पत्नी बोली – फैसला कर लो, माँ या मैं… फिर आगे जो हुआ, पूरी दुनिया रो पड़ी

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पत्नी बोली – फैसला कर लो, माँ या मैं… फिर आगे जो हुआ, पूरी दुनिया रो पड़ी

शाम का समय था। घर के आंगन में तुलसी के पास एक बूढ़ी मां बैठी थी। उसकी आंखें बार-बार दरवाजे की ओर उठ जाती थीं। उसे इंतजार था अपने बेटे रामू का। कभी यह घर बहुत खुशहाल हुआ करता था। छोटा सा कच्चा घर, लेकिन हंसी से भरा हुआ। उस घर में मां-बेटे के बीच कोई दीवार नहीं थी। मां की सांस में बेटा था और बेटे की रगों में मां। रामू जब छोटा था, उसके पिता बहुत पहले चल बसे थे। मां ने ही खेत में काम किया, दूसरों के घर झाड़ू-पोछा किया। कभी पेट काटकर उसे पढ़ाया, कभी खुद भूखी रहकर उसे दो रोटी दी।

रामू को आज भी याद था, जब वह बुखार में तपता था तो मां पूरी रात जागती थी। अपने आंचल से हवा करती और हर थोड़ी देर में उसका माथा छूकर कहती, “मेरा बेटा ठीक हो जाएगा, भगवान है ना।” समय बदला, रामू बड़ा हुआ, पढ़-लिखकर शहर चला गया। नौकरी मिली, पैसा आया और फिर उसकी जिंदगी में आई सीमा। सीमा खूबसूरत थी, पढ़ी-लिखी थी, बोलचाल में तेज और अपने फैसलों में बहुत पक्की। शादी धूमधाम से हुई। गांव में ढोल बजे। मां की आंखों में आंसू थे, खुशी के। उसे लगा अब उसका बेटा अकेला नहीं रहेगा। उसके घर में एक और बेटी आ गई है।

शुरुआत के कुछ महीने सब ठीक रहा। सीमा मां के पैर छूती, मां उसे गले लगाती। रामू चैन से सोता था। लेकिन धीरे-धीरे घर में सन्नाटा आने लगा। सीमा को गांव पसंद नहीं था। मिट्टी की खुशबू उसे अजीब लगती थी। मां की सादगी उसे पिछड़ापन लगने लगी। मां सुबह उठकर सबसे पहले बहू के लिए चाय बनाती, लेकिन सीमा बिना देखे कह देती, “मुझे बिना चीनी की चाहिए।” मां फिर चुपचाप दूसरी चाय बनाती। कभी दाल में नमक ज्यादा हो जाता, तो सीमा का चेहरा बिगड़ जाता। कभी सब्जी पसंद नहीं आती, तो थाली एक तरफ सरका देती। मां कुछ नहीं कहती। बस रात को सोते समय छत की ओर देखती रहती।

रामू सब देखता था, लेकिन कुछ बोलता नहीं था। उसे लगता था थोड़ा समय लगेगा, सब ठीक हो जाएगा। पर समय ठीक नहीं हुआ। एक दिन सीमा ने कहा, “मुझे शहर जाना है। इस गांव में मेरा दम घुटता है।” रामू मां की तरफ देखता रहा। मां ने बस इतना कहा, “अगर मेरे बेटे की खुशी वहां है तो चला जा बेटा।” और वे शहर चले गए।

शहर का घर बड़ा था, लेकिन उसमें अपनापन नहीं था। मां वहां अजनबी बन गई। उसकी सुबह-शाम अब किसी को नहीं दिखती थी। सीमा को मां की मौजूदगी चुभने लगी। कभी कहती, “दिन भर यही बैठी रहती है,” तो कभी कहती, “हर बात में टोकती रहती है।” एक दिन बात बढ़ गई। सीमा गुस्से में बोली, “रामू, साफ-साफ फैसला कर लो। इस घर में तेरी मां रहेगी या मैं?” यह शब्द तलवार की तरह रामू के दिल में उतर गए। कमरे के बाहर मां बैठी थी। उसने सब सुन लिया था। उसकी आंखों में आंसू नहीं आए, बस दिल बैठ गया।

उसे याद आया जब रामू पहली बार चलना सीखा था, जब उसने पहला शब्द “मां” बोला था, जब उसने पहली कमाई मां के हाथ में रखी थी। और आज उसी बेटे से उसका अस्तित्व पूछा जा रहा था। रामू चुप था। बहुत देर तक सीमा की आंखों में जिद थी और मां की आंखों में बस इंतजार। उसे उम्मीद थी, शायद मेरा बेटा बोलेगा, कहेगा “मां मेरी है।” लेकिन रामू कुछ नहीं बोला। उसकी चुप्पी ही जवाब थी।

मां धीरे-धीरे उठी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे। उसने सिर्फ इतना कहा, “बहू, अगर मेरी वजह से तुम्हारे घर में अशांति है तो मैं चली जाऊंगी।” सीमा ने कुछ नहीं कहा। रामू ने भी नहीं। मां अपने कमरे में गई। एक छोटा सा झोला निकाला। उसमें बस दो साड़ियां थीं और बेटे की बचपन की एक फोटो। वो फोटो देखकर उसके होंठ कांप गए। “मैंने तुझे दुनिया दी थी बेटा। आज तूने मुझे दुनिया से निकाल दिया।”

रात गहरी हो रही थी। शहर की लाइटें चमक रही थीं और उस घर में एक मां अपने बेटे के फैसले का बोझ उठाकर खामोशी से जाने की तैयारी कर रही थी। उसे नहीं पता था आगे क्या होगा, कहां जाएगी, कैसे जिएगी। बस इतना जानती थी, उसका बेटा अब उसका नहीं रहा। दरवाजे पर हाथ रखा। एक बार पीछे मुड़कर देखा। रामू खड़ा था, नजरें झुकी हुई। मां ने कुछ नहीं कहा। बस मन ही मन कहा, “भगवान मेरे बेटे को खुश रखना।” और दरवाजा बंद हो गया।

उस बंद दरवाजे के साथ एक मां की पूरी जिंदगी बाहर रह गई। दरवाजा बंद होते ही घर के अंदर अजीब सी खामोशी फैल गई। ऐसी खामोशी जिसमें आवाज नहीं होती, लेकिन दिल चीखता रहता है। मां बाहर चली गई थी और रामू अंदर खड़ा था जैसे उसकी रगों से खून खींच गया हो। सीमा ने राहत की सांस ली। उसे लगा अब घर उसका हो गया है। अब कोई टोकेगा नहीं, कोई पुराने रीति-रिवाज नहीं, कोई बिना मतलब की बातें नहीं। वह रसोई में गई, टीवी ऑन किया, मोबाइल उठाया। लेकिन रामू वही खड़ा रहा। उसे लग रहा था जैसे घर की दीवारें उसे घूर रही हों, जैसे हर कोना पूछ रहा हो, “मां कहां है?”

उसे याद आया जब मां इसी घर में पहली बार आई थी, कैसे उसने हर दीवार को छुआ था, कैसे उसने कहा था, “मेरा बेटा अब बड़े घर में रहता है।” आज वही घर उसकी मां के लिए पराया हो गया था। बाहर रात ठंडी थी। मां सड़क के किनारे खड़ी थी। उसके पास ना पैसा था, ना कोई ठिकाना। उसने आसपास देखा। अजनबी चेहरे, अजनबी रास्ते, इतनी बड़ी दुनिया और उसमें उसके लिए एक कोना भी नहीं। उसके कदम अपने आप मंदिर की ओर बढ़ गए। वहीं जहां वह हर मुश्किल में जाती थी। मंदिर के बाहर सीढ़ियों पर बैठ गई। ठंडी हवा उसके शरीर को चीर रही थी, लेकिन उससे ज्यादा ठंड उसके दिल में थी।

उसने आंचल ओढ़ा, आंखें बंद की। भगवान से कोई शिकायत नहीं की। बस इतना कहा, “अगर मेरा बेटा खुश है तो मुझे कुछ नहीं चाहिए।” लेकिन भगवान भी शायद उसकी हालत देख रहे थे। रात बीतती गई, मां वहीं बैठी रही। सुबह जब मंदिर खुला तो पुजारी ने देखा एक बूढ़ी औरत सीढ़ियों पर बैठी कांप रही है। उसने पूछा, “मां, कहां जाना है?” मां ने धीमी आवाज में कहा, “जहां जगह मिल जाए बेटा।” पुजारी की आंखें भर आईं। उसने उसे अंदर बिठाया, थोड़ा प्रसाद दिया और एक पुरानी चादर। मां ने पहली बार आंसू बहाए।

उधर रामू की रात भी नहीं बीती। वह बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। हर करवट पर मां का चेहरा सामने आ जाता। उसे मां की आवाज सुनाई देती, “बेटा, भूखा मत सोना।” सुबह हुई, सीमा देर से उठी। वो चाय पीते हुए बोली, “आज ऑफिस देर हो जाएगा।” रामू ने पहली बार उसे ध्यान से देखा। उसे एहसास हुआ जिस औरत के लिए उसने मां को छोड़ा, वह उसकी आंखों में उसकी मां की जगह कभी नहीं ले पाएगी। लेकिन फिर भी वह कुछ नहीं बोला।

ऑफिस में उसका मन नहीं लगा। फाइलें सामने थीं, लेकिन अक्षर धुंधले लग रहे थे। बार-बार सोचता रहा, “मां कहां होगी? क्या खाया होगा? ठंड तो नहीं लग रही होगी?” दोपहर में उससे रहा नहीं गया। उसने मंदिर जाकर देखने का फैसला किया। मंदिर के बाहर वही सीढ़ियां, वही चादर और उस चादर के नीचे उसकी मां। रामू की सांस रुक गई। वो धीरे-धीरे पास गया। मां की आंखें बंद थीं, चेहरा थका हुआ। रामू ने कांपती आवाज में कहा, “मां…” मां की पलकें हिलीं। उसने आंखें खोलीं, सामने बेटे को देखा। वह कुछ नहीं बोली, बस उठने की कोशिश की। रामू घुटनों के बल बैठ गया, उसके आंसू गिरने लगे। “मां, घर चलो।” मां ने सिर हिला दिया। धीरे से बोली, “नहीं बेटा, अब वहां मेरी जगह नहीं है।”

रामू ने कहा, “आप मेरी मां हो।” मां ने हल्की सी मुस्कान दी। “मां तो हूं, पर अब तेरे घर की नहीं।” यह शब्द रामू के सीने में चुब गए। उसे पहली बार एहसास हुआ, फैसला बोलकर नहीं चुप रहकर भी किया जाता है। मां ने कहा, “तू जा बेटा, तेरी जिंदगी में मेरी वजह से झगड़ा ना हो।” रामू कुछ कहना चाहता था, लेकिन शब्द नहीं मिले। वो उठकर चला गया। घर लौटते समय उसे लगा, वो अकेला है। पूरी तरह अकेला।

दिन बीतते गए। मां मंदिर में ही रहने लगी। कभी कोई भंडारा होता तो दो रोटी मिल जाती। कभी कोई श्रद्धालु कुछ दे देता। लेकिन उसका शरीर जवाब देने लगा। एक दिन वह बेहोश हो गई। लोगों ने अस्पताल पहुंचाया। डॉक्टर ने कहा, “इन्हें किसी अपने की जरूरत है।” नाम पूछा गया। मां ने कहा, “मेरा कोई नहीं।” उसने बेटे का नाम नहीं लिया। उधर रामू को जब खबर मिली तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। वह अस्पताल पहुंचा। मां बेड पर पड़ी थी, कमजोर, नाजुक। रामू ने उसका हाथ पकड़ा। पहली बार मां ने हाथ खींच लिया। वो बोली, “अब देर हो गई बेटा।”

रामू फूट-फूट कर रो पड़ा। उसे समझ आ गया, कुछ फैसलों की कीमत बहुत भारी होती है। मां की हालत गंभीर थी। डॉक्टर ने कहा, “दुआ करो।” रामू बाहर बैठा रहा पूरी रात। उसे लगा अगर मां चली गई तो वह खुद को कभी माफ नहीं कर पाएगा। सुबह मां की आंखें खुलीं। उसने रामू को पास बुलाया। धीमी आवाज में बोली, “बेटा, अगर मैं बच गई तो तुझे एक बात माननी होगी।” रामू ने कहा, “जो कहोगी मां।” मां बोली, “कभी किसी और मां के साथ ऐसा मत होने देना।” रामू सर झुका कर रोता रहा। मां की आंखों से आंसू गिर गए।

कहानी यही खत्म नहीं होती क्योंकि आगे सीमा का सच सामने आएगा। रामू का सबसे बड़ा फैसला होगा और एक ऐसा मोड़ आएगा जो पूरे घर की तस्वीर बदल देगा।

अस्पताल की दीवारें सफेद थीं, लेकिन रामू को वो दीवारें काली लग रही थीं। ऐसी काली जिन पर उसकी चुप्पी के दाग साफ दिख रहे थे। मां बेड पर लेटी थी, सांस चल रही थी लेकिन बहुत धीमी। डॉक्टर ने साफ कहा था, “अगर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो शरीर तो बच जाएगा, लेकिन हौसला शायद नहीं।” रामू वही कुर्सी पकड़ कर बैठा रहा। नींद आंखों से कोसों दूर थी। उसे याद आने लगा वह दिन जब मां ने अपने गहने बेचकर उसका शहर का फॉर्म भरा था। वो रातें जब मां खुद भीगी हुई जमीन पर सोती थी ताकि बेटा सूखी जगह पर सो सके। और आज वही मां अस्पताल के बिस्तर पर पड़ी थी और वह खुद अपनी नौकरी से छुट्टी लेने में भी दो बार सोच चुका था।

उसके कानों में मां की आवाज गूंज रही थी, “कभी किसी और मां के साथ ऐसा मत होने देना।” यह बात रामू के दिल में लोहे की कील की तरह धंस गई। उसी समय उसका मोबाइल बजा। सीमा का फोन था। “कहां हो? ऑफिस से कॉल आया था। तुम आज भी नहीं गए।” रामू कुछ नहीं बोला। सीमा झुंझला गई, “मैंने कहा था ना? यह सब ड्रामा करने की जरूरत नहीं है। डॉक्टर है, नर्स है। हमारी जिंदगी क्यों रुके?” रामू की उंगलियां कांपने लगीं। उसने धीमी लेकिन कड़ी आवाज में कहा, “वो मेरी मां है।” सीमा हंसती एक ऐसी हंसी जिसमें अपनापन नहीं था। “हर किसी की मां होती है। इसका मतलब यह थोड़ी कि हम अपनी जिंदगी रोक दें।”

यही वो पल था जब रामू के भीतर कुछ टूट गया। उसने फोन काट दिया। पहली बार उसने सीमा की आवाज को अपने दिल से निकाल फेंका। मां की हालत अगले दो दिन तक वैसी ही बनी रही। कभी आंख खुलती, कभी बंद हो जाती। एक बार उसने रामू का हाथ पकड़ लिया। बहुत हल्के से बोली, “तू ठीक है ना बेटा?” रामू रो पड़ा, “मैं ठीक हूं मां। लेकिन आप ठीक हो जाओ।” मां ने मुस्कुराने की कोशिश की, “तू खुश है, यही मेरे लिए काफी है।” रामू को लगा यह औरत मां नहीं, भगवान है।

तीसरे दिन डॉक्टर ने कहा, “खतरा टल गया है।” रामू ने राहत की सांस ली। लेकिन यह राहत अधूरी थी क्योंकि अब सवाल यह नहीं था कि मां बचेगी या नहीं, सवाल यह था अब मां जाएगी कहा। रामू ने तय कर लिया था, इस बार वो चुप नहीं रहेगा। मां को अस्पताल से छुट्टी मिली। रामू उसे घर ले गया। दरवाजा खुला। सीमा सामने खड़ी थी। उसका चेहरा सख्त था, आंखों में ना चिंता थी ना ममता। मां ने अंदर कदम रखा, तो सीमा ने कहा, “मैंने साफ कहा था, यह घर अब उनका नहीं है।”

मां रुक गई। रामू आगे आया, “यह मेरी मां है और यह घर भी।” सीमा चौंक गई। शायद उसने पहली बार रामू की आवाज में मजबूती सुनी थी। सीमा बोली, “तो मतलब तुमने फैसला कर लिया?” रामू ने बिना हिचक कहा, “हां।” सीमा का चेहरा लाल हो गया। “तो मैं क्या हूं?” उसने चिल्लाकर पूछा। रामू ने बहुत शांति से कहा, “तुम मेरी पत्नी हो, लेकिन मां मेरी जड़ है और जड़ काट दी जाए तो पेड़ खड़ा नहीं रहता।” सीमा हंसी, लेकिन इस बार उसकी हंसी में गुस्सा और जहर था। “ठीक है, तो देख लेना मैं क्या करती हूं।” उसने बैग उठाया और घर से निकल गई। दरवाजा जोर से बंद हुआ।

मां डर गई, “बेटा मेरी वजह से घर टूट गया।” रामू ने मां के पैर पकड़ लिए, “नहीं मां, घर आज पहली बार जुड़ा है।” मां की आंखों से आंसू ब निकले। लेकिन कहानी यही खत्म नहीं हुई। सीमा खाली हाथ नहीं गई थी। अगले दिन रामू के ऑफिस में एक शिकायत पहुंची। घरेलू हिंसा, मानसिक प्रताड़ना, झूठे आरोप। रामू को सस्पेंड कर दिया गया। घर में सन्नाटा छा गया। पैसा रुक गया। इस दांव पर लग गई। मां को सब समझ आ गया। उसने रात में रामू को बुलाया, “बेटा, मैं चली जाऊंगी।”

रामू ने कहा, “जाओगी मां?” मां बोली, “जहां मेरा बोझ ना बनूं।” रामू चुप हो गया। मां ने आगे कहा, “मेरी वजह से तेरी नौकरी चली गई। तेरी जिंदगी खराब हो रही है।” रामू ने मां को गले लगा लिया, “अगर आपकी वजह से मेरा सब कुछ चला जाए तो भी मुझे कोई गम नहीं।” मां रोने लगी। अगले दिन मां चुपचाप घर से निकल गई। इस बार बिना बताए। जब रामू लौटा, घर खाली था, मां का कमरा खाली। सिर्फ एक कागज रखा था, उस पर लिखा था, “बेटा, मैंने तुझे जन्म दिया, अब तुझे आजाद करती हूं। जहां रहूंगी, खुश रहूंगी। तू अपनी जिंदगी बचा ले।”

रामू जमीन पर बैठ गया। अब वो सच में अकेला था। मां फिर सड़क पर थी, इस बार और भी कमजोर। लेकिन इस बार भगवान ने एक रास्ता खोला। एक महिला आश्रम, जहां अनाथ बेसहारा महिलाएं रहती थीं। मां वहां पहुंची। उसे खाना मिला, बिस्तर मिला, इज्जत मिली। वहां की औरतों ने पहली बार उसे मां कह कर बुलाया। मां फिर से जीने लगी।

उधर रामू अपनी नौकरी बचाने की लड़ाई लड़ रहा था। सच सामने आया, सीमा के झूठ पकड़े गए। ऑफिस ने रामू को बहाल कर दिया। लेकिन दिल वह अभी भी टूटा हुआ था। एक दिन उसे पता चला, मां एक आश्रम में है। वह दौड़ता हुआ पहुंचा। मां सामने थी, लेकिन इस बार वह शांत थी, संतुष्ट थी। रामू रो पड़ा, “मां, घर चलो।” मां ने सिर हिलाया, “अब मेरा घर यही है बेटा।” रामू को पहली बार समझ आया, हर वापसी घर नहीं होती। कुछ त्याग हमेशा के लिए होते हैं। मां ने कहा, “मैं खुश हूं, तू भी खुश रह।” रामू ने सिर झुका लिया। अब वह जान चुका था, इंसान सबसे बड़ी गलती तब करता है जब वह चुप रहता है और मां सबसे बड़ा त्याग तब करती है जब वह बोलना छोड़ देती है।

मां आश्रम के आंगन में बैठी थी। सुबह की धूप उसकी झुर्रियों पर उतर रही थी। उसके चेहरे पर शांति थी, ऐसी शांति जो बहुत कुछ सहने के बाद आती है। आश्रम की महिलाएं उसे मां कहकर बुलाती थीं। कोई उसके पैर दबा देती, कोई पानी रख देती। पहली बार उसे महसूस हुआ, इस किसी रिश्ते की मोहताज नहीं होती। लेकिन फिर भी दिल के किसी कोने में एक नाम अब भी सांस ले रहा था – रामू।

हर दिन रामू मां के बारे में सोचता था। ऑफिस में काम करता, लेकिन फाइलों के बीच मां की झुकी हुई पीठ दिख जाती। रात को सोने जाता तो लगता मां अब भी दरवाजा खोल कर कहेगी, “बेटा, खाना खा ले।” लेकिन दरवाजा नहीं खुलता था। एक दिन ऑफिस में एक सेमिनार हुआ। विषय था – बुजुर्गों के अधिकार और पारिवारिक जिम्मेदारी। एक सामाजिक कार्यकर्ता बोल रही थी। उसकी बातें सीधी दिल में उतर रही थीं। वह कह रही थी, “जिस समाज में मां-बाप बोझ बन जाए, वह समाज ज्यादा दिन खड़ा नहीं रह सकता।”

रामू की आंखें भर आईं। सेमिनार खत्म हुआ, लोग ताली बजा रहे थे। रामू उठ खड़ा हुआ। उसने माइक लिया। उसकी आवाज कांप रही थी, “मैं एक बेटा हूं, जो समय पर नहीं बोला। मैंने अपनी मां को खो दिया, जिंदा रहते हुए।” पूरा हॉल खामोश हो गया। रामू ने सब कुछ बता दिया – घर, पत्नी, चुप्पी, मां का जाना। कई आंखें नम हो गईं। वही सामाजिक कार्यकर्ता रामू के पास आई, “आपकी मां जिंदा है?” उसने पूछा। रामू ने सिर हिलाया, “वो एक आश्रम में है।” महिला बोली, “तो अभी सब खत्म नहीं हुआ।”

रामू को जैसे एक रोशनी दिखी। उसी दिन उसने फैसला किया, अब वो सिर्फ बेटे की तरह नहीं, एक इंसान की तरह जिएगा। उसने अपनी सैलरी का एक हिस्सा आश्रमों के लिए दान करना शुरू किया। हर हफ्ते किसी ना किसी बुजुर्ग से मिलने जाता। लेकिन मां के सामने वो अब भी नहीं जा पा रहा था। डरता था, कहीं मां उसे पहचान कर भी अपनाने से इंकार ना कर दे।

इधर सीमा की जिंदगी भी बिखर चुकी थी। झूठे आरोप सामने आ चुके थे। समाज ने मुंह मोड़ लिया था। मायके में भी अब उसे सहारा नहीं मिल रहा था। पहली बार उसे एहसास हुआ, जिस मां को उसने हटाया वो सिर्फ एक औरत नहीं थी, वो एक छाया थी जो सब कुछ सहकर भी घर को बचाए रखती है।

एक दिन सीमा उसी आश्रम के बाहर खड़ी थी। उसे नहीं पता था कि रामू की मां वही रहती है। वह बस एक बुजुर्ग महिला से मिलने आई थी, जिसके बारे में उसने सुना था कि वो बहुत शांत है। आश्रम के आंगन में कदम रखा। सामने वही चेहरा था – सफेद साड़ी, सिर पर पल्लू, आंखों में शांति। सीमा के पैरों तले जमीन खिसक गई। “मां…” शब्द अपने आप निकल गया। मां ने उसे देखा, पहचान लिया लेकिन चेहरे पर ना गुस्सा था, ना शिकायत। बस एक ठहरी हुई नजर।

सीमा रो पड़ी। वो मां के पैरों में गिर गई, “मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मां, मैं अंधी हो गई थी।” मां ने धीरे से उसका सिर उठाया, “बेटी, गलती वही होती है जिसे इंसान माने।” सीमा फूट-फूट कर रोने लगी। उस दिन मां ने कोई बदला नहीं लिया, कोई ताना नहीं मारा। बस इतना कहा, “जिस दिन तुम किसी मां की जगह खुद को रख पाओगी, उस दिन सब समझ जाओगी।” सीमा चली गई, लेकिन उसके भीतर कुछ हमेशा के लिए बदल गया।

कुछ दिन बाद रामू आश्रम पहुंचा। इस बार भागा नहीं, डरा नहीं। सीधे मां के सामने गया। “मां…” बस यही कहा। मां ने उसे देखा, बहुत देर तक। फिर बोली, “बैठ जा बेटा।” रामू बैठ गया। उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे, “मुझे माफ कर दो मां।” मां ने गहरी सांस ली, “माफी गलती से नहीं, दोहराने से डरने से मिलती है।” रामू रोता रहा। मां ने उसका सिर अपने कंधे पर रख दिया। कई सालों बाद वो फिर बच्चा बन गया।

लेकिन मां ने साफ कहा, “मैं अब तेरे साथ नहीं रहूंगी।” रामू चौका, “क्यों मां?” मां बोली, “क्योंकि अब मेरा जीवन किसी एक घर तक सीमित नहीं है। यहां बहुत सी बेटियां हैं, जिन्हें मां चाहिए।” रामू ने सिर झुका लिया। उसने समझ लिया, मां अब सिर्फ उसकी नहीं रही। वो उठ खड़ा हुआ, मां के पैर छुए, “मां, अगर कभी किसी मां को मेरी जरूरत पड़े तो मैं पीछे नहीं हटूंगा।” मां मुस्कुराई, “यही मेरा इनाम है।”

समय बीतता गया। रामू ने एक संस्था बनाई, बुजुर्ग माता-पिता के लिए। उसकी कहानी लोगों तक पहुंची। टीवी, अखबार, सोशल मीडिया लोग लिखने लगे, “अगर हर बेटा ऐसा हो जाए तो कोई मां सड़क पर ना सोए।” एक दिन एक कार्यक्रम में मां को सम्मानित किया गया। स्टेज पर मां खड़ी थी, पूरे हॉल ने खड़े होकर तालियां बजाई। मां ने माइक लिया, “मैं कोई महान नहीं हूं, मैं बस एक मां हूं। और मां कभी बदला नहीं लेती।” रामू नीचे खड़ा रो रहा था। उसे लगा उसने मां को खोया नहीं, वह तो और बड़ी हो गई।

कहानी यही खत्म नहीं होती, क्योंकि हर घर में कोई ना कोई मां आज भी इंतजार कर रही है। सवाल बस इतना है – हम फैसला कब करते हैं? जब मां दरवाजे पर खड़ी होती है या जब उसकी जगह खाली हो जाती है। अगर इस कहानी ने आपकी आंखें नम कर दी हो, अगर आपको अपनी मां की याद आ गई हो तो आज ही एक काम जरूर कीजिए – अपनी मां को सम्मान दीजिए। क्योंकि हर कहानी किसी ना किसी मां की खामोश चीख होती है।