तुम मेरे पति बन जाओ ₹10 Cr. दूँगी — करोड़पति लड़की ने गरीब किसान से किया मजबूरी का सौदा
.
.
.
“तुम मेरे पति बन जाओ… ₹10 करोड़ दूँगी”
करोड़पति लड़की का गरीब किसान से मजबूरी का सौदा — एक पूरी, मर्मस्पर्शी कहानी
हरियाणा के सदकपुर गाँव में सुबह का मतलब सिर्फ सूरज निकलना नहीं होता—सुबह का मतलब होता है जिंदगी का फिर से शुरू होना।
कच्ची पगडंडियों पर ओस की नमी, सरसों के खेतों की गंध, दूर मंदिर की घंटी, और कहीं-कहीं से उठती चूल्हे की धुआँधार लकीरें—ये सब मिलकर गाँव की सुबह को वैसा बनाते हैं, जैसा शहर के लोग सिर्फ फिल्मों में देखते हैं।
उस दिन भी सुबह लगभग पाँच बजे ईशान अपने पुराने कुएँ के पास खड़ा था। ठंडा पानी चेहरे पर डालकर उसने आँखें मल लीं। पानी की बूंदें उसके माथे से फिसलकर उसकी गर्दन पर उतर रही थीं और फिर धूप में तपे कंधों से नीचे बहकर मिट्टी में समा जाती थीं।
ईशान 27 साल का था। लंबा, मजबूत, पर उतना ही शांत। उसकी आँखों में एक अजीब-सी गहराई थी—जैसे कोई आदमी हँसना भी जानता हो और दर्द भी छुपाना भी। उसने कृषि विज्ञान में डिग्री ली थी। शहर में नौकरी मिल सकती थी—एसी वाले केबिन, फाइलें, मीटिंगें। पर उसने चुना था यह गाँव, यह खेत, यह मिट्टी… और अपनी बूढ़ी माँ गायत्री देवी।
ईशान के पिता कर्ज के बोझ के नीचे दबकर चले गए थे। जमीन गिरवी थी। घर की दीवारों में दरारें थीं। पर ईशान ने हिम्मत नहीं हारी। उसने दिन-रात मेहनत करके धीरे-धीरे कर्ज चुकाया, जमीन छुड़ाई और खुद से एक वादा किया—
“यह मिट्टी सिर्फ जमीन नहीं, मेरे बाप की इज्जत है।”
वह ट्रैक्टर स्टार्ट करने लगा। “डुगडुग… डुगडुग…”
गाँव की खामोशी में ट्रैक्टर की आवाज जैसे ऐलान कर रही थी कि—आज भी मेहनत जिंदा है।
1) धूल भरी सड़क पर उतरी शहर की रईसी
दोपहर तक धूप तेज हो चुकी थी। पीपल के पेड़ के नीचे बुजुर्ग हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। बच्चे गली में भागते हुए कंचे खेल रहे थे। तभी गाँव के मोड़ पर एक चमचमाती काली लग्ज़री SUV दिखाई दी।
गाँव जैसे एक पल में ठहर गया।
ऐसी गाड़ी सदकपुर में पहले कभी नहीं दिखी थी। उसकी चमक, उसके शीशों की काली परत, और उसके साथ चलता हुआ धूल का गुबार—सबकुछ शहर की अमीरी की तरह लगता था, जो गाँव की सादगी को बिना कुछ कहे चुभा देता है।
SUV के पीछे की सीट पर बैठी थी काव्या मल्होत्रा।
उसके चेहरे पर बड़े डिजाइनर चश्मे थे, लेकिन चश्मे के पीछे उसकी आँखों में जो थकान थी—वह किसी लंबे युद्ध की थकान थी।
काव्या कोई सामान्य लड़की नहीं थी। वह मल्होत्रा ग्रुप की उत्तराधिकारी थी—एक ऐसा नाम जिसके आगे शहर के बड़े-बड़े लोग “जी मैडम” कहकर झुकते थे।
लेकिन उस दिन काव्या की रीढ़ सीधी नहीं थी। अंदर कहीं कुछ टूट रहा था।
SUV ईशान के घर के पास रुकी। ड्राइवर ने दरवाज़ा खोला। काव्या उतरी—सूट बूट में, शहर की खुशबू में, लेकिन आँखों में मजबूरी लेकर।
ईशान उस वक्त ट्रैक्टर के नीचे झुका कोई पार्ट ठीक कर रहा था। उसने आवाज सुनी, बाहर निकला, गमछे से हाथ पोंछे।
काव्या ने धीमे से पूछा,
“क्या तुम ही… ईशान हो?”
ईशान ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा—इतनी महंगी, इतनी चमकदार, और इस धूल में इतनी अजीब।
उसने सहज-सा तंज किया,
“जी, मैं ही हूँ। आपको खेत का रास्ता भूल गया है या किसी ने गलत पता दे दिया?”
काव्या ने चश्मा उतारा। उसकी आँखें लाल थीं—शायद रात भर जागने से, या अंदर की जंग से।
उसने सीधे ईशान की आँखों में देखा और कहा—
“मैं रास्ता नहीं भूली। मैं तुमसे मिलने आई हूँ। मुझे एक पति चाहिए… सिर्फ छह महीने के लिए।”
ईशान जैसे सुन्न हो गया। उसे लगा उसने गलत सुना है।
“देखिए,” वह हँसा—लेकिन उसकी हँसी में कटुता थी—
“अगर यह कोई शहरी मज़ाक है, तो मेरे पास खेत में काम बहुत है। यहाँ हम फसल उगाते हैं। नाटक नहीं करते।”
काव्या की आवाज काँप गई।
“यह मज़ाक नहीं है।”

2) सच: “शादी नहीं हुई तो सब छिन जाएगा”
काव्या ने खुद को समेटकर कहा,
“मैं काव्या मल्होत्रा हूँ। मेरे चचेरे भाई इंद्रजीत की नजर मेरी जायदाद पर है। मेरे दादाजी की वसीयत के मुताबिक मुझे कल तक शादी करनी होगी, वरना कंपनी की कमान इंद्रजीत को चली जाएगी।”
ईशान चुप रहा।
काव्या आगे बोली,
“शहर का कोई रईस लड़का नहीं चाहिए। वो हिस्सेदारी माँगेगा, ब्लैकमेल करेगा, या मेरी कमजोरी बन जाएगा। मुझे ऐसा आदमी चाहिए… जो लालची न हो। तुम्हें…।”
ईशान की आँखें तनीं।
“तो आपको पति नहीं, मोहरा चाहिए।”
काव्या ने बिना नजरें झुकाए कहा,
“हाँ। अगर सच कहूँ तो… हाँ।”
फिर उसने धीरे से अपनी बात के ऊपर एक और परत चढ़ाई—परत पैसों की।
“मैं तुम्हें ₹10 करोड़ दूँगी। तुम्हारे गाँव की हर मुश्किल दूर हो जाएगी। कर्ज खत्म, खेत का सारा काम आसान, माँ की दवाई, घर की मरम्मत—सब। बस छह महीने तक… मेरे साथ पति बनकर रहना।”
ईशान ने ट्रैक्टर बंद कर दिया। उसका स्वर धीमा था, पर कठोर—
“काव्या जी, खेत में फसल उगने में महीनों लगते हैं। उसे काटने में एक दिन।
पर रिश्ता… रिश्ता सब्जी नहीं, जो बाजार से खरीद ली जाए।”
काव्या की पलकों पर आँसू टिक गए। वह जल्दी से पोंछना चाहती थी, जैसे आँसू भी उसके कंट्रोल से बाहर न निकल जाएँ।
“मेरी दुनिया में रिश्ता नहीं होता,” वह बोली, “वहाँ सिर्फ जरूरत होती है।
मेरे माँ-बाप का तलाक हुआ। मैं दस साल की उम्र में अकेली हो गई। तब से मैंने सिर्फ सौदे देखे।
आज अगर मैंने यह फैसला नहीं लिया, तो मेरे दादाजी का सपना राख हो जाएगा।”
उसने एक कदम आगे बढ़कर कहा—
“क्या तुम एक हारते हुए इंसान की मदद नहीं करोगे?”
ईशान ने पहली बार उसकी आँखों में ठीक से देखा। वहाँ घमंड नहीं था। वहाँ एक ऐसी लड़की थी जो जीतती हुई दिखती थी, पर अंदर से थककर हार चुकी थी।
कुछ देर खामोशी रही। फिर ईशान ने कहा—
“मैं आपकी दौलत के लिए हाँ नहीं कह रहा।
मैं हाँ कह रहा हूँ क्योंकि मैंने देखा है… अपनों का साथ छूट जाए तो कैसा लगता है।
और मैं नहीं चाहता कि आपके दादाजी का सपना वैसे ही टूट जाए जैसे मेरे पिता का।”
काव्या की साँस हल्की हुई। उसे यकीन नहीं हो रहा था कि जिसे वह एक सौदे का हिस्सा समझकर आई थी, वह इस सौदे को जिम्मेदारी बना रहा है।
फिर ईशान ने अपनी शर्त रखी—
“लेकिन मेरी एक शर्त है। शहर जाने से पहले आपको हमारे तरीके से शादी करनी होगी… और कुछ दिन मेरे घर रहना होगा। ताकि मेरी माँ को लगे कि यह सच है।”
काव्या ने मिट्टी की तरफ देखा। फिर ईशान की तरफ।
उसने पहली बार किसी पर भरोसा करते हुए कहा—
“कोशिश करूँगी।”
3) तहसील का कमरा और कागज पर लिखा रिश्ता
शहर की तहसील कचहरी का कमरा उम्मीद से कहीं ज्यादा छोटा और धूल भरा था। दीवारों पर पुराने फाइलों के ढेर, एक कोने में चरमराता पंखा, और टेबल पर फैले दस्तावेज।
वहाँ ना ढोल, ना शहनाई, ना लाल जोड़ा।
बस एक कॉन्ट्रैक्ट था—रिश्ते के नाम पर।
काव्या नीले फॉर्मल सूट में थी। चेहरे पर कॉर्पोरेट मास्क। बगल में ईशान—साफ सफेद कुर्ते में, सरल, स्थिर।
गवाह के रूप में ईशान के साथ रामू काका आए थे—गाँव के बुजुर्ग, जिनकी आँखों में भी यह सब किसी सपने जैसा था।
वकील ने बेरुखी से कहा,
“यहाँ और यहाँ… साइन कर दीजिए।”
काव्या के हाथ काँपे। उसे अपने माँ-बाप का टूटता रिश्ता याद आया। उसने कभी नहीं सोचा था कि वह किसी शादी के कागज पर हस्ताक्षर करेगी। लेकिन उसने किया।
क्योंकि उसके पास समय नहीं था।
ईशान ने पेन उठाया—और बहुत गंभीरता से साइन किए। जैसे वह सिर्फ दस्तखत नहीं कर रहा, किसी की जिंदगी का बोझ उठा रहा हो।
4) गाँव की देहरी: जहाँ सौदा परिवार बन गया
SUV जैसे ही सदकपुर पहुँची, पूरा गाँव खिड़कियों से झाँकने लगा।
ईशान का घर पक्का था, पर पुराना। चूने से पुती दीवारें। बरामदे में तुलसी का पौधा। आँगन में मिट्टी।
काव्या जैसे ही उतरी, सामने गायत्री देवी आरती की थाली लेकर खड़ी थीं। उनके चेहरे पर माँ की वह चमक थी, जो काव्या ने बरसों से नहीं देखी थी—क्योंकि उसके पास माँ तो थी ही नहीं, सिर्फ “मैनेजर” थे, “नैनी” थीं, “सिक्योरिटी” थी।
गायत्री देवी ने आरती उतारी, माथे पर तिलक लगाया और बोलीं—
“जीती रहे पुत्तर। आज इस घर के भाग्य खुल गए… जो तू इस चौखट पर आई है।”
“पुत्तर”—यह शब्द काव्या के सीने में कहीं जाकर लगा।
काव्या को अचानक लगा, उसने कंपनी बचाने के चक्कर में एक परिवार किराए पर नहीं लिया, बल्कि एक माँ की ममता के सामने खड़ी हो गई है—जिसकी कीमत कोई पैसा नहीं चुका सकता।
उस रात काव्या ने पहली बार समझा—गाँव गरीबी नहीं, धैर्य है।
और ईशान सिर्फ किसान नहीं, चरित्र है।
5) पहली रात: अंधेरा, मच्छर और लालटेन की रोशनी
रात करीब दस बजे काव्या लैपटॉप खोलकर बोर्ड मीटिंग के पेपर देख रही थी कि बिजली चली गई। पूरा कमरा घने अंधेरे में डूब गया। उमस, मच्छर, और इंटरनेट का न होना—उसके लिए सब नया था, और परेशान करने वाला।
“यह कैसी जगह है…” वह बड़बड़ाई, “ना बिजली, ना एसी, ना ढंग का इंटरनेट।”
तभी दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई।
ईशान अंदर आया—हाथ में लालटेन, और मटके का ठंडा पानी। उसके पास बाँस का हाथ वाला पंखा भी था।
उसने चुपचाप पानी रखा और काव्या को हवा करने लगा।
काव्या झुंझला पड़ी—
“ईशान, मैं यहाँ एक दिन भी नहीं रह सकती। मुझे नहीं पता था गाँव की जिंदगी इतनी मुश्किल होती है।”
ईशान शांत रहा।
“काव्या जी, शहर में बटन दबाते ही रोशनी मिल जाती है। इसलिए वहाँ के लोग उजाले की कदर भूल जाते हैं।
यहाँ हमें हर चीज़ के लिए इंतजार करना पड़ता है—बारिश के लिए, फसल के लिए… और बिजली के लिए भी।”
काव्या ने चिढ़कर पूछा,
“तो क्या आप चाहते हैं कि मैं भी इस इंतजार की आदत डाल लूँ?”
ईशान हल्का-सा मुस्कुराया।
“आदत नहीं… बस धैर्य का महत्व समझना चाहता हूँ। फसल पकने में समय लगता है, वैसे ही कुछ रिश्ते भी…”
काव्या कुछ नहीं बोली। पर उसने पंखा अपने हाथ में ले लिया।
उस रात, लालटेन की रोशनी में मटके का पानी पीकर काव्या ने पहली बार खिड़की से आकाश के तारे देखे।
उसे लगा—तारे शहर में भी होते हैं, पर दिखते नहीं।
शायद यही फर्क था—गाँव में जो कम है, वो सच ज्यादा है।
6) जिस “मोहरे” को वह लाई थी, वह नायक निकला
तीसरे दिन सुबह काव्या जल्दी उठ गई। बाहर देखा तो ईशान कुछ किसानों के साथ चौपाल पर बैठा था। वह उन्हें सरकारी योजनाओं, बीज की गुणवत्ता, मिट्टी की सेहत—सब बहुत सरल भाषा में समझा रहा था।
काव्या चुपचाप एक तरफ खड़ी होकर सुनती रही।
उसे पहली बार एहसास हुआ—ईशान सिर्फ खेत में हल नहीं चलाता।
वह अपने गाँव के लोगों को कॉर्पोरेट शोषण से बचने की समझ भी दे रहा था।
काव्या के मन में सम्मान की पहली किरण वहीं फूटी।
“जिसे मैं मोहरा समझकर आई थी… वो तो खुद में एक कहानी है।”
उस दिन उसने पहली बार चाय बनाई।
चाय का कप लेकर वह ईशान के पास गई, जो ट्रैक्टर ठीक कर रहा था। ईशान ने हैरानी से देखा… फिर मुस्कुराकर कप ले लिया।
ट्रैक्टर की छाया में बैठे-बैठे दोनों की बातें खुलने लगीं।
काव्या ने अपने माता-पिता के तलाक का दर्द बताया।
ईशान ने अपने पिता की मेहनत और अपने कर्ज की लड़ाई बताई।
उनके बीच जो दीवार थी—वो पहली बार दरार लेने लगी।
7) आग: जो “साजिश” थी, पर “बंधन” बन गई
उस रात गाँव की नींद टूट गई।
“आग! आग!” की चीखें गूँज उठीं।
काव्या घबरा कर बाहर भागी। उसने देखा—ईशान का अनाज गोदाम जल रहा था। ऊँची लपटें उठ रही थीं। यह दुर्घटना नहीं थी। यह साजिश थी।
काव्या का कलेजा मुँह को आ गया, जब उसने देखा ईशान आग की तरफ दौड़ रहा है।
“ईशान! बाहर निकलो!” वह चीखी। “जान से बढ़कर कुछ नहीं!”
पर ईशान अंदर गया—बीज के बोरे बाहर निकालने। क्योंकि वो सिर्फ उसका नुकसान नहीं था; गाँव के कई किसानों की उम्मीदें थीं।
गाँव वालों की मदद से आग बुझ गई, पर ईशान झुलस चुका था।
काव्या उसे सहारा देकर अंदर लाई। उसके हाथ काँप रहे थे। आँखों से आँसू गिरते जा रहे थे।
“यह सब मेरी वजह से हुआ…” वह रोई। “मुझे यहाँ नहीं आना चाहिए था।”
ईशान ने झुलसा हुआ हाथ उसके हाथ पर रखा।
“काव्या… यह अब सिर्फ तुम्हारी लड़ाई नहीं है। यह हमारी है।”
उस एक वाक्य ने काव्या के भीतर कुछ बदल दिया।
कॉन्ट्रैक्ट पीछे छूट गया।
और साझेदारी जन्म ले गई।
8) इंद्रजीत का हमला और ईशान का जवाब
अगले दिन दोपहर को तीन काली गाड़ियाँ धूल उड़ाती हुई घर के सामने रुकीं।
इंद्रजीत आया—बॉडीगार्ड, वकील, अहंकार… सब साथ।
वह ठहाका मारकर बोला,
“वाह! मल्होत्रा ग्रुप की वारिस… एक किसान की मरहम-पट्टी कर रही है। यह नाटक बंद करो, काव्या। बोर्ड को पता चल चुका है कि यह शादी सिर्फ कानूनी धोखाधड़ी है।”
काव्या आगे बढ़ी। उसकी आँखों में अब डर नहीं था।
“धोखाधड़ी तुम कर रहे हो। और बोर्ड को सच बताने के लिए… मैं खुद आ रही हूँ।”
इंद्रजीत ने ईशान की तरफ देख कर कहा,
“और सुनो किसान! अगर अभी साइन कर दे कि यह शादी झूठी है… तो इतना पैसा दूँगा कि सात पुश्तें खाएँगी।”
ईशान धीरे-धीरे उसके करीब गया।
उसकी सादगी उस महंगे सूट पर भारी पड़ रही थी।
“इंद्रजीत जी,” ईशान बोला, “आपने कीमत लगाना सीखा है… कदर करना नहीं।
काव्या जी का साथ मेरे लिए सौदा नहीं है। और पैसों की बात… मिट्टी से सोना उगाना हमें आता है।”
इंद्रजीत बौखला गया।
“कल बोर्ड मीटिंग में तुम कुछ साबित नहीं कर पाओगे!”
तभी ईशान ने जेब से एक पेनड्राइव निकाली।
“गवाह हमारे पास भी हैं। कल रात जब आपके आदमी गोदाम में आग लगा रहे थे… मेरे छोटे भाई राजेश ने वीडियो रिकॉर्ड किया है। और कॉल रिकॉर्ड भी निकलवाए हैं।”
इंद्रजीत की हँसी सूख गई।
9) बोर्ड मीटिंग: जहाँ शहर ने गाँव की सच्चाई देखी
अगले दिन मुख्य कार्यालय में बोर्ड मीटिंग हुई। इंद्रजीत को भरोसा था कि वह सब संभाल लेगा।
लेकिन काव्या और ईशान साथ अंदर आए—हाथ में सबूत, आँखों में आत्मविश्वास।
प्रोजेक्टर पर वीडियो चला। आगजनी। पेट्रोल। गुंडे। साफ़ चेहरा।
काव्या ने कड़क आवाज में कहा,
“यह व्यक्ति कंपनी के मूल्यों के खिलाफ है। इसने एक निर्दोष परिवार की जान लेने की कोशिश की है।”
ईशान ने बस इतना कहा—
“व्यापार भरोसे पर चलता है। जो इंसान अपने परिवार का नहीं हो सका, वह आपकी कंपनी का क्या होगा?”
बोर्ड झुक गया—दलीलों से नहीं, सच से।
पुलिस बुलाई गई। इंद्रजीत सस्पेंड हुआ। हथकड़ियाँ लगीं।
और पहली बार काव्या ने महसूस किया—वह अकेली नहीं है।
10) “कॉन्ट्रैक्ट पूरा हुआ… अब तुम आज़ाद हो”
मीटिंग के बाद काव्या अपने केबिन की खिड़की से शहर को देख रही थी।
ईशान पीछे आकर खड़ा हुआ।
काव्या ने धीरे से कहा,
“आज मेरी कंपनी बच गई। हमारा कॉन्ट्रैक्ट पूरा हुआ। अब तुम आज़ाद हो।”
ईशान ने मुस्कुराकर पूछा—
“क्या सच में आपको लगता है कि यह अब भी सिर्फ कॉन्ट्रैक्ट है? क्या आप चाहती हैं कि मैं चला जाऊँ?”
काव्या की आँखें जवाब दे रही थीं, पर जुबान डर रही थी।
क्योंकि पहली बार कोई रिश्ता शर्तों से नहीं, साथ से बन रहा था।
11) असली शादी: खेतों के बीच, दिल की स्याही से
कुछ हफ्तों बाद सदकपुर में फिर उत्सव था।
इस बार कारण कोई साजिश नहीं—शादी थी।
मल्होत्रा ग्रुप की चेयरपर्सन काव्या और प्रगतिशील किसान ईशान की असली शादी।
शादी किसी फाइव स्टार होटल में नहीं, उन्हीं खेतों के बीच थी जहाँ पहली मुलाकात हुई थी। गेंदे के फूल, टिमटिमाती लाइटें, गाँव की औरतों के मंगल गीत, और गायत्री देवी की आँखों में आशीर्वाद।
काव्या लाल बनारसी साड़ी में थी। उस चेहरे पर कॉर्पोरेट कठोरता नहीं, भीतर की शांति थी।
गायत्री देवी ने उसका हाथ थामकर जैसे कह दिया—अब तुम अकेली नहीं।
फेरे शुरू हुए।
ईशान ने झुककर काव्या के कान में कहा,
“याद है काव्या जी… हमारा कॉन्ट्रैक्ट आज खत्म हो रहा है। अब आप पूरी तरह आज़ाद हैं।”
काव्या रुकी। उसकी आँखों में पानी भर आया। उसने धीमे से कहा—
“नहीं ईशान… आज से एक नया कॉन्ट्रैक्ट शुरू हो रहा है। उम्र भर का।
और इस बार इसकी स्याही कोई वकील नहीं… मेरा दिल है।”
ईशान ने मुस्कुराकर उसकी माँग में सिंदूर भरा।
यह सिंदूर रस्म नहीं था—यह दो दुनिया के मिलन का प्रतीक था।
और जो कहानी “₹10 करोड़ के सौदे” से शुरू हुई थी…
वह “अमूल्य रिश्ते” पर खत्म हुई।
News
Emekli Paşaların Gölgesindeki Yolsuzluk Korgeneral Ayla Sancak’ın İhanet Temizliği
Emekli Paşaların Gölgesindeki Yolsuzluk Korgeneral Ayla Sancak’ın İhanet Temizliği . . . Emekli Paşaların Gölgesindeki Yolsuzluk: Korgeneral Ayla Sancak’ın İhanet…
Türkler Sahada İş Bilmez” — 8 Dakika 30 Saniyede Cevap Verdiler
Türkler Sahada İş Bilmez” — 8 Dakika 30 Saniyede Cevap Verdiler . . . Başlangıç: Bir Tatbikat ve Bir Meydan…
Türk Hademe – “Köpeğim Ol” Diyen Yüzbaşıyı – Tek Hamlede Diz Çöktürdü
Türk Hademe – “Köpeğim Ol” Diyen Yüzbaşıyı – Tek Hamlede Diz Çöktürdü . . . Türk Hademe – “Köpeğim Ol”…
कनाडा में भारतीय लड़कियों का चौंकाने वाला कांड! जो सामने आया, उसने सबको सन्न कर दिया!
कनाडा में भारतीय लड़कियों का चौंकाने वाला कांड! जो सामने आया, उसने सबको सन्न कर दिया! . . . कनाडा…
इंस्पेक्टर मैडम चोर को पकड़ने पहुँची, सामने निकला तलाकशुदा पति | सच्ची कहानी | Emotional Story
इंस्पेक्टर मैडम चोर को पकड़ने पहुँची, सामने निकला तलाकशुदा पति | सच्ची कहानी | Emotional Story . . . इंस्पेक्टर…
बेटी का एडमिशन कराने लंदन गई थी साधारण माँ…दुबई का सबसे बड़ा करोड़पति उसे देखते ही पैरों में झुक गया
बेटी का एडमिशन कराने लंदन गई थी साधारण माँ…दुबई का सबसे बड़ा करोड़पति उसे देखते ही पैरों में झुक गया…
End of content
No more pages to load






