नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा था लड़का, ट्रेन में टीटी लड़की ने जो किया—इंसानियत रो पड़ी

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नौकरी की तलाश में दिल्ली जा रहा था लड़का, ट्रेन में टीटीई लड़की ने जो किया—इंसानियत रो पड़ी

सुबह के चार बज रहे थे।

उत्तर भारत के एक छोटे से कस्बे महोबा का रेलवे स्टेशन उस वक्त आधी नींद में डूबा हुआ था। प्लेटफॉर्म पर पीली रोशनी टिमटिमा रही थी, जैसे खुद भी जागने को मजबूर हो। चाय की दुकान से उठती अदरक की खुशबू हवा में तैर रही थी, और कहीं दूर से किसी कुली की आवाज़ गूंज रही थी।

इसी प्लेटफॉर्म के आख़िरी सिरे पर खड़ा था राहुल

उम्र मुश्किल से बाईस साल।
कंधे पर एक पुराना झोला।
पैरों में घिसे हुए जूते।
और आँखों में डर, उम्मीद और जिम्मेदारी—तीनों एक साथ।

आज वह दिल्ली जा रहा था।

न घूमने।
न पढ़ाई के लिए।
बल्कि नौकरी ढूंढने

उसके हाथ में जो टिकट था, वह सामान्य श्रेणी का था। महीनों पहले खरीदा गया, क्योंकि आख़िरी पैसे उसी में लगे थे। घर में अब कुछ भी नहीं बचा था।

पिता की मौत को तीन साल हो चुके थे।
मां बीमार रहती थीं।
छोटी बहन की पढ़ाई अधूरी थी।

घर का बोझ अचानक उसके कंधों पर आ गया था।


जब ट्रेन आई, तो प्लेटफॉर्म पर अफरा-तफरी मच गई।

जनरल कोच में जगह पाने के लिए लोग ऐसे टूट पड़े जैसे वही ज़िंदगी का आख़िरी सहारा हो। राहुल भी भीड़ में धक्का खाता हुआ अंदर घुसा। किसी तरह एक कोने में खड़ा होने की जगह मिल गई।

ट्रेन चली।

खिड़की से बाहर अंधेरा पीछे छूटने लगा।

राहुल ने आंखें बंद कर लीं।

उसे याद आया—
मां ने जाते वक्त क्या कहा था।

“बेटा, अगर कुछ न मिले तो वापस आ जाना… भूखा मत रहना।”

राहुल मुस्कुराया था।

लेकिन अंदर से वह जानता था—
वापस लौटने का विकल्प अब उसके पास नहीं था।


करीब दो घंटे बाद ट्रेन रफ्तार पकड़ चुकी थी।

कोच में भीड़ और बढ़ गई थी। कुछ लोग जमीन पर बैठे थे, कुछ दरवाजे के पास लटके हुए। राहुल का पैर सुन्न हो चुका था, लेकिन उसने हिम्मत नहीं छोड़ी।

तभी एक आवाज़ गूंजी—

“टिकट दिखाइए।”

लोगों में हलचल मच गई।

टीटी आ चुके थे।

राहुल का दिल धड़कने लगा। उसने झोले से टिकट निकालकर हाथ में कसकर पकड़ लिया।

लेकिन जैसे ही टीटी उनके सामने पहुंची, राहुल ठिठक गया।

वह लड़की थी

करीब सत्ताइस–अट्ठाइस साल की।
नीली वर्दी।
बाल कसकर बंधे हुए।
चेहरे पर सख़्ती, लेकिन आंखों में अजीब-सी शांति।

नाम प्लेट पर लिखा था—
अदिति शर्मा

वह बिना किसी हड़बड़ी के टिकट चेक कर रही थी।
जिसके पास टिकट नहीं होता, उससे सख़्ती से बात करती।
लेकिन अपमान नहीं।

जब वह राहुल के सामने पहुंची, उसने हाथ बढ़ाया।

“टिकट।”

राहुल ने तुरंत टिकट आगे कर दिया।

अदिति ने टिकट देखा।

फिर राहुल को देखा।

उसके फटे झोले को।
उसके थके चेहरे को।
और उसके कांपते हाथों को।

“दिल्ली क्यों जा रहे हो?”
अदिति ने अचानक पूछा।

राहुल चौंक गया।

“न… नौकरी ढूंढने,”
उसने धीमी आवाज़ में कहा।

अदिति ने टिकट दोबारा देखा।

“सीट नहीं है?”

“जनरल का टिकट है, मैडम।”

अदिति ने सिर हिलाया।

वह आगे बढ़ने ही वाली थी कि तभी उसने देखा—
राहुल का बैग खुला हुआ था।

अंदर सिर्फ़ दो जोड़ी कपड़े…
और एक फोल्ड किया हुआ कागज़।

अदिति ने इशारे से पूछा।

“ये क्या है?”

राहुल ने झिझकते हुए कागज़ निकाला।

वह रिज़्यूमे था।

कई जगह सिलवटें पड़ी थीं।
ऊपर लिखा था— Graduate (B.A.)
नीचे— Any suitable job

अदिति कुछ सेकंड तक उसे देखती रही।

फिर उसने धीरे से पूछा—

“घर में कौन-कौन है?”

राहुल की आंखें झुक गईं।

“मां… और बहन।”

“पिता?”

“नहीं हैं।”

अदिति की आंखों में कुछ बदल गया।


अगले स्टेशन से पहले ही अदिति वापस आई।

इस बार उसके हाथ में एक कागज़ था।

“चलो,”
उसने कहा।

“कहां?”
राहुल घबरा गया।

“मेरे साथ।”

लोगों ने देखना शुरू कर दिया।

राहुल को लगा—
अब जुर्माना लगेगा।
अब ट्रेन से उतार दिया जाएगा।

वह चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा।

अदिति उसे स्लीपर कोच में ले गई।

एक खाली सीट पर रुककर बोली—

“यहां बैठो।”

राहुल के मुंह से आवाज़ नहीं निकली।

“मैडम… मेरा टिकट…”

“मैं जानती हूं,”
अदिति ने कहा।

उसने जेब से कुछ निकाला।

वह अपनी डायरी थी।

उसने उसमें कुछ लिखा।
फिर टिकट पर स्टाम्प लगाया।

“अब ये अस्थायी अनुमति है। अगले तीन घंटे तक यहीं बैठ सकते हो।”

राहुल की आंखें भर आईं।

“लेकिन… क्यों?”

अदिति कुछ पल चुप रही।

फिर बोली—

“क्योंकि मैंने भी कभी ऐसे ही सफर किया था।”

राहुल ने उसकी तरफ देखा।

पहली बार उसने उस सख़्त टीटीई के चेहरे के पीछे एक इंसान देखा।


अदिति चली गई।

राहुल सीट पर बैठ गया।

उसने सिर पीछे टिकाया।

आंखों से आंसू बहने लगे।

बिना आवाज़ के।

पास बैठे एक बुजुर्ग ने पूछा—

“बेटा, सब ठीक?”

राहुल ने सिर हिला दिया।

“हां… आज पहली बार।”


कुछ देर बाद अदिति वापस आई।

इस बार उसके हाथ में एक डब्बा था।

“लो,”
उसने कहा।

“ये क्या है?”

“खाना।”

राहुल घबरा गया।

“मैडम, मैं पैसे…”

“मत बोलो,”
अदिति ने उसे रोक दिया।

“ट्रेन में मैं टीटी हूं।
लेकिन बाहर… मैं भी किसी की बेटी हूं।”

राहुल ने कांपते हाथों से डब्बा लिया।

पहली निवाले के साथ ही
उसका दम घुट गया।

इतने दिनों बाद
किसी ने उससे बिना सवाल किए
कुछ दिया था।


दिल्ली आने से पहले अदिति ने आख़िरी बार उससे बात की।

“दिल्ली में कहां जाओगे?”

“पहले करोल बाग… फिर जहां काम मिले।”

अदिति ने एक कार्ड दिया।

“यह नंबर रख लो।
अगर दो दिन में कुछ न मिले, कॉल करना।”

“मैडम… मैं कैसे…”

“यह एहसान नहीं है,”
अदिति ने कहा।

“यह वही समाज है
जो कभी तुम्हें भी
किसी और की मदद करने का मौका देगा।”


ट्रेन दिल्ली पहुंची।

भीड़ फिर टूट पड़ी।

राहुल उतर गया।

मुड़कर देखा।

अदिति प्लेटफॉर्म पर खड़ी थी।

उसने दूर से सिर हिलाया।

राहुल ने हाथ जोड़ दिए।


तीन महीने बाद…

दिल्ली के एक छोटे से दफ्तर में
राहुल काम कर रहा था।

तनख्वाह कम थी।

लेकिन सम्मान था।

पहली सैलरी से
उसने मां की दवाइयां खरीदीं।
बहन का एडमिशन कराया।

और सबसे आख़िर में—
उसने एक लिफाफा पोस्ट किया।

अंदर सिर्फ़ एक चिट्ठी थी—

“मैडम,
आपने मुझे सीट नहीं दी थी,
आपने मुझे हिम्मत दी थी
जब भी किसी और को टूटता देखूंगा,
मैं आपको याद रखूंगा।”


इंसानियत
कभी वर्दी नहीं देखती।
कभी औकात नहीं पूछती।

वह बस
सही समय पर
सही दिल में
जाग जाती है।


समाप्त