रातों रात बदल गई जिंदगी। जब बीवी ने दिया धोखा तब हाथ में लगा करोड़ों का खजाना
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अर्जुन की कहानी: धोखे से मिली दौलत और बदलती जिंदगी
परिचय: एक अनजान गांव का अनजान आदमी
उत्तर प्रदेश के एक ऐसे गांव का आदमी था, जिसका नाम नक्शे पर भी ढूंढना मुश्किल था। नाम तो महाभारत के महान योद्धा का था — अर्जुन। लेकिन उसकी जिंदगी किसी हारी हुई अंतिम जंग से कम नहीं थी। 40 की उम्र में जिंदगी के बोझ ने उसकी कमर झुका दी थी। उसकी आंखें गालों के गड्ढों में इस कदर ढस गई थीं जैसे वहां रोशनी ने जाने से इंकार कर दिया हो। चेहरे पर पड़ी झुर्रियां उम्र की नहीं, बल्कि भूख, लाचारी और अनगिनत बजते अपमानों की कहानी कहती थीं।
गांव वाले उसे ‘अर्जुन कबाड़ी वाला’ कहते थे। पर यह नाम भी शायद इज्जतदार था। पीठ पीछे लोग उसे निकम्मा, आवारा और बहुत कुछ कहते थे। जब वह गलियों से गुजरता, तो कुछ औरतें अपने बच्चों को घर के अंदर खींच लेतीं, जैसे वह कोई बीमारी हो। बच्चे झुंड बनाकर उस पर हंसते, “देखो कचरे का राजा आया, इसकी औकात तो देखो।”
अर्जुन बस एक फीकी, बेजान मुस्कान के साथ सिर झुका कर आगे बढ़ जाता। उसके पास इन जहरीले तानों का जवाब देने के लिए न तो शब्द थे, न बची-खुची हिम्मत।
खुशियों से भरी पुरानी जिंदगी
लेकिन अर्जुन हमेशा से ऐसा नहीं था। एक वक्त था जब उसकी दुनिया भी हंसी-खुशी से चल रही थी। पत्नी माया के हाथों की चूड़ियों की खनक और दो छोटे बच्चों — एक बेटा रोहन और एक बेटी प्रिया — की खिलखिलाहट से उसकी छोटी सी झोपड़ी भी महल जैसी लगती थी। वह मेहनत मजदूरी करता था और जो कुछ कमाता था, उसमें गुजर-बसर कर लेता था।
फिर गरीबी की दीमक ने धीरे-धीरे सब कुछ खोखला करना शुरू कर दिया। अर्जुन बीमार हो गया। महीनों तक बिस्तर पर पड़ा रहा। घर में जो थोड़ा बहुत जमा था, इलाज में लग गया। कमाई का जरिया बंद हुआ तो घर में फाके पड़ने लगे। कई रातें पूरा परिवार सिर्फ पानी पीकर सो जाता था।
माया की चूड़ियों की खनक अब तानों में बदल चुकी थी। वह रोज कहती, “तुम्हारी बीमारी ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा।”

धोखा और तन्हाई
फिर एक सुबह माया बच्चों का हाथ पकड़ कर दरवाजे पर खड़ी हो गई। उसकी आंखों में आंसू नहीं, बल्कि बेबसी और गुस्सा था। उसने कहा, “मैं और मेरे बच्चे इस जहन्नुम में घुट-घुट कर मर नहीं सकते।” और वह चली गई।
उस रात अर्जुन सिर्फ अकेला नहीं हुआ था, वह अंदर से टूट गया था। उसकी झोपड़ी में अब सिर्फ वह था और उसकी खामोश सिसकियां। दीवारों से आती सीलन की बदबू उसे हर पल उसकी हारी हुई जिंदगी की याद दिलाती थी। बीमारी ने शरीर तोड़ा था, पर तन्हाई और अपमान ने उसकी आत्मा को मार दिया था।
रोज़गार की तलाश और कचरा उठाना
जिंदा रहने की मजबूरी उसे हर सुबह अपनी टूटी हुई हिम्मत के आखिरी टुकड़ों को समेटने पर मजबूर करती। वह अपनी पीठ पर फटा हुआ बोरा लाता और गांव के बाहर विशाल कचरे के पहाड़ की ओर चल पड़ता — जो अब उसकी रोज़ी-रोटी का जरिया बन चुका था।
दुनिया की नजरों में वह सिर्फ कचरे का कलेक्टर था। शहर भर की सारी गंदगी, सड़ांध और बीमारियां वहीं आकर जमा होती थीं। लेकिन अर्जुन के लिए वह मैदान उसकी किस्मत का मैदान था। वह लकड़ी की छड़ी से प्लास्टिक की बोतलें, लोहे के जंग लगे टुकड़े तलाशता। यही उसकी दौलत थी।
दिनभर की मेहनत के बाद जब वह कबाड़ी की दुकान पहुंचता, तो हाथ में ₹10-20 ही आते। इतने में पेट की आग मुश्किल से शांत होती। लेकिन फिर एक सुबह कुछ ऐसा हुआ, जो उसकी जिंदगी बदल देगा।
खजाने की खोज
सर्दी की धुंध ने पूरे मैदान को ढक रखा था। अर्जुन ने अपनी आदत के अनुसार नया कोना चुना और कचरे की गीली बदबूदार परतें हटाई। अचानक उसकी छड़ी किसी सख्त धातु से टकराई। उसने जोर लगाया और एक पुरानी, झंग लगी लोहे की पेटी निकाली।
उस पेटी के अंदर उसने नोटों की गड्डियां और सोने के गहने पाए। नोट 500 के नए और तगड़े थे। सोने की चमक सूरज की किरणों जैसी तेज थी। अर्जुन की आंखें खुली की खुली रह गईं। उसने सोचा, “यह दौलत करोड़ों की है।”
लेकिन खुशी के साथ-साथ एक खौफ भी था। यह दौलत किसी अपराधी की थी, जिसका पीछा उसे मौत तक ले जा सकता था।
बदलाव की शुरुआत
अर्जुन ने इस खजाने को छुपा दिया और धीरे-धीरे अपनी जिंदगी सुधारने लगा। उसने अपनी झोपड़ी की मरम्मत करवाई, एक किराना दुकान खोली, और गांव में सम्मान कमाया। धीरे-धीरे वह आसपास के गांवों का सप्लायर बन गया।
उसने बच्चों का स्कूल दाखिला कराया और गांव में एक स्कूल और अस्पताल बनवाए। उसकी मदद से गांव में साफ पानी के कुएं खोदे गए। उसका नाम अब ‘अर्जुन सेठ’ हो गया था।
खतरा और सामना
लेकिन विक्रम सिंह, गैंगस्टर जिसने वह खजाना खो दिया था, जेल से रिहा हो गया। उसने अपनी खोई हुई दौलत वापस पाने की ठानी। अर्जुन के ऊपर खतरा मंडराने लगा।
एक रात विक्रम सिंह के गुंडे उसे पकड़ने आए। मगर गांव वालों के समर्थन से विक्रम सिंह को हार माननी पड़ी। अर्जुन ने साबित कर दिया कि असली दौलत पैसा नहीं, इज्जत और समाज का भरोसा है।
अंत और सीख
अर्जुन ने वह खजाना पुलिस को सौंप दिया और पूरे मामले की सच्चाई बताई। उसकी ईमानदारी और नेक दिली ने उसे गांव का मसीहा बना दिया।
यह कहानी हमें सिखाती है कि किस्मत चाहे जो भी दे, उसे सही दिशा में इस्तेमाल करना जरूरी है। दौलत से बड़ा धन होता है इंसानियत और समाज की सेवा।
आपकी राय: अगर आप अर्जुन की जगह होते तो उस पैसे का क्या करते? क्या गलत पैसे से की गई भलाई को सही माना जा सकता है? कृपया अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।
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