रात के 2:00 बजे इंस्पेक्टर ने की IPS अफसर से, बदतमीजी फिर आगे जो हुआ..
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रात के 2:00 बजे: इंस्पेक्टर की बदतमीज़ी और आईपीएस अफ़सर का दांव
यह कहानी है सोनिया वर्मा की, जो सिर्फ एक खूबसूरत और जवान लड़की नहीं थी, बल्कि एक आईपीएस अफ़सर थी। रात के 2:00 बजे का सन्नाटा पूरी तरह से सड़कों पर पसरा था। सोनिया वर्मा उस सुनसान रास्ते पर अकेली चल रही थीं। उनका दिल तेज़ धड़क रहा था, लेकिन उनके इरादे मज़बूत थे।
चलते-चलते जब वह एक वीरान चौराहे पर पहुँचीं, तो सड़क के बीचों-बीच एक दरोगा, अशोक, और एक सिपाही, महेश, खड़े थे। वर्दी के गुरूर और नशे की चमक में डूबे उन दोनों ने, एक खूबसूरत लड़की को रात के इस पहर अपनी तरफ़ आता देखकर, ख़ुद को शिकारी समझने की भूल कर दी। वे बेसब्री से उसका इंतज़ार करने लगे।
अचानक दरोगा अशोक सड़क के बीच में आकर खड़ा हो गया और सोनिया वर्मा का रास्ता रोकते हुए उसे ऊपर से नीचे तक घूरने लगा। सोनिया वर्मा बिना रुके, उसके साइड से निकलकर आगे की तरफ़ चलने लगीं, लेकिन अब दरोगा अशोक और सिपाही महेश उसके पीछे चलने लगे।
सोनिया का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। अचानक दरोगा अशोक पीछे से तेज़ी से उसकी तरफ़ बढ़ा और उसके बाजू को पकड़ते हुए बोला, “हाँ ना मैडम जी, कहाँ जा रही हो, और हमसे मिले बिना ही जा रही हो?” दोनों के चेहरों पर एक अजीब सा नशा था।
सोनिया ने शांति से कहा, “वो एक ज़रूरी काम था। वहाँ से होकर घर जा रही हूँ।”
दरोगा अशोक ने उसको पकड़ कर अपनी तरफ़ खींचते हुए कहा, “मुझे नहीं बताओगी कि वह क्या ज़रूरी काम था।”
सोनिया ने जवाब दिया, “वो एक ज़रूरी मीटिंग थी।”
अचानक दोनों पुलिस वाले ठहाका मारकर हँसने लगे। दरोगा अशोक बोला, “हम सब जानते हैं इस वक़्त कौन सी मीटिंग चलती है। हमारे साथ भी आज मीटिंग कर लो।”
दरोगा अशोक ने उसके बाजू को ज़ोर से खींचा और सोनिया की आस्तीन फट गई। सोनिया अब समझ चुकी थी कि उसके साथ कुछ गलत होने वाला है। उसकी आँखों में डर झलक रहा था, लेकिन यह डर नहीं, बल्कि आने वाले ख़तरे का सटीक आकलन था।
दरोगा अशोक ने अपने कदम और आगे उसकी तरफ़ बढ़ाए। तभी वह अचानक सोनिया की तरफ़ झपटा। सोनिया ने एक पल भी देर न की और पूरी ताक़त से दौड़ पड़ी। उसकी साँसें तेज़ थीं, दिल धक-धक कर रहा था।
मगर दरोगा अशोक भी पीछे हटने वाला नहीं था। उसने तेज़ी से पास आकर सोनिया को पीछे से धक्का दे दिया। वह धूल में गिर पड़ी। दरोगा अशोक नीचे झुका, उसकी आँखों में अजीब सी चमक थी। सोनिया ने एक झटके में उसे दूर धकेल दिया, उठी और पीछे हटने लगी।
दरोगा अशोक ने उसे फिर पकड़ा, और सिपाही महेश से चिल्लाकर कहा, “चल, बीयर निकाल।”
सिपाही महेश तेज़ी से गाड़ी की तरफ़ भागा और बोतल उठा लाया। दरोगा अशोक ने बीयर का ढक्कन खोला और सोनिया, जो सड़क के बीचोंबीच बैठी थी, उसके ऊपर बीयर उंडेलने लगा। सोनिया पूरी तरह से भीग चुकी थी।
दरोगा अशोक ने आधी बीयर पीने के बाद सोनिया को बोतल पकड़ाते हुए कहा, “ये ले, पी।”
सोनिया ने डरते हुए कहा, “नहीं, मैं नहीं पीती।”
दरोगा अशोक ने घूरते हुए कहा, “पी ले, वरना परेशानी होगी, पछताना पड़ेगा।”

सोनिया ने, जो कि एक आईपीएस अफ़सर थी, दरोगा अशोक के हाथ से बोतल लेकर कहा, “ठीक है, अगर यही चाहते हो तो देखो।” सोनिया ने एक झटके में ही वह बीयर पी ली। यह देखकर दोनों सिपाही हैरान रह गए।
देखते ही देखते, सोनिया का सारा वजूद जैसे चकरा गया। उसने अपने दोनों हाथ सिर पर रख लिए। यह क्या हो रहा है? सोनिया मदहोशी जैसे हालात में सड़क के बीचोंबीच लेट गई। वह नीम-बेहोश सी पड़ी थी, और उसके कानों में दरोगा अशोक और सिपाही महेश की धीमी हँसी गूंज रही थी।
दरोगा अशोक उसके क़रीब आया, झुककर उसके चेहरे को गौर से देखने लगा। उसने हाथ बढ़ाया और उसके बालों की एक लट उँगलियों में थामी। मुस्कुराते हुए बोला, “अब देखेंगे कहाँ भागेगी।”
मगर जैसे ही दरोगा अशोक ने आगे बढ़कर सोनिया के गाल को छूने की कोशिश की, तभी ‘छन’ की आवाज़ के साथ धमाका हुआ। सोनिया ने ज़मीन पर पड़ी बीयर की बोतल उठाई और पूरी ताक़त से दरोगा अशोक के सिर पर दे मारी। दरोगा अशोक लड़खड़ाता हुआ नीचे गिर पड़ा।
सोनिया, जिसके शरीर में अभी भी बीयर का नशा दौड़ रहा था, काँपते हुए ख़ुद को संभालने लगी। उसके कदम लड़खड़ा रहे थे, पर हिम्मत नहीं हारी थी।
ज़मीन पर पड़े दरोगा अशोक ने सिपाही महेश से चिल्लाकर कहा, “क्या देख रहा है? पकड़ इसे। इसकी सज़ा इसे ज़रूर मिलेगी!”
सिपाही महेश तेज़ी से उसकी तरफ़ भागा और सोनिया के बाजू को पकड़ लिया। दरोगा अशोक भी गुस्से में उठ खड़ा हुआ और सोनिया को खींचकर पास लाया। “तूने मेरे साथ चाल चली। अब देख मैं क्या करता हूँ।”
दरोगा अशोक उसे पकड़कर अपनी गाड़ी की तरफ़ ले जाने लगा। सोनिया ने पूरे ज़ोर से ख़ुद को छुड़ाने की कोशिश की। दरोगा अशोक ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और सोनिया को अचानक गाड़ी के अंदर धक्का दे दिया।
अचानक दरोगा अशोक ने तेज़ी से दरवाज़ा बंद किया और ख़ुद भी अंदर घुस आया। उसकी आँखों में वैशियाना चमक थी। उसने सोनिया की ठोड़ी को सख़्ती से पकड़ लिया और गरज कर बोला, “अब देखता हूँ तुम्हारा ग़ुरूर कहाँ जाता है। तुमने मुझे सबके सामने ज़लील किया है। अब तू चीखेगी और मेरी जीत होगी।”
सोनिया ने पलटवार करते हुए, गाड़ी में रखे टॉर्च को उठाया और पूरी ताक़त से सीधा दरोगा अशोक के जबड़े पर दे मारा। दरोगा अशोक एक चीख़ के साथ पीछे हट गया।
सोनिया ने पल गवाए बग़ैर दरवाज़ा खोला और अंधेरे में तेज़ी से बाहर निकल कर दौड़ पड़ी। पीछे दरोगा अशोक पागलों की तरह उसका पीछा कर रहा था। सोनिया ने सड़क के किनारे एक पुराना सा गेट देखा। वह एक खंडहरनुमा गोदाम था। सोनिया लड़खड़ाती हुई अंदर घुसी और एक मशीन के पीछे छिप गई।
कुछ पल बाद गेट धड़ाम से खुला और दरोगा अशोक अंदर आ गया। “कहाँ छिपी है? निकल बाहर।”
अचानक दरोगा अशोक की नज़र मशीन के पास गई। वह चुपचाप सोनिया के पास आया और कसकर पकड़ लिया।
सोनिया ने एकदम अपना चेहरा दरोगा अशोक की तरफ़ घुमाया और बोली, “देखो, तुम यह सब ठीक नहीं कर रहे। जो तुम अब करने वाले हो, उसका नतीजा तुझे बहुत बुरा मिलेगा। कानून तुझे इसकी सज़ा देगा।”
दरोगा अशोक ठहाका मारता हुआ बोला, “ए पागल लड़की, क्या तुम अभी भी सोचती हो कि मैं तुम्हें ऐसे ही जाने दूँगा? आख़िर मैं इंस्पेक्टर हूँ। जो मैं चाहूँगा, वही क़ानून है।”
सोनिया ने दरोगा अशोक को ज़ोर से पीछे की तरफ़ धकेला और गोदाम से बाहर निकलकर दौड़ पड़ी। लेकिन अभी वह कुछ दूर ही पहुँची थी कि सामने सिपाही महेश रास्ता रोककर खड़ा था। सोनिया मुड़ी, तो वहाँ से दरोगा अशोक भागता हुआ आ गया।
सोनिया के लिए तमाम रास्ते बंद हो गए थे। उसने हार मानकर आँखें बंद कर लीं और वहीं सड़क के बीच बैठ गई।
दरोगा अशोक ने बूट ज़ोर से सड़क पर मारते हुए कहा, “उठ और चुपचाप ख़ुद ही जाकर गाड़ी में लेट जा। वरना यहीं सड़क पर तेरा अंजाम कर दूँगा।”
सोनिया ने धड़कते दिल के साथ धीरे-धीरे अपने हाथ आँखों से हटाए और काँपती आवाज़ में कहा, “तुम लोग समझते हो तुम्हारे पास वर्दी है, इसलिए जो चाहो कर सकते हो। लेकिन याद रखना, ज़ुल्म कभी छुपता नहीं।”
दरोगा अशोक ने कहा, “ऐसे नहीं मानेगी? ए, जाओ, रस्सी लेकर आओ।”
सिपाही महेश रस्सी निकाल कर ले आया। सोनिया ने सोचा, अगर मैं बँध गई, तो फिर बचने का कोई रास्ता नहीं होगा।
अचानक उसने दरोगा अशोक से कहा, “अच्छा, ठीक है। जो तुम चाहते हो, मैं इसके लिए तैयार हूँ।” यह सुनकर दोनों ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़े।
दरोगा अशोक क़रीब आया। सोनिया ने अपने चेहरे पर एक अजीब सा सुकून बना लिया, जैसे वह सच में हार मान चुकी हो। दरोगा अशोक ने रस्सी सिपाही महेश के हाथ से लेते हुए कहा, “अब तो यह ख़ुद ही तैयार है। फिर रस्सी की कोई ज़रूरत नहीं। बस सीधे गाड़ी में बैठ जा।”
सोनिया इस सुनसान सड़क पर गाड़ी की तरफ़ चलने लगी। दरोगा अशोक और सिपाही महेश अपना मक़सद पूरा करने के लिए उसके पीछे-पीछे बेताबी से चलने लगे।
गाड़ी के पास पहुँचते ही सोनिया ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला और एकदम मुड़कर दरोगा अशोक से बोली, “देखो, मैं तुम्हारी बात मान तो रही हूँ, लेकिन मैं तुम्हें यह एक बार फिर बता रही हूँ कि इसका अंजाम तुम्हारे साथ बहुत बुरा होगा।”
दरोगा अशोक मुस्कान के साथ बोला, “ओहो, अंजाम! अब तेरा अंजाम हमारे हाथों में है। बाक़ी किसी अंजाम की फ़िक्र छोड़ दे।”
सोनिया आहिस्ता-आहिस्ता कदम अंदर गाड़ी में रखा। दरोगा अशोक झुककर उसके क़रीब होते हुए तंज़िया अंदाज़ में बोला, “शाबाश! बहुत अक़लमंद हो गई हो।”
और जैसे ही दरोगा अशोक गाड़ी के अंदर दाख़िल होने लगा, उसी वक़्त पीछे से एक और पुलिस की गाड़ी वहाँ आ गई। दरोगा अशोक ने पुलिस देखी, तो दरवाज़ा बंद करके जल्दी से उस गाड़ी की तरफ़ बढ़ा।
सोनिया ने जल्दी से दरवाज़ा खोला और बाहर आकर दरोगा अशोक के पास पहुँची। उसका हाथ पकड़ कर बोली, “हाँ, अब क्या हुआ?” सोनिया ने मोहब्बत भरी नज़रों से उसकी तरफ़ देखा और उसे अपने पास लाते हुए बोली, “मुझे बहुत भूख लगी है। पहले मुझे कुछ खिला दो, फिर जो करना है वह कर लेना।”
दरोगा अशोक अपनी गाड़ी की तरफ़ गया और एक बर्गर निकालकर सोनिया को पकड़ा दिया। सोनिया वहीं सड़क पर बैठकर खाने लगी। दरोगा अशोक उतावला खड़ा था, “जल्दी खाओ। वक़्त बहुत कम है।”
सोनिया मन ही मन बोली, ‘अब इन्हें और देर तक रोकना मुश्किल है। अब क्या करूँ?’
दरोगा अशोक अब पूरी तरह तैयार था। उसने आगे बढ़कर सोनिया का बाजू मज़बूती से पकड़ लिया और बोला, “चल, अब तमाशा बहुत हो गया। वक़्त बर्बाद मत कर।”
सोनिया एक पल के लिए मुस्कुराई। उसने अपनी नज़रें दरोगा अशोक की आँखों में डालते हुए धीरे से कहा, “एक शर्त है।”
दरोगा अशोक रुका और बोला, “कैसी शर्त?”
सोनिया ने प्यार भरे लहजे में कहा, “मुझ पर हाथ डालने से पहले अपनी आँखें बंद करनी होंगी।”
दरोगा अशोक पहले तो चौंका, फिर ठहाका मारकर हँस पड़ा। सोनिया दरोगा अशोक के पास आई और उसका हाथ पकड़ कर सड़क के कोने की तरफ़ ले जाने लगी। दरोगा अशोक भी उसके साथ चल पड़ा।
सोनिया वहाँ पहुँचकर बोली, “बस, यहाँ ठीक है।”
दरोगा अशोक फ़ौरन उसके बहकावे में आ गया और गुरूर में बोला, “हाँ, सही कहा तूने। मुझे डर किस बात का। चल फिर, जैसे तू कहे, वैसे ही सही।”
सोनिया ने मासूमियत से उसका हाथ अपने हाथ में लिया। फिर बोली, “नीचे सड़क पर लेट जाओ और अपनी आँखें बंद कर लो।”
दरोगा अशोक मुस्कुराता हुआ नीचे लेट गया। सोनिया कुछ देर उसके चारों तरफ़ घूमती रही। तभी सोनिया ने अपने जूते की एड़ी उसकी कलाई पर दे मारी, जहाँ वह रिवाल्वर पहने था। दरोगा अशोक दर्द से तड़प कर बैठ गया, लेकिन तब तक सोनिया उसकी बंदूक निकाल चुकी थी।
दरोगा अशोक ज़मीन पर हैरानी से बैठा रह गया। सोनिया उसके पास आई, मुस्कुराती हुई, और बोली, “मैं बस तुझे यह दिखाना चाहती थी कि अगर मैं चाहूँ, तो भाग सकती हूँ।”
सोनिया ने फिर कहा, “एक मिनट रुको। पहले मुझे यह बताओ, क्या तू सच में इतना ताक़तवर इंस्पेक्टर है कि जो चाहे वह कर सकता है?”
दरोगा अशोक ने गुरूर भरे लहजे में कहा, “हाँ, कर सकता हूँ।”
सोनिया झट से गाड़ी के अंदर गई और गाड़ी से एक लाल रंग का दुपट्टा उठाकर बाहर लाई और बोली, “यह किसका है?”
दरोगा अशोक ने तंज़िया अंदाज़ में हँसते हुए कहा, “होगा तेरी जैसी किसी लड़की का।”
सोनिया अब अपने असली मक़सद की तरफ़ बढ़ रही थी। दरोगा अशोक ने अपने मोबाइल से वह सारी तस्वीरें दिखाने लगा, जिनमें वह मासूम लड़कियों के साथ ग़लत काम कर चुका था, और बड़े गुरूर से बोला, “कल मैंने ऐसा किया, परसों वैसा किया। मुझे पकड़ने वाला कौन है? आख़िर मैं इंस्पेक्टर हूँ।”
सोनिया चुपचाप सब सुनती रही। फिर वह उसके क़रीब जाकर बोली, “वाह! तू तो बड़ा बहादुर निकला। आ, अब तेरी बहादुरी देखने का वक़्त आ गया है।” वह दरोगा अशोक को सड़क की दूसरी तरफ़ ले जाने लगी, जहाँ सिपाही महेश खड़ा था।
वहाँ पहुँचकर सोनिया मुस्कुराई और बोली, “तो क्या कह रहे थे इंस्पेक्टर साहब? तुझे पकड़ने वाला कोई नहीं।” यह कहते ही उसने अपने कपड़ों में छुपा कैमरा निकाला। वही कैमरा जिसमें दरोगा अशोक के सारे गुनाह और ग़ुरूर भरे इक़रार रिकॉर्ड हो चुके थे।
दरोगा अशोक का चेहरा उतर गया। वह घबराकर सोनिया की तरफ़ लपका, मगर उसी पल सोनिया का एक ज़ोरदार थप्पड़ उसके मुँह पर पड़ा। अब वह वहीं दरिंदा नहीं दिख रहा था, बल्कि सामने खड़ी थी एक बहादुर अफ़सर अपने असली रूप में।
तभी पीछे से दो काली जीपों की हेडलाइटें जलीं। टायरों के रुकने की आवाज़ गूंजी और कुछ कमांडो गाड़ियों से बाहर निकले।
सोनिया ने हाथ का इशारा किया और देखते ही देखते दरोगा अशोक और सिपाही महेश ज़मीन पर दबोच लिए गए।
सोनिया उसके पास आई और एक और ज़ोरदार थप्पड़ मारते हुए बोली, “तुझे पता है मैं कौन हूँ? मैं आईपीएस ऑफ़िसर हूँ और यह टीम मेरे इशारे पर यहाँ आई है। तू सोचता रहा कि खेल तू खेल रहा है, पर असल में खेल मैंने खेला है। मुझे तेरी हर हरकत का पता था, इसलिए मैंने ख़ुद तुझे पकड़ने का जाल बिछाया, ताकि तू अपने जुर्म ख़ुद क़बूल करे।”
सोनिया ने आईपीएस कार्ड जेब से निकालकर उसके सामने लहराया। दोनों की आँखें डर और हैरत से फैल गईं।
सोनिया ने लात मारकर दरोगा अशोक को नीचे गिराया और आदेश दिया, “ले जाओ इसे मेरी नज़रों के सामने से।“
कमांडो ने दोनों को गाड़ी में डाल दिया और जेल के लिए रवाना हो गए। कुछ दिनों बाद अदालत में मुक़दमा चला। सोनिया ने कैमरे की रिकॉर्डिंग और सारे सबूत जज के सामने पेश किए। अदालत ने दोनों गुनहगारों को कड़ी सज़ा सुनाई।
यह कहानी केवल मनोरंजन और शिक्षा के उद्देश्य से बनाई गई है, जो यह दर्शाती है कि अन्याय और ज़ुल्म के सामने हिम्मत और बुद्धिमानी ही असली ताक़त होती है।
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