फौजी बेटे ने बाप की इज्जत के लिए पूरी आर्मी बुला ली 🇮🇳 |Army vs Police

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उत्तर भारत के एक हरे-भरे गाँव में, जहाँ सुबह की शुरुआत गौशाला की घंटियों और पक्षियों की चहचहाहट से होती थी, वहीं रहता था किसान किशन सिंह। उसकी दुनिया बहुत छोटी थी—कुछ बीघा जमीन, मिट्टी की खुशबू, और एक ही सहारा… उसका बेटा, मेजर विक्रम सिंह, जो भारतीय सेना में तैनात था।

किशन सिंह अक्सर अपनी पगड़ी ठीक करते हुए खेतों की मेड़ पर खड़ा आसमान की ओर देखा करता और बुदबुदाता, “मेरा बेटा सरहद पर है… ताकि पूरा मुल्क चैन से सो सके।”
गाँव वाले जानते थे कि वह गरीब जरूर है, मगर स्वाभिमान में किसी राजा से कम नहीं।

विक्रम साल में एक-दो बार ही छुट्टी पर घर आता था। जब भी आता, पूरा गाँव उसे देखने उमड़ पड़ता। बच्चे उसकी वर्दी को छूकर गर्व महसूस करते। किशन सिंह की आँखें उस समय चमक उठतीं—“देखो, ये मेरा शेर है।”

लेकिन उसी गाँव में एक और नाम था—इंस्पेक्टर राणा। थाना प्रभारी। सत्ता का घमंड उसके चेहरे पर साफ झलकता था। वह कानून का रखवाला कम, इलाके का बादशाह ज्यादा बन चुका था। उसके पीछे खड़ा था जमींदार ठाकुर रणविजय सिंह, जो गरीब किसानों की जमीन हड़पने के लिए बदनाम था।

ठाकुर की नजर काफी समय से किशन सिंह की जमीन पर थी। वह जमीन छोटी जरूर थी, मगर हाईवे के पास होने के कारण उसकी कीमत बढ़ गई थी। ठाकुर ने कई बार लालच दिया—“किशन, जमीन दे दे। शहर में मकान दिलवा दूंगा।”

किशन सिंह हर बार एक ही जवाब देता, “यह मिट्टी मेरी माँ है। माँ का सौदा नहीं करता।”

ठाकुर के अहंकार को यह बात चुभ गई।

एक शाम, जब सूरज ढल रहा था और खेतों में हल्की हवा बह रही थी, तभी पुलिस की जीप किशन सिंह के घर के सामने आकर रुकी। इंस्पेक्टर राणा उतरा। उसके साथ दो सिपाही थे।

“किशन सिंह!” उसने ऊँची आवाज में पुकारा।

किशन बाहर आया। “जी इंस्पेक्टर साहब?”

“तुम पर शिकायत है कि तुमने सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा किया है। चलो, थाने चलना होगा।”

किशन हक्का-बक्का रह गया। “साहब, ये जमीन मेरे बाप-दादों की है। कागज घर में हैं।”

राणा हँसा, “कागज? कागज तो अब हमारे पास होंगे। चलो, ज्यादा बहस मत करो।”

जब किशन ने विरोध किया, राणा ने उसकी पगड़ी खींचकर जमीन पर फेंक दी। गाँव वाले सब देख रहे थे, मगर डर के कारण कोई आगे नहीं आया।

किशन की आँखों में आँसू थे, पर आवाज में अब भी साहस था—“मेरा बेटा फौज में है। वह ये जुल्म बर्दाश्त नहीं करेगा।”

राणा ने तिरस्कार से कहा, “तेरा बेटा सरहद पर होगा। यहाँ का राजा मैं हूँ।”

किशन को थाने ले जाया गया। लॉकअप में डाल दिया गया। उस पर दबाव डाला गया कि वह जमीन के कागजों पर दस्तखत कर दे।

उसी रात विक्रम छुट्टी पर घर पहुँचा। उसने सोचा था बाबा को चौंका देगा। लेकिन घर सुनसान था। टूटी चारपाई, बिखरे सामान और जमीन पर पड़ी पगड़ी देखकर उसका दिल काँप गया।

पड़ोसी दौड़कर आए। “विक्रम बेटा… इंस्पेक्टर राणा तुम्हारे बाबा को उठा ले गया।”

विक्रम की आँखों में खून उतर आया। उसने जमीन से पगड़ी उठाई, सीने से लगाई और बोला, “जिस हाथ ने यह पगड़ी उछाली है, वह हाथ सलामत नहीं रहेगा।”

वह सीधे थाने पहुँचा। वर्दी में, मेडल्स सीने पर चमक रहे थे।

“मेरे पिता को किस जुर्म में गिरफ्तार किया?” उसने शांत लेकिन दृढ़ स्वर में पूछा।

राणा कुर्सी पर पैर फैलाकर बैठा था। “ये बॉर्डर नहीं है, फौजी। पुलिस स्टेशन है। यहाँ तुम्हारी वर्दी की कोई कीमत नहीं।”

विक्रम ने संयम रखा। “मैं कानून का रास्ता चाहता हूँ। मेरे पिता को रिहा कर दीजिए।”

राणा ने हँसते हुए उसे धक्का दे दिया। “निकल जाओ, वरना तुम्हें भी अंदर कर दूँगा।”

उस क्षण विक्रम को लगा जैसे उसकी वर्दी का अपमान हुआ हो। उसने सीमा पर गोलियाँ झेली थीं, लेकिन अपने ही देश में यह तिरस्कार… असहनीय था।

वह बाहर आया, गहरी साँस ली और अपने कमांडिंग ऑफिसर, कर्नल शर्मा, को फोन लगाया।

“सर, आज मेरी वर्दी की तौहीन हुई है। मेरे पिता पर जुल्म हो रहा है।”

कर्नल की आवाज सख्त हो गई। “पूरी बात बताओ।”

सब सुनकर कर्नल बोले, “यह सिर्फ तुम्हारा मामला नहीं। यह भारतीय सेना की इज्जत का सवाल है। तुम वहीं रहो। हम आ रहे हैं।”

पंद्रह मिनट बाद गाँव की सड़कों पर सेना के ट्रकों की गड़गड़ाहट गूँज उठी। पूरी बटालियन नहीं, लेकिन एक मजबूत टुकड़ी थी—कानूनी मर्यादा में रहकर समर्थन देने के लिए।

थाने को चारों ओर से घेर लिया गया।

“कोई फायर नहीं,” कर्नल ने आदेश दिया, “हम कानून के खिलाफ नहीं, कानून के दुरुपयोग के खिलाफ खड़े हैं।”

थाने के अंदर अफरा-तफरी मच गई। राणा के चेहरे का रंग उड़ गया।

कर्नल शर्मा आगे बढ़े। “इंस्पेक्टर राणा, आप पर आरोप है कि आपने एक नागरिक पर अत्याचार किया और एक आर्मी ऑफिसर का अपमान किया। तुरंत कैदी को रिहा करें।”

उसी समय ठाकुर रणविजय भी पहुँच गया। “जानते हो मैं कौन हूँ? मेरी पहुँच ऊपर तक है!”

कर्नल ने ठंडे स्वर में कहा, “हम भी जानते हैं कि कानून सबके लिए बराबर है।”

जिला एसपी और मीडिया को सूचना दी जा चुकी थी। मामला अब छिप नहीं सकता था।

डर के मारे एक सिपाही ने लॉकअप की चाबी थमा दी।

विक्रम अंदर दौड़ा। उसके पिता घायल हालत में बैठे थे।

“अब्बा…” उसकी आवाज भर्रा गई।

किशन ने मुस्कुराने की कोशिश की। “मुझे पता था तू आएगा।”

विक्रम ने हथकड़ियाँ खोलीं। पिता को सहारा देकर बाहर लाया।

गाँव वाले जमा हो चुके थे। पहली बार उन्होंने देखा कि कानून का दुरुपयोग करने वालों के सामने भी कोई खड़ा हो सकता है।

एसपी ने मौके पर राणा को निलंबित किया। ठाकुर के खिलाफ जमीन हड़पने और साजिश का केस दर्ज हुआ।

कर्नल शर्मा ने विक्रम के कंधे पर हाथ रखा। “याद रखो, हम कानून से ऊपर नहीं। मगर जब कानून को झुकाया जाए, तो उसे सीधा करना भी हमारा कर्तव्य है।”

कुछ महीनों बाद अदालत ने फैसला सुनाया। राणा बर्खास्त हुआ। ठाकुर की अवैध संपत्तियाँ जब्त हुईं।

किशन सिंह अपने खेत में फिर हल चला रहा था। विक्रम छुट्टी खत्म होने से पहले उसके साथ मेड़ पर बैठा था।

“बेटा,” किशन बोला, “तूने फौज नहीं, मेरी इज्जत बुला ली थी उस दिन।”

विक्रम मुस्कुराया, “अब्बा, फौज की ताकत हथियारों में नहीं, सम्मान में होती है।”

गाँव में अब लोग डरते नहीं थे। उन्हें पता था कि वर्दी का मतलब सिर्फ ताकत नहीं, जिम्मेदारी भी है।

यह कहानी केवल एक बेटे की नहीं, उस रिश्ते की है जहाँ इज्जत, मिट्टी और वर्दी एक साथ खड़ी हो जाती हैं। जब अन्याय हद पार कर जाए, तो खामोशी गुनाह बन जाती है। मगर न्याय हमेशा संगठित साहस से जीतता है।

और उस दिन गाँव ने देखा—एक फौजी बेटे ने अपने बाप की इज्जत के लिए पूरी आर्मी नहीं, बल्कि पूरी सच्चाई को खड़ा कर दिया था।