रोज़ स्कूल के बाहर 3 अनाथ बच्चों को खाना देती थी यह महिला… 25 साल बाद उसके घर हेलीकॉप्टर उतरा

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सिंघानिया परिवार की कहानी

कमला देवी का नाम पहले केवल उन अनाथ बच्चों के लिए ही जाना जाता था, जिन्हें उसने स्कूल के बाहर अपने ठेले से खाना दिया था। स्कूल के सामने एक पुराना ठेला, एक बूढ़ी औरत और एक दिल जो हमेशा दूसरों के लिए धड़कता था। कमला का जीवन संघर्षों से भरा हुआ था। उसने कभी किसी से मदद नहीं ली, लेकिन कभी भी किसी को भूखा नहीं सोने दिया। उसके पास खुद के लिए बहुत कुछ नहीं था, लेकिन जब भी किसी बच्चे को भूखा देखा, उसने अपना दिल खोलकर उसकी मदद की।

जीवन का संघर्ष

कमला का पति एक फैक्ट्री हादसे में मारा गया था। वह अकेली अपनी जिंदगी के बारे में सोचने लगी थी। रिश्तेदारों ने कुछ समय उसकी मदद की, लेकिन बाद में वे भी अपने रास्ते पर चल दिए। कमला ने कभी किसी से नहीं कहा कि वह परेशान थी। उसने अपना जीवन पूरी तरह से खुद पर निर्भर किया। पहले घरों में बर्तन मांझे, फिर सिलाई की और अंत में सड़क के किनारे ठेला लगाकर खाना बनाने का काम शुरू किया। यही काम उसे जीवन में सुकून देता था। सुबह-सुबह वह सूरज निकलने से पहले उठती और चूल्हे पर दाल चढ़ाती, रोटियों का आटा गूंथती और स्कूल की घंटी बजने का इंतजार करती।

स्कूल के सामने ठेला

कमला का ठेला स्कूल के गेट के सामने लगता था। बच्चें आते, हंसते, खेलते और जाते। कुछ बच्चे टिफिन लेकर आते थे, कुछ बच्चों के पास टिफिन नहीं होता था। लेकिन तीन बच्चों के चेहरे हमेशा कमला के लिए अजनबी नहीं थे। वह तीन बच्चे हमेशा ठेले के पास खड़े रहते थे, उनकी आँखों में भूख होती थी, उनके पास खाना नहीं था। कमला देवी ने उन्हें देखकर कभी अनदेखा नहीं किया। उसने उन्हें कभी उनका नाम नहीं पूछा, लेकिन उन्हें अपने आशीर्वाद से भर दिया।

पहली मुलाकात

कमला देवी ने उन बच्चों को पहली बार तब देखा जब वे स्कूल के बाद गेट के पास खड़े थे और बाकी बच्चों के टिफिन झांक रहे थे। कमला का दिल नहीं माना और उसने उन्हें अपने पास बुलाया। उसने तीनों बच्चों से पूछा, “तुम लोग रोज यहां क्यों खड़े रहते हो?” सबसे बड़े बच्चे ने सिर झुका कर कहा, “अम्मा, घर नहीं है, खाने को कुछ नहीं है।”

कमला देवी का दिल पिघल गया और उसने बिना एक पल सोचे, तीनों बच्चों को गरम दाल और रोटियाँ परोस दी। बच्चे खुशी-खुशी खाना खाने लगे। जैसे कई दिनों बाद उन्हें पेट भरने का मौका मिला हो। जब खाना खत्म हुआ तो सबसे छोटे बच्चे ने धीरे से पूछा, “अम्मा, कल भी मिलेगा?” कमला देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ बेटा, कल भी मिलेगा और रोज मिलेगा।”

मां बनने का अहसास

यह वही दिन था जब कमला देवी की जिंदगी में एक नई मां बनने की परिभाषा जुड़ी। उसने बच्चों से कभी उनका असली नाम नहीं पूछा, लेकिन उसने उन तीनों बच्चों को अपना नाम दिया: रोहन, मोहन और सोहन। उसका मानना था कि नाम से ज्यादा जरूरी यह था कि वे रोज पेट भरकर स्कूल जाएं।

कमला ने खुद को एक मां के रूप में कभी पहचाना नहीं था, लेकिन उन बच्चों के लिए वह माँ थी। वह उन्हें हर दिन खाना खिलाती, उनके लिए किताबें खरीदती और उनकी फीस भी भरती। वह जानती थी कि इन बच्चों का भविष्य तभी सुधरेगा जब वह खुद उनके लिए कुछ करेगी।

समय का प्रभाव

समय बीतता गया और बच्चे बड़े होने लगे। वे अब खुद अपनी ज़िंदगी के रास्ते पर चलने लगे थे। एक दिन उन्होंने कमला देवी के पैर छुए और कहा, “अम्मा, हमें बाहर पढ़ने का मौका मिला है।” कमला देवी ने बिना किसी सवाल के सिर पर हाथ रखा और कहा, “जहां भी रहो, ईमानदार रहना और किसी भूखे को कभी खाली हाथ मत लौटाना।”

लेकिन उसके बाद बच्चों का रास्ता अलग हो गया। वे बड़े शहरों में पढ़ाई करने के लिए चले गए। कमला देवी को खुशी थी कि उसने उन बच्चों को एक अच्छा रास्ता दिखाया था, लेकिन उसका दिल खाली हो गया। उसकी झोपड़ी अब उतनी भरी-भरी नहीं रहती थी।

हेलीकॉप्टर का उतरना

एक दिन, जब कमला देवी की उम्र ढलने लगी और उसके हाथों में अब पहले जैसी ताकत नहीं रही, एक दिन ऐसा आया जब उसके छोटे से घर के सामने हेलीकॉप्टर उतरा। वह दिन उसके जीवन में एक बड़ा मोड़ लाने वाला था। उस हेलीकॉप्टर में वह तीन बच्चे थे, जो अब बहुत बड़े हो चुके थे, और जिन्होंने अपने जीवन में सफलता पाई थी।

रोहन, मोहन और सोहन अब सफल थे। रोहन को एक बड़ी कंपनी में नौकरी मिल गई थी, मोहन ने कानून की पढ़ाई पूरी की थी और एक ईमानदार वकील बन गया था, और सोहन ने खुद का व्यवसाय शुरू किया था। वे अब अपने जीवन में सफल थे, लेकिन उन्हें कमला देवी का प्यार और आशीर्वाद कभी नहीं भूलाया।

कमला देवी का सम्मान

हेलीकॉप्टर ने कमला देवी के घर के पास उतरते ही उसे आश्चर्यचकित कर दिया। जब तीनों बच्चे उतरे और उसके पास पहुंचे, तो उन्होंने उसे गले से लगा लिया। रोहन ने कहा, “अम्मा, हम आपको लेने आए हैं। अब हम आपको आराम से जीने देंगे।” मोहन और सोहन ने भी वही कहा, “आपने हमें जो दिया, वह हम कभी नहीं भूल सकते।”

कमला देवी की आँखों में आंसू थे, लेकिन इस बार वे आंसू खुशी के थे। वह जानती थी कि उसने अपनी पूरी जिंदगी को उन बच्चों के लिए समर्पित किया था, और अब वे बच्चे उसे अपने जीवन में सबसे ज्यादा सम्मान देने आए थे।

नई शुरुआत

कमला देवी के जीवन में अब एक नई शुरुआत हो रही थी। वह अब अपने बच्चों के साथ एक नए घर में रहने वाली थी, और वह जानती थी कि अब उसका काम खत्म नहीं हुआ था। अब उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा काम यह था कि वह उन बच्चों को, जिन्होंने उसकी मदद से अपना रास्ता पाया, अच्छे इंसान बनाये रखे।

समाप्ति

यह कहानी इस बात की है कि समय और प्यार हमेशा अपने तरीके से फलता है। जो औरत कभी अपने बच्चों को सड़क किनारे खाना देती थी, वही आज उस प्यार के बदले सम्मान पा रही थी। यह कहानी उस बलिदान की है, जिसने हमें यह सिखाया कि कभी भी किसी की मदद करने में कोई छोटा काम नहीं होता, क्योंकि कभी न कभी, वह मदद हमें बड़ी खुशी और सम्मान दे सकती है।