नौकर घर से || जाने लगा तो मालकिन हाथ पकड़ कर बोली मत जाओ मेरा क्या होगा || और फिर
रवि बचपन से ही जिम्मेदार था। पिता की लंबी बीमारी ने उसकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया। पिता के इलाज के लिए उसने घर की सारी जमा-पूंजी, माँ के गहने और यहाँ तक कि पुश्तैनी जमीन तक बेच दी। लेकिन इसके बावजूद पिता की जान नहीं बची। पिता के गुजर जाने के बाद माँ, बहन और घर की जिम्मेदारियों का बोझ उसके कंधों पर आ गया।
घर कर्ज में डूबा हुआ था, बहन शादी के योग्य हो गई थी, और खुद उसकी उम्र भी विवाह योग्य हो रही थी। मगर जेब खाली थी। साहूकार रोज़ घर खाली करने की धमकी देता। ऐसे में रवि ने ठान लिया कि चाहे जो हो, वह काम करके पैसा कमाएगा और अपने परिवार का भविष्य सुरक्षित करेगा।
शहर की दौड़-भाग
रवि बेंगलुरु पहुंचा और सुबह से शाम तक काम की तलाश करता रहा। छोटे-बड़े घरों के दरवाजे खटखटाए, कंपनियों के बाहर गया, लेकिन हर जगह से निराशा मिली। लोग अनजान होने के कारण उस पर भरोसा नहीं करते थे।
थककर वह एक पॉश कॉलोनी में पहुंचा, जहाँ बड़े-बड़े बंगले थे। उसने सोचा, “अगर यहाँ किसी घर में नौकर का काम मिल गया तो भी ठीक रहेगा।”
राधिका से मुलाकात
इसी दौरान उसकी मुलाकात राधिका से हुई। राधिका का पति लंबे समय से बीमार था और बिस्तर पर पड़ा था। घर और कंपनी दोनों की जिम्मेदारियाँ उसके सिर पर थीं। उसने रवि से कहा – “अगर तुम मेरे पति की देखभाल कर सको, तो मैं तुम्हें काम पर रख लूंगी।”
रवि तुरंत तैयार हो गया। उसकी शर्त पर राधिका ने उसे अपेक्षा से भी अधिक वेतन देने का वादा किया। रवि बेहद खुश हुआ क्योंकि इससे वह जल्दी कर्ज चुका सकता था और अपनी बहन की शादी भी करा सकता था।

सेवा और विश्वास
रवि ने राधिका के पति की बड़ी ईमानदारी और समर्पण से सेवा की। वह इतना ध्यान रखता कि खुद राधिका भी शायद उतना न रख पाती। राधिका ने घर में कैमरे भी लगाए थे, लेकिन रवि का सच्चा स्वभाव देखकर वह निश्चिंत हो गई।
धीरे-धीरे रवि इस घर का अभिन्न हिस्सा बन गया। राधिका जब कंपनी में व्यस्त होती, रवि घर और मरीज दोनों का ख्याल रखता। छह महीने तक उसने बिना किसी शिकायत के काम किया।
पति की मौत और राधिका का अकेलापन
समय बीतने के साथ राधिका के पति की हालत बिगड़ती गई और एक दिन उनका निधन हो गया। यह राधिका के लिए गहरा सदमा था। शोकसभा के दौरान भी रवि ने पूरा घर संभाला।
लेकिन जैसे ही शोकसभा खत्म हुई, रवि ने सोचा कि अब उसका काम खत्म हो गया। उसने सामान बाँधकर घर छोड़ने की तैयारी की।
भावनाओं का मोड़
जैसे ही रवि जाने लगा, राधिका ने उसका हाथ पकड़कर कहा –
“रवि, तुम मत जाओ। तुम्हारे बिना यह घर काटने को दौड़ेगा। मैं अकेले यहाँ नहीं रह सकती।”
रवि चौंक गया। उसने कहा – “मैडम, जिस काम के लिए आपने रखा था, वह काम अब खत्म हो चुका है। मुझे तो अब लौट जाना चाहिए।”
राधिका ने दृढ़ आवाज़ में कहा – “नहीं। तुम्हें वही वेतन मिलता रहेगा। लेकिन तुम यहीं रहो। कम से कम कुछ दिन, जब तक मेरा मन संभल नहीं जाता।”
रवि मान गया और वहीं ठहर गया। धीरे-धीरे उनके बीच अजीब-सी नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं।

रवि का सच और राधिका का वादा
एक दिन राधिका ने उससे पूछा – “तुम इस तरह दर-दर काम क्यों मांग रहे थे?”
रवि ने अपना पूरा सच बता दिया – गाँव, कर्ज, बहन की शादी, और जिम्मेदारियों का बोझ।
राधिका ने उसकी हालत समझी और कहा – “कर्ज की चिंता मत करो। मैं चुका दूंगी। तुम्हारी बहन की शादी भी मेरी जिम्मेदारी होगी। बस, तुम यहीं रहो।”
नया रिश्ता
धीरे-धीरे समय बीतता गया। आठ महीने हो गए। रवि राधिका और उसके घर का अभिन्न हिस्सा बन चुका था। एक दिन जब वह अपनी बहन के लिए लड़का देखने गया और रात को घर नहीं लौट पाया, तो राधिका बेचैन होकर पूरी रात उसे फोन करती रही।
अगले दिन जैसे ही रवि लौटा, राधिका उसे गले लगाकर रो पड़ी और बोली –
“तुम कहाँ चले गए थे? तुम्हारे बिना यह घर मुझे खाली-खाली लगता है।”
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