बेटा 6 साल बाद जज बनकर लौटा, तो बूढ़ी माँ ट्रेन में भीख मांगती मिली, फिर जो हुआ!.. .
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एक माँ की ममता और बेटे का विश्वासघात
वाराणसी की पवित्र धरती पर, जहां पतित पावनी गंगा बहती है, एक छोटे से कच्चे घर में पार्वती और उसका बेटा रवि रहते थे। उनकी गरीबी इतनी गहरी थी कि दो वक्त की रोटी भी उनके लिए एक विलासिता थी। पार्वती एक विधवा थी, जिसके पास अपने बेटे के भविष्य को संवारने के लिए केवल अपने दो हाथ और असीम ममता थी। खाटों पर कपड़े धोकर और लोगों के बर्तन मांझकर वह जो भी कुछ सिक्के कमाती, उन्हें अपने आंचल में संजोकर रखती थी, ताकि रवि अपनी पढ़ाई जारी रख सके।
जैसे-जैसे रवि बड़ा हुआ, उसकी आँखों में वकालत की पढ़ाई कर एक बड़ा आदमी बनने का सपना पलने लगा। इस सपने को साकार करने के लिए पार्वती ने अपनी बंजर जमीन भी गांव के एक क्रूर जमींदार के पास गिरवी रख दी। दिन-रात की कड़ी मेहनत और धुएं वाले चूल्हे के सामने काम करने के कारण उसकी आँखों की रोशनी धीरे-धीरे धुंधली पड़ने लगी थी। फिर भी जब वह शहर से रवि के लिए कानून की महंगी किताबें खरीद कर लाती, तो उसके चेहरे पर संतोष और खुशी की चमक होती थी।
रवि अपनी मां के इस अतुलनीय बलिदान को समझता था। रात के सन्नाटे में, जब मिट्टी के दीये की हल्की रोशनी में वह अपनी किताबें पढ़ता, तो पार्वती उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरती रहती। मां के दर्द भरे और फटे हुए हाथों का स्पर्श उसे भीतर तक छू जाता था। वह चुपचाप आंसू बहाता और मन ही मन यह दृढ़ संकल्प लेता कि एक दिन वह इस गरीबी की जंजीरों को तोड़कर अपनी मां को दुनिया की हर खुशी और सम्मान देगा।
आखिरकार वह दिन आ ही गया, जब रवि को उच्च शिक्षा और अपने सपनों को उड़ान देने के लिए दिल्ली जैसे महानगर के लिए प्रस्थान करना था। वाराणसी रेलवे स्टेशन पर, लोगों की भारी भीड़ और अंजान चेहरों के बीच पार्वती अपने बेटे के लिए कुछ रोटियाँ और आम का अचार बांध रही थी। उसके दिल में अपने इकलौते बेटे से दूर जाने का गहरा दर्द था, लेकिन उसने अपनी ममता को छुपाते हुए रवि के माथे पर दही और चीनी का पवित्र तिलक किया और उसे आशीर्वाद दिया।

पूर्ण मां की उस चमचमाती रात में, स्टेशन के एक कोने में खड़े होकर रवि ने अपनी मां के दोनों हाथ पकड़ लिए और रोते हुए कहा कि वह बहुत जल्दी एक बड़ा आदमी बनकर वापस लौटेगा। वह अपनी मां को इस गरीब जिंदगी से निकालकर अपने साथ ले जाएगा। पार्वती ने आंसू भरी आँखों से उसे गले लगाया और ट्रेन में चढ़ने को कहा। जैसे ही ट्रेन ने सीटी बजाई और धीरे-धीरे प्लेटफार्म छोड़ने लगी, पार्वती वहीं जमीन पर बैठ गई और दूर जाती हुई ट्रेन को तब तक देखती रही, जब तक वह आँखों से ओझल नहीं हो गई।
रवि के जाने के बाद वह छोटा सा कच्चा घर पार्वती के लिए एक सोनी और डरावनी गुुफा के समान हो गया था। अब सुबह और शाम से किसी को जगाना नहीं पड़ता था, और न ही रात को किसी के लौटने का इंतजार रहता था। गंगा के घाटों पर अब भी वह रोज जाती, लेकिन अब उसकी प्रार्थनाओं में केवल रवि की सफलता और उसकी कुशलता की मन्नतें होती थीं। हर गुजरते दिन के साथ उसका शरीर कमजोर होता जा रहा था, लेकिन अपने बेटे के वापस लौटने की अटूट उम्मीद ही उसकी एकमात्र ताकत और जीने का सहारा बनी हुई थी।
शहर की संकरी गलियों में पार्वती भूख और प्यास से लड़ते हुए अपना अस्तित्व बचाए रखने का संघर्ष कर रही थी। वहीं दूसरी ओर, दिल्ली की चढ़ी हुई सड़कों पर रवि एक बिल्कुल अलग जीवन जी रहा था। उसने उच्च न्यायालय में सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ी और खुद को समाज में स्थापित करने की पूरी कोशिश की। लेकिन उस नई दुनिया में रवि को अपनी पहचान को छुपाने में बहुत मुश्किलें आ रही थीं, क्योंकि वह एक निम्न जाति से था।
रवि ने महसूस किया कि इस दुनिया में सफलता पाने के लिए केवल मेहनत और पढ़ाई काफी नहीं थी। उसे यह समझ में आया कि एक अमीर परिवार से जुड़ने के लिए, उसके पास सही सामाजिक पहचान होनी चाहिए। उसने इस नज़रिए से अपनी मां के बारे में सोचने की बजाय, शालिनी जैसे उच्च वर्ग की लड़की से संबंध बनाना शुरू किया। लेकिन अपने बेटे के सपनों को साकार करने के लिए माँ ने जो कुर्बानियाँ दी थीं, रवि उसे पूरी तरह से भूल चुका था।
रवि ने शालिनी से शादी करने का निर्णय लिया और उसने अपनी गरीबी और पुराने जीवन के बारे में झूठ बोला। उसने कहा कि उसके माता-पिता का एक दुखद दुर्घटना में निधन हो गया। शालिनी के परिवार के सामने वह खुद को एक अमीर और प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करने में सफल हुआ।
लेकिन नियति के खेल के चलते, एक दिन रवि को दिल्ली में अपनी मां का सामना करना पड़ा। एक दिन रवि की पत्नी शालिनी और अन्य अधिकारी काशी विश्वनाथ एक्सप्रेस से वाराणसी के लिए रवाना हुए। रवि की मंशा थी कि वह वाराणसी में अपने पुराने इलाके में कदम न रखे, लेकिन नियति ने उसे वहीं ले आकर खड़ा कर दिया, जहाँ से उसने अपनी यात्रा शुरू की थी।
वाराणसी स्टेशन पर जब रवि ट्रेन से बाहर निकला, तो उसे अपने पुराने घर के सामने खड़ी अपनी मां, पार्वती को देखा। वह अब पूरी तरह से अंधी हो चुकी थी और स्टेशन पर भीख मांग रही थी। उसकी हालत देखकर रवि का दिल फट गया। वह अपनी मां को पहचान नहीं पा रहा था, लेकिन उसके दिल में गहरे घाव थे। रवि ने सोचा, “क्या यह वही मां है, जिसने अपने खून और पसीने से मुझे इस मुकाम तक पहुँचाया?”
यह दृश्य रवि के लिए एक कड़ा और दर्दनाक सबक था। उसने महसूस किया कि जो कुछ भी वह अब तक कर रहा था, वह उसकी मां के बलिदानों के बिना संभव नहीं था। वह अपनी मां को गोद में उठाकर गंगा के घाट पर ले गया, जहाँ उसने अपनी मां के पैरों को धोकर उन्हें शांति और सम्मान दिया।
रवि ने इस दिन तय किया कि वह अपने जीवन की शेष यात्रा केवल अपनी मां के साथ बिताएगा और उसे वह सब देगा, जो उसने कभी नहीं दिया।
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