पति की मौत के बाद मजदूरी करने को मजवूर थी महिला, इंजीनियर ने जो किया..
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बे में दीपक नाम का एक लड़का रहता था। उम्र सिर्फ़ 19 साल, पर सपने बहुत बड़े। घर ग़रीब था – पिता रिक्शा चलाते थे, माँ खेतों में मज़दूरी करती थी। एक छोटा भाई और बहन स्कूल जाते थे।
दीपक बचपन से ही पढ़ाई में तेज़ था। हर कक्षा में अव्वल आता। अध्यापक हमेशा कहते – “यह लड़का अगर मौका पाए तो ज़िंदगी बदल देगा।” लेकिन घर की हालत ऐसी थी कि कॉलेज की पढ़ाई का खर्च उठाना आसान नहीं था।
पहला संघर्ष
हाई स्कूल पास करने के बाद पिता ने साफ़ कहा –
“बेटा, अब घर की मदद कर। तेरे छोटे भाई-बहन भी हैं। इतनी पढ़ाई का खर्च हम नहीं उठा सकते।”
दीपक की आँखों में आँसू आ गए। वह जानता था कि पिता गलत नहीं कह रहे, मगर उसका दिल पढ़ाई छोड़ने को तैयार नहीं था। रात को माँ के पास बैठकर बोला –
“अम्मा, मैं मेहनत कर लूंगा। दिन में काम करूँगा, रात में पढ़ाई।”
माँ ने बेटे के सिर पर हाथ रखा और कहा –
“ठीक है, लेकिन वादा कर कि किसी भी हाल में हार नहीं मानेगा।”
दीपक ने वादा किया।
मेहनत की राह
सुबह से दोपहर तक वह कस्बे की एक साइकिल दुकान पर काम करता, टायर ठीक करता, तेल लगाता। शाम को घर लौटकर ट्यूशन पढ़ाता। और रात को लालटेन की रोशनी में पढ़ाई करता। कई बार थकान इतनी होती कि किताब पर सिर रखकर सो जाता। लेकिन जब भी हिम्मत टूटती, माँ की आँखें याद आ जातीं और वह फिर उठ खड़ा होता।
पहला बड़ा इम्तहान
इंटर की परीक्षा आई। दीपक ने पूरी ताक़त से पढ़ाई की। रिज़ल्ट आया तो पूरे ज़िले में पहला स्थान उसका था। अख़बार में तस्वीर छपी। कस्बे के लोग गर्व से कहने लगे – “यह लड़का हमारा नाम रोशन करेगा।”
लेकिन असली चुनौती अब थी – इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला। फीस लाखों में थी। दीपक के पिता के पास इतनी रकम का तो ख्वाब भी नहीं था।
सपनों का बोझ
एक दिन पिता ने रिक्शा रोककर कहा –
“बेटा, इतना बड़ा सपना मत देख। साधारण नौकरी कर ले। पेट भर जाएगा।”
दीपक ने विनम्रता से कहा –
“पिताजी, अगर मैं हार मान गया तो मेरे बाद आने वाले बच्चे भी हार मानेंगे। मैं कोशिश जरूर करूँगा।”
उसने स्कॉलरशिप के फॉर्म भरे, परीक्षाएँ दीं। और किस्मत ने उसका साथ दिया – उसे एक नामी इंजीनियरिंग कॉलेज में 75% स्कॉलरशिप मिल गई। बाकी फीस के लिए उसने गाँव के साहूकार से कर्ज़ लिया।

नया सफर
कॉलेज का माहौल बिल्कुल अलग था। वहाँ अमीर घरों के लड़के-लड़कियाँ पढ़ते थे। ब्रांडेड कपड़े, लैपटॉप, स्मार्टफोन। दीपक के पास बस एक पुराना बैग और सादे कपड़े थे। शुरू में साथी उसका मज़ाक उड़ाते –
“अरे गाँव वाला, तुझे यहाँ क्या मिला?”
पर दीपक चुप रहता। उसे पता था, असली जवाब मेहनत से देना है।
दोस्ती और सम्मान
धीरे-धीरे उसकी लगन सबको दिखने लगी। लेक्चर में सबसे पहले हाथ उठाना, हर प्रोजेक्ट समय से पूरा करना। प्रोफेसर भी उसकी तारीफ करने लगे। क्लास के वही छात्र जो पहले मज़ाक उड़ाते थे, अब उससे नोट्स माँगने लगे।
एक दिन कंप्यूटर लैब में उसकी मुलाक़ात श्रेया से हुई। श्रेया शहर की अमीर लड़की थी, लेकिन दिल से बहुत सरल। उसने दीपक की हालत देखी और पूछा –
“तुम्हारे पास लैपटॉप क्यों नहीं है?”
दीपक ने हंसकर कहा –
“मेरे पास दिमाग है, वही काफी है।”
श्रेया उसकी आत्मविश्वास से प्रभावित हो गई और दोनों की दोस्ती हो गई।
सबसे बड़ी चुनौती
तीसरे साल में एक नेशनल टेक्निकल कॉम्पिटिशन हुआ। इसमें जीतने वाले को सीधा बड़ी कंपनी में नौकरी मिलनी थी। दीपक ने हिस्सा लिया। दिन-रात मेहनत कर मशीन का मॉडल बनाया।
फाइनल के एक दिन पहले, उसके मॉडल का एक अहम पार्ट टूट गया। साथियों ने ताना मारा –
“अब गाँव वाले की पोल खुल जाएगी।”
दीपक टूटा नहीं। रातभर जागकर पुराने पुर्जों से नया पार्ट बनाया। और अगली सुबह जब मंच पर उसका मॉडल चला, तो सब दंग रह गए।
परिणाम आया – पहला पुरस्कार दीपक को मिला।

घर की रोशनी
कंपनी ने उसे 12 लाख सालाना की नौकरी का ऑफर दिया। यह सुनकर उसके पिता की आँखों से आँसू बहने लगे।
“बेटा, तूने साबित कर दिया कि गरीब का बेटा भी सितारे छू सकता है।”
दीपक ने कहा –
“पिताजी, यह मेरी नहीं, हमारे पूरे परिवार की जीत है। आपने पसीना बहाया, अम्मा ने भूख सहा, तभी यह दिन आया।”
आख़िरी लड़ाई
नौकरी शुरू होने से पहले दीपक गाँव लौटा। उसने पिता का रिक्शा लिया और पूरे कस्बे में चलाया। लोग हैरान हुए। किसी ने पूछा –
“अब तो तू बड़ा इंजीनियर बन गया, फिर यह क्यों?”
दीपक मुस्कुराया –
“मैं यह याद रखना चाहता हूँ कि मैं कहाँ से उठा हूँ। ताकि ऊँचाई पर जाकर कभी घमंड न करूँ।”
सीख
दीपक की कहानी पूरे इलाके में मशहूर हो गई। उसने साबित किया कि हालात कैसे भी हों, अगर इरादा मजबूत हो तो मंज़िल दूर नहीं।
लोगों ने उससे पूछा –
“तुम्हारा राज़ क्या है?”
दीपक ने बस इतना कहा –
“गरीबी सबसे बड़ी दुश्मन नहीं है। असली दुश्मन है हार मान लेना।”
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