पति की लाश चेन और रस्सी से कटी, पत्नी पहुंची थाने तो SHO ने तुरंत किया गिरफ्तार, देखें कैसे

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“लाश पर चेन के निशान… और थाने में पत्नी की हथकड़ी”

बारिश की बूंदें जैसे आसमान से नहीं, शहर के माथे पर रखे किसी अपराध-बोध से गिर रही थीं। रात के करीब दस बजे का वक्त था। शिवनगर की गलियों में पानी भर चुका था, नालियों की बदबू और गीली मिट्टी की गंध एक-दूसरे से लड़ रही थी। उसी शहर में, रेलवे लाइन के पीछे वाली पुरानी फैक्ट्री के पास, एक चौकीदार ने टॉर्च घुमाई—और उसकी चीख हवा में फट गई।

फैक्ट्री के अंदर, टूटे हुए दरवाजे के पीछे, एक आदमी की लाश पड़ी थी। शरीर के आसपास चेन और रस्सी के टुकड़े बिखरे थे। जैसे किसी ने जानबूझकर सबूतों को एक तस्वीर की तरह सजाया हो। लाश के पास मिट्टी में घिसटने के निशान थे, और दीवार पर कीचड़ के छींटे—मानो कोई संघर्ष हुआ हो।

और उस संघर्ष का पहला नाम पुलिस रिकॉर्ड में कुछ ही देर बाद लिखा गया—

“किरण वर्मा, पत्नी।”

ਚੇਨਾਂ ਡੋਰ ਨਾਲ ਪਤੀ ਦੀ ਕੱਟੀ ਗਈ ਧਾਉਣ ਤਾ ਪਤਨੀ ਪਹੁੰਚ ਗਈ ਥਾਣੇ SHO ਅੱਗੋਂ ਹੋ ਗਿਆ  ਸਿੱਧਾਂ ਦੇਖੋ ਕਿਵੇਂ


1) थाने की सीढ़ियों पर भीगी हुई औरत

किरण वर्मा उसी रात थाने पहुंची थी।

भीगी साड़ी, कांपते हाथ, और आंखों में ऐसा डर, जैसे किसी ने उसका भविष्य अंधेरे कमरे में बंद कर दिया हो। वो गेट से अंदर आई, डेस्क के सामने खड़े सिपाही ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा।

“किससे मिलना है?” सिपाही ने बिना भाव के पूछा।

किरण ने होंठों को दबाया।

मेरे पति… मेरे पति राघव… वो घर नहीं आए… और—” उसकी आवाज टूट गई।

ड्यूटी अफसर ने टेबल पर उंगली मारी।

“धीरे बोलो। क्या हुआ?”

किरण ने जेब से फोन निकाला। हाथ कांप रहा था। स्क्रीन पर एक कॉल लॉग था—‘अज्ञात नंबर’ से आया मिस्ड कॉल। और उसके बाद एक मैसेज—

“फैक्ट्री के पास आओ। अगर सच जानना है।”

किरण ने आंखों में पानी भरकर कहा,

“मैं… मैं वहां गई थी। दरवाजा खुला था। अंदर… अंदर… वो—”

इतना कहते ही उसका शरीर थरथराने लगा। जैसे शब्द नहीं, कांपती हड्डियां बयान दे रही हों।

इसी वक्त पीछे से भारी कदमों की आवाज आई।

दरवाजे पर खड़ा आदमी—कड़क वर्दी, मोटी मूंछ, और आंखों में अजीब सी ठंडक।

एस.एच.ओ. अजय प्रताप सिंह।

उसने किरन को देखा—एक पल भी नहीं रुका।

“इसी को ढूंढ रहे थे,” उसने सीधे कहा।

किरण चौंक गई।

“मैं… मैं कुछ समझी नहीं…”

एसएचओ ने हाथ बढ़ाया।

“किरण वर्मा, तुम गिरफ्तार हो।”

कमरे में जैसे बिजली गिर गई।

किरण ने हकलाकर कहा,

“किस बात की…? मैंने क्या किया है?”

एसएचओ ने कागज उठाया, ठंडे लहजे में बोला,

“तुम्हारे पति की लाश मिली है। मौके पर तुम्हारे पैरों के निशान हैं। कॉल और मैसेज तुम्हारे फोन में है। और सबसे बड़ी बात—तुम अभी-अभी वहां से भागकर यहां आई हो। यही काफी है।”

किरण की सांस अटक गई।

“नहीं… नहीं… मैं तो मदद मांगने आई थी!”

लेकिन जवाब में सिर्फ हथकड़ी की आवाज आई—छनक!


2) शहर का सबसे आसान सच

थाने में कहानी जल्दी बनती है। और अगर कोई अफसर चाहे, तो कहानी को सच बनने में देर नहीं लगती।

किरण को लॉकअप में डाल दिया गया। बाहर रिपोर्टर जमा होने लगे। बरसात में भी कैमरे चमक रहे थे।

“पति की हत्या, पत्नी गिरफ्तार!”

“लाश पर चेन और रस्सी… घरेलू विवाद!”

“किरण वर्मा—शक के घेरे में!”

शहर को एक मसालेदार सच चाहिए था। और उन्हें वही मिल गया।

लॉकअप में, किरन की आंखें दीवार को घूर रही थीं। उसके कानों में एक ही बात घूम रही थी—

“तुम गिरफ्तार हो।”

उसने सोचने की कोशिश की।

राघव सुबह ऑफिस गया था। शाम को उसने कॉल किया था—थोड़ा परेशान लग रहा था।

“किरण, आज देर हो जाएगी।”

“क्यों?”

“बस… कुछ हिसाब-किताब है। बाद में बताता हूँ।”

बस यही। फिर रात को अज्ञात मैसेज।

और फिर… फैक्ट्री… लाश… चेन… रस्सी…

किरण ने अपने माथे पर हाथ रखा।

“मैं फंस गई,” उसने धीमे से कहा, “मैं फंसा दी गई।”

लॉकअप की सलाखों के बाहर से किसी ने कहा,

“पहली बार किसी औरत को इतना शांत देखा है। आमतौर पर रोती हैं।”

किरण ने सिर उठाया।

बाहर एक लड़की खड़ी थी—साधारण कपड़े, माथे पर छोटी सी बिंदी, आंखों में तेज।

“आप कौन हैं?” किरण ने पूछा।

लड़की मुस्कुराई नहीं। सिर्फ बोली,

“मैं नंदिनी, लोकल अखबार की रिपोर्टर… और सच की भूखी।”

“तो क्या आप भी वही लिखेंगी जो सब लिख रहे हैं?” किरण का गला भर आया।

नंदिनी ने धीरे से कहा,

“नहीं। मैं देखना चाहती हूं… एसएचओ ने आपको इतनी जल्दी क्यों गिरफ्तार किया?

किरण ने पहली बार उम्मीद जैसा कुछ महसूस किया।


3) एसएचओ की जल्दी… और उसकी वजह

एसएचओ अजय प्रताप सिंह का नाम शहर में डर की तरह चलता था। उसकी गिरफ्तारी मतलब—केस बंद, मीडिया शांत, और ऊपर वालों की तारीफ।

लेकिन उस रात उसकी गिरफ्तारी “बहुत जल्दी” थी।

सिपाही गोविंद ने ड्यूटी रजिस्टर में एंट्री की—

“लाश मिलने का समय: 9:38 PM”
“किरण की गिरफ्तारी: 9:52 PM”

सिर्फ चौदह मिनट में फैसला?

नंदिनी ने यह रजिस्टर चोरी से देखा। उसके दिमाग में सवाल दहाड़ने लगे।

इतनी जल्दी सबूत कैसे जमा हो गया?

और सबसे बड़ा सवाल—

लाश की जानकारी किरन को कैसे मिली?

मैसेज किसने भेजा?


4) राघव वर्मा कौन था?

राघव वर्मा कोई साधारण आदमी नहीं था।

वो शहर की सबसे बड़ी ट्रांसपोर्ट कंपनी “वर्मा लॉजिस्टिक्स” में अकाउंट हेड था। ईमानदार… या कम से कम लोग ऐसा मानते थे। घर में सादगी। किरन एक स्कूल में टीचर थी। उनकी शादी को छह साल हुए थे। कोई बच्चा नहीं था, लेकिन रिश्ते में नफरत भी नहीं थी।

तो हत्या क्यों?

और चेन-रस्सी जैसी डरावनी “सजावट” क्यों?

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट का शुरुआती नोट—

“शरीर पर बंधन के निशान। घटना स्थल पर घसीटने के संकेत। मौत का समय अनुमानित 7:30 से 8:30 के बीच।”

यह समय वही था जब किरन घर पर थी—स्कूल का काम कर रही थी, ऑनलाइन क्लास की तैयारी।

लेकिन पुलिस क्या देखती है?

पुलिस वही देखती है जो कहानी में फिट हो।


5) पहला झटका: किरन का फोन रिकॉर्ड

अगली सुबह पूछताछ हुई।

एसएचओ ने कुर्सी पर बैठकर फाइल खोली। सामने किरन—थकी, आंखें सूजी हुई, लेकिन आवाज में साफ़पन।

“तुम्हारा पति तुमसे झगड़ा करता था?” एसएचओ ने पूछा।

“नहीं,” किरन ने कहा।

“झूठ मत बोलो,” एसएचओ ने टेबल थपथपाई। “तुम्हारे पड़ोसी कहते हैं आवाजें आती थीं।”

किरन के चेहरे पर दर्द उभरा।

“आवाजें… हां, कभी-कभी बहस होती थी। पर… हत्या? मैं… मैं उसे—”

एसएचओ ने उसे काट दिया।

“तुम्हारे फोन से 8:17 पर राघव को कॉल गई। और 8:22 पर लोकेशन फैक्ट्री के आसपास दिख रही है। समझीं?”

किरन सन्न रह गई।

“ये… ये कैसे हो सकता है? मैं उस वक्त घर पर थी!”

“फोन तो तुम्हारे पास था,” एसएचओ ने मुस्कुराकर कहा, “या… तुम ये भी कहोगी फोन किसी और के पास था?”

किरन की सांस तेज हो गई।

उसने अचानक याद किया—

शाम को जब वो रसोई में थी, राघव का दोस्त मोहित आया था। उसने कहा था—

“भाभी, राघव ने फाइल मंगवाई है। दो मिनट में जाता हूँ।”

किरन ने फोन चार्जिंग पर लगाया था। वो वही पास बैठा था।

किरन ने धीरे से कहा,

“फोन… मेरे फोन को… किसी ने—”

एसएचओ ने झट से कहा,

“अच्छा! अब तुम किसी और पर डालोगी। क्लासिक।”

लेकिन नंदिनी उस वक्त बाहर खड़ी थी। उसने यह पूरा वाक्य सुन लिया—

“फोन किसी ने इस्तेमाल किया।”


6) नंदिनी की जांच: मोहित का सच

नंदिनी ने मोहित का पता निकाला। मोहित राघव का ऑफिस मित्र था—हमेशा घर आता-जाता। मोहल्ले में “भाई जैसा” माना जाता था।

नंदिनी उसके घर पहुंची।

दरवाजा खुलते ही मोहित घबरा गया।

“आप…?”

“मैं नंदिनी,” उसने पहचान पत्र दिखाया। “कुछ सवाल हैं।”

मोहित ने हल्की हंसी हंसने की कोशिश की।

“अरे मैडम, मुझे कुछ नहीं पता। राघव मेरा दोस्त था।”

“तो कल रात आप किरन के घर गए थे?” नंदिनी ने सीधे पूछा।

मोहित के चेहरे का रंग बदल गया।

“नहीं… मतलब… हां… बस एक मिनट… फाइल लेने…”

“और किरन का फोन?”

मोहित ने आंखें चुराईं।

नंदिनी ने वही दबाव बनाया जो एक रिपोर्टर के पास हथियार होता है—चुप्पी।

कई सेकंड बाद मोहित बुदबुदाया,

“मैंने फोन नहीं छुआ।”

नंदिनी ने कहा,

“ठीक है। फिर आपकी कॉल रिकॉर्ड… क्यों कहती है कि आप 8:05 पर फैक्ट्री के पास थे?”

मोहित के माथे पर पसीना आ गया।

“ये… ये गलत होगा…”

नंदिनी ने जेब से एक कागज निकाला—एक कॉपी जो उसने किसी संपर्क से निकलवाई थी।

“ये देखिए। लोकेशन पिंग्स।”

मोहित ने कागज देखा और उसका चेहरा सफेद पड़ गया।

“मैडम… मैं… मैं फंस जाऊंगा…”

“सच बोलिए,” नंदिनी ने कहा। “क्योंकि एक औरत जेल में है।”

मोहित की आंखें भर आईं।

“राघव ने… राघव ने कुछ देखा था…”

“क्या?”

“कंपनी में… बड़े लोग… माल के बिल… फर्जी… पैसे—”

नंदिनी ने धीमे से कहा,

“घोटाला।”

मोहित ने सिर हिला दिया।

“राघव ने कहा था वो सबूत जमा कर रहा है। वो ऊपर शिकायत करेगा। पर… उसने नहीं जाना कि जिन लोगों के खिलाफ जा रहा है, वो कितने ताकतवर हैं।”

नंदिनी का दिल धड़क उठा।

“और एसएचओ?”

मोहित ने आंखें बंद कर लीं।

“एसएचओ भी… उन्हीं के साथ है।”


7) किरन के हाथ में आखिरी उम्मीद

नंदिनी उसी शाम कोर्ट में बेल की सुनवाई के समय वहां पहुंची। किरन को हथकड़ी में लाया गया। उसकी आंखें सूखी थीं, पर चेहरा टूट चुका था।

नंदिनी ने धीरे से कहा,

“किरन जी, आपके पति कुछ बड़ा खुलासा करने वाले थे।”

किरन की आंखों में अचानक आग जली।

“तो… तो उन्होंने उसे मार दिया?”

“शायद,” नंदिनी ने कहा। “और आपको फंसा दिया।”

किरन के होंठ कांपने लगे।

“मैंने तो… मैंने तो बस सच जानने की कोशिश की… और मेरी जिंदगी…”

नंदिनी ने हाथ बढ़ाकर कहा,

“आपको मजबूत रहना होगा। क्योंकि मैं सबूत ढूंढ रही हूँ।”

किरन ने पहली बार सलाखों के भीतर से बाहर किसी पर भरोसा किया।


8) दूसरा झटका: फैक्ट्री की सीसीटीवी

फैक्ट्री में सीसीटीवी था—कम से कम गेट पर। लेकिन पुलिस कह रही थी—

“कैमरा खराब था।”

नंदिनी ने फैक्ट्री के मालिक से मुलाकात की। मालिक ने घबराकर कहा,

“मैडम, पुलिस आई थी। हार्ड डिस्क ले गई।”

“किसने?” नंदिनी ने पूछा।

“एसएचओ साहब।”

नंदिनी ने समझ लिया—कहानी की असली चाबी वही हार्ड डिस्क है।

उसने अपने एक टेक-जानकार दोस्त इरफान को बुलाया, जो सर्विलांस सिस्टम लगाता था। इरफान ने फैक्ट्री की वायरिंग देखी, फिर बोला,

“मैडम, हार्ड डिस्क निकालने से पहले एक चीज होती है—क्लाउड बैकअप।”

“है?” नंदिनी की आंखें चमक उठीं।

“कई बार होता है,” इरफान ने कहा। “अगर मालिक ने सब्सक्रिप्शन लिया हो।”

मालिक ने डरते-डरते कहा,

“हां… था… लेकिन पासवर्ड पुलिस ने बदल दिया।”

नंदिनी ने इरफान की तरफ देखा।

इरफान मुस्कुराया।

“पासवर्ड बदलने से डेटा मिटता नहीं, मैडम। बस रास्ता बदलता है।”

उस रात, बारिश फिर शुरू हुई। लेकिन अब नंदिनी के भीतर उम्मीद की बारिश थी।


9) वीडियो में कौन था?

सुबह चार बजे इरफान ने लैपटॉप स्क्रीन घुमाकर नंदिनी को दिखाया।

वीडियो धुंधला था, लेकिन साफ़ इतना दिख रहा था—

गेट पर एक आदमी आया। उसने हूडी पहनी थी। उसके पीछे दूसरा आदमी था—उसके हाथ में कुछ भारी था, जैसे चेन का बंडल। फिर तीसरा—वो किसी को घसीट रहा था।

और फिर—सबसे चौंकाने वाला दृश्य।

तीसरे आदमी ने अपनी हूडी थोड़ी हटाई, और उसकी गर्दन के पास टैटू दिखा—एक खास निशान।

नंदिनी ने आंखें सिकोड़कर देखा।

“ये… ये तो…”

उसके दिमाग में तुरंत एक चेहरा आया।

मोहित।

लेकिन मोहित अकेला नहीं था।

पहला आदमी थोड़ा मुड़ा—चेहरा आधा दिखा।

वर्दी की झलक। वही चाल। वही कद।

नंदिनी के पेट में ठंड उतर गई।

एसएचओ।


10) एसएचओ का असली खेल

नंदिनी सीधे किसी को बताना चाहती थी, लेकिन उसे पता था—सीधे टकराने पर वो भी गायब हो सकती है।

उसने पहले किरन के वकील अमित देशमुख को सब बताया। फिर एक कॉपी सुरक्षित जगह रखी। फिर एक बड़ा कदम—

उसने वीडियो का छोटा हिस्सा अपने संपादक को भेज दिया—लेकिन पूरी फाइल नहीं। उसने कहा,

“अगर मेरे साथ कुछ हो, तो ये पब्लिक कर देना।”

संपादक ने घबराकर पूछा,

“क्या तुम पागल हो गई हो?”

नंदिनी ने कहा,

“नहीं। मैं अब सच के करीब हूँ।”


11) मोहित का टूटना

नंदिनी ने मोहित को फिर बुलाया। इस बार कैफे में नहीं, मंदिर के पीछे वाली सुनसान गली में।

“देखो,” नंदिनी ने मोबाइल स्क्रीन पर वीडियो का फ्रेम दिखाया। “ये तुम्हारा टैटू है।”

मोहित के होंठ कांप गए।

“मैडम… मैं मजबूर था।”

“किसने मजबूर किया?” नंदिनी ने दबाव डाला।

मोहित की आंखों में डर तैर आया।

“कंपनी के एमडी… और एसएचओ… उन्होंने कहा अगर मैंने मदद नहीं की, तो मेरे परिवार को—”

“राघव को किसने मारा?” नंदिनी ने पूछा।

मोहित ने सिर झुका लिया।

“राघव… उसने फाइलें छुपा दी थीं। वो पुलिस में शिकायत करने वाला था। उन्होंने उसे फैक्ट्री में बुलाया—बातचीत के बहाने। एसएचओ पहले से वहां था। उन्होंने राघव को बांधा… धमकाया… और फिर…”

मोहित की आवाज टूट गई।

“मैंने उसे मारा नहीं, मैडम। लेकिन मैंने सब होते देखा। और… और किरन भाभी को फंसाने के लिए उनके फोन से कॉल किया… लोकेशन ऑन कर दी…”

नंदिनी ने आंखें बंद कीं। गुस्सा और दुख एक साथ उमड़ रहा था।

“तुम गवाह बनोगे?” उसने पूछा।

मोहित ने डरते हुए कहा,

“अगर मैं गवाही दूँगा, तो मैं जिंदा नहीं रहूंगा।”

नंदिनी ने धीरे से कहा,

“अगर तुम नहीं दोगे, तो किरन जिंदा रहते हुए भी मर जाएगी।”


12) मोहित की कीमत

अगले दिन मोहित गायब था।

उसका फोन बंद। घर पर ताला। पड़ोसियों ने कहा—

“रात में काली गाड़ी आई थी।”

नंदिनी की रीढ़ में सिहरन दौड़ गई।

वो समझ गई—खेल अब खतरनाक हो चुका है।

इसी बीच किरन की जमानत फिर खारिज हो गई। जज ने कहा—

“सबूत गंभीर हैं।”

किरन कोर्ट से लौटते समय बस इतना बोली,

“भगवान… अगर सच है तो… मुझे बचा लो।”


13) आखिरी दांव: एसपी ऑफिस

नंदिनी ने फैसला किया—अब लोकल पुलिस पर भरोसा नहीं।

वो सीधे एसपी ऑफिस पहुंची। वहां उसने आवेदन दिया, वीडियो की कॉपी दिखाई, और पूरी रिपोर्ट लिखित में दी।

एसपी ने वीडियो देखा। उसकी भौंहें तन गईं।

“ये बहुत बड़ा मामला है,” उसने कहा। “लेकिन अगर ये फर्जी निकला तो तुम पर केस भी हो सकता है।”

नंदिनी ने शांत स्वर में कहा,

“सर, मैं पत्रकार हूँ। मेरा हथियार सच है। और मेरा डर—किरन जैसी औरतों का भविष्य।”

एसपी ने तुरंत आदेश दिया।

“एसएचओ अजय प्रताप को सस्पेंड करो। और केस क्राइम ब्रांच को ट्रांसफर।”

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14) जब शिकारी खुद फंस गया

शहर में हलचल मच गई। मीडिया जो कल तक किरन को “हत्यारिन” कह रहा था, आज सवाल पूछने लगा—

“एसएचओ पर संदेह!”

“क्या पत्नी फंसाई गई?”

एसएचओ को बुलाया गया। पूछताछ हुई। उसने पहले हंसी उड़ाई, फिर धमकाया, फिर चुप हो गया।

लेकिन वीडियो… लोकेशन… कॉल रिकॉर्ड… सब कुछ मिल रहा था।

अंत में, जब क्राइम ब्रांच ने मोहित को एक हाईवे ढाबे से बरामद किया—डरा, टूटा, लेकिन जिंदा—तो केस की रीढ़ मजबूत हो गई।

मोहित ने बयान दिया।

“मुझे धमकाया गया। राघव को मारकर किरन को फंसाने की प्लानिंग थी।”

एसएचओ की आंखें पहली बार डर से खाली हुईं।


15) किरन की रिहाई… और नया दर्द

एक महीने बाद किरन जेल से बाहर आई।

गेट खुला। हवा उसके चेहरे से टकराई—लेकिन आज हवा में आज़ादी की खुशबू नहीं थी। उसमें बदनामी का धुआं मिला था।

बाहर नंदिनी खड़ी थी।

किरन ने उसे देखा, और बिना कुछ कहे रो पड़ी।

नंदिनी ने उसका कंधा पकड़ा।

“आप निर्दोष साबित हो गईं।”

किरन ने कांपती आवाज में कहा,

“पर मेरे पति…?”

नंदिनी के पास जवाब नहीं था। सिर्फ चुप्पी थी—वो चुप्पी जो किसी इंसान की कमी से बनती है।

किरन ने आसमान की तरफ देखा। बारिश फिर शुरू हो गई थी।

“राघव ने सच के लिए लड़ाई लड़ी,” उसने कहा, “और सच ने उसे खा लिया।”

नंदिनी ने धीरे से कहा,

“नहीं। सच ने उसे नहीं खाया। लोगों ने खाया। लेकिन आज… सच जीता है।”

किरन ने एक गहरी सांस ली।

“जीत… किस कीमत पर?”


16) आखिरी मोड़: राघव की फाइल

कुछ दिनों बाद, क्राइम ब्रांच ने राघव के घर से एक पुराना लिफाफा निकाला। वो अलमारी के पीछे छुपा था। अंदर एक पेन-ड्राइव।

उस पेन-ड्राइव में कंपनी का पूरा घोटाला था। नाम, रकम, ट्रांसफर, और कुछ नेताओं के संकेत।

एसपी ने नंदिनी को बुलाकर कहा,

“तुम्हारी वजह से सिर्फ एक निर्दोष औरत नहीं बची… एक पूरा सिस्टम हिला है।”

नंदिनी ने सिर झुकाया।

“सर, ये सब राघव ने किया।”

एसपी ने गंभीरता से कहा,

“और अब… राघव के नाम पर केस खुलेगा। बड़े लोग गिरेंगे।”


17) किरन की नई शुरुआत

किरन ने स्कूल की नौकरी छोड़ दी। वो शहर में नहीं रहना चाहती थी। लेकिन भागना भी नहीं चाहती थी।

उसने एक छोटा सा एनजीओ शुरू किया—“सच की आवाज”—जहां वो उन औरतों की मदद करती जो झूठे आरोपों में फंसा दी जाती हैं।

पहली मीटिंग में उसने कहा,

“मुझे बचाने कोई परिवार नहीं आया था।
मुझे बचाया एक लड़की ने—जो सच देख सकती थी।
और अब… मैं हर उस इंसान के लिए खड़ी रहूंगी… जिसे दुनिया ने पहले ही दोषी मान लिया।”

नंदिनी पीछे खड़ी थी। उसकी आंखों में थकान थी, लेकिन गर्व भी।


18) कहानी का सच

इस कहानी में सबसे डरावनी चीज़ चेन या रस्सी नहीं थी।

सबसे डरावनी चीज़ थी—

एक इंसान को बिना सुने दोषी मान लेना।
एक अफसर का कानून को हथियार बना लेना।
और एक समाज का मसाला खोजकर इंसानियत भूल जाना।

किरन बच गई। लेकिन उसका भरोसा, उसका घर, उसका पति—सब नहीं बच पाए।

फिर भी, जब भी वो अपनी एनजीओ के दरवाजे पर बोर्ड देखती—

“सच की आवाज”

तो उसे लगता—

राघव कहीं न कहीं जिंदा है।
किसी फाइल में नहीं…
किसी रिपोर्ट में नहीं…
बल्कि उन लोगों के भीतर—जो अब डर के सामने झुकते नहीं।