दरोगा ने की आर्मी के साथ बदतमीजी और बुलेट में लगाई आग फिर SP ने जो किया देख के पूरा राज्य हिला।

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भारत के एक छोटे से जिले में सुबह का समय था। हल्की धूप खेतों पर फैल रही थी। गाँव की पगडंडियों पर लोग अपने-अपने काम में लग चुके थे। उसी गाँव के किनारे एक छोटी सी झोपड़ी में एक बुजुर्ग महिला सावित्री देवी रहती थीं। उनका जीवन बहुत साधारण था, लेकिन उनके दिल में एक ही सहारा था—उनकी बेटी, कैप्टन अंजली।

अंजली भारतीय सेना में अधिकारी थी। देश की सीमा पर तैनात होकर वह अपने देश की रक्षा करती थी। सावित्री देवी को अपनी बेटी पर बहुत गर्व था। गाँव के लोग भी अंजली को सम्मान की नजर से देखते थे। लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जिन्हें किसी की खुशी या सम्मान देखना अच्छा नहीं लगता।

उस इलाके में एक भ्रष्ट इंस्पेक्टर तिवारी और एक लालची लेखपाल काम करते थे। दोनों की मिलीभगत से कई गरीबों की जमीन हड़पी जा चुकी थी। अब उनकी नजर सावित्री देवी की जमीन पर थी।

वह जमीन सावित्री देवी के पति की आखिरी निशानी थी। कई साल पहले उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से वह खेत खरीदा था। उसी खेत की फसल से घर चलता था।

एक दिन अचानक इंस्पेक्टर तिवारी, लेखपाल और कुछ आदमी उस खेत पर पहुँच गए।

लेखपाल ने जमीन नापनी शुरू कर दी।

सावित्री देवी घबराकर दौड़ती हुई वहाँ पहुँचीं।

“ये आप लोग क्या कर रहे हैं?” उन्होंने कांपती आवाज में पूछा।

लेखपाल ने ठंडे स्वर में कहा,
“ये जमीन अब मंत्री जी के आदमी के नाम हो चुकी है।”

सावित्री देवी का दिल जैसे टूट गया।

“नहीं बेटा… ये जमीन मेरी है। मेरे पति की आखिरी निशानी है। तुम लोग ऐसा मत करो,” उन्होंने हाथ जोड़कर कहा।

लेकिन इंस्पेक्टर तिवारी हँस पड़ा।

“बुढ़िया, ज्यादा नाटक मत कर। अगर समझदारी है तो यहाँ से हट जा, नहीं तो जेल में डाल दूंगा।”

सावित्री देवी की आँखों से आँसू बहने लगे।

“बेटा, एक माँ की बद्दुआ कभी खाली नहीं जाती,” उन्होंने दर्द से कहा।

लेकिन तिवारी को किसी की बद्दुआ या दर्द की परवाह नहीं थी।

उसी समय सावित्री देवी की तबीयत बिगड़ने लगी। उन्हें दिल का दौरा पड़ गया। गाँव वालों ने उन्हें संभाला और किसी तरह अस्पताल ले जाने की कोशिश करने लगे।

गाँव का एक लड़का छोटू तुरंत फोन लेकर अंजली को कॉल करने लगा।

“दीदी… जल्दी आइए… आपकी जमीन पर कब्जा हो गया है… और माँ की हालत बहुत खराब है…”

फोन सुनते ही अंजली का दिल जोर से धड़कने लगा।

“क्या? माँ को अस्पताल ले जाओ… मैं तुरंत आती हूँ,” उसने घबराकर कहा।

अंजली तुरंत छुट्टी लेकर अपने गाँव के लिए निकल पड़ी। वह अपनी बुलेट मोटरसाइकिल पर तेज रफ्तार से सड़क पर दौड़ रही थी।

उसके मन में सिर्फ एक ही बात थी—माँ को बचाना है।

लेकिन रास्ते में पुलिस की चेकिंग लगी हुई थी।

इंस्पेक्टर तिवारी वहीं खड़ा था।

उसने अंजली को रोक लिया।

“गाड़ी साइड में लगाओ,” उसने घमंड से कहा।

अंजली ने बाइक रोकी और बोली,
“मुझे जल्दी है। मेरी माँ अस्पताल में हैं।”

तिवारी ने हँसते हुए कहा,
“पहले डॉक्यूमेंट दिखाओ।”

अंजली ने अपनी आर्मी आईडी दिखा दी।

“मैं इंडियन आर्मी से हूँ,” उसने कहा।

लेकिन तिवारी ने घमंड से कहा,
“आर्मी हो या मंत्री… यहाँ नियम सबके लिए एक हैं। दस हजार रुपये का फाइन लगेगा।”

अंजली हैरान रह गई।

“क्यों? मेरे सारे डॉक्यूमेंट सही हैं,” उसने कहा।

तिवारी की नजर अंजली पर खराब तरीके से घूम रही थी।

“अगर पैसे नहीं हैं… तो दूसरा तरीका भी है…” उसने गंदी मुस्कान के साथ कहा।

अंजली का खून खौल उठा।

“तमीज से बात करो इंस्पेक्टर,” उसने सख्त आवाज में कहा।

तिवारी हँस पड़ा।

“अरे वाह… फौजी होकर मुझे सिखाएगी?”

उसने धमकी दी।

“यहाँ से जाने नहीं दूंगा।”

अंजली ने मजबूरी में दस हजार रुपये दिए क्योंकि उसे माँ के पास पहुँचना था।

लेकिन तिवारी यहीं नहीं रुका।

उसने अंजली की बुलेट पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी।

अंजली की आँखों में गुस्से और दर्द के आँसू भर आए।

उसने तुरंत फोन निकाला और एसपी को कॉल किया।

“जय हिंद सर… मैं कैप्टन अंजली बोल रही हूँ… मुझे आपकी मदद चाहिए…”

एसपी विक्रम सिंह एक ईमानदार अधिकारी थे। उन्होंने पूरी बात सुनी।

उनकी आवाज सख्त हो गई।

“अंजली… तुम चिंता मत करो। मैं अभी पहुँच रहा हूँ।”

करीब दस मिनट बाद पुलिस की कई गाड़ियाँ वहाँ आ गईं।

एसपी खुद मौके पर पहुँचे।

उन्होंने जलती हुई बुलेट और रोती हुई अंजली को देखा।

उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।

“इंस्पेक्टर तिवारी!” उन्होंने जोर से आवाज लगाई।

तिवारी घबरा गया।

“सर… हम तो बस चेकिंग कर रहे थे…”

लेकिन एसपी ने उसे बीच में ही रोक दिया।

“झूठ मत बोलो!”

उन्होंने अंजली की ओर देखा।

“क्या यही आदमी है?”

अंजली ने सिर हिलाकर हाँ कहा।

अब एसपी का गुस्सा फूट पड़ा।

“तुम्हें शर्म नहीं आती? एक महिला के साथ बदतमीजी… वो भी एक आर्मी ऑफिसर के साथ?”

सभी पुलिस वाले चुप खड़े थे।

एसपी गरजते हुए बोले—

“जो इंसान भारतीय सेना का सम्मान नहीं करता… वह देशद्रोही से कम नहीं है।”

उन्होंने आदेश दिया—

“अभी इसी समय इसकी वर्दी उतारो और इसे गिरफ्तार करो।”

सभी पुलिसकर्मी तुरंत हरकत में आ गए।

तिवारी के हाथों में हथकड़ी डाल दी गई।

वह रोते हुए बोला—

“सर माफ कर दीजिए… मुझसे गलती हो गई…”

लेकिन एसपी ने सख्ती से कहा—

“कानून से बड़ा कोई नहीं है।”

फिर उन्होंने अंजली से कहा—

“चलो, मैं तुम्हें अस्पताल छोड़ देता हूँ।”

अस्पताल पहुँचकर अंजली ने अपनी माँ का हाथ पकड़ लिया।

सावित्री देवी धीरे से मुस्कुराईं।

“मुझे पता था… मेरी बेटी जरूर आएगी…”

अंजली की आँखों से आँसू बहने लगे।

उस दिन पूरे जिले में एक ही खबर फैल गई—

एक भ्रष्ट इंस्पेक्टर को गिरफ्तार किया गया क्योंकि उसने एक आर्मी ऑफिसर का अपमान किया था।

लोगों ने राहत की साँस ली।

और उस दिन सबको एक बात समझ में आ गई—

सच्चाई और ईमानदारी की ताकत सबसे बड़ी होती है।

जो लोग वर्दी का सम्मान करते हैं… वही सच्चे देशभक्त होते हैं।

और जो लोग वर्दी की आड़ में गलत काम करते हैं… कानून उन्हें एक दिन जरूर सजा देता है।

कैप्टन अंजली फिर से सीमा पर लौट गई।

लेकिन इस बार उसके दिल में एक और मजबूत विश्वास था—

कि इस देश में अभी भी न्याय जिंदा है।