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गाँव भीमरावपुर छोटा था, पर उसकी मिट्टी में आत्मसम्मान की खुशबू बसती थी। खेतों के चारों ओर फैली सरसों की पीली चादर, कच्ची गलियों में खेलते बच्चे, और शाम को मंदिर की घंटियों की ध्वनि—सब कुछ सामान्य था। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इस गाँव पर डर का साया छा गया था। कारण था थाना प्रभारी दरोगा मोहन ठाकुर, जिसने कानून की वर्दी को अपना निजी हथियार बना लिया था।

मोहन ठाकुर का नाम सुनते ही लोगों के चेहरों का रंग उड़ जाता। उसने कच्ची सड़क पर अवैध चेकिंग लगा रखी थी। जो भी उस रास्ते से गुजरता, उससे वह मनमानी रकम वसूलता। कोई ट्रैक्टर लेकर जाता तो चालान का डर दिखाता, कोई मोटरसाइकिल वाला मिलता तो कागज़ात में कमी निकाल देता। यहाँ तक कि साइकिल चलाने वाले बूढ़े किसान से भी हेलमेट और लाइसेंस पूछकर पाँच हजार रुपये माँग लेता। जो विरोध करता, उसे धमकी मिलती—“ड्रम में भरकर सीमेंट डाल दूँगा, कोई पता भी नहीं लगाएगा।”

गाँव वालों ने कई बार उच्च अधिकारियों से शिकायत की, पर हर बार मामला दबा दिया गया। कहते हैं, दरोगा की पहुँच ऊपर तक थी। लोग सहमे हुए थे। शाम ढलते ही घरों के दरवाज़े बंद हो जाते।

इसी गाँव में रामदुलारी रहती थी। उसका बेटा अर्जुन भारतीय सेना में जवान था और इस समय करनाल में तैनात था। कई महीनों से वह घर नहीं आया था। एक शाम जब डर और अन्याय की बातें सुनकर रामदुलारी का दिल भर आया, तो उसने काँपते हाथों से बेटे को फोन लगाया।

“बेटा, कब आएगा तू? गाँव की हालत ठीक नहीं है,” उसने भर्राई आवाज़ में कहा।

अर्जुन की आवाज़ में चिंता झलक उठी। “क्या हुआ माँ? किसने परेशान किया?”

रामदुलारी ने दरोगा की करतूतें बताईं। ड्रम में भरकर सीमेंट से दबा देने की धमकी सुनकर अर्जुन की मुट्ठियाँ भींच गईं। “माँ, तुम चिंता मत करो। मैं छुट्टी लेकर आ रहा हूँ।”

अगले ही दिन अर्जुन ने अपने कमांडिंग ऑफिसर से एक महीने की छुट्टी माँगी। उसने पूरे हालात विस्तार से बताए। अधिकारी ने गंभीर होकर कहा, “जवान, कानून हाथ में मत लेना। पर अगर सच में अत्याचार हो रहा है, तो सच का साथ देना। सावधानी से काम करना। जरूरत पड़े तो हमें सूचना देना।”

अर्जुन ने सलाम किया और गाँव के लिए रवाना हो गया।

बस से उतरते ही उसने देखा—वही कच्ची सड़क, वही खेत, पर वातावरण में अजीब सन्नाटा था। कुछ दूरी पर दरोगा मोहन ठाकुर अपने दो सिपाहियों के साथ खड़ा था। पास में एक बड़ा लोहे का ड्रम और सीमेंट की बोरियाँ रखी थीं। वह एक बूढ़े किसान को डरा रहा था।

“पाँच हजार दे, नहीं तो अंजाम बुरा होगा,” दरोगा गरजा।

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बूढ़ा हाथ जोड़कर कह रहा था, “साहब, मैं तो साइकिल से आया हूँ। इतना पैसा कहाँ से लाऊँ?”

अर्जुन आगे बढ़ा। “साहब, कानून में कहाँ लिखा है कि साइकिल पर हेलमेट जरूरी है? आप इस गरीब को क्यों डरा रहे हैं?”

दरोगा ने घूरकर देखा। “तू कौन होता है बीच में बोलने वाला?”

“मैं इस गाँव का बेटा हूँ, और भारतीय सेना का जवान,” अर्जुन ने दृढ़ स्वर में कहा।

दरोगा हँस पड़ा। “यहाँ मेरी चलती है। वर्दी उतार दूँगा तेरी।”

अर्जुन शांत रहा। “वर्दी की इज़्ज़त करना सीखिए। यह देश की रक्षा के लिए पहनी जाती है, डराने के लिए नहीं।”

दरोगा का अहंकार भड़क उठा। उसने सिपाहियों को इशारा किया। “इसे भी ड्रम में भर दो, बहुत बहादुरी दिखा रहा है।”

सिपाही झिझके, पर दरोगा के डर से आगे बढ़े। अर्जुन ने आत्मरक्षा में उनका हाथ रोका, पर वह किसी पर हमला नहीं करना चाहता था। तभी दूर से गाड़ियों का काफिला आता दिखाई दिया। दरअसल अर्जुन ने पहले ही अपने अधिकारी को स्थिति की सूचना दे दी थी।

जिले के उच्च अधिकारी और सेना के प्रतिनिधि वहाँ पहुँच गए। दृश्य देखकर सब स्तब्ध रह गए—ड्रम, सीमेंट की बोरियाँ, और डरे हुए ग्रामीण।

जाँच हुई। खेतों की मेड़ के पास खुदाई करवाई गई तो एक ड्रम बरामद हुआ, जिसमें बेहोशी की हालत में वही बूढ़ा किसान मिला जिसे पहले धमकाया गया था। समय रहते उसे बचा लिया गया। यह साबित हो गया कि दरोगा केवल धमकी नहीं देता था, बल्कि सच में लोगों को ड्रम में बंद कर डराता था।

मोहन ठाकुर को वहीं गिरफ्तार कर लिया गया। उसके खिलाफ हत्या के प्रयास, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग के मामले दर्ज हुए। गाँव वालों ने राहत की साँस ली।

रामदुलारी ने बेटे को गले लगा लिया। “तू आया तो जैसे भगवान आ गए।”

अर्जुन मुस्कुराया। “माँ, भगवान नहीं, बस अपना कर्तव्य निभाया है।”

कुछ महीनों बाद भीमरावपुर फिर से सामान्य हो गया। कच्ची सड़क अब पक्की बन चुकी थी। लोग निडर होकर गुजरते। अर्जुन अपनी ड्यूटी पर लौट गया, पर गाँव वालों के दिल में वह हमेशा के लिए बस गया।

इस घटना ने सबको एक सबक दिया—वर्दी चाहे पुलिस की हो या सेना की, उसका उद्देश्य जनता की रक्षा है, भय पैदा करना नहीं। जब कोई अपने अधिकार का दुरुपयोग करता है, तो सच और साहस मिलकर उसे रोक सकते हैं।

भीमरावपुर की मिट्टी आज भी गवाही देती है कि अन्याय कितना भी ताकतवर क्यों न लगे, एक सच्चा दिल और अडिग साहस उसे झुका सकता है।