“बाजार चौराहे पर गरीबों की जेब काट रहा था दरोगा, सादी ड्रेस वाली IPS ने सबके सामने किया खुलासा”

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महाशिवरात्रि से एक दिन पहले शहर का माहौल अलग ही था। गलियों में रंग-बिरंगी झालरें सज चुकी थीं, मंदिरों में भजन की ध्वनि गूंज रही थी और बाजारों में भीड़ उमड़ने लगी थी। लेकिन इस धार्मिक उत्साह के पीछे एक सच्चाई छिपी थी, जिसे बहुत कम लोग जानते थे। शहर के बीचों-बीच स्थित मुख्य चौराहे पर तैनात दरोगा आनंद सिंह के लिए त्योहार भक्ति का नहीं, कमाई का मौका होता था।

थाने के कमरे में उस रात हंसी और शराब की गंध फैली हुई थी। मेज पर आधी खाली बोतल, कुछ गिलास और बिखरे हुए कागज पड़े थे। आनंद सिंह कुर्सी पर पांव फैलाकर बैठा था और उसके सामने कांस्टेबल अजय और एक अन्य सिपाही खड़े थे।

“कल महाशिवरात्रि है,” अजय ने मुस्कुराते हुए कहा, “इस बार तो खूब भीड़ होगी साहब।”

आनंद ने गिलास में शराब उड़ेलते हुए जवाब दिया, “भीड़ होगी तो वसूली भी होगी। मंदिर जाने वाला कोई भी खाली हाथ नहीं जाएगा। ठेले वाले, रिक्शा वाले, दुकानदार… सबका हिसाब होगा। एक दिन में हफ्ते भर का कोटा पूरा कर लेंगे।”

तीनों ठहाका लगाकर हंसे। आनंद की आंखों में लालच साफ झलक रहा था। उसके लिए वर्दी शक्ति का प्रतीक नहीं, धौंस का हथियार थी।

उधर शहर के दूसरे कोने में आईपीएस रानी मिश्रा अपने सरकारी आवास पर फाइलें देख रही थीं। वे नई-नई इस जिले में नियुक्त हुई थीं और पिछले कुछ हफ्तों से लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि निचले स्तर पर भ्रष्टाचार गहराई तक फैला हुआ है। खासकर त्योहारों के समय गरीबों से अवैध वसूली की खबरें बार-बार सामने आती थीं।

रात काफी हो चुकी थी। रानी ने घड़ी देखी—ग्यारह बजने वाले थे। उन्होंने फाइल बंद की और गहरी सांस ली। “कल महाशिवरात्रि है,” उन्होंने सोचा, “सुबह मंदिर भी जाना है।” उन्होंने तय किया कि इस बार वे बिना वर्दी, साधारण कपड़ों में शहर का हाल देखेंगी।

सुबह होते ही शहर में रौनक बढ़ गई। मंदिरों के बाहर लंबी कतारें लग गईं। महिलाएं पूजा की थाली लेकर जा रही थीं, बच्चे हाथों में प्रसाद के पैकेट लिए इधर-उधर दौड़ रहे थे। इसी भीड़ के बीच रानी साधारण सलवार-सूट में, बाल बांधे, हाथ में दूध का लोटा लिए मंदिर की ओर बढ़ रही थीं। उनके चेहरे पर शांति थी, लेकिन मन में सतर्कता।

मुख्य चौराहे पर अचानक एक पुलिस जीप आकर रुकी। दरोगा आनंद सिंह उतरते ही ऊंची आवाज में बोला, “चलो-चलो, लाइन से खड़े हो जाओ। लाइसेंस दिखाओ। जगह घेर रखी है सबने!”

एक ठेला लगाने वाले बुजुर्ग ने हाथ जोड़कर कहा, “साहब, आज तो त्योहार है। दो वक्त की रोटी का सहारा है यह…”

आनंद ने उसकी बात काट दी, “ज्यादा भाषण मत दे। पांच सौ निकाल, नहीं तो ठेला उठवा दूंगा।”

बुजुर्ग के कांपते हाथों से नोट छीनकर आनंद आगे बढ़ गया। मंदिर जाने वाली कुछ महिलाओं को भी रोका गया। “सुरक्षा जांच है,” कहकर उनसे पैसे ऐंठे जाने लगे।

रानी कुछ दूरी पर खड़ी यह सब देख रही थीं। उनके भीतर आक्रोश उबलने लगा। उन्होंने आगे बढ़कर शांत स्वर में कहा, “साहब, यह क्या हो रहा है? त्योहार के दिन भी आप लोगों से पैसे ले रहे हैं?”

आनंद ने घूरकर देखा, “तू कौन है? अपने काम से काम रख।”

रानी ने संयम बनाए रखा। “इनसे जबरन पैसे लेना गलत है।”

भीड़ इकट्ठी होने लगी। आनंद का अहंकार भड़क उठा। “बहुत जुबान चल रही है तेरी,” उसने कहा और आवेश में आकर रानी को जोर से थप्पड़ मार दिया।

कुछ क्षण के लिए पूरा चौराहा स्तब्ध रह गया। रानी का हाथ से दूध का लोटा गिर पड़ा। सफेद दूध सड़क पर फैल गया, जैसे पवित्रता का अपमान हुआ हो।

रानी ने धीरे से अपना चेहरा उठाया। उनकी आंखों में अब शांति नहीं, दृढ़ता थी। उन्होंने स्पष्ट और ठोस आवाज में कहा, “दरोगा आनंद सिंह, आपने एक आम महिला पर हाथ नहीं उठाया है। आपने आईपीएस अधिकारी रानी मिश्रा पर हाथ उठाया है।”

आनंद का चेहरा पीला पड़ गया। “क्या… क्या कहा?”

रानी ने जेब से अपना परिचय पत्र निकाला और सामने कर दिया। “मैं इस जिले की पुलिस अधीक्षक हूं। और अभी इसी वक्त आपको निलंबित करती हूं।”

भीड़ में हलचल मच गई। कुछ लोगों ने तालियां बजानी शुरू कर दीं। आनंद के हाथ कांपने लगे। “मैडम… गलती हो गई…”

रानी ने तुरंत अपने स्टाफ को फोन किया। कुछ ही मिनटों में अतिरिक्त पुलिस बल वहां पहुंच गया। “दरोगा आनंद सिंह को हिरासत में लिया जाए,” उन्होंने आदेश दिया, “और इनके खिलाफ भ्रष्टाचार, मारपीट और पद के दुरुपयोग की धाराओं में मामला दर्ज किया जाए।”

वही कांस्टेबल, जो कुछ देर पहले आनंद के साथ हंस रहे थे, अब सिर झुकाए खड़े थे। आनंद को उसकी ही जीप में बैठाकर ले जाया गया। चौराहे पर खड़े लोग एक-दूसरे को देख रहे थे—जैसे वर्षों का डर अचानक टूट गया हो।

मंदिर की घंटियां बज रही थीं। रानी ने जमीन से लोटा उठाया। पास खड़ी एक बुजुर्ग महिला ने कहा, “बेटी, आज तूने सच में महादेव की पूजा की है।”

रानी की आंखें नम हो गईं। उन्होंने मंदिर जाकर शिवलिंग पर दूध चढ़ाया और मन ही मन संकल्प लिया कि यह सिर्फ शुरुआत है।

आने वाले दिनों में जांच तेज हुई। एंटी करप्शन टीम ने पुराने रिकॉर्ड खंगाले। त्योहारों पर अवैध वसूली के वीडियो सामने आए। कई दुकानदारों और रिक्शा चालकों ने बयान दिए। आनंद सिंह की अवैध संपत्ति का भी खुलासा हुआ।

मामला अदालत पहुंचा। सबूत इतने मजबूत थे कि उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। विभागीय जांच के बाद उसे सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

कुछ महीनों बाद वही चौराहा बदल चुका था। ठेले वाले बिना डर के काम कर रहे थे। मंदिर जाने वालों के चेहरे पर सुकून था। पुलिस की जीप गुजरती तो लोग सिर झुकाकर सम्मान करते, भय से नहीं, विश्वास से।

एक शाम रानी निरीक्षण पर निकलीं। सूर्यास्त की सुनहरी किरणें शहर पर बिखर रही थीं। वही बुजुर्ग ठेला वाला मुस्कुराते हुए बोला, “मैडम, अब लगता है पुलिस सच में हमारी है।”

रानी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “पुलिस हमेशा आपकी थी। बस हमें अपना कर्तव्य याद रखना था।”

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रानी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “पुलिस हमेशा आपकी थी। बस हमें अपना कर्तव्य याद रखना था।”

जीप आगे बढ़ गई। हवा में ठंडक थी, लेकिन माहौल में गर्मजोशी। महाशिवरात्रि का वह दिन शहर के इतिहास में एक मोड़ बन गया था। उस दिन सिर्फ शिवलिंग पर दूध नहीं चढ़ा था, बल्कि अन्याय पर न्याय की जीत का अभिषेक हुआ था।

भ्रष्टाचार कितना भी ताकतवर क्यों न हो, एक दिन सच के सामने झुकता ही है। और जब वर्दी अपने असली अर्थ को समझ ले, तो समाज में विश्वास फिर से जन्म लेता है। यही इस कहानी का संदेश है—हिम्मत, ईमानदारी और सच्चाई कभी हारती नहीं।