे एक कहानी हो सकती है।
हर चुप आँखों में एक युद्ध छिपा हो सकता है।
और हर “पागल” कहलाने वाले बच्चे में एक सच्चा सिपाही।
जय हिंद।
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