पिता अपनी बेटी को जल्दी सयाना बनाने के लिए उसे दवा देता रहा। उर्दू हिंदी कहानी
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जल्दी सयाना बनाने की दवा: एक बाप की हैवानियत, एक बेटी की जंग
सर्दियों की एक कड़ाके की रात थी। अस्पताल के बाहर एक आदमी, राघव, बेचैन घूम रहा था। अंदर उसकी पत्नी जिंदगी की जंग हार रही थी। कुछ देर बाद नर्स बाहर आई और अफसोस भरे लहजे में बोली, “हम आपकी बीवी को नहीं बचा सके।” नर्स के हाथ में एक नन्ही सी बच्ची थी। राघव ने उसे सीने से लगा लिया, लेकिन उसकी आंखों से आंसू बह रहे थे। “यह मासूम बच्ची कैसे पलेगी? खुदा, यह कैसा पहाड़ मेरे ऊपर टूट पड़ा!”
बीवी की नियत घर ले जाई गई, दफनाया गया। राघव ने बेटी को अपनी बहन के हवाले करना चाहा, लेकिन बहन ने झट से बच्ची को परे कर दिया, “यह मनहूस बच्ची है, पैदा होते ही मां को खा गई।” राघव रोता हुआ अपनी बेटी को गोद में लिए घर लौट आया। उसने बेटी का नाम आरजू रखा। बाद में आरजू अपनी नानी के पास पलने लगी, राघव अकेला रह गया।
राघव मेडिकल स्टोर पर काम करता था, लेकिन शाम को घर आता तो तन्हाई उसे खा जाती। धीरे-धीरे वह नशे का आदी हो गया। अक्सर बिस्तर पर पड़ा रहता और बार-बार सोचता, “अगर यह बेटी पैदा न होती तो मेरी बीवी जिंदा होती। यह मेरी बर्बादी की वजह है।” दिन-ब-दिन वह नशे और आलस्य में डूबता चला गया।
जब आरजू 13 साल की हुई, उसकी नानी का इंतकाल हो गया। अब वह फिर अपने बाप के पास आ गई। इन 13 बरसों में उसने अपने पिता को हमेशा नफरत भरी नजरों से देखते पाया था। एक दिन आरजू ने रोते हुए कहा, “बाबा, आप मुझसे इतने रूठे क्यों रहते हैं?” राघव ने कोई जवाब न दिया। उसके दिमाग में न जाने क्या चल रहा था।
राघव कामचोर बन चुका था। बेटी बार-बार कहती, “अगर आप काम पर नहीं जाओगे तो हम खाएंगे क्या?” लेकिन वह चारपाई पर पड़ा रहता। एक दिन आरजू का चेहरा लाल हो गया, आंखों में जलन थी। वह कमजोर आवाज में बोली, “बाबा, आज मुझे बहुत बुखार है।” राघव ने उसकी तरफ देखा, अचानक उसके दिमाग में खतरनाक ख्याल आया। वह मुस्कुराकर बोला, “बेटी, फिक्र मत करो, मैं अभी दवा लाता हूं।”
राघव मेडिकल स्टोर गया, एक इंजेक्शन खरीदा और लौटकर बेटी को लगा दिया। इंजेक्शन लगते ही आरजू बेहोश हो गई। राघव एक कोने में जाकर कहकहे लगाता रहा, बार-बार इंजेक्शन को देखता और खुश होता जैसे कोई बड़ी कामयाबी हासिल की हो।

शाम को आरजू को होश आया तो उसका चेहरा तप रहा था, बुखार से बेहाल थी। यह सिलसिला चलता रहा। राघव खाने में दवा मिला देता जिससे आरजू को बुखार आ जाता, फिर वही इंजेक्शन लगाता और बहलाता, “फिक्र मत करो, सुबह तक ठीक हो जाओगी।”
एक दिन राघव ने बेटी को आवाज दी, “ओ आरजू, आज खाने में अच्छा सा बना लेना, मेरा दोस्त मनीष आ रहा है।” आरजू ने हैरत से पूछा, “कौन सा दोस्त?” राघव बोला, “वही जो बचपन में तुम्हें खिलाता था, आज लखनऊ से मिलने आ रहा है।”
सर्द रात थी। दरवाजे पर दस्तक हुई। मनीष आया, दोनों गले मिले। मनीष ने आरजू को देखा तो चौंक गया, “इतनी कम उम्र में इतनी जवान लड़की!” उसकी आंखों में हवस थी। राघव सब समझ रहा था, मगर मक्कारी से बोला, “भाई, आज मुझे जरूरी काम है, मैं घर पर नहीं रुकूंगा, मेरी बेटी अकेली है, बेहतर है तुम वापस जाओ।” मनीष ललचाई नजरों से देखता हुआ चला गया।
राघव ने आरजू को फिर इंजेक्शन लगाया। आरजू बेहोश हो गई। राघव के चेहरे पर मुस्कान थी। यह कोई आम इंजेक्शन नहीं था। जब वह फार्मेसी में हेल्पर था, उसे पता चला था कि कुछ दवाएं लड़कियों को वक्त से पहले जवान बना देती हैं। दो साल से वह यही इंजेक्शन अपनी बेटी को दे रहा था।
पड़ोस की खाला बिलकीस अक्सर कहती, “आरजू, तू दिन-ब-दिन खूबसूरत होती जा रही है। तेरी हमउम्र मलीहा अब भी बच्ची लगती है, तू कैसे जवान हो गई?” आरजू खुद भी हैरान थी, लेकिन असल राज उसके बाप की मक्कारी थी।
घर का राशन खत्म हो रहा था, पैसे नहीं थे। आरजू ने बाप से कहा, “बाबा, ऐसे ही घर में सोते रहे तो पैसे कहां से आएंगे?” राघव ने मजदूरी छोड़ दी थी, जुए और नशे में डूबा रहता। मोहल्ले के बिगड़े लोगों के साथ जुआ खेलने लगा, सब हार गया।
शमशेर खान, जो नशे में था, कहकहा लगाकर बोला, “अब तो मैं तेरी बेटी को अपने घर ले जा सकता हूं।” राघव ने हार मान ली। रात को शमशेर खान आया, आरजू को बेहोश पाकर उठा लिया, गाड़ी में डालकर ले गया। राघव के चेहरे पर मुस्कुराहट थी, उसने बैंक से पैसे निकाल लिए।
दूसरी तरफ, आरजू की आंख खुली तो वह शानदार बेडरूम में थी। याद आया, बेहोश होने से पहले क्या हुआ था—बाप का इंजेक्शन, शमशेर का उसे उठाना। “नहीं, बाबा तो मेरा सहारा था, उसने ही मेरे साथ यह सब क्यों किया?”
शमशेर खान कमरे में आया, दरवाजा बंद किया, भूखी नजरों से देखने लगा, “तेरा बाप तुझे मेरे हाथ बेच चुका है, लाखों के एवज।” आरजू का दिल चाहा जमीन फट जाए। शमशेर आगे बढ़ा, तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, मुलाजिम ने बुलाया, शमशेर बाहर गया।
अचानक खिड़की पर हल्की दस्तक हुई। आवाज आई, “आरजू, दरवाजा खोलो, मैं हूं तुम्हारा बाबा।” आरजू डर के बावजूद बाप के साथ बाहर निकल आई। गाड़ी में बैठकर पूछा, “बाबा, कहां ले जा रहे हैं?” राघव बोला, “शमशेर मेरा दोस्त है, मुझे उससे कुछ नुकसान हुआ था, इसलिए तुम्हें उसके पास छोड़ना पड़ा, लेकिन अब छुड़ाने आया हूं।”
गाड़ी सुनसान जगह पर रुकी। सामने कई इमारतें थीं, जिनमें औरतें, लड़कियां खड़ी थीं, बेहयाई से हंस रही थीं। आरजू बोली, “बाबा, यहां से चलें।” मगर राघव ने सर्द निगाह डाली, “बरसों से तुझ पर जो खर्च किया है, अब उसे वसूल करने का वक्त आ गया है।”
राघव ने आरजू को घसीटकर एक कोठे पर ले गया। मोटी सी औरत तख्त पर बैठी थी, राघव ने आरजू को उसके कदमों में धकेल दिया। औरत ने लालची नजरों से देखा, “कमाल की चीज लाए हो, कहां से मिली यह हसीन परी?”
राघव बोला, “सिर्फ 14 साल की है, लेकिन मेरी मेहनत का नतीजा है। अब यह तुम्हारे कोठे की शान बढ़ाएगी, बस मेरा हिस्सा दे दो।”
खानमबाई बोली, “ऐसे माल के लिए हम तुम्हें कितने भी पैसे देंगे।” आरजू दरवाजे की तरफ भागी, बाहर गुंडे खड़े थे, उसे घसीटकर वापस लाया गया। वह बुरी तरह रो रही थी, “बाबा, मुझे यहां मत छोड़ो, मैं आपकी बेटी हूं।” मगर राघव ने मुंह फेर लिया।
खानमबाई बोली, “14 साल की है, लेकिन 20 साल की जवान लगती है, ऐसी हसीन शक्ल मेरे कोठे की शान बढ़ा देगी।”
राघव बोला, “जब यह पैदा होने वाली थी, इसकी मां बेवा थी, मैंने सिर्फ उसका इस्तेमाल किया। एक दिन किसी ने बताया कि बेटी पर मेहनत करो, मैंने इंजेक्शन लगाने शुरू किए, अब यही मेरी कमाई का जरिया है।”
राघव नोट गिनता रहा, खानमबाई मुस्कुराती रही। आरजू पत्थर की मूर्ति बन गई, “अब्बा, आपने यह सब क्यों किया?” वह फूट-फूटकर रोने लगी। राघव ने बेपरवाही से नोट जेब में डाले और चला गया।
राघव का इरादा था मुल्क छोड़कर बाहर ऐश करने का, लेकिन तकदीर को कुछ और मंजूर था। सड़क पार करते वक्त तेज रफ्तार ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। लोग दौड़े, उसकी गर्दन टूट चुकी थी, आंखें नीम बंद थीं। उसने आखिरी बार आसमान की तरफ देखा, फिर दम तोड़ दिया। जेब से नोटों की गड्डियां निकलीं, लोग लूट ले गए।
उधर आरजू कोठे में कैद थी। उसने तय किया, अब खुद ही अपनी जान बचानी है। रात के अंधेरे में सबने समझा वह बेहोश है, उसे कोठे के पिछले हिस्से में डाल दिया। वह अदाकारी कर रही थी। जैसे ही सब हटे, उसने शमशेर के कमरे से छुपाया खंजर निकाला, दरवाजे का ताला तोड़ा, बाहर निकल आई।
वह अंधेरी रात में भागती रही, खाला के घर पहुंच गई। खाला ने उसे गले लगा लिया। खाला का जवान बेटा भी अफसोस और हमदर्दी से देख रहा था। कुछ दिनों बाद खाला ने आरजू और अपने बेटे की शादी कर दी।
अब आरजू की जिंदगी बदल गई। उसका शौहर उसे इज्जत और मोहब्बत देता था। वह सुकून में थी। खाला ने दुआ दी, “ऐ अल्लाह, किसी की मां ना मरे, वरना औलाद दर-दर की ठोकरें खाने पर मजबूर हो जाती है।”
आरजू ने अपने बाप को सब कुछ समझा था, लेकिन उसने ही उसे जिल्लत में धकेल दिया। आखिरकार कुदरत ने इंसाफ किया—जालिम बाप लालच के साथ दुनिया से रुखसत हुआ, और मासूम बेटी को एक नया सहारा मिल गया।
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