बेटा DM बनकर लौटा तो माँ-बाप रोड के किनारे भीख मांग रहे थे बेटे ने देखा फिर जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी
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“बेटा DM बनकर लौटा तो माँ-बाप रोड के किनारे भीख मांग रहे थे, बेटे ने देखा फिर जो हुआ, इंसानियत रो पड़ी”
भाग 1: आकाश का संघर्ष
4 साल का वक्त कोई छोटा नहीं होता। चार साल में इंसान की पूरी जिंदगी बदल जाती है, उसकी पहचान, उसका सपना, उसकी सोच। आकाश का जीवन भी कुछ ऐसा ही था। वह एक साधारण किसान का बेटा था, जिसने बचपन में गरीबी और भूख देखी थी। वह जानता था कि उसने जितना भी कुछ पाया है, वह सिर्फ मेहनत और सपनों के बल पर हासिल किया है।
आकाश का सपना था कि वह एक दिन बड़ा आदमी बनेगा, और वह सपने अपने माता-पिता की थकी हुई आँखों में देखता था। उसकी मां हर दिन उसे यह समझाती थी कि बेटा, हमारी तरह जिंदगी मत जीना, कुछ बड़ा करना। आज वही आकाश विदेश से लौटकर आ रहा था, लेकिन अब वह सिर्फ एक बेटा नहीं था, वह एक डीएम बन चुका था। उसके पास सब कुछ था — ऊंची पोस्ट, बड़ी गाड़ी, सरकारी रुतबा। फिर भी, आकाश का दिल वहीं था, जहां उसने अपने सपने देखे थे, और वह चाहता था कि वह अपने माता-पिता को हैरान कर दे, उन्हें अपनी सफलता दिखाए।

भाग 2: गांव लौटते हुए
आकाश ने अपने आसपास की सारी जिम्मेदारियों से खुद को कुछ दिन के लिए मुक्त किया। उसने पत्नी या रिश्तेदारों से कोई संपर्क नहीं किया। सीधा टैक्सी ली और गांव का रास्ता बताकर चल पड़ा। चार साल बाद वही पुरानी सड़कें, वही पेड़, वही खेत, सब कुछ पहले जैसा था, लेकिन अब सब कुछ अजनबी सा लग रहा था। उसके दिल में पुराने दिनों की यादें ताज़ा हो रही थीं। मां का सुबह अंधेरे में उठकर चूल्हा जलाना, पिता का खेतों में काम करना, और हर दिन यही कहना कि बेटा, तू पढ़ ले, हमारी तरह जिंदगी मत जीना।
गाड़ी अचानक मंदिर के पास रुक गई। टैक्सी ड्राइवर ने कहा, “बस दो मिनट का काम है।” आकाश ने बिना किसी झिझक के हामी भर दी, वह अभी जल्दी नहीं था। गाड़ी से बाहर निकलकर वह मंदिर की सीढ़ियों पर खड़े लोगों को देख रहा था। कुछ भिखारी बैठे थे, जिनमें एक बुजुर्ग आकाश की नजरों के सामने आया। वह फटे कपड़ों में, बढ़ी हुई दाढ़ी और धूल से सना हुआ था। उसकी आँखें ऐसी थीं, जो आकाश के दिल को बेचैन कर देती थीं।
आकाश ने खुद को समझाया कि वह सब वहम कर रहा है, लेकिन फिर भी उसे एक बार फिर उस बुजुर्ग की तरफ देखा। यह क्या था? उसकी आत्मा कुछ अजीब सी बेचैनी से भर उठी। वह टैक्सी का दरवाजा खोलकर बाहर चला गया और मंदिर की सीढ़ियों की तरफ बढ़ने लगा। कदम भारी हो रहे थे, जैसे उसे कोई जंग लड़नी हो।
भाग 3: पिता की पहचान
जैसे ही वह उस बुजुर्ग के पास पहुंचा, वह आदमी सिर झुकाए बैठा था, और भीख मांग रहा था। आकाश का दिल कांपने लगा। उसका हाथ कांपने लगा और उसने खुद को समझाया कि यह उसका भ्रम है, लेकिन फिर भी उसके कदम रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। जब वह उस बुजुर्ग के पास पहुंचा, तब उसका दिल रुक गया।
वह आदमी कोई और नहीं, उसका पिता मोहन सिंह था। वही पिता, जिसने उसे बचपन में कंधों पर बैठाकर स्कूल भेजा था। वही पिता जिसने अपनी भूख दबाकर बेटे का पेट भरा था। आज वही पिता सड़क किनारे बैठा भीख मांग रहा था। आकाश पूरी तरह से चौंक गया।
आकाश घुटनों के बल बैठ गया, उसकी आवाज कांपने लगी, “पिताजी!” उस बुजुर्ग ने सिर उठाया, और एक पल के लिए उसकी आंखें खाली थीं, फिर अचानक पहचान की एक झलक मिली और उसने कहा, “आकाश?” दोनों की आँखों से आंसू बहने लगे। आसपास लोग थे, शोर था, लेकिन उस पल आकाश और उसके पिता के लिए पूरी दुनिया गायब हो चुकी थी।
आकाश बार-बार पूछता रहा, “मां कहां है? घर कहां है? गांव क्यों नहीं गए?” लेकिन पिता बस सिर झुकाए बैठे रहे। थोड़ी देर बाद उन्होंने बस इतना कहा, “बेटा, अब घर हमारा नहीं रहा।”
यह सुनते ही आकाश के सीने में आग भर गई। वह डीएम था, अफसर था, लेकिन उस पल वह सिर्फ एक बेटा था। वह अपनी सबसे बड़ी हार देख रहा था। उसकी आंखों के सामने जैसे धुंध छा गई। घर हमारा नहीं रहा। यह शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे। जिस घर के लिए उसने इतने साल मेहनत की थी, वही घर अब उसके मां-बाप का नहीं था।
भाग 4: पिता की कहानी
आकाश कुछ बोलना चाहता था, लेकिन गला जैसे बंद हो गया था। पिता की आंखें जमीन पर टिकी थीं। उनमें शर्म थी, दर्द था, और एक ऐसा सन्नाटा था जो शब्दों से ज्यादा बोलता था। पिता ने धीरे-धीरे बताना शुरू किया कि कैसे बेटे के विदेश जाने के बाद सब कुछ बदलने लगा।
शुरुआत में सब ठीक था, लेकिन धीरे-धीरे बहू की मां का आना और फिर घर में उसका टिकना, और उसके बाद रोज-रोज के ताने, अपमान, और बेइज्जती। पिता ने बताया कि कैसे एक दिन उन्हें बरामदे में सोने के लिए कहा गया और धीरे-धीरे घर में उनकी मौजूदगी बोझ बन गई। हर बात पर उन्हें एहसास दिलाया जाता कि वे किसी काम के नहीं हैं, बस खाते हैं और पड़े रहते हैं।
आकाश का दिल अंदर से टूटता जा रहा था। वह सोच रहा था कि जिस बेटे पर उसे सबसे ज्यादा भरोसा था, वही बेटा कितनी आसानी से कट गया था। पिता ने आगे बताया कि जब उन्होंने बेटे से बात करने की कोशिश की, तो फोन बंद मिला। बहू ने साफ मना कर दिया कि बेटे के पास वक्त नहीं है और फिर एक दिन वह पल भी आया जब बहू ने साफ-साफ कह दिया कि अगर घर छोड़ना है तो छोड़ दे, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता।
आकाश ने कांपते हाथों से पिता का हाथ पकड़ा, जो अब ठंडा और सूखा हो चुका था। उस हाथ में अब वह मजबूती नहीं थी, जिसे पकड़ कर वह बचपन में चलना सीखा था।
भाग 5: घर की तलाश
आकाश ने पिता के साथ गांव जाने की कोशिश की, लेकिन वहां कोई सहारा नहीं था। थोड़े बहुत पैसे थे, जो जल्दी खत्म हो गए। फिर शहर की सड़कों पर दिन कटने लगे। मंदिर के बाहर बैठना, लोगों की दया पर जीना यही उनकी नई दुनिया बन गई थी।
आकाश यह सब सुनकर अंदर से कांप रहा था। उसकी आंखों के सामने मां का चेहरा घूम गया। उसने घबराकर पूछा, “मां कहां है?” पिता ने हाथ से इशारा किया, “यह पास में झुग्गी में।”
यह सुनते ही आकाश बिना कुछ सोचे उठ खड़ा हुआ। उसका दिल जोर से धड़क रहा था। वह उस रास्ते पर चल पड़ा, जहां हर कदम के साथ उसका अफसर होना पीछे छूटता जा रहा था और सिर्फ एक गुनहगार बेटा बच रहा था। उसे नहीं पता था कि मां को किस हाल में देखेगा, लेकिन उसे इतना जरूर पता था कि अब कहानी सिर्फ दर्द की नहीं रहने वाली थी।
भाग 6: मां की झुग्गी
पिता आगे-आगे चल रहे थे। उनकी चाल में थकान थी, झुकाव था, और एक ऐसी मजबूरी थी जो उम्र से नहीं, हालात से आती है। आकाश उनके पीछे चलता जा रहा था। लेकिन उसके दिमाग में कोई आवाज नहीं थी, बस शोर था यादों का, पछतावे का, और उस अपराध बोध का जिसे वह 4 साल तक अनदेखा करता रहा था।
थोड़ी देर बाद पिता एक नीले रंग की पुरानी त्रपाल के सामने रुके। वही उनकी दुनिया थी। सड़क किनारे गंदगी और धुएं के बीच एक छोटी सी झुग्गी, जो बारिश में टपकती थी और गर्मी में भट्टी बन जाती थी। पिता ने त्रिपाल को हल्का सा उठाया और धीरे-धीरे बोले, “मीना देख, बेटा आया है।”
आकाश ने खड़े होकर झुग्गी के अंदर झांका। अंदर अंधेरा था, बदबू थी, और जमीन पर एक पतली सी चादर बिछी थी जिस पर उसकी मां बैठी थी। मीना देवी, वही मां, जिसके हाथों की रोटी खाकर वह बड़ा हुआ था। वही मां, जिसने अपनी चूड़ियां बेचकर उसकी फीस भरी थी। आज वही मां, एक कोने में बैठी थी।
आकाश ने झुग्गी के बाहर आकर खड़ा हो गया। उसकी आंखों के सामने जैसे धुंध छा गई थी। घर हमारा नहीं रहा। यह शब्द उसके कानों में बार-बार गूंज रहे थे। जिस घर के लिए उसने रात दिन मेहनत की थी, वही घर अब उसके मां-बाप का नहीं था।
आकाश ने मां से धीरे-धीरे सब पूछा। मां ने ज्यादा कुछ नहीं कहा। बस इतना बताया कि कैसे एक-एक दिन बोझ बनता गया। कैसे बहू की आवाज में मिठास खत्म होती गई। कैसे घर में उनकी बातों की कोई कीमत नहीं रही। मां ने यह भी बताया कि कई रातें उन्होंने भूखे पेट काटी हैं, ताकि बेटे को फोन पर यह ना लगे कि सब ठीक नहीं है।
आकाश ने कांपते हाथों से पिता का हाथ पकड़ा, जो ठंडा और सूखा हो चुका था। उस हाथ में अब वह मजबूती नहीं थी, जिसे पकड़ कर वह बचपन में चलना सीखा था।
भाग 7: आकाश की निर्णय की रात
आकाश ने फैसला किया कि वह अपने माता-पिता के लिए एक नया घर बनाएगा। उसने गांव में जमीन खरीदी और एक छोटा सा घर बनवाया। अब उसके माता-पिता सड़क पर नहीं थे। उन्होंने अपने बेटे के लिए जो कुछ भी किया, आकाश ने उनका कर्ज चुकाया।
लेकिन असली परीक्षा अभी बाकी थी। उसे खुद को समाज से भी लड़ना था। जो रिश्ते उसने बनाए थे, उन्हें भी अब तोड़ना था, क्योंकि वह जानता था कि कुछ रिश्ते निभाने से ज्यादा जरूरी होता है उन्हें छोड़ देना।
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