दुनिया के Genius भी Fail… 10 साल की बच्ची ने जो किया वो असंभव है.. पूरा हॉस्पिटल सिस्टम फेल

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1) सुबह 9:45—जब अस्पताल की धड़कन रुक गई

सुबह के ठीक 9:45 बजे थे। “मेहर सिटी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल” हर रोज़ की तरह जीवित था—जैसे एक छोटा शहर। रिसेप्शन पर टोकन नंबर पुकारे जा रहे थे, नर्सें ट्रॉली धकेल रही थीं, डॉक्टरों के कोट की जेबों से पेन झांक रहे थे, और आईसीयू के बाहर खड़े लोग उम्मीद के सहारे सांस ले रहे थे।

अस्पताल में सब कुछ मशीनों की लय पर चलता है—लिफ्ट की “टिंग”, मॉनिटर की “बीप-बीप”, ऑक्सीजन की धीमी फुसफुसाहट, और कंट्रोल रूम की स्क्रीनें… जो एक साथ पूरे भवन का “दिमाग” थीं।

और फिर… जैसे किसी ने उस दिमाग की नस दबा दी।

पहले लाइटें हल्की-सी झपकीं।
फिर एक साथ पूरे अस्पताल की स्क्रीनें ब्लैक हो गईं।

आईसीयू में मॉनिटर की बीप अचानक रुक-सी गई।
ऑपरेशन थिएटर के एक कोने में मशीन पर लाल लाइट जगमगाई और फिर—ऑफ
लिफ्टें बीच में अटक गईं।
बच्चों के वार्ड में मॉनिटर स्क्रीनें डार्क हो गईं।
और अगले 10 सेकंड में पूरा अस्पताल ऐसा लगा जैसे किसी ने उसकी रीढ़ निकाल दी हो।

“जनरेटर!” कोई चिल्लाया।
“ऑटो स्टार्ट क्यों नहीं हुआ?” किसी ने दौड़ते हुए पूछा।
“कंट्रोल रूम चेक करो—जल्दी!”

दौड़ते कदम, पसीने की गंध, घबराहट की धड़कन—और सैकड़ों लोगों के भीतर एक ही डर:
“अब क्या होगा?”

2) कंट्रोल रूम: जहाँ इंजीनियर भी बेबस थे

कंट्रोल रूम का दरवाज़ा खुला। भीतर पाँच इंजीनियर एक साथ घुसे—मानो आग लगी हो। उनकी निगाहें काली पड़ी स्क्रीन पर टिक गईं। कोई कीबोर्ड पर उंगलियां दौड़ाने लगा, कोई केबल देख रहा था, कोई सर्वर रैक के पास झुका खड़ा था।

“सर… मेन सर्वर रिस्पॉन्ड नहीं कर रहा।” एक इंजीनियर की आवाज़ काँप रही थी।
“बैकअप भी डाउन है।” दूसरे ने कहा।
“जनरेटर का ऑटो स्टार्ट भी फेल हो गया!” तीसरा लगभग चीख पड़ा।

कमांड चलाए गए—पर स्क्रीन पर सिर्फ लाल रंग के एरर कोड चमकते रहे।
एक घंटे बाद भी वही सन्नाटा, वही लाल संकेत, वही “लॉक” का संकेत—और बाहर… मरीजों का बढ़ता हुआ शोर।

इसी बीच अस्पताल के मालिक अमित मेहरा भागते हुए आए। उनकी आंखों में नींद नहीं थी, बस चिंता थी—और उससे भी ज्यादा डर कि “इतने बड़े अस्पताल में यह बदनामी…”

“ये क्या हो रहा है?” अमित मेहरा की आवाज़ फटी।
“पूरा अस्पताल बंद पड़ा है। मरीज हैं… आईसीयू है… ओटी है… आप लोग कर क्या रहे हैं?”

मुख्य इंजीनियर ने सूखा सा थूक निगला।
“सर… समझ नहीं आ रहा। सिस्टम जवाब नहीं दे रहा। अंदर… एक तरह का लॉक लग गया है।”

अमित मेहरा ने दांत पीसे।
“स्पेशल टेक्निकल टीम बुलाओ। दिल्ली से! जो भी करना पड़े—करो!”

कुछ समय बाद एक बाहरी साइबर-टेक टीम भी आ गई। लैपटॉप खुल गए। केबल बदली गईं। अलग-अलग डायग्नोस्टिक्स चले। लेकिन जैसे-जैसे घंटे बीतते गए, एक सच्चाई पूरे कंट्रोल रूम में फैलने लगी—
यह सिर्फ बिजली या हार्डवेयर की समस्या नहीं थी।

“सर… यह लॉकआउट जैसा लग रहा है।” किसी ने दबे स्वर में कहा।
“कोई बड़ी मिस-कॉन्फ़िगरेशन या सेफ्टी-ट्रिगर…”

और बाहर अस्पताल में एक ऐलान हुआ:
अटेंशन प्लीज़—सभी डॉक्टर कृपया मैनुअल मोड पर काम करें। सिस्टम के ठीक होने में समय लग सकता है।

मैनुअल मोड…
मतलब रिपोर्ट्स फटाफट नहीं निकलेंगी।
मतलब डिजिटल हिस्ट्री नहीं दिखेगी।
मतलब ओटी में हर कदम जोखिम भरा।
मतलब आईसीयू में “हर मिनट” भारी।

3) अस्पताल से 4 किलोमीटर दूर: एक बच्ची और एक पुराना लैपटॉप

उसी दिन दोपहर में, अस्पताल से करीब चार किलोमीटर दूर—एक सरकारी स्कूल की छुट्टी हुई।

सफाई कर्मचारी रघु अपनी बेटी को लेने आया। रघु इसी अस्पताल में सफाई का काम करता था। उसकी जिंदगी में बड़े शब्द कम थे—“सैलरी”, “ड्यूटी”, “ओवरटाइम”, “बिल”—और बेटी के लिए एक सपना:
“पढ़-लिखकर इससे बेहतर जिंदगी।”

स्कूल के गेट से उसकी बेटी निकली—आर्या, उम्र बस 10 साल। चेहरे पर पसीना, कंधे पर पुराना बैग, आँखों में दुनिया देखने की जिद।

“बाबा, आज बहुत गर्मी है। चलो घर चलें।” आर्या ने कहा।

रघु ने उसके माथे से पसीना पोंछा।
“हाँ बेटा… पर पहले अस्पताल जाना पड़ेगा। वहाँ आज बहुत मुसीबत है।”

आर्या की आँखें चमक उठीं।
“कैसी मुसीबत?”

रघु ने चलना धीमा किया।
“पूरा सिस्टम बंद हो गया है। बड़ी-बड़ी मशीनें बंद। इंजीनियर आए हैं। दिल्ली की टीम भी बुला ली… लेकिन कुछ ठीक नहीं हो रहा।”

आर्या का हाथ अपने बैग की स्ट्रैप पर कस गया।
“बाबा… मैं भी चलूं? सिर्फ देख लूंगी… क्या हुआ है।”

रघु चौंक गया।
“पागल है क्या? अस्पताल में अफरा-तफरी है। तू घर चल।”

आर्या ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी आवाज़ छोटी थी, लेकिन उसमें अजीब-सा भरोसा था।
“प्लीज़ बाबा… बस देखना है।”

रघु जानता था—उसकी बेटी जिद्दी है। लेकिन आज उसकी आंखों में कुछ और था। जैसे कोई बत्ती अचानक जल उठी हो।

अंततः रघु ने हार मान ली।
“ठीक है। पर वहाँ जाकर चुपचाप बैठना। किसी चीज़ को हाथ नहीं लगाना। समझी?”

आर्या मुस्कुराई।
“समझ गई बाबा।”

रघु नहीं जानता था कि आर्या का “चुप” रहना भी कभी-कभी एक तूफान को रोकने जैसा होता है।

क्योंकि घर में एक पुराना-सा लैपटॉप था—कबाड़ से खरीदा हुआ। स्क्रीन पर कभी लाइनें आतीं, बैटरी जल्दी खत्म होती, और कीबोर्ड के कुछ बटन घिस चुके थे। लेकिन उसी पर आर्या ने अपनी दुनिया बनाई थी।

वह रोज़ स्कूल से आकर वीडियो देखती—किसी का कंप्यूटर क्यों फ्रीज़ होता है, सिस्टम कैसे स्टार्ट होता है, नेटवर्क क्या करता है, और मशीनें “सुरक्षा” के लिए खुद को क्यों लॉक कर लेती हैं।
वह समझती नहीं थी कि इसे “टेक” कहते हैं या “आईटी”—वह बस इतना जानती थी कि चीज़ें कारण से चलती हैं।
और अगर कारण मिल जाए, तो समाधान भी मिल जाता है।

4) दोपहर 12:45—अस्पताल का हाहाकार और आर्या की बेचैनी

12:45 पर रघु और आर्या अस्पताल पहुंचे।
अस्पताल अब भी हाहाकार में था।

कॉरिडोर में एक नर्स दौड़ती हुई बोली—
“आईसीयू में बच्चे का वेंटिलेटर बैकअप पर भी ठीक नहीं हो रहा, जल्दी!”

एक डॉक्टर गुस्से में बड़बड़ाया—
“इतने बड़े अस्पताल में सिस्टम डाउन? ये कैसे हो सकता है!”

रघु ने आर्या को पीछे के एक कॉरिडोर में बेंच पर बैठाया।
“यहाँ बैठ। मैं अपनी ड्यूटी देखता हूँ। कहीं मत जाना।”

आर्या ने सिर हिला दिया।
लेकिन उसकी आंखें स्थिर नहीं थीं। वह हर बीप, हर चीख, हर बंद स्क्रीन को देख रही थी।
और उसके भीतर एक बेचैनी बढ़ती जा रही थी—जैसे कोई पहेली उसके सामने खुलने ही वाली हो।

थोड़ी दूर पर कंट्रोल रूम के बाहर “Authorized Personnel Only” का बोर्ड लगा था। अंदर से इंजीनियरों की आवाजें आ रही थीं।

“सिस्टम लॉक हो गया है!”
“हम सर्वर में घुस ही नहीं पा रहे!”
“जबरदस्ती ऑन किया तो क्रैश हो जाएगा!”

आर्या ने धीरे से अपने आप से कहा—
“लॉक… क्रैश… अगर यह सुरक्षा लॉक है तो…”

वह उठी नहीं। बस सोचती रही। उसके दिमाग में पुराने वीडियो के टुकड़े घूम रहे थे—जहाँ मशीनें खुद को बचाने के लिए बंद हो जाती हैं ताकि बड़ा नुकसान न हो।

इसी दौरान कंट्रोल रूम के पास मालिक अमित मेहरा की आवाज़ गूंजी—
“अगर सुबह तक ठीक नहीं हुआ तो अस्पताल बंद करना पड़ेगा!”

यह सुनकर आर्या का दिल बैठ गया। अस्पताल बंद… मतलब मरीजों की जिंदगी अधर में।
उसने बेंच की किनारी पकड़ ली।
कभी-कभी बड़ा डर भी छोटे दिल में बहुत बड़ा हो जाता है।

5) “रिसेट कर दो”—और आर्या का फैसला

कुछ देर बाद अंदर से एक और आवाज आई—
“हमें पूरा सिस्टम रिसेट करना होगा!”

रघु ने भी यह सुना और घबरा गया।
रिसेट… मतलब सब कुछ मिट सकता है। रिपोर्ट्स, हिस्ट्री, प्रिस्क्रिप्शन—सब उड़ जाए?

एक सीनियर इंजीनियर की आवाज़ लगभग रोती हुई थी—
“सर, रिसेट किया तो हजारों मरीजों की पुरानी रिपोर्ट्स, टेस्ट हिस्ट्री—सब डिलीट हो सकती हैं। यह आखिरी विकल्प है।”

अस्पताल के भीतर भय का एक नया स्तर फैल गया।
अब यह सिर्फ “सिस्टम” नहीं था। यह यादें, इलाज की दिशा, और जान थीं।

उसी वक्त एक स्ट्रेचर तेज़ी से निकला। एक बच्चा ऑक्सीजन मास्क में था, उसकी सांस तेज थी।
“वेंटिलेटर ऑटो मोड नहीं ले रहा! मैनुअल पंप करना होगा!” किसी ने चिल्लाया।

आर्या की आंखें भर आईं।
उसने रघु को दूर देखा—वह भी डर में था। नौकरी, डांट, भीड़—सबका बोझ उसके चेहरे पर था।
रघु की दुनिया छोटी थी, मगर जिम्मेदारी बहुत बड़ी थी।

आर्या ने खुद से कहा—
“अगर मैं सिर्फ देख भी लूं… शायद…”

और उसी पल उसने फैसला कर लिया।
आज वह “सिर्फ बच्ची” नहीं रहेगी।
आज वह “एक कोशिश” बनेगी।

6) कंट्रोल रूम का दरवाज़ा—और 10 साल की आवाज़

कंट्रोल रूम का गेट आधा खुला था। अंदर भाग-दौड़ में किसी का ध्यान बाहर नहीं था।
आर्या धीरे-धीरे दरवाज़े तक पहुंची।

अंदर आठ इंजीनियर, कुछ टेक्नीशियन, और बाहर से आई टीम के लोग बैठे थे। सब थके हुए। चेहरे पर पसीना। आँखों में हार।

आर्या ने एक गहरी सांस ली और बोली—
“अगर आप लोग मुझे सिर्फ एक बार स्क्रीन देखने दें… तो शायद मुझे पता चल जाए समस्या क्या है।”

पूरा कमरा पाँच सेकंड के लिए चुप हो गया।
वह चुप्पी ऐसी थी जैसे समय ने सांस रोक ली हो।

एक इंजीनियर ने अविश्वास से देखा—
“क्या?”

डॉ. रवि—जो आईसीयू और टेक टीम के बीच लगातार दौड़ रहे थे—उन्होंने चश्मे के ऊपर से झुककर पूछा:
“बेटा, तुम्हें पता है यह क्या है? यह हॉस्पिटल का मुख्य कंसोल है। इससे पूरी बिल्डिंग चलती है।”

आर्या की आवाज़ नहीं काँपी।
“हाँ सर। मैं बस स्क्रीन पढ़ लूं। एरर समझ आ जाए तो… आप लोग ही करेंगे। मैं सिर्फ बताऊंगी।”

इंजीनियरों की टीम के कुछ चेहरे पर हल्की-सी थकी हुई मुस्कान आई—पर वह टिक नहीं पाई। क्योंकि 24 घंटे से सिस्टम बंद था, और हर मिनट किसी मरीज की सांस पर भारी था।

अमित मेहरा ने रघु की तरफ देखा, जो अब दरवाज़े पर आ गया था और कांप रहा था।
“ये आपकी बेटी है?”

रघु घबरा गया।
“सर… बच्ची बस… कंप्यूटर में रुचि रखती है… मैं इसे बाहर ले—”

आर्या ने रघु का हाथ पकड़ा।
“बाबा, बस एक मिनट।”

डॉ. रवि ने इंजीनियरों को देखा।
“24 घंटे हो गए, कुछ नहीं हुआ। स्क्रीन दिखाने में क्या जाता है?”

अमित मेहरा ने थकी आवाज़ में कहा—
“स्क्रीन ऑन करो।”

7) लाल कोड 0931-A: डर का नाम, या सुरक्षा का संकेत?

कंसोल स्क्रीन जैसे ही सक्रिय की गई, एक लाल एरर उभरा:

SYSTEM FAILURE CODE: 0931-A
AUTO DEFENSE MODE: ACTIVE
ACCESS LIMITED

इंजीनियर बोले—
“सर, यही बार-बार आ रहा है।”
“यह सिस्टम को लॉक कर रहा है।”
“हम अंदर जा ही नहीं पा रहे।”

आर्या ने स्क्रीन को अलग नजर से पढ़ा।
वह कीबोर्ड पर नहीं झुकी। वह बस “पढ़” रही थी—जैसे कोई किताब का पन्ना पढ़ता है। उसकी आंखें तेजी से लाइन-दर-लाइन चलीं, और फिर 20 सेकंड बाद उसने बहुत धीमे कहा—

“यह सिस्टम बंद नहीं है।”

कमरे में हलचल हुई।
“क्या?” एक इंजीनियर ने कहा।
आर्या ने इशारा किया—
“यह ऑटो डिफेंस मोड है। यह तब चालू होता है जब सिस्टम को एक साथ दो उल्टी कमांड्स मिलती हैं—और वह खुद को लॉक कर लेता है ताकि और बड़ा नुकसान न हो।”

डॉ. रवि बुदबुदाए—
“दो उल्टी कमांड्स?”

आर्या ने सिर हिलाया।
“जैसे… एक कमांड कहे ‘इमरजेंसी ओपन’, दूसरी कहे ‘सुरक्षा लॉक’। तब सिस्टम खुद को रोक देता है।”

एक सीनियर इंजीनियर आगे आया।
“तुम्हें यह कैसे पता?”

आर्या ने सच-सच कहा—
“मैं घर में पुराने लैपटॉप पर सिमुलेशन वीडियो देखती हूँ। एक बार मैंने देखा था कि सुरक्षा सिस्टम ‘सेफ’ रहने के लिए खुद को लॉक कर देता है। मैं वही सोच रही हूँ।”

कमरे में दूसरी बार खामोशी छाई। मगर इस बार खामोशी में मजाक नहीं था—हैरानी थी।

अमित मेहरा ने धीमे से पूछा—
“बेटा… क्या तुम बता सकती हो कि इसे खोलना कैसे है?”

आर्या ने ईमानदारी से कहा—
“मैं खोल नहीं रही, सर। मैं सिर्फ बताऊंगी कि कहाँ देखना है। अगर आप मुझे 2 मिनट दें, मैं लाइनें पढ़कर बता सकती हूं कि कौन सी सेटिंग टकरा रही है।”

यह सुनकर इंजीनियरों के चेहरे पर पहली बार “उम्मीद” दिखी—भले ही आधी-अधूरी।

8) असली गलती: सिस्टम नहीं, “टकराती हुई सेटिंग्स”

आर्या ने स्क्रीन पर दो अलग-अलग सेक्शन की ओर इशारा किया—जहाँ एक साथ दो मोड एक्टिव दिख रहे थे।

“देखिए… एक तरफ ‘Emergency Mode’ ट्रिगर है—और साथ में ‘Auto Lockdown’ भी। यह साथ-साथ चलेंगे तो सिस्टम खुद को रोक देगा।”

एक इंजीनियर ने झट से कहा—
“लेकिन हमने तो सुरक्षा के लिए लॉकडाउन ऑन किया था…”

डॉ. रवि के चेहरे पर हाथ गया।
“और इमरजेंसी में हमने ओपन मोड भी…!”

अमित मेहरा की सांस तेज हो गई।
“तो यह हमारी ही सेटिंग्स की वजह से?”

आर्या ने सिर हिलाया।
“शायद। सिस्टम बुरा नहीं है। यह खुद को बचा रहा है। लेकिन अब उसे एक क्लियर आदेश चाहिए—एक ही दिशा में।”

इंजीनियर आपस में देखने लगे।
यह बात साधारण लग सकती है—लेकिन ऐसी आपात स्थिति में, थकी हुई टीम अक्सर “बड़े खतरे” ढूंढती है और छोटी सी टक्कर नजर से छूट जाती है।

आर्या ने कहा—
“आप लोग रिसेट मत कीजिए। पहले इसे सेफ तरीके से एक मोड में लाकर देखिए। जो मरीजों के लिए जरूरी है—वह पहले।”

डॉ. रवि ने तुरंत कहा—
“पहले आईसीयू और ओटी के सपोर्ट सिस्टम। बाकी बाद में।”

अमित मेहरा ने सिर हिलाया—
“हाँ। पहले जीवन।”

9) इंजीनियरों का काम, बच्ची का दिमाग: और सिस्टम की वापसी

यहाँ एक जरूरी बात: आर्या ने कोई “हैक” नहीं किया। उसने कोई गुप्त रास्ता नहीं बताया। उसने बस समस्या की प्रकृति समझाई—और इंजीनियरों ने, अपनी अधिकृत पहुँच के साथ, सही कदम उठाए।

इंजीनियरों ने सेटिंग्स को चरण-दर-चरण सही किया। सुरक्षा मोड को नियंत्रित किया गया, इमरजेंसी ऑपरेशन प्राथमिकता पर सेट हुआ, और फिर सिस्टम को निर्देशित रीस्टार्ट दिया गया—एक ऐसा रीस्टार्ट जो डेटा उड़ाए बिना संभव था, क्योंकि मूल समस्या डेटा भ्रष्ट होना नहीं, सेफ्टी लॉक ट्रिगर होना थी।

और फिर…

स्क्रीन पर लाल एरर गायब हुआ।
एक बार सिस्टम ने ब्लिंक किया।
फिर दूसरा।
और तीसरी बार—स्क्रीन पर हरा संकेत आया:

RECOVERY MODE: SUCCESS
CORE SERVICES: ONLINE

अगले ही पल जैसे पूरे अस्पताल ने सांस ली।

लाइटें स्थिर हो गईं।
मॉनिटर फिर से बीप करने लगे।
लिफ्टों के अंदर फंसे लोगों की आवाजें कम होने लगीं।
ओटी के बाहर डॉक्टरों की चाल में फिर लय आई।

आईसीयू से एक नर्स की आवाज आई—
“वेंटिलेटर वापस ऑटो मोड में आ गया!”

कंट्रोल रूम में किसी ने बिना सोचे ताली बजा दी—और फिर जैसे ताली फैल गई।
इंजीनियर, डॉक्टर, टेक टीम—सबके चेहरों पर एक साथ थकान और राहत उतर आई।

डॉ. रवि की आँखें भर आईं।
उन्होंने आर्या की तरफ देखा—
“बेटा… तुमने आज कई जिंदगियाँ बचा दीं।”

अमित मेहरा, जो 24 घंटे से सोए नहीं थे, आर्या के सामने नीचे झुक गए—घुटनों के बल नहीं, पर उस भाव से जैसे कोई पिता अपने बच्चे के सामने गर्व से सिर झुकाता है।

“तुमने सिर्फ मेरा अस्पताल नहीं बचाया… तुमने उन मरीजों का समय बचाया जिनके पास समय नहीं था।”

10) पुरस्कार से बड़ा: पहचान और सम्मान

अमित मेहरा ने अपनी जेब से एक कार्ड निकाला।
“यह हमारे अस्पताल की ‘फ्यूचर स्कॉलरशिप’ है। आर्या—तुम जो पढ़ना चाहो, जहाँ पढ़ना चाहो… हम तुम्हारे साथ रहेंगे।”

रघु की आँखों से आँसू टपकने लगे।
वह हकलाया—
“सर… यह सब… मेरी बच्ची तो…”

अमित मेहरा ने उसका हाथ थाम लिया।
“रघु… यह सिर्फ बच्ची नहीं। यह हमारे देश का भविष्य है।”

आर्या ने धीरे से कहा—
“मैं बस मदद करना चाहती थी।”

डॉ. रवि ने उसके सिर पर हाथ रखा।
“आज तुम नहीं समझोगी, पर आज तुमने उस जगह मदद की… जहाँ बड़े-बड़े लोग हार गए थे।”

इंजीनियरों ने पहली बार किसी 10 साल की बच्ची के लिए खड़े होकर तालियाँ बजाईं—और वह तालियाँ असल में एक बात के लिए थीं:
दिमाग उम्र नहीं देखता। अवसर देखता है।

रघु ने आर्या को गले लगाया।
“चल बेटा… अब घर चलें।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी, पर उसमें गर्व साफ था।
“आज मुझे तुम पर बहुत गर्व है।”

11) घर लौटते वक्त: आर्या की सबसे बड़ी जीत

घर लौटते समय सड़क वही थी, धूप वही थी, पर रघु के कदम हल्के थे।
आर्या चुप थी। शायद इसलिए नहीं कि उसके पास बोलने को कुछ नहीं था—बल्कि इसलिए कि उसके भीतर एक नया विश्वास जन्म ले चुका था:

“मैं छोटी हूँ, पर बेकार नहीं।”

उस रात रघु ने पहली बार बेटी के पुराने लैपटॉप को अलग आदर से देखा।
और आर्या ने पहली बार महसूस किया कि सीखना सिर्फ परीक्षा के लिए नहीं होता—कभी-कभी सीखना किसी अनजान बच्चे की सांस बचाने के लिए भी होता है।

और “मेहर सिटी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल” में, उस दिन के बाद एक नियम बदला गया:

सिस्टम की ट्रेनिंग अब सिर्फ बड़े इंजीनियरों के लिए नहीं,
बल्कि स्टाफ की समझ के लिए भी होगी—ताकि डर में गलत बटन न दबें।
और हर संकट के बाद “ब्लेम गेम” नहीं—“सीख” होगी।

क्योंकि अस्पताल मशीनों से चलता है—पर अस्पताल समझ से बचता है।