“दरोगा ने IPS को भिखारी समझा और किया बदतमीजी – फिर हुआ ऐसा पल जो सबने देखा!”

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आईना महाकुंभ का

महाकुंभ का इलाका सुबह से ही शोर में डूबा हुआ था।
घंटियों की आवाज़, शंखनाद, हर हर गंगे के नारे और लाखों कदमों की हलचल—
सब कुछ मिलकर एक ऐसा दृश्य रच रहे थे, जिसमें आस्था भी थी और अव्यवस्था भी।

इसी भीड़ में एक बूढ़ी औरत लगभग गिरती हुई आगे बढ़ रही थी।
उसके चेहरे पर डर था, आँखों में आँसू और हाथ काँप रहे थे।

वह सीधे ज़िला पुलिस कार्यालय पहुँची।

“मैडम… मेरी बेटी को बचा लीजिए…”

ड्यूटी पर बैठी महिला अधिकारी ने तुरंत कुर्सी छोड़ी।

“माँ जी, पहले बैठिए… पानी पीजिए… और शांत होकर बताइए, क्या हुआ है?”

बूढ़ी औरत फूट-फूट कर रो पड़ी।

“मैडम… मेरी बेटी अनन्या महाकुंभ गई थी दर्शन के लिए…
वहाँ किसी दरोगा ने उसे रोक लिया…
और अब दो दिन से वह घर नहीं लौटी…”

उसकी आवाज़ टूट गई।

“मुझे डर लग रहा है मैडम…
कहीं उस पुलिस वाले ने मेरी बच्ची के साथ कुछ गलत तो नहीं कर दिया…”

महिला अधिकारी की आँखों में एक अजीब सी कठोर चमक आ गई।

“आप चिंता मत कीजिए,”
उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा।
“आपकी बेटी को कुछ नहीं होगा।
मैं आपसे वादा करती हूँ।”

उसने अपने स्टाफ़ को इशारा किया।

“माँ जी, आप घर जाइए।
बहुत जल्द आपकी बेटी आपको मिल जाएगी।”

बूढ़ी औरत हाथ जोड़ती हुई चली गई।

कमरा शांत हो गया।

लेकिन उस महिला अधिकारी के भीतर तूफ़ान उठ चुका था।


एक फैसला

वह महिला थी आईपीएस रानी मिश्रा

सख़्त, ईमानदार और नियमों से समझौता न करने वाली अधिकारी।

पिछले कुछ महीनों से महाकुंभ क्षेत्र से लगातार शिकायतें आ रही थीं—
अवैध वसूली, महिलाओं से बदतमीजी, गरीबों को थाने में बंद करना।

रानी कुर्सी से उठी और खिड़की के पास जा खड़ी हुई।

“आख़िर चल क्या रहा है महाकुंभ में…”
उसने खुद से कहा।

“अगर रोज़ शिकायतें आ रही हैं,
तो इसका मतलब है कि नीचे कुछ बहुत गंदा पक रहा है।”

लेकिन समस्या यह थी कि—

महाकुंभ क्षेत्र में जाते ही सब पहचान लेंगे कि वह आईपीएस है।
और फिर सच्चाई कभी सामने नहीं आएगी।

तभी उसके मन में एक ख्याल आया।

“अगर मैं…
अगर मैं वहाँ एक भिखारी बनकर जाऊँ?”

वह पलटी।

“हां… यही तरीका है।”

उसने तुरंत अपने विश्वस्त स्टाफ़ ऑफिसर सुरेश को बुलाया।

“सुरेश, महाकुंभ क्षेत्र का इंचार्ज कौन है?”

सुरेश थोड़ा हिचका।

“मैम… दरोगा रणविंद्र सिंह।”

“और उसकी छवि?”

सुरेश ने आवाज़ धीमी कर ली।

“मैम…
नशे में रहता है।
बिना उसके वहाँ कुछ नहीं होता।
वसूली उसका रोज़ का काम है।”

रानी ने सिर हिलाया।

“ठीक है।
अब सुनो।
मैं इस मिशन को गुप्त तरीके से करूँगी।”

सुरेश चौंक गया।

“मैम… आप खुद?”

“हां,”
रानी की आवाज़ में कोई हिचक नहीं थी।
“मैं भिखारी बनकर जाऊँगी।
कपड़ों में कैमरा, रिकॉर्डर—
सब कुछ तैयार रखो।”

सुरेश घबरा गया।

“मैम, ये बहुत रिस्क है…”

रानी मुस्कराई।

“सच हमेशा रिस्की होता है, सुरेश।”


भिखारी और दरोगा

महाकुंभ की भीड़ में एक फटी पुरानी साड़ी पहने एक औरत घूम रही थी।
चेहरा गंदगी से ढका, बाल बिखरे हुए।

कोई पहचान नहीं सकता था कि यह औरत जिले की सबसे ताक़तवर आईपीएस अधिकारी है।

वह ध्यान से देख रही थी।

तभी उसने देखा—

कुछ गाँव की महिलाएँ रोती हुई खड़ी थीं।
उनके सामने खड़ा था—
दरोगा रणविंद्र सिंह

“अबे चुप!”
वह चिल्लाया।
“तुम्हें पकड़ा है मज़े के लिए!”

उसके साथ खड़े सिपाही हँस रहे थे।

“साहब, आज बड़ा मज़ा आएगा,”
एक बोला।

रानी का खून खौल उठा।

वह आगे बढ़ी।

“साहब…
इन महिलाओं ने क्या किया है?”

रणविंद्र ने उसे ऊपर से नीचे देखा।

“अबे भिखारी!”
“अपनी औकात भूल गई है?”

उसने हाथ उठाया।

थप्पड़।

पूरा इलाका सन्न हो गया।

“ये थप्पड़ सिर्फ मुझे नहीं,”
रानी ने मन में कहा,
“हर उस गरीब को पड़ा है…”

रणविंद्र हँसा।

“भाग यहाँ से।
नहीं तो यहीं गाड़ दूँगा।”

रानी पीछे हटी।

लेकिन उसके होंठों पर हल्की मुस्कान थी।

“तेरा घमंड ही तुझे डुबोएगा,”
वह बुदबुदाई।


सच की रिकॉर्डिंग

अगले कुछ घंटे रानी ने महाकुंभ क्षेत्र में बिताए।

उसने देखा—

दुकानदारों से रोज़ हज़ारों की वसूली।
गरीब तीर्थयात्रियों को बैरिकेड में रोकना।
औरतों को धमकाना।

सब कुछ रिकॉर्ड हो चुका था।

अब बारी थी—
इस सच को बाहर लाने की।

वह सीधा शहर की सबसे बड़ी न्यूज़ एजेंसी पहुँची।

गार्ड ने उसे रोका।

“अरे भिखारी, यहाँ क्या काम?”

रानी ने शांत स्वर में कहा—

“मैं इस जिले की आईपीएस रानी मिश्रा हूँ।”

गार्ड हँस पड़ा।

तभी मैनेजर बाहर आया।

उसे देखते ही चौंक गया।

“मैम?! आप यहाँ?”

कुछ ही घंटों में—

वीडियो देशभर में वायरल हो गए।


जनता का तूफ़ान

सड़कों पर नारे गूँजने लगे—

“न्याय चाहिए!”
“भ्रष्ट दरोगा हटाओ!”

टीवी चैनलों पर एक ही खबर—

“भिखारी बनकर आईपीएस ने किया बड़ा खुलासा!”

राष्ट्रपति कार्यालय तक मामला पहुँच गया।

आदेश आया—

“दरोगा रणविंद्र सिंह को तुरंत सस्पेंड कर गिरफ़्तार किया जाए।”


अंत नहीं—शुरुआत

थाने के बाहर भीड़ जमा थी।

रानी सामने आई।

“रणविंद्र सिंह,
आपको जनता के साथ विश्वासघात के आरोप में गिरफ़्तार किया जाता है।”

रणविंद्र का चेहरा पीला पड़ गया।

“वो भिखारी…
वो तुम थीं?”

रानी ने आँखों में आँखें डालकर कहा—

“हां।
और अब जनता देखेगी कि
घमंड का अंत क्या होता है।”


सीख

रानी मिश्रा ने माइक पकड़ा।

“सच किसी एक की वजह से नहीं जीतता।
सच तब जीतता है जब जनता डरना छोड़ देती है।”

भीड़ तालियों से गूँज उठी।


अंतिम पंक्तियाँ

इंसान की पहचान उसकी वर्दी से नहीं,
उसके व्यवहार से होती है।

और जो सत्ता को सेवा समझ ले—
वही असली अधिकारी होता है।