दसवीं फ़ैल लड़के ने करोड़पति से कहा मुझे नौकरी दें 3 महीने में आपकी कंपनी का नक्शा बदल दूंगा , न बदल

क्या सचमुच एक कागज़ का टुकड़ा, जिसे हम डिग्री कहते हैं, इंसान की असली काबिलियत का पैमाना होता है? क्या ज्ञान सिर्फ किताबों और क्लासरूम की चारदीवारी तक सीमित है? यह सवाल अक्सर हमारे समाज में उठते रहते हैं। आज की कहानी एक ऐसे युवक की है, जिसने बिना डिग्री और क्वालिफिकेशन के भी यह साबित कर दिया कि असली सफलता का रास्ता हुनर, जुनून और ईमानदारी से होकर जाता है।

शुरुआत: एक चाय वाले का बेटा

गुरुग्राम की भीड़भाड़ भरी कॉलोनियों में एक छोटा-सा घर था, जिसमें 24 वर्षीय दिलीप अपनी मां के साथ रहता था। उसके नाम के आगे हमेशा एक ठप्पा लगता—“10वीं फेल”। यही ठप्पा उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गया था। लोग कहते, “यह लड़का कुछ नहीं कर सकता।” लेकिन उन सबकी नजर से छुपा हुआ था दिलीप का तेज दिमाग और उसकी अनोखी सोच।

उसकी मां ने घर चलाने के लिए एक छोटी-सी चाय की दुकान खोल रखी थी। दिलीप दिनभर उसी दुकान पर काम करता—चाय बनाता, बर्तन धोता और ग्राहकों से बातें करता। दुकान ठीक उस फैक्ट्री के बाहर थी, जहाँ देश की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक ओबेरॉय एंटरप्राइजेज का सामान बनता था।

दिलीप अक्सर फैक्ट्री के गेट पर नजरें गड़ाए खड़ा रहता। वह देखता कि कैसे ट्रक ड्राइवरों को गेट पास के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता, कैसे मजदूर थके-हारे चेहरे लिए अंदर जाते और बाहर आते, कैसे लाखों का माल बर्बाद होता और बड़े-बड़े मैनेजर अपनी गाड़ियों में आते-जाते लेकिन असली समस्याओं से अनजान रहते।

तूफान की शुरुआत

एक दिन उसकी मां की तबीयत अचानक बिगड़ गई। डॉक्टर ने बताया कि दिल का ऑपरेशन करना होगा और लाखों रुपए खर्च होंगे। यह सुनकर दिलीप के पैरों तले जमीन खिसक गई। चाय की दुकान से इतना पैसा जुटाना असंभव था। उसी रात दिलीप ने ठान लिया कि अब वह अपनी जिंदगी बदलकर रहेगा।

अगले दिन वह सीधे ओबेरॉय टावर्स पहुंचा और गार्ड से कहा, “मुझे सचिन ओबेरॉय से मिलना है।”
गार्ड हंस पड़ा—“पागल है क्या? साहब किसी से भी नहीं मिलते।”
लेकिन दिलीप ने हार नहीं मानी। वह रोज सुबह आता और शाम तक गेट पर खड़ा रहता। धूप, बारिश, भूख, प्यास—सब झेलता। आखिरकार उसकी जिद सचिन ओबेरॉय के कानों तक पहुंची और उन्होंने उसे अपने कैबिन में बुला लिया।

असंभव शर्त

60 वर्षीय सचिन ओबेरॉय एक ऐसे उद्योगपति थे जिन्होंने अपने पिता के छोटे से कारोबार को एक मल्टीनेशनल साम्राज्य में बदल दिया था। उनके लिए हर चीज़ का पैमाना था—डिग्री और क्वालिफिकेशन

उन्होंने गुस्से से पूछा—“क्या चाहिए तुम्हें?”
दिलीप बोला—“साहब, मुझे नौकरी चाहिए।”
“क्वालिफिकेशन?”
“मैं 10वीं फेल हूं।”

यह सुनते ही सचिन भड़क उठे। लेकिन तभी दिलीप ने एक ऐसी शर्त रखी जिसने सबको हैरान कर दिया—
“साहब, मुझे सिर्फ 3 महीने का वक्त दीजिए। अगर मैं आपकी कंपनी का नक्शा नहीं बदल पाया तो आप मुझे जेल भिजवा दीजिए।”

पहली बार किसी ने सचिन से इतनी हिम्मत के साथ बात की थी। वह चौंक गए। दिलीप की आंखों में उन्हें एक ऐसी चमक दिखी जो किसी मैनेजर में नहीं थी। उन्होंने कहा, “ठीक है, 3 महीने। तनख्वाह दस हजार रुपए। कोई पद नहीं, कोई कैबिन नहीं। अगर नाकाम रहे तो जेल पक्की।”

असली काम की शुरुआत

दिलीप ने अपना सफर एयर कंडीशन मीटिंग रूम से नहीं बल्कि फैक्ट्री फ्लोर से शुरू किया। वह मजदूरों के साथ खाना खाता, ट्रक ड्राइवरों से बातें करता, गार्ड्स के साथ ड्यूटी पर खड़ा रहता। धीरे-धीरे सबका भरोसा जीत लिया।

उसने सबसे पहले फैक्ट्री की बर्बादी पर ध्यान दिया। मशीनों के नीचे ट्रे लगवाई ताकि गिरने वाला माल बर्बाद न हो। इससे हर महीने लाखों की बचत होने लगी। फिर उसने ट्रकों के लिए टाइम स्लॉट सिस्टम बनाया जिससे घंटों की देरी खत्म हो गई और कामकाज तेज हो गया।

उसका अगला कदम था—सुझाव पेटी। उसने कहा, “जिसका सुझाव कंपनी के लिए फायदेमंद होगा, उसे इनाम मिलेगा और उस सुझाव को लागू करने की जिम्मेदारी उसी की होगी।” मजदूरों और कर्मचारियों में जोश लौट आया। छोटे-छोटे सुझावों से बड़े-बड़े बदलाव होने लगे।

सबसे बड़ी चुनौती

दिलीप जानता था कि असली परीक्षा बाजार में है। उसने कंपनी के सबसे पुराने और मशहूर प्रोडक्ट “सम्राट बिस्किट” पर काम शुरू किया। दुकानदारों और ग्राहकों से बात कर उसने पाया कि लोग इसे पुराना और बोरिंग मानने लगे थे।

उसने आरएंडडी टीम को नए फ्लेवर और पैकेजिंग पर काम करने के लिए राजी किया। नतीजा निकला—“सम्राट नेक्स्ट जन”। चमकदार पैकेजिंग, नया स्वाद, वही पुरानी कीमत। सैंपल बाजार में आते ही हाथों-हाथ बिक गए।

आखिरी परीक्षा

तीन महीने पूरे होने वाले थे। सचिन ओबेरॉय ने बोर्ड मीटिंग बुलाई। वहां मिस्टर चड्ढा जैसे बड़े-बड़े मैनेजरों ने झूठे आंकड़े पेश किए और कहा कि दिलीप कंपनी को बर्बाद कर रहा है। सबको लगा कि अब दिलीप जेल जाएगा।

तभी दरवाजा खुला और अंदर आए मजदूर, गार्ड, ड्राइवर और दुकानदार। सबने गवाही दी कि कैसे दिलीप ने कंपनी को बदल दिया है। उन्होंने सबूत और रजिस्टर पेश किए। सचिन ओबेरॉय की आंखों में चमक लौट आई। उन्होंने गुस्से से कहा—“चड्ढा, तुम और तुम्हारी टीम तुरंत इस्तीफा दो।”

फिर वह दिलीप की तरफ मुड़े और पूरे बोर्ड के सामने घोषणा की—
“आज से ओबेरॉय एंटरप्राइजेज के नए चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर होंगे मिस्टर दिलीप।”

पूरा कमरा तालियों से गूंज उठा।

एक नई शुरुआत

उस दिन के बाद कंपनी का चेहरा बदल गया। फैसले अब मीटिंग रूम में नहीं बल्कि फैक्ट्री फ्लोर पर लिए जाने लगे। कर्मचारियों की राय मायने रखने लगी। कुछ ही सालों में कंपनी ने सफलता के नए कीर्तिमान बनाए।

और दिलीप? जो कभी 10वीं फेल कहलाता था, वही आज देश के सबसे सफल बिजनेस लीडर्स में गिना जाने लगा। लेकिन वह आज भी अपना ज्यादातर समय मजदूरों और कर्मचारियों के बीच बिताता था।

संदेश

यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी इंसान को उसकी डिग्री से नहीं, बल्कि उसके हुनर और नजर से आंका जाना चाहिए। डिग्री कागज़ पर होती है, लेकिन असली काबिलियत दिमाग और दिल में होती है।

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