“मशीन खराब है, मेरे पापा ज़िंदा हैं!” – गरीब बच्ची की दहाड़ सुनकर डॉक्टर के होश उड़ गए!

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“मशीन खराब है, मेरे पापा ज़िंदा हैं!” – गरीब बच्ची की दहाड़ सुनकर डॉक्टर के होश उड़ गए!

अस्पताल की उस ठंडी सफेद रोशनी वाली कॉरिडोर में जिंदगी और मौत का खेल चल रहा था। जहां मशीनों की बीप बीप की आवाज इंसानी सांसों से ज्यादा अहमियत रखती थी। शहर के मशहूर सिटी केयर अस्पताल के जनरल वार्ड के कोने वाले बिस्तर पर 45 साल का दीनाना पड़ा था। उसका शरीर मिट्टी और चूने से सना हुआ था, जो इस बात का गवाह था कि वह एक मजदूर है। कल शाम एक निर्माणाधीन इमारत से गिरने के बाद उसे यहां लाया गया था। उसके सिर पर पट्टियां बंधी थी और मुंह पर ऑक्सीजन मास्क लगा हुआ था। बिस्तर के पास बैठी थी 14 साल की गौरी। उसकी फ्रॉक जगह-जगह से फटी हुई थी और आंखों में आंसुओं का समंदर था, लेकिन वह रो नहीं रही थी। वह बस अपने पिता के सीने को टकटकी लगाए देख रही थी, जो बहुत धीमी गति से ऊपर-नीचे हो रहा था। गौरी के लिए दीनाना सिर्फ एक पिता नहीं बल्कि उसकी पूरी दुनिया था। मां के गुजर जाने के बाद दीनाना ने ही ईंट पत्थर ढोकर उसे पाला था। आज वही चट्टान जैसा पिता बेसुध पड़ा था।

तभी अचानक वह मनहूस आवाज गूंजी। कार्डियक मॉनिटर से एक लंबी तीखी बीप की आवाज आने लगी। पी स्क्रीन पर जो हरी लकीर अब तक ऊपर-नीचे हो रही थी, वह एकदम सीधी हो गई। सपाट। वार्ड में हड़कंप मच गया। वहां मौजूद नर्स, जिसका नाम सिस्टर विनीता था, दौड़कर आई। उसने मॉनिटर देखा और एक गहरी सांस ली। चेहरे पर दुख से ज्यादा काम खत्म होने की राहत थी। उसने फाइल उठाई और ड्यूटी पर मौजूद डॉक्टर समीर को आवाज दी। डॉक्टर समीर, जो अपनी काबिलियत से ज्यादा अपने गुस्से और अहंकार के लिए जाने जाते थे, झुनझुनाते हुए वहां आए। उन्होंने ना तो मरीज की नब्ज देखी, ना ही उसकी आंखों की पुतलियों की जांच की। उनकी नजर सिर्फ उस महंगी मशीन की स्क्रीन पर थी।

“फ्लैट लाइन,” डॉक्टर समीर ने सपाट लहजे में कहा। उन्होंने अपनी घड़ी देखी और नर्स से कहा, “टाइम ऑफ डेथ नोट करो। सुबह के 10:15। बॉडी को मोर्चरी में शिफ्ट करने की तैयारी करो।” यह सुनते ही गौरी के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह झटके से खड़ी हो गई।

“नहीं, डॉक्टर साहब नहीं!” वह चीखी।

डॉक्टर समीर ने उसे अनदेखा किया और जाने के लिए मुड़ने ही वाले थे कि गौरी ने डॉक्टर का रास्ता रोक लिया। उसकी नन्ही हथेलियां कांप रही थी, लेकिन उसकी आंखों में एक अजीब सी जिद थी। वह दौड़कर अपने पिता के पास गई और अपना कान उनके सीने पर रख दिया। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। फिर उसने अपना सिर उठाया और डॉक्टर की आंखों में आंखें डालकर एक ऐसी बात कही, जिसने पूरे वार्ड को चौंका दिया।

“डॉक्टर साहब, आपकी मशीन झूठ बोल रही है। यह मशीन खराब है,” गौरी ने पूरी ताकत से चिल्लाया। “मेरे बाबा का दिल अभी भी धड़क रहा है। मैंने सुना है यह मशीन टूटी हुई है। इसे बदलिए।”

डॉक्टर समीर का चेहरा गुस्से से लाल हो गया। एक गंदी, मैली बच्ची, जो शायद स्कूल भी नहीं जाती होगी, वह शहर के सबसे बड़े कार्डियोलॉजिस्ट को मशीन और मेडिकल साइंस के बारे में बता रही थी। यह उनकी तौहीन थी।

“सिक्योरिटी!” डॉक्टर समीर ने चिल्लाकर कहा, “इस लड़की को यहां से बाहर निकालो। यह पागल हो गई है। मरीज मर चुका है और यह ड्रामा कर रही है।” दो गार्ड गौरी की तरफ लपके। लेकिन गौरी ने अपने पिता का हाथ कसकर पकड़ लिया।

“छोड़ो मुझे! मैं सच कह रही हूं,” वह रोते हुए गिड़गिड़ाई। “डॉक्टर अंकल, बस एक बार, बस एक बार अपने हाथ से चेक कर लीजिए। मशीन पर भरोसा मत कीजिए। एक बार इंसान पर भरोसा करके देखिए। प्लीज।”

उसकी आवाज में इतना दर्द और गहरा विश्वास था कि डॉक्टर समीर के कदम जो बाहर जाने के लिए उठ चुके थे, अचानक रुक गए। पूरे वार्ड की निगाहें उन पर थीं। अपनी इज्जत बचाने के लिए ही सही, या शायद उस बच्ची की जिद को गलत साबित करने के लिए डॉक्टर समीर वापस मुड़े।

“ठीक है,” उन्होंने गुस्से में स्टेथोस्कोप गले से उतारा। “मैं अभी साबित कर देता हूं कि तुम गलत हो और विज्ञान सही।”

डॉक्टर समीर बिस्तर के पास आए। उन्होंने दीनाना की कलाई पकड़ी। उनकी उंगलियां नब्ज टटोलने लगीं। चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक मुस्कान थी जो यह कहने के लिए तैयार थी कि मैंने कहा था ना। लेकिन अगले ही पल डॉक्टर समीर के चेहरे का रंग उड़ गया। उनकी उंगलियां दीनाना की कलाई पर जम गईं। उनकी आंखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने झटके से ऊपर देखा। सामने मॉनिटर पर अभी भी सीधी सपाट लाइन चल रही थी, जो मौत का संकेत थी। लेकिन उनकी उंगलियों के नीचे दीनाना की कलाई में एक बहुत ही धीमी लेकिन स्पष्ट धड़कन महसूस हो रही थी।

“धक धक,” मरीज जिंदा था।

डॉक्टर समीर ने तुरंत स्टेथोस्कोप अपनी कानों में लगाया और दीनाना की छाती पर दोबारा रखा। “थक थक, थक थक” आवाज बहुत धीमी थी लेकिन स्पष्ट थी। एक बिजली के झटके की तरह डॉक्टर समीर हरकत में आ गए।

“सिस्टर, क्रैश कार्ड लाओ, जल्दी! एड्रेनालाइन का इंजेक्शन तैयार करो!” उनकी आवाज में अब वह सुस्ती और लापरवाही नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी घबराहट और तेजी थी।

“ऑक्सीजन फ्लो बढ़ाओ! तुरंत!”

वार्ड में जो सन्नाटा मौत की खबर के साथ छाया था, वह अब भागदौड़ और चीखपकार में बदल गया। जिस मरीज को अभी-अभी मुर्दा घोषित किया गया था, उसके चारों तरफ अब डॉक्टरों और नर्सों का घेरा बन गया। डॉक्टर समीर की नजर उस कार्डियक मॉनिटर पर पड़ी, जो अब भी सपाट लकीर दिखा रहा था। उन्होंने गौर से देखा कि सेंसर का तार पीछे से हल्का सा कटा हुआ था और सॉकेट ढीला था। शर्म और गुस्से के मारे डॉक्टर समीर ने उस सेंसर को खींचकर जोर से जमीन पर दे मारा।

“कबाड़!” वह दांत पीसते हुए बुदबुदाए।

वह अपनी हार मानने को तैयार नहीं थे।

गौरी वहीं कोने में दीवार से सटकर खड़ी थी। अपने दोनों नन्हे हाथ जोड़े हुए। उसकी आंखों से अब वह खौफ गायब हो चुका था। उसकी जगह उम्मीद की एक लौ जल रही थी।

अद्भुत जीत: गौरी ने अपनी जिद से किया कुछ ऐसा जो डॉक्टर नहीं कर पाए

5 मिनट की कड़ी मशक्कत, सीपीआर और इंजेक्शन के बाद दीनाना के शरीर में एक जोरदार हरकत हुई। उसका सीना ऊपर उठा और उसने एक लंबी खरखराती हुई गहरी सांस ली। जैसे कोई बहुत देर बाद पानी के अंदर से बाहर आया हो।

“सांसे स्थिर हो रही हैं सर,” नर्स विनीता ने राहत की सांस लेते हुए कहा।

डॉक्टर समीर पसीने से तरबतर हो चुके थे। वह दो कदम पीछे हटे और पास पड़ी कुर्सी पर धम्म से बैठ गए। उन्होंने अपनी महंगी मेडिकल डिग्री, अपने सालों के अनुभव और अपने अहंकार को अपनी ही आंखों के सामने चखनाचूर होते हुए देखा था।

एक अनपढ़ मजदूर की 14 साल की बेटी ने उन्हें वह पाठ पढ़ा दिया था जो दुनिया के किसी मेडिकल कॉलेज की मोटी किताबों में नहीं लिखा था कि मशीनों के आंकड़ों से बड़ा होता है इंसान का दिल और अपनों का रिश्ता।

वह धीरे से उठे और कांपते कदमों से गौरी के पास गए। वह बच्ची अब दौड़कर अपने पिता के पास जा चुकी थी और उनका खुरदरा हाथ चूम रही थी। डॉक्टर समीर, जो कभी किसी गरीब मरीज के रिश्तेदार से सीधे मुंह बात नहीं करते थे, आज घुटनों के बल गौरी के सामने बैठ गए।

“माफ करना बेटा,” उनकी आवाज भारी थी और गला रुंधा हुआ था। “अगर तुम आज जिद नहीं करती, तो मैं एक जिंदा इंसान को मुर्दा घर भेज देता। तुमने अपने पिता को बचाया है। मैंने नहीं।”

गौरी ने आंसू भरी आंखों से मुस्कुराते हुए कहा, “बाबा कहते हैं मशीनें लोहे की होती हैं। डॉक्टर अंकल उनमें जान नहीं होती। जान तो भरोसे में होती है।”

डॉक्टर समीर ने सिर हिलाया। उनकी आंखों में नमी थी। वह भारी मन से वार्ड से बाहर निकल आए। उन्हें ताजी हवा की जरूरत थी। लेकिन जैसे ही वह कॉरिडोर में पहुंचे, सामने अस्पताल के ट्रस्टी और डीन डॉक्टर हरीश खड़े थे। डॉक्टर हरीश का चेहरा गुस्से से लाल था।

लेकिन इसलिए नहीं कि एक मरीज की जान खतरे में थी, बल्कि इस लिए कि उनकी प्रतिष्ठा खतरे में थी।

अस्पताल का असली चेहरा

डॉक्टर हरीश ने दबी हुई लेकिन कड़क आवाज में कहा, “यह क्या तमाशा है? एक मरीज को मृत घोषित करने के बाद उसे वापस जिंदा करना। क्या आप को अंदाजा भी है कि अगर यह बात बाहर मीडिया में गई तो सिटी केयर की क्या साख रह जाएगी?”

डॉक्टर समीर हैरान रह गए। उन्हें लगा था कि प्रशासन खुश होगा कि एक जान बच गई।

“सर, एक जान बची है,” डॉक्टर समीर ने कहा, “मशीन खराब थी, यह हमारी गलती है। हमें मानवता के नाते कुछ रियायत देनी चाहिए।”

डॉक्टर हरीश ने बेरुखी से उनकी बात काट दी। “तुम्हें उस लड़की का मुंह बंद करना होगा। उसे कुछ पैसे दे दो। फीस माफ कर दो। जो करना है करो। लेकिन यह खबर इस अस्पताल की चार दीवारी से बाहर नहीं जानी चाहिए कि हमारे आईसीयू के उपकरण कबाड़ हैं।”

डॉक्टर समीर को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। अंदर एक बेटी अपने पिता की जान बचाकर भगवान का शुक्रिया अदा कर रही थी, और बाहर अस्पताल प्रशासन इसे बिजनेस का नुकसान मान रहा था।

अजनबी की मदद से गौरी ने किया पर्दाफाश

तभी अचानक अस्पताल के गेट पर एक काली कार आई। बाहर से एक आदमी बाहर निकला। उसने बारिश की परवाह किए बिना गौरी और उसके पिता की मदद की। वह आदमी एक पत्रकार था, जिसका नाम शेखर था। शेखर ने अस्पताल के अंदर के राज को खोज लिया था। उसने गौरी को और उसके पिता को सुरक्षित जगह पहुंचाया।

गौरी की मदद से शेखर ने सबूत जुटाए और मीडिया में पूरी घटना को प्रकट किया। सिटी केयर अस्पताल की सच्चाई दुनिया के सामने आ गई। अस्पताल की अव्यवस्थित मशीनों, गंदे डॉक्टरों, और खराब सुविधाओं को लेकर एक बड़ा खुलासा हुआ। अस्पताल की प्रतिष्ठा अब पूरी तरह से टूट चुकी थी।

समाप्ति: एक संघर्ष की जीत

गौरी ने एक छोटे से कदम से बड़े बदलाव की शुरुआत की थी। वह 14 साल की बच्ची, जो एक बेबस मजदूर की बेटी थी, आज पूरी दुनिया के सामने सच्चाई उजागर कर रही थी। अस्पताल की लापरवाही के खिलाफ उसका संघर्ष, हर गरीब मरीज की आवाज बन गया।

उसने हमें यह सिखाया कि इंसानियत और भरोसा मशीनों से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होते हैं। डॉक्टर हरीश की प्रतिष्ठा तो गिर गई, लेकिन गौरी का दिल और उसका संघर्ष आज भी हर किसी की प्रेरणा बन गया है।