दो गरीब लड़कियाँ चावल माँगने आईं, उनकी चिट्ठी पढ़कर करोड़पति वहीं गिर पड़ा।
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कहानी: दो भूखी बहनें और एक अनजाना रिश्ता
शाम का समय था। आसमान में हल्का अंधेरा छाने लगा था। शहर के एक पुराने मंदिर के बाहर दो छोटी लड़कियाँ खड़ी थीं। उनके कपड़े फटे हुए थे और चेहरों पर भूख और थकान साफ दिखाई दे रही थी।
बड़ी लड़की का नाम प्रिया था और छोटी का नाम रानी।
रानी ने धीरे से कहा,
“दीदी… मुझे बहुत भूख लगी है।”
प्रिया ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“बस थोड़ा सब्र कर, रानी। मंदिर में आज प्रसाद मिलेगा। हम वहीं से कुछ चावल ले लेंगे।”
दोनों अनाथ बहनें थीं। उनकी माँ मीरा कुछ महीने पहले ही बीमारी से गुजर गई थीं। उनके पास अब कोई नहीं था।
मंदिर के अंदर लोग पूजा कर रहे थे। तभी एक अमीर आदमी वहाँ आया। उसका नाम अर्जुन खन्ना था। वह शहर का बड़ा बिजनेसमैन था।
जब उसकी नजर उन दोनों बच्चियों पर पड़ी, तो वह रुक गया।
उसने देखा कि छोटी लड़की भूख से रोने वाली थी और बड़ी लड़की उसे संभालने की कोशिश कर रही थी।
अर्जुन उनके पास गया और धीरे से पूछा,
“तुम दोनों यहाँ अकेली क्यों खड़ी हो?”
प्रिया थोड़ी डर गई।
“हम… हम प्रसाद लेने आए हैं,” उसने धीरे से कहा।

अर्जुन ने उनके लिए खाना मंगवाया। जब दोनों बच्चियाँ खाना खाने लगीं, तो उनके चेहरे पर जो खुशी थी, उसे देखकर अर्जुन की आँखें नम हो गईं।
उसी समय उसे प्रिया की आँखों में कुछ अजीब सा एहसास हुआ।
वही आँखें… वही मासूमियत…
उसे अचानक अपनी पुरानी प्रेमिका मीरा याद आ गई।
कई साल पहले अर्जुन और मीरा एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे। लेकिन हालात ऐसे बने कि अर्जुन को शहर छोड़कर जाना पड़ा। जब वह वापस लौटा, तब तक मीरा कहीं जा चुकी थी।
अर्जुन ने कभी उसे फिर नहीं देखा।
उसने धीरे से पूछा,
“तुम्हारी माँ का नाम क्या था?”
प्रिया ने जवाब दिया,
“मीरा।”
यह सुनते ही अर्जुन का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने पूछा,
“तुम्हारे पिता?”
प्रिया ने सिर झुका लिया।
“माँ कहती थीं… वो बहुत दूर रहते हैं।”
अर्जुन चुप हो गया।
उस रात वह सो नहीं पाया। उसे बार-बार वही सवाल परेशान कर रहा था —
क्या यह बच्चियाँ मेरी बेटियाँ हो सकती हैं?
अगले दिन अर्जुन ने उन दोनों को ढूँढना शुरू किया। बहुत पूछताछ के बाद उसे पता चला कि वे शहर के किनारे एक टूटी हुई झोपड़ी में रहती हैं।
वह तुरंत वहाँ पहुँचा।
झोपड़ी का दरवाजा खटखटाया।
दरवाजा खुला… और सामने प्रिया खड़ी थी।
वह अर्जुन को देखकर चौंक गई।
“आप…?”
अर्जुन ने धीरे से कहा,
“मैं तुमसे मिलने आया हूँ।”
अंदर रानी बैठी थी। झोपड़ी बहुत गरीब हालत में थी।
अर्जुन की आँखों में आँसू आ गए।
तभी प्रिया अंदर गई और एक पुराना डिब्बा लेकर आई।
“यह माँ ने मरने से पहले मुझे दिया था,” उसने कहा।
“उन्होंने कहा था कि अगर कभी अर्जुन खन्ना नाम का आदमी मिले… तो यह उसे दे देना।”
अर्जुन के हाथ कांपने लगे।
उसने डिब्बा खोला।
अंदर एक चिट्ठी थी।
चिट्ठी में लिखा था:
“अर्जुन,
अगर यह चिट्ठी तुम्हें मिले, तो शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगी।
मैंने तुम्हें कभी दोष नहीं दिया।
लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहती हूँ…
प्रिया और रानी तुम्हारी बेटियाँ हैं।
मैंने उन्हें अकेले पाला, क्योंकि मैं तुम्हारी जिंदगी खराब नहीं करना चाहती थी।
अगर कभी तुम्हारा दिल कहे…
तो उन्हें अपना लेना।
— मीरा”
चिट्ठी पढ़ते-पढ़ते अर्जुन की आँखों से आँसू बहने लगे।
वह जमीन पर बैठ गया।
उसने प्रिया और रानी को गले लगा लिया।
“मुझे माफ कर दो… बेटियों,” वह रोते हुए बोला।
प्रिया और रानी कुछ समझ नहीं पा रही थीं।
लेकिन उस दिन के बाद उनकी जिंदगी बदल गई।
अर्जुन उन्हें अपने घर ले गया।
उन्हें स्कूल में दाखिल कराया।
और सबसे जरूरी — उन्हें एक पिता का प्यार दिया।
सालों बाद…
प्रिया डॉक्टर बनी और रानी टीचर।
एक दिन वे तीनों मंदिर गए — उसी मंदिर में जहाँ कभी दो भूखी बहनें खड़ी थीं।
प्रिया ने मुस्कुराते हुए कहा,
“अगर उस दिन आप हमें खाना न देते… तो शायद हमारी जिंदगी ऐसी न होती।”
अर्जुन ने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा,
“धन्यवाद, मीरा…
तुमने मुझे मेरी दुनिया वापस दे दी।”
और मंदिर की घंटियाँ बज उठीं।
समाप्त।
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