तलाक के 3 साल बाद सड़क पर मिला घायल पति… तलाकशुदा पत्नी ने जो किया, इंसानियत रो पड़ी

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तलाक के 3 साल बाद सड़क पर मिला घायल पति… तलाकशुदा पत्नी ने जो किया, इंसानियत रो पड़ी

मध्य प्रदेश के इंदौर शहर की एक बरसाती रात थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और लगातार हो रही बारिश से सड़कें लगभग खाली हो चुकी थीं। शहर की चमकती रोशनी भी उस रात कुछ फीकी-सी लग रही थी।

संध्या अपनी कार धीरे-धीरे चलाते हुए ऑफिस से घर लौट रही थी। वह एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी। दिन भर की थकान उसके चेहरे पर साफ दिखाई दे रही थी, लेकिन उसके मन में रोज की तरह काम से जुड़ी कई बातें चल रही थीं।

कार की विंडशील्ड पर लगातार गिरती बारिश की बूंदें उसे बार-बार वाइपर चलाने पर मजबूर कर रही थीं।

सड़क पर इक्का-दुक्का गाड़ियाँ ही नजर आ रही थीं।

तभी अचानक उसकी नजर सड़क किनारे पड़े एक आदमी पर पड़ी।

वह आदमी फुटपाथ के पास कीचड़ में गिरा हुआ था। बारिश की बूंदें लगातार उसके ऊपर गिर रही थीं और वह बिल्कुल भी हिल नहीं रहा था।

संध्या ने कार की रफ्तार धीमी की और दूर से उस आदमी को देखने लगी।

उसके मन में पहला ख्याल आया —

“शायद कोई शराब पीकर गिर गया होगा।”

रात का समय था। आसपास कोई भी नहीं था।

उसने सोचा कि इस समय रुकना ठीक नहीं है।

उसने कार को आगे बढ़ाने के लिए गियर बदला।

लेकिन तभी कार मोड़ते समय उसकी हेडलाइट सीधी उस आदमी के चेहरे पर पड़ी।

जैसे ही रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी…

संध्या का दिल जोर से धड़कने लगा।

उसने तुरंत ब्रेक लगा दी।

कुछ सेकंड तक वह कार के अंदर बैठी रही और ध्यान से उस चेहरे को देखती रही।

उसके चेहरे पर हैरानी साफ दिखाई दे रही थी।

क्योंकि सड़क किनारे बेहोश पड़ा वह आदमी कोई और नहीं बल्कि विवेक था।

वही विवेक…

जो कभी उसका पति हुआ करता था।

वही विवेक जिसने तीन साल पहले उसे यह कहकर तलाक दे दिया था कि वह उसके लायक नहीं है।

और वही विवेक जिसने उस पर यह आरोप लगाया था कि वह अपने ऑफिस के पुरुष सहकर्मियों के साथ गलत रिश्ते रखती है।

संध्या का दिल एक पल के लिए जैसे पत्थर बन गया।

उसके दिमाग में पुरानी बातें किसी फिल्म की तरह घूमने लगीं।

उसे वह दिन याद आने लगे जब विवेक ने उस पर शक किया था।

वह दिन जब उसने रो-रोकर अपनी बेगुनाही साबित करने की कोशिश की थी।

और वह दिन भी जब आखिरकार विवेक ने कहा था —

“मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकता।”

उस रात संध्या की दुनिया टूट गई थी।

लेकिन आज…

तीन साल बाद…

वही इंसान सड़क किनारे घायल पड़ा था।

संध्या ने गहरी सांस ली और खुद से कहा —

“मुझे इससे कोई मतलब नहीं होना चाहिए।”

उसने कार आगे बढ़ाने की कोशिश की।

लेकिन तभी उसकी नजर फिर से विवेक पर पड़ी।

वह पूरी तरह भीग चुका था।

उसके कपड़े फटे हुए थे।

और उसके सिर से खून बह रहा था।

बारिश लगातार तेज हो रही थी।

संध्या के दिल में एक अजीब बेचैनी होने लगी।

उसके अंदर दो आवाजें लड़ रही थीं।

एक आवाज कह रही थी —

“इसे छोड़ दो। इसने तुम्हारे साथ क्या किया था याद है ना?”

लेकिन दूसरी आवाज कह रही थी —

“अगर तुम इसे यहां छोड़ गई और इसे कुछ हो गया तो?”

कुछ सेकंड तक यही संघर्ष चलता रहा।

आखिरकार इंसानियत जीत गई।

संध्या ने कार साइड में रोकी और बाहर निकल आई।

बारिश इतनी तेज थी कि कुछ ही सेकंड में वह पूरी तरह भीग गई।

वह धीरे-धीरे विवेक के पास पहुंची।

उसने झुककर उसे ध्यान से देखा।

विवेक के माथे पर गहरी चोट लगी थी और खून पानी के साथ मिलकर बह रहा था।

संध्या के चेहरे पर चिंता साफ दिखाई देने लगी।

उसने आसपास नजर दौड़ाई लेकिन वहां दूर-दूर तक कोई भी नहीं था।

उसने विवेक को हिलाकर देखा।

लेकिन वह बिल्कुल बेहोश था।

अब संध्या समझ चुकी थी कि उसे तुरंत अस्पताल ले जाना जरूरी है।

उसने पूरी ताकत लगाकर विवेक को उठाया।

विवेक का शरीर भारी था।

लेकिन किसी तरह उसने उसे संभाला और कार तक ले आई।

काफी मुश्किल के बाद उसने उसे कार की पिछली सीट पर लिटा दिया।

फिर वह ड्राइविंग सीट पर बैठी और कार तेजी से अस्पताल की तरफ दौड़ा दी।

करीब 15 मिनट बाद वह एक प्राइवेट अस्पताल पहुंच गई।

अस्पताल के कर्मचारी स्ट्रेचर लेकर आए और विवेक को अंदर ले गए।

संध्या भी उनके पीछे-पीछे अंदर चली गई।

कुछ देर बाद रिसेप्शन पर बैठी महिला ने पूछा —

“आप मरीज की क्या लगती हैं?”

यह सवाल सुनकर संध्या कुछ सेकंड के लिए चुप रह गई।

उसने सोचा कि कह दे कि रास्ते में मिला था।

लेकिन अगले ही पल उसके मन में एक सवाल उठा —

आखिर विवेक की ऐसी हालत कैसे हो गई?

जो आदमी कभी अच्छी नौकरी करता था…

हमेशा साफ-सुथरे कपड़े पहनता था…

आज उसकी जिंदगी इस हालत में कैसे पहुंच गई?

कुछ पल सोचने के बाद उसने धीरे से कहा —

“मैं… इनकी पत्नी हूं।”

रिसेप्शनिस्ट ने फॉर्म में यह लिख दिया।

कुछ देर बाद डॉक्टर बाहर आए।

उन्होंने कहा —

“घबराने की जरूरत नहीं है। सिर पर चोट लगी है लेकिन हालत नियंत्रण में है।”

करीब आधे घंटे बाद विवेक को होश आया।

संध्या धीरे-धीरे उसके पास गई।

विवेक ने आंखें खोलीं।

और सामने खड़ी संध्या को देखा।

कुछ सेकंड तक वह उसे देखता रहा।

लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।

संध्या ने धीरे से पूछा —

“विवेक… तुम्हारी ऐसी हालत कैसे हो गई?”

लेकिन विवेक चुप रहा।

उसी समय डॉक्टर वहां आए।

उन्होंने संध्या को एक तरफ बुलाया और गंभीर आवाज में कहा —

“सिर की चोट के अलावा इनकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं लग रही।”

संध्या ने हैरानी से पूछा —

“मतलब?”

डॉक्टर बोले —

“लगता है इन्हें किसी गहरे सदमे ने तोड़ दिया है। इनका मानसिक संतुलन थोड़ा बिगड़ गया है।”

यह सुनकर संध्या बिल्कुल स्तब्ध रह गई।

जिस इंसान ने कभी उस पर शक करके रिश्ता तोड़ दिया था…

आज वही इंसान उसके सामने टूटा हुआ खड़ा था।

उस रात संध्या सो नहीं सकी।

उसके मन में एक ही सवाल घूम रहा था —

इन तीन सालों में विवेक के साथ क्या हुआ?

अगली सुबह वह सीधे अस्पताल पहुंची।

विवेक कमरे के कोने में चुपचाप बैठा था।

उसकी आंखें खुली थीं लेकिन उनमें कोई भाव नहीं था।

संध्या ने डॉक्टर से बात की।

डॉक्टर ने बताया कि विवेक को किसी गहरे सदमे ने मानसिक रूप से तोड़ दिया है।

यह सुनकर संध्या ने फैसला किया कि वह सच्चाई जाने बिना चैन से नहीं बैठेगी।

उसे याद आया कि तलाक के बाद विवेक अपने गांव चला गया था।

उसने कार उठाई और गांव की तरफ निकल पड़ी।

रास्ते भर वह अतीत की यादों में खोई रही।

उसे वह दिन याद आया जब वह और विवेक पहली बार मिले थे।

दोनों एक ही कंपनी में काम करते थे।

धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदल गई थी।

दोनों ने परिवार के खिलाफ जाकर शादी की थी।

लेकिन समय के साथ सब बदल गया।

संध्या की नई नौकरी के बाद विवेक के मन में शक पैदा हो गया।

किसी ने उसे कुछ तस्वीरें दिखा दी थीं।

जिनमें संध्या अपने ऑफिस के एक क्लाइंट से बात कर रही थी।

विवेक ने बिना सच्चाई जाने उन तस्वीरों पर विश्वास कर लिया।

और आखिरकार उसने तलाक दे दिया।

इन यादों में खोई हुई संध्या कब गांव पहुंच गई उसे पता ही नहीं चला।

उसने लोगों से विवेक के घर का पता पूछा।

आखिरकार वह घर तक पहुंच गई।

दरवाजा एक युवक ने खोला।

“आप कौन?”

संध्या ने धीमी आवाज में कहा —

“मैं संध्या हूं… विवेक की पत्नी… जिसे उसने तीन साल पहले तलाक दिया था।”

यह सुनते ही युवक रोने लगा।

वह विवेक का छोटा भाई रोहित था।

रोहित रोते हुए बोला —

“भाभी… हमें माफ कर दीजिए। गलती हमारी थी।”

संध्या चौंक गई।

रोहित ने सच बताया —

घरवालों को यह शादी पसंद नहीं थी।

उन्होंने ही रोहित से कहा था कि किसी तरह उनके रिश्ते में दरार डाल दे।

रोहित ने संध्या की एक तस्वीर खींचकर विवेक को दिखा दी थी।

और उसके मन में शक पैदा कर दिया था।

जब बाद में विवेक को सच्चाई पता चली…

तो वह पूरी तरह टूट गया।

घर छोड़कर चला गया।

और फिर कभी वापस नहीं आया।

यह सुनकर संध्या की आंखों से आंसू बहने लगे।

उसे अब सब समझ आ चुका था।

वह तुरंत वापस अस्पताल लौट आई।

उसने फैसला किया —

वह विवेक को फिर से सामान्य जिंदगी में लाने की कोशिश करेगी।

वह उसे आगरा के एक बड़े मानसिक रोग विशेषज्ञ के पास ले गई।

करीब एक साल तक उसने विवेक का इलाज करवाया।

दिन में वह नौकरी करती…

शाम को उसकी देखभाल करती।

एक दिन अचानक विवेक रो पड़ा।

“संध्या… मुझे माफ कर दो।”

उसकी याददाश्त वापस आने लगी थी।

उसने अपनी गलती स्वीकार की।

उसने बताया कि उसने एक डायरी लिखी थी।

दोनों पुराने घर गए और डायरी ढूंढ निकाली।

डायरी पढ़कर संध्या रो पड़ी।

उसमें विवेक ने हर दिन अपना पछतावा लिखा था।

आखिरकार संध्या ने कहा —

“चलो… हम फिर से नई शुरुआत करते हैं।”

विवेक ने कहा —

“मैं तुम्हारे लायक नहीं हूं।”

संध्या मुस्कुराई —

“गलती इंसान से ही होती है। अगर उसे अपनी गलती का एहसास हो जाए… तो वही सबसे बड़ा सुधार है।”

और इस तरह…

तीन साल बाद टूटा हुआ रिश्ता फिर से जुड़ गया।


सीख

रिश्तों में शक सबसे खतरनाक जहर होता है।

लेकिन अगर दिल में सच्चा प्यार और माफ करने की ताकत हो…

तो टूटा हुआ रिश्ता भी फिर से जुड़ सकता है।