पति IAS की ट्रैनिंग से लौट रहा था तलाकशुदा पत्नी ट्रेन में भीख मांगती मिली फिर जो हुआ…
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सर्दियों की धूप और अधूरी कहानियाँ
सर्दियों की हल्की धूप उस दिन गाँव के छोटे से रेलवे स्टेशन की पटरियों पर बिछी हुई थी।
हवा में मिट्टी, कोयले और दूर जलती चाय की दुकानों से उठती भाप की मिली-जुली खुशबू थी।
स्टेशन वैसा ही था जैसा वर्षों से रहा था—
पुराना, थका हुआ, लेकिन अपनी सादगी में सच्चा।
उसी स्टेशन की ओर बढ़ती एक्सप्रेस ट्रेन के एक डिब्बे की खिड़की के पास बैठा शिवम बाहर फैले खेतों को देख रहा था।
हरी फसलें, कहीं-कहीं पीली होती सरसों, और दूर मिट्टी के घरों की कतारें।
उसकी आँखों में चमक थी।
लेकिन उस चमक के पीछे एक पुराना दर्द भी छिपा हुआ था।
आज वह सिर्फ ट्रेनिंग पूरी करके लौटता हुआ युवक नहीं था।
आज वह आईएएस अधिकारी बन चुका था।
गाँव का वही साधारण लड़का,
जिसने कभी कच्चे घर की टिमटिमाती लालटेन के नीचे बैठकर सपने देखे थे—
आज उन्हीं सपनों को सच करके अपने गाँव लौट रहा था।
लेकिन अजीब बात यह थी कि इतनी बड़ी सफलता के बाद भी उसके दिल में वैसी खुशी नहीं थी जैसी होनी चाहिए थी।
क्योंकि उसकी जिंदगी का एक हिस्सा ऐसा था,
जो हमेशा के लिए उससे छूट चुका था।
और वह हिस्सा था—
शिवानी।

यादों की पहली सीढ़ी
खिड़की से बाहर देखते हुए शिवम के मन में पुरानी यादें किसी धीमी फिल्म की तरह चलने लगीं।
वही छोटा सा गाँव।
वही टूटी-फूटी पगडंडी।
और उसी रास्ते से स्कूल जाते हुए पहली बार शिवानी को देखना।
साधारण सी सलवार-कमीज़,
बालों में एक लंबी चोटी,
लेकिन आँखों में ऐसे सपने—
जैसे पूरी दुनिया जीत लेना चाहती हो।
स्कूल की दोस्ती धीरे-धीरे कॉलेज तक पहुँची।
और दोस्ती कब प्यार में बदल गई—
यह दोनों को भी ठीक से याद नहीं था।
गाँव में लोग बातें करने लगे थे।
लेकिन उन्हें फर्क नहीं पड़ता था।
क्योंकि उनके सपने एक जैसे थे—
कुछ बनकर दिखाना,
परिवार की हालत बदलना,
और एक दिन ऐसा घर बनाना
जहाँ किसी चीज़ की कमी न हो।
शादी और संघर्ष
कॉलेज खत्म होने के बाद हालात आसान नहीं थे।
शिवम के घर की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर थी।
पिता की पुरानी बीमारी,
छोटे भाई की पढ़ाई का खर्च,
और ऊपर से घरवालों का दबाव—
“कोई नौकरी कर लो।”
लेकिन शिवानी हमेशा एक ही बात कहती—
“तुम बस पढ़ाई करो शिवम।
एक दिन तुम बहुत बड़े अधिकारी बनोगे।
मैं नौकरी कर लूंगी।
हम दोनों मिलकर सब संभाल लेंगे।”
और सच में वही हुआ।
गाँव के मंदिर में एक साधारण सी शादी हुई।
ना कोई बड़ा समारोह,
ना ज़्यादा लोग।
लेकिन उस दिन दोनों के चेहरों पर जो मुस्कान थी—
वह किसी महल की शादी से कम नहीं थी।
शादी के बाद शहर में एक छोटा सा किराए का कमरा लिया गया।
दीवारों पर सीलन थी।
गर्मियों में पंखा ठीक से नहीं चलता था।
लेकिन उस छोटे से कमरे में
एक बहुत बड़ा सपना रहता था—
आईएएस बनने का सपना।
छोटे कमरे का बड़ा सपना
शिवानी सुबह जल्दी उठती।
खाना बनाती।
फिर बस पकड़कर अपनी छोटी सी प्राइवेट नौकरी पर चली जाती।
शाम को लौटकर
शिवम के लिए चाय बनाते हुए
हमेशा मुस्कुराकर पूछती—
“आज कितने घंटे पढ़ाई हुई?”
शिवम कभी थक जाता।
कभी परेशान हो जाता।
लेकिन शिवानी की आवाज़ में ऐसा भरोसा होता
कि उसका हौसला फिर से खड़ा हो जाता।
कई बार महीने के आख़िर में पैसे इतने कम बचते
कि दोनों को सिर्फ दाल-चावल पर गुज़ारा करना पड़ता।
लेकिन शिवानी हँसकर कहती—
“आज सादा खाना सही।
लेकिन एक दिन हम अपने बड़े घर की बालकनी में बैठकर चाय पिएंगे।”
पहली दरार
समय बीतता गया।
धीरे-धीरे रिश्तेदारों और जान-पहचान वालों की बातें
उनके छोटे से घर तक पहुँचने लगीं।
“लड़की सुबह से शाम तक बाहर रहती है।”
“नौकरी करती है।”
“शहर का माहौल ठीक नहीं।”
शिवम शुरू में इन बातों को नज़रअंदाज़ करता रहा।
लेकिन बार-बार वही बातें सुनते-सुनते
कहीं न कहीं उसके मन में
हल्की सी बेचैनी पैदा होने लगी।
शिवानी यह सब महसूस करती थी।
लेकिन चुप रहती।
वह जानती थी—
यह समय भी गुजर जाएगा।
उसे बस इतना चाहिए था
कि शिवम का ध्यान पढ़ाई से न हटे।
गलतफहमी का बीज
एक दिन शिवानी ऑफिस से देर से लौटी।
मीटिंग लंबी हो गई थी।
बारिश भी तेज़ थी।
शिवम ने पहली बार थोड़ी कठोर आवाज़ में पूछा—
“इतनी देर क्यों हुई?”
शिवानी ने शांति से जवाब दिया।
“काम था।”
शिवम ने धीमे से कहा—
“लोग बातें भी करते हैं।”
यह सुनते ही शिवानी की आँखों में नमी आ गई।
“लोगों की बातों के लिए
क्या मैं अपना काम छोड़ दूँ?
मैं यह सब तुम्हारे लिए कर रही हूँ।”
कमरे में खामोशी छा गई।
अलगाव
छोटी-छोटी बहसें
धीरे-धीरे बड़ी होती गईं।
और एक दिन
गुस्से और थके हुए शब्दों के बीच
बात तलाक तक पहुँच गई।
शिवानी ने जाते वक्त सिर्फ इतना कहा—
“मैं आज भी वही हूँ शिवम।
बस तुम्हारा भरोसा
रास्ते में कहीं खो गया है।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
और साथ ही
उनकी जिंदगी का एक अध्याय भी।
अलग-अलग रास्ते
शिवम ने खुद को पूरी तरह पढ़ाई में झोंक दिया।
आईएएस ही अब उसका एकमात्र लक्ष्य था।
शिवानी की जिंदगी उतनी आसान नहीं थी।
कुछ समय बाद उसकी नौकरी चली गई।
छोटे-मोटे काम किए।
कभी ट्यूशन,
कभी अस्थायी नौकरी।
कई रातें
सिर्फ पानी पीकर सोई।
लेकिन उसने कभी हाथ नहीं फैलाया।
सफलता और खालीपन
सालों की मेहनत के बाद
शिवम का चयन हो गया।
पूरा गाँव खुश था।
लेकिन उसके दिल में एक खालीपन था।
“काश शिवानी यहाँ होती…”
वह ट्रेन
और आज—
उसी ट्रेन में
वह सामने खड़ी थी।
फटे कपड़े।
थकी आँखें।
और हाथ में भीख की थैली।
“शिवानी…”
शिवम के मुँह से निकल गया।
वह ठिठकी।
फिर नज़रें झुका ली।
“गलत पहचान लिया आपने साहब।”
लेकिन उसकी आवाज़ में
वह सख़्ती नहीं थी।
सच का सामना
शिवम उसके पास पहुँचा।
“अगर मैं गलत हूँ
तो मेरी आँखों में देखकर कह दो
कि तुम शिवानी नहीं हो।”
आँखें मिलीं।
सालों का दर्द
उस एक पल में छलक पड़ा।
“मेरी हालत कैसे हुई—
यह बताने से हल्की नहीं होती।”
शिवम ने सिर झुका लिया।
“मुझसे गलती हुई थी।
बहुत बड़ी।”
नई शुरुआत
ट्रेन स्टेशन पर रुक चुकी थी।
भीड़ उतर रही थी।
शिवम ने हाथ आगे बढ़ाया।
“मेरे साथ चलो।”
शिवानी ने कहा—
“एक शर्त पर।”
“इस बार
हम सिर्फ अपने भरोसे पर चलेंगे।”
शिवम मुस्कुराया।
“इस बार
सिर्फ हम।”
शिवानी ने उसका हाथ थाम लिया।
अंत नहीं—आरंभ
सर्दियों की धूप
अब स्टेशन से आगे फैल रही थी।
और दो लोग—
जिनकी कहानी अधूरी रह गई थी—
एक बार फिर
नई शुरुआत की ओर बढ़ रहे थे।
क्योंकि कुछ रिश्ते
टूटने के बाद भी
खत्म नहीं होते।
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